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राजनीति में शांत रस काल चल रहा -प्रभाकर चौबे
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चार साल के भाजपा सरकार के अवदान पर दृष्टि डालें, तो खोजना पड़ता है कि क्या दिया है। पेट्रोल और डीजल की जबरदस्त महंगाई है कि एक कहावत है 'जबरा मारे और रोवन ना दे।' भाजपा सरकार की सबसे बड़े देन यही है कि जनता की पिटाई कर रही है, महंगाई से बेरोजगारी से, जनता भी थक हार सी गई है। रेल में किस रूप से ठगती है, पता नहीं चलता। ठगा जाने के बाद पता लगता है। सरकार ने शायद सत्तर साल पहली बार ऐसा निर्णय लिया, जो आश्चर्यजनक है। सरकार ने निर्णय लिया है कि मिलिट्री में यूनिफार्म फौजी खुद खरीदेंगे। इसमें सरकार की मंशा है कि कोई कार्पोरेट हाउस को एकमुश्त ठेका मिले। अर्थात वह उद्योग को लाभ देना चाहती है और इस तरह निजीकरण की तरफ जा रही है। कर्नाटक की राजनीति स्थिर होने के बाद और यहां कुछ राजनीतिक हासिल नहीं होने के बाद अब भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर कुछ हलचल करने लगी है। अभी 2019 के चुनाव को देर है, लेकिन भाजपा ने मतदाताओं के बीच एक गुब्बारा छोड़ दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने चार दिन पूर्व कहा कि अब देश में जो कुछ भी होगा गरीबों के पास होगा। यह किस प्रकार का बयान है, समझ से परे है। अगर देश में जो कुछ है, वह अगर गरीबों का होगा तो बाकी लोग गरीब हो जाएंगे, मतलब ये अमीरी-गरीबी बनी रहेगी। मतलब मोदीजी जुमलों के द्वारा कुछ-कुछ बोलते रहते हैं। साथ ही यह नहीं बताते कि विशाल जनसंख्या के पास दो-तीन साल में सब कुछ कैसे पहुंच जाएगा? जो गरीबों को अमीर बना देगा? खैर, यह मोदीजी जानें, लेकिन आम जनता जानती है कि यह जुमलेबाजी है। एक बात और चौंकाने वाली कही कि 2022 सबको आवास मिलेगा। अब ये हर एक को मकान कोई आज का नारा तो है नहीं, आजादी के बाद से ही, यह नारा उठा है। भाजपा अपनी आदत के अनुसार कह सकती है कि कांग्रेस ने 70 साल में कुछ नहीं किया लेकिन एनडीए सरकार ने भी कुछ नहीं किया। आजादी के बाद ही जुलूसों में नारे लगते 'हमको कुछ नहीं चाहिए हमको चाहिए रोटी, कपड़ा, मकान' कई पीढ़ियां खप गईं, इस नारे को लगाते-लगाते। एक फिल्म की उसी थीम पर मनोज कुमार ने ही 'रोटी, कपड़ा और मकान' फिल्म बनाई थी, राजकपूर ने 'श्री 420' फिल्म में अपने ढंग से मुद्दे को उठाया था। समस्या गंभीर है, राजनीतिक दलों को इसे गंभीरता से उठाना चाहिए और निदान होना चाहिए। मोदीजी बात तो रखते हैं, आंकड़े नहीं रखते। वो इस प्रकार भारतीय राजनीति एक तरफ से जुमलों से दूर, यथार्थ की खोज में लगी है और विश्लेषण कर रही है। यह राजनीति का गंभीर कर्म है। इसे शांतिकाल तो नहीं कहेंगे, लेकिन आंतरिक विश्लेषण का कार्य कहते हैं भारतीय राजनीतिक गंभीरता की ओर बढ़ रही है। अब विचार कर रही है कि कर्नाटक चुनाव के समय जो संयुक्त विपक्षी मोर्चा को लेकर एक तरह से टाइम पास बयान दिये जा रहे थे, और जनता का मनोरंजन कर रहे थे। उससे अलग आज राजनीतिक दलों के कर्म सही दिशा में चल रहे हैं। वैसे इस समय मीडिया भी कोई मनोरंजन की वस्तु या 'लॉफ्टर चैलेंज' की तरह पेश कर रहा था। मीडिया अपने कर्म के सबसे नीचे पायदान में था उन दिनों। तीसरा मोर्चा को मीडिया केवल मनोरंजन बना देना चाहता था, जो