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'नाटकों से रोजी नहीं कमा सकता कोई'
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लगभग दो दशक के बाद थिएटर की ओर लौटे जाने-माने अभिनेता और रंगकर्मी कुलभूषण खरबंदा कला की इस विधा के प्रति लोगों में बढ़ते आकर्षण से काफी खुश हैं खरबंदा कहते हैं कि नाटकों के दर्शकों की तादाद बढ़ती देख कर बेहद खुशी होती है. दर्शक हर भाषा में थिएटर की प्रशंसा कर रहे हैं. इस सप्ताह यहां इस नाटक के चार शो आयोजित किए गए. इनमें खरबंदा ने अपने अभिनय से एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. आप कोई दो दशकों बाद थिएटर की ओर लौटे हैं. इस लंबे अंतराल की वजह ? वजह तो कोई खास नहीं है. कुछ निजी व्यस्तताएं थीं. उनके अलावा ऐसा कोई किरदार भी नहीं मिला. मैंने वर्ष 1991 में सखाराम बाइंडर में अभिनय किया था. उसके बाद संयोग ऐसे बने कि मंच पर नहीं आ सका. पिछले दिनों शूटिंग के दौरान एक हादसे के बाद जब बिस्तर पर पड़ा था तभी इस नाटक का प्रस्ताव मिला और मैंने बिना सोचे-समझे हामी भर दी. थिएटर से आपका जुड़ाव कैसे हुआ? थिएटर से मेरा लगाव तो शुरू से ही था. साठ के दशक में मैंने दिल्ली के थिएटर समूह यात्रिक के साथ काम शुरू किया था. बाद में मैंने अभिज्ञान नामक एक संस्था बनाई. वर्ष 1972-73 में श्यामानंद जालान के सुझाव पर दिल्ली से कोलकाता आ गया. यहां एक गैस फैक्टरी में नौकरी मिल गई. लेकिन मेरे लिए वहां करने को कुछ खास नहीं था. इस दौरान मैंने विजय तेंदुलकर के दो नाटकों में काम किया. इमें सखाराम बाइंडर तो काफी विवादास्पद साबित हुआ. इसके लिए हमें काफी विरोध झेलना पड़ा. उसी की वजह से मेरी नौकरी भी चली गई. हिंदी फिल्मों में जाने का विचार कैसे आया? अब नाटकों से कोई पैसे तो कमा नहीं सकता. मुझे किसी तरह रोजी-रोटी कमानी ही थी. इसलिए मैं कोलकाता से बंबई चला गया. वहां फिल्मों में काम मिलने के साथ ही दाल-रोटी भी मिलने लगी. लेकिन मेरा पहला प्यार हमेशा थिएटर ही रहा. अब तो नाटकों में दर्शकों की तादाद बढ़ने लगी है. लोग कला की इस विधा को सराहने लगे हैं, यह देख कर काफी सुकून मिलता है. कला फिल्मों और थिएटर के बीच आपने संतुलन कैसे कायम रखा ? स्टेज या थिएटर का अपना अलग ही नशा है. यह नशा एक बार लग जाए तो आजीवन नहीं छूटता. मैं जरा आलसी हूं. एक साथ कई काम नहीं कर सकता. यह भी एक वजह रही नाटकों की ओर लौटने के बीच के इस लंबे अंतराल की. समानांतर फिल्मों में बेहतरीन अभिनय के लिए आपने काफी सराहना बटोरी है. आपको निजी तौर पर कौन सा किरदार सबसे यादगार लगा ? देखिए, यह कहना तो बहुत मुश्किल है कि किस फिल्म में मेरी भूमिका सबसे यादगार रही. तमाम फिल्मों में मेरा किरदार एक-दूसरे काफी अलग था. लेकिन उनको निभा कर मुझे एक जैसी संतुष्टि मिली. आपको सिनेमा और थिएटर दोनों से समान लगाव है. इनमें अंतर क्या है ? यह दोनों अलग माध्यम हैं. सिनेमा मुख्य रूप से एक निर्देशक का माध्यम है जबकि थिएटर में कुछ हद तक अभिनेता की भी भूमिका होती है. लेकिन बेहतर भूमिकाएं मिलती रहें तो मैं इन दोनों माध्यमों का आनंद लेता रहूंगा. मैं कभी थिएटर को ना नहीं कहूंगा. हकीकत तो यह है कि मैं थिएटर में ज्यादा से ज्यादा काम करना चाहता हूं. क्या पहले के मुकाबले समानांतर सिनेमा की स्थिति अब बेहतर हुई है ? यह कहना मुश्किल है. अब दूसरा दौर है. महेश भट्ट ने जब अर्थ जैसी फिल्म बनाई थी तब उसे कोई खरीददार नहीं मिला था. उस दौर में भी वह फिल्म दो साल तक डिब्बे में बंद रही थी. हमारा समाज भीतर से अब भी उसी तरह का है जैसा चित्रण अर्थ में किया गया था. 68 साल की उम्र में भी इतनी ऊर्जा कैसे बनाए रखते हैं ? शायद मेरा आलसीपन इसमें सहायक है. इसी वजह से मैं दो शिफ्टों में काम नहीं कर पाता. इस आलस के चलते ही मैंने एक कलाकार के तौर पर खुद को बचाए रखा है. इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता


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