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अब्राहिम अलकाज़ी: आधुनिक भारतीय रंगमंच के पितामह
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वरिष्ठ रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी बीते 18 अक्टूबर को 90 वर्ष हो गए. इस अवसर पर उनकी बेटी अमल अल्लाना ने अपने पति के साथ मिलकर नई दिल्ली में उनके रंगकर्म का रेट्रोस्पेक्टिव 'द थिएटर ऑफ इब्राहिम अलकाजीः अ मार्डनिस्ट अप्रोच टू इंडियन थिएटर' आयोजित किया. अमल अल्लाना खुद भी प्रसिद्ध रंगकर्मी हैं. उनके पति निसार अल्लाना स्टेज डिजाइनर हैं. 15 जनवरी से तीन फरवरी तक ललित कला अकादमी में चली इस प्रदर्शनी में अलकाजी के पांच दशक लंबे करियर की झलकियां पेश की गईं. प्रदर्शनी में 200 से ज्यादा तस्वीरें, पत्र, पेंटिंग, पोस्टर, ऑडियो और वीडियो प्रदर्शित किए गए. अमल अल्लाना ने बताया कि इस प्रदर्शनी की सामग्री पिछले 20 साल में तैयार की गई है. अलकाजी का जन्म 1925 पुणे में हुआ था. उनके पिता सऊदी अरब के कारोबारी थे. उनकी मां कुवैत की थीं. साल 2002 में दिए एक इंटरव्यू में अलकाजी ने बताया था, "मेरा बचपन शानदार था. मेरी मां हिन्दी, अरबी, उर्दू, मराठी और गुजराती बोले लेती थीं. उन्होंने हमें ये सारी भाषाएं सिखाईं. मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत अच्छी शिक्षा दी." उन्होंने बताया, "मुझे हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया. अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू और मराठी सभी भाषाएं. मेरा थिएटर से पहला परिचय स्कूल में हुआ था. उसके बाद जब मैं ज़ेवियर कॉलेज बॉम्बे में गया तो मेरा रंगमंच से प्यार परवान चढ़ा." अलकाजी ने बताया था कि उनपर सबसे गहरा असर सुल्तान बॉबी पदमसी का था. अलकाजी और उनके दो अन्य भाइयों ने सुल्तान पदमसी की तीन बेटियों से शादी की थी. अलकाजी ने बताया, "सुल्तान पदमसी का मेरे जीवन पर अतुलनीय असर रहा है. वो जीनियस थे. ऑर्सन वेल्स के मैकबेथ से बहुत पहले उन्होंने मैकबेथ का मंचन किया था." 1947 में अलकाजी रॉयल एकैडमी ऑफ़ ड्रैमेटिक आर्ट्स (राडा), लंदन में नाटक के बजाय कला की पढ़ाई के लिए गए. 1950 में राडा से वापस आकर उन्होंने मुंबई में अपना थिएटर ग्रुप शुरू किया. 1954 में उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक बनने का प्रस्ताव मिला लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया. उन्हें लगा कि इस पद के लिए उनकी उम्र बहुत कम है. उस समय वो 29 साल के थे. आखिरकार वो 1962 में एनएसडी के निदेशक बने. दिल्ली आने के बाद उन्हें हिंदी रंगमंच के महत्व का अहसास हुआ. उन्होंने समकालीन भारतीय नाटकों पर नाटकों की शुरुआत की. एनएसडी में उनके कार्यकाल में ओम शिवपुरी, मनोहर सिंह, सुरेका सीकरी, रोहिणी हट्टंगड़ी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अनुपम खेर और पंकज कपूर जैसे चर्चित अभिनेता निकले. नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "अलकाजी के रुप में मुझे प्रेरित करने वाला टीचर मिला. वो मुझे पसंद करते थे और मेरा हौसला बढ़ाते थे. वो कठिन मेहनत कराते थे ताकि मेरी क्षमताओं का विकास हो सके." अलकाजी का एनएसडी में पहला नाटक मोहन राकेश का 'आषाढ़ का एक दिन' था. इस नाटक में मुख्य भूमिका ओम शिवपुरी और सुधा शिवपुरी ने निभाई थी. इसके बाद उन्होंने धरमवीर भारती के नाटक 'अंधायुग' का फिरोजशाह कोटला में मंचन किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी नाटक देखने गए थे. उन्होंने पुराना किला में गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक़ का मंचन किया. 1977 में उन्होंने एनएसडी के निदेशक का पद छोड़ दिया. उसके बाद वो रंगमंच से भी एक तरह से दूर हो गए. 1990 के दशक में उन्होंने थोड़े समय के लिए रंगमंच पर वापसी की और एनएसडी में तीन नाटकों का निर्देशन किया. करन थापर को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं चाहूंगा कि लोग मुझे मेरे समूचे रंगकर्म के लिए याद करें, न कि केवल एनएसडी के मेरे कार्यकाल के लिए." लेख- प्रियता ब्रजबासी साभार- कैच


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