वैश्विक पूंजीवादी साजिश थी। सवाल है कि क्या आज की राजनीतिक परिस्थिति के अनुसार तीसरा मोर्चा बनेगा? इसका उत्तर है कि बनेगा। फासिज्म के खिलाफ उदारपंथी ने जिस गंभीरता से लिया है उससे तय है कि तीसरा मोर्चा बनेगा। यह कहकर कि सीपीएम क्या तृणमूल के साथ बंगाल में जाएगा, इस तरह के बयान में मीडिया का बहुत कह षड़यंत्रकारी रोल छिपा है। एक ओर जनता की आमधारणा को पुष्ट करता है कि दोनों मिल ही नहीं सकते। सवाल यहां दोनों के मिलने का नहीं कि तृणमूल और कम्युनिस्ट क्यों मिलेंगे? लेकिन इस गठबंधन की मूलभावना को आहत नहीं पहुंचाएंगे, आपस में चुनाव लड़ेंगे। मध्यप्रदेश की स्थिति साफ कर दी गई है कि जिन हिस्सों में समाजवादी मजबूत है तो लड़ेंगी। इसी तरह जो गठबंधन का सदस्य जहां मजबूत है, वह वहां से लड़ेगा। इसमें बहुत काम्प्लीकेशन भी होगें, ये मीडिया द्वारा पैदा किया जा रहा है। मीडिया तीसरा मोर्चा ना बने, इस पर अपना जी-जान लगा देगा। कुछ मीडिया हाउस जनता के बीच लोक विचार पैदा करने की कोशिश करेगा। बनते-बनते, टूटते-टूटते बनेगा। जनसंघ के पुराने साथी याद रखें कि 1967 की संविद सरकारें कैसी बनी थीं। जनसंघ के लोग खुद कांग्रेसियों को संविद में शामिल करने लगे रहे। तो राजनीति की जरूरत सब बनवा देती है। दूर क्यों जाएं मैं 1977 में जनता पार्टी कैसे बनी और सरकार कैसे बना लिए समाजवादी, जनसंघ सहित तमाम दल शामिल हो गए और सरकार बन गई, यह राजनीतिक कंपलसेशन था। यह बात अलग है दोहरी सदस्यता के सवाल पर जनता सरकार गिर गई। दोहरी सदस्यता मतलब, जनता पार्टी की सदस्यता और आरएसएस की सदस्यता नहीं चलेगी। यह मांग समाजवादी नेताओं ने उठाई और आरएसएस वाले नहीं माने और जनता पार्टी सरकार ढाई साल में ही गिर गई। देश में कितने भी प्रयोग हुए ये सब भारतीय राजनीति को मजबूत करने के लिए हुए। लोकतंत्र सबसे अनुकूल व्यवस्था है लेकिन कुछ सांठ-गांठ करने में माहिर लोगों ने लोकतंत्र को कब्जे में कर लिया। लोकतंत्र की जो परिभाषा जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की सरकार, इसको पलट दिया और अब यह कुछ चालाक, धूर्त, बेईमान कारक वर्ग के लोगों ने इसे अपने कब्जे में कर लिया है और वैश्विक पूंजीवाद की मदद से चला रहे हैं। जनता की भागीदारी केवल वोट देने तक ही रह गई है। कभी-कभी हमारे लोकतंत्र में एकाध कर्म को अपनी करनी से हास्यापद बना देते हैं, फिर जनता समझती है मजाक। जैसे अभी कर्नाटक में चला और अमित शाह का बयान कि कांग्रेस अपने विधायकों को बाहर नहीं ले जाती तो भाजपा सरकार बनाती आजकल संसद और विधानसभा के सत्र निरंतर छोटे होते जा रहे हैं। संसद सत्र में चर्चा नहीं होती, वाकआउट होता रहता है। पिछले समय छत्तीसगढ़ का सत्र एक दिन का हुआ। हमेशा ही राजनीति की धारा ऊपर चले जरूरी नहीं है। राजनीति की एक अंतर्धारा भी बहती है, जो इस समय राजनीति की अंतर्धारा बह रही है, जो अपने अवसर पर बाहर आएगी। राजनीति की अंतर्धारा कभी-कभी खतरनाक रूप से बाहर आती है और जनता हतप्रभ रह जाती है। देश की राजनीति ऊपर से तो शांत लग रही है, जिसमें तीसरे मोर्चे की संभावनाएं टटोलने का काम चल रहा है। न्यूज चैनल के एंकर यह तो पूछते हैं कि तृणमूल और कम्युनिस्ट साथ रहेंगे कि नहीं, लेकिन यह नहीं पूछते कि महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा कैसे गठबंधन बनाएंगे? क्योंकि