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वनाधिकार कानून : नए प्रस्ताव के विरोध में आदिवासियों का जनप्रदर्शन
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला, धमतरी जिला, सरगुजा, सूरजपुर में वन अधिकार मंच के बैनर तले ग्रामीणों ने आदिवासी के बेदखली के फरमान, वन अधिकार कानून को सही ढंग से लागू करने अथवा मोदी सरकार द्वारा वन कानून में परिवर्तन के लिए नया प्रस्ताव पेश करने के विरोध में जिला कलेक्टरों को ज्ञापन सौपा गया. बाता दे कि छत्तीसगढ़ के धमतरी, गरियाबंद, सरगुजा, सूरजपुर जिले के ग्राम सभा को सामुदायिक वन अधिकार देने की मांग को लेकर वनवासियों ने कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन किया । उनका कहना है कि वनों का संरक्षण गांव में ग्राम सभा बेहतर तरीके से कर सकता है इसलिए इसे समिति के बजाय ग्राम सभा के अधीन किया जाए । 2 अप्रेल 2019 को छत्तीसगढ़ धमतरी जिला में जन अधिकार मंच के बैनर तले आदिवासियों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे समाजसेविका नंदिनी साहू ने कहा कि धमतरी जिला 4031. 93 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसका अधिकांश भूभाग वनों से आच्छादित है। जिले के तीन मुख्य वन परिक्षेत्र धमतरी बिरगुढ़ी और नगरी है, जहां साल के अलावा साजा, महुआ बीजा से आच्छादित। मोदी सरकार ने आदिवासियों से जुड़ी वन कानून को लेकर काला कानून का प्रस्ताव पेश किया है। इसे काला कानून इस लिए कहा जा रहा है कि इस नए कानून के प्रस्ताव में आदिवासियों को गोली मारने का भी एजेंडा जुड़ा है। बता दे कि मोदी सरकार ने वन कानून में परिवर्तन के लिए नया प्रस्ताव पेश किया है। यह कानून अंग्रेजों ने 1927 में लागू किया था। मोदी सरकार के नए प्रस्ताव के मुताविक इस प्रस्ताव के मुताविक 1927 के कानून को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा। इस प्रस्ताव में वन अधिकारियों को असीमित शक्तियां मिल जाएंगी। इतनी कि वे कानूनी तौर पर किसी पर भी गोली तक चला सकेंगे। मौत हो जाने पर सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई भी नहीं होगी।1927 के वन कानून में इस परिवर्तन के प्रस्ताव के लिए केंद्र सरकार ने एक ड्राफ्ट तैयार किया है. इस ड्राफ्ट को 7 जून तक विभिन्न राज्य सरकारों के समक्ष सलाह मशविरे के लिए पेश किया जाना है।इस ड्राफ्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वन अधिकारियों के पास वनों की ग्राम सभाओं के फैसले पर वीटो करने का अधिकार होगा। इसके साथ ही इस ड्राफ्ट में वन अधिकार एक्ट(2006) को भी कमजोर करने का प्रस्ताव है। मतलब वन अधिकार एक्ट(2006) के तहत जिन आदिवासियों को विरासत के तौर पर वनों और वन संपदा के ऊपर संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है, वो अब पूरी तरह से वन अधिकारियों के खाते में चला जाएगा। वन अधिकारी अगर चाहेंगे तो ही आदिवासियों को उनका ये अधिकार देंगे। वहीं केंद्र ने यह प्रस्ताव भी रखा है कि राज्यों के वन मामलों में केंद्र सीधे तौर पर दखल दे सकेगा।बता दें कि 1927 में अंग्रेजी हुकूमत ने जो भारतीय वन कानून लागू किया था, वो पूरी तरह से आदिवासियों का दमन करने और वन संपदा को लूटने के लिए था। आजादी के बाद की सरकारों ने भी कमोबेश यही किया। ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें इस कानून की आड़ में निर्दोष आदिवासियों को सताया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कानून मध्य भारत में नक्सलवाद को बढ़ावा देने के लिए बहुत हद तक उत्तरदायी है। इसके बाद भी सरकार ने इसे और अधिक जनविरोधी बनाने का प्रस्ताव रखा है। यह 1927 के वन कानून का जनविरोधी चरित्र ही था कि भारत सरकार को मजबूर होकर 2006 में वन अधिकार एक्ट पास करवाना पड़ा था। इस एक्ट से यह कोशिश की गई थी कि आदिवासियों और दूसरे वनाश्रितों के साथ जो अन्याय हुआ है, उसे सुधारा जा सके। वहीं दूसरी तरफ वन प्रशासन लगातार शिकायत करता रहा है कि जनसंख्या विस्फोट और विकास के नए मॉडल के बीच वनों का संरक्षण करने के लिए उसके पास पर्याप्त शक्तियां नहीं हैं। इसी बिच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि भारतीय वन अधिनियम 1927 में प्रस्तावित संशोधन को आदिवासी हितों के खिलाफ बताते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन को पत्र लिखा है। सीएम ने अपने पत्र में बताया कि वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन शुरू से ही भारत के अनुसूचित क्षेत्रों के आदिवासियों, खासतौर पर छत्तीसगढ़ के बस्तर, सरगुजा, कोरिया, कवर्धा आदि क्षेत्रों के आदिवासियों के अधिकारों पर विचार नहीं करते। वन में रहने वाले निवासियों को दमन और उत्पीड़न से न्याय दिलाने और उनके अस्वीकृत पारंपरिक अधिकारों को स्वीकार करने के लिए पहली बार 2007 में वन अधिकार अधिनियम को अधिनियमित किया गया था। प्रस्तावित संशोधन 2006 के वन अधिनियम में स्वीकृत आदिवासियों के अधिकारों की न सिर्फ उपेक्षा करते हैं बल्कि ये संशोधन आदिवासियों के जीवन में पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने में भी असफल है। संशोधन के सेक्शन 33-1-सी में जंगल में अतिक्रमण पर दंडित करने का प्रावधान है। इसकी आड़ में आदिवासियों को परेशान किया जा सकता है। बघेल ने केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन को भेजी गई चिट्ठी में कहा कि भारतीय वन अधिनियम 1927 पहले ही वन अधिकारियों को असीमित शक्तियां देता है. यह आदिवासियों का दमन करने और भारतीय संसाधनों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी. प्रस्तावित संशोधनों से यह शक्तियां पुलिस को भी मिल जाएगी और उन्हें अभियोजन से बेहतर बचाव भी उपलब्ध कराएगी. साथ ही प्रस्तावित संशोधन के सेक्शन 66 (B) के अनुसार जो भी इस अधिनियम की या इसके अंतर्गत बनने वाले नियमों की अवहेलना करेगा या इसकी अवहेलना को शह देगा, उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकेगी. कोई व्यक्ति, वन अधिकारी या राज्य सरकार का कोई अधिकारी भी प्रिसिंपल एक्ट के अंतर्गत दर्ज अपराध के मामलों को वापस नहीं ले सकेगा. यानी एक बार यदि किसी आदिवासी के खिलाफ मामला दर्ज हो गया, तो उसे वापस नहीं लिया जा सकेगा. भले ही वह अपराध उस आदिवासी के अधिकार में ही क्यों न आता हो. इससे आदिवासियों को बार-बार कोर्ट बुलाकर परेशान करने और उन पर आर्थिक बोझ डालने जैसा होगा. बघेल ने कहा है कि प्रस्तावित संशोधन से आदिवासियों की प्राकृतिक संसाधनों को अपनी सांस्कृतिक विरासत मानकर उन की सुरक्षा करने की पुरानी परिपाटी भी खत्म हो जाएगी और उनके अंदर जंगल को लेकर एक नफरत की भावना पैदा होगी, जो वन संरक्षण के लिए नुकसानदायक होगी. मुख्यमंत्री ने चिट्ठी में लिखा है कि बिलासपुर, राजनांदगांव के बैगा जनजाति और कोरबा तथा सरगुजा के पहाड़ी कोरवा जनजाति लंबे समय से स्थानांतरित कृषि करते हैं. प्रस्तावित संशोधन के चैप्टर 4(B), खासतौर पर सेक्शन 34(D)(6) में राज्य सरकार को किसी भी स्थान पर स्थानांतरित कृषि निषेध करने का अधिकार देती है, जो छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों की रीतियों के विरूद्ध है. उन्होंने लिखा है कि प्रस्तावित संशोधन के सेक्शन 34(C ) के अनुसार जंगल के कुछ क्षेत्रों को उत्पादक वन बनाया जाएगा, जहां टिंबर, पल्प, पल्पवुड, चिकित्सीय पौधे इत्यादि का उत्पादन किया जाएगा, ऐसे उत्पादक वनों से अनुसूचित क्षेत्रों का व्यवसायीकरण हो जाएगा, जो आदिवासियों के जमीन के हक के खिलाफ है और उनकी प्रथाओं में भी बाधक है. साथ ही इस संशोधन का वन अधिकार नियम 2006 में कोई संदर्भ नहीं है, जिससे यह आदिवासियों और वन निवासियों के अधिकारों के विरूद्ध है. भूपेश बघेल ने अपनी चिट्ठी भी इस बात भी जिक्र किया है कि प्रस्तावित संशोधन से आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्था की उपेक्षा होगी. उन्होंने अपनी चिट्ठी में कहा है कि पंचायत अधिनियम 1996 ग्राम सभा को आदिवासियों के अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार देता है. आदिवासी क्षेत्रों की जमीन के अधिग्रहण के पहले ग्राम सभा से मंजूरी लेना अनिवार्य है, ग्राम सभा के पास यह शक्ति है कि वह आदिवासियों के हित को प्रथम रखते हुए निर्णय ले. उन्होंने लिखा है कि प्रस्तावित संशोधन पेसा एक्ट के प्रावधानों का भी उल्लंघन करता है. आदिवासियों की जमीन के अधिग्रहण और उनकी मूल प्रथाओं में बदलाव से जुड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधित्व को नजरअंदाज कर दिया गया. प्रस्तावित संशोधन ग्राम सभाओं को पंचायत अधिनियम 1996 में मिली शक्तियों की भी अवहेलना करता है, जिसके अनुसार ग्राम सभा अपने समुदाय को नियंत्रित कर सकती है. ctc sangharsh sanvad


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