विगत दिनों से शिवसेना भारतीय जनता पार्टी की कल आलोचक बनी है और मुखपत्र 'सामना' लगातार भाजपा के खिलाफ मुहिम छेड़े है और तो और 'सामना' में राहुल गांधी की तारीफ भी की गई। वह तो एनडीए से अलग होने की घोषणा कर चुका है। राजनीति की शुचिता वही है, जो स्वार्थसिद्ध कर चुके दो दिन पहले अमित शाह को उद्धव ठाकरे से मिलने घर जाना पड़ा। महाराष्ट्र में उनके महत्व को समझ गए हैं। उद्धव ठाकरे से मिलकर लौटते समय पत्रकारों से कहा कि हमारा गठबंधन नहीं छूटेगा। 2019 का चुनाव भी साथ लड़ेंगे। इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति जबरदस्त आपसी राजनीतिक रिश्तों पर टिकी है। चार साल के भाजपा सरकार के अवदान पर दृष्टि डालें, तो खोजना पड़ता है कि क्या दिया है। पेट्रोल और डीजल की जबरदस्त महंगाई है कि एक कहावत है 'जबरा मारे और रोवन ना दे।' भाजपा सरकार की सबसे बड़े देन यही है कि जनता की पिटाई कर रही है, महंगाई से बेरोजगारी से, जनता भी थक हार सी गई है। रेल में किस रूप से ठगती है, पता नहीं चलता। ठगा जाने के बाद पता लगता है। सरकार ने शायद सत्तर साल पहली बार ऐसा निर्णय लिया, जो आश्चर्यजनक है। सरकार ने निर्णय लिया है कि मिलिट्री में यूनिफार्म फौजी खुद खरीदेंगे। इसमें सरकार की मंशा है कि कोई कार्पोरेट हाउस को एकमुश्त ठेका मिले। अर्थात वह उद्योग को लाभ देना चाहती है और इस तरह निजीकरण की तरफ जा रही है। इसके बाद लगता है कि रेल्वे का नंबर आएगा। धीरे-धीरे सरकार हर डिपार्टमेंट की वर्दी की धुलाई, खरीदी निजी हाथों को ठेके में सौंप देगी। इस सरकार के समय बैंकिंग व्यवस्था की जितनी दुर्दशा हुई है और अविश्वसनीय बनी है, ऐसा कभी नहीं हुआ। पोस्ट आफिस और बैंक मध्यवर्ग को कस्टेडियन और सेवा देते रहे। सरकार ने उसे अविश्वसनीय बना दिया। चार साल में मोदीजी और उनकी सरकार यह नहीं बता पाई कि उसकी औद्योगिक नीति क्या है? आर्थिक नीति क्या है? औद्योगिक नीति की घोषणा तक नहीं की। हवा में सब चल रहा है जबकि देश आजाद होते ही 1948 में प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने अपनी औद्योगिक नीति घोषित की थी। इसकी कटु आलोचना हुई। 1952 के चुनाव में आलोचना का एक मुद्दा औद्योगिक नीति भी था। दूसरी बार 1956 में 1948 की प्रथम औद्योगिक नीति की आलोचनाओं को ध्यान में रखकर सरकार ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की। यह कोई 'चोरी-चोरी चुपके-चुपके' नहीं थी। यह नीति बाकायदा पब्लिक डोमेन में आई और जिन्हें इनकी आलोचना करनी थी, उन्होंने की। कहने का मतलब ये कि वे बताएं तो मनमोहन सिंह की नीति पर चल रहे हैं? या निजीकरण, उदारीकरण, कार्पोरेट को छूट के मामले मे फर्राटा दौड़ के टै्रक पर तेजी से दौड़ रहे हैं। सन् 2004 से 2014 तक कार्पोरेट को कांग्रेस खासकर डॉ. मनमोहन सिंह पसंद रहे, लेकिन कार्पोरेट निराश हो गया, वह जिस तेजी से आर्थिक सुधार चाहता था, ऐसा नहीं हुआ। वह चाहता था कि आर्थिक सुधार तेजी से लाया जाए और पूंजीवाद भारत में मजबूती की तरफ बढ़े। अब भाजपा और दूसरे राजनीतिक दल 2019 चुनावी तैयारी में जुट गए हैं, इस समय चैलेंज आर्थिक विकास को पूंजीवाद के रास्ते पर ले जाने से रोकना तो है, लोकतंत्र को बचाना भी है, विपक्ष इस पर गौर करे।prabhakarchaube@gmail.com


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