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सौ साल का हिंदी सिनेमा
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पहली श्वेत-श्याम हिंदी मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र को दर्शकों ने देखा, तो सबको अजूबा लगा.सौ साल पहले रूपहले पर्दे पर वर्ष 1913 में 21 अप्रैल को फिल्मी पर्दे पर पहले-पहल वह नज़ारा सचमुच स्वप्न लोक जैसा ही था. राजा हरिश्चंद्र फिल्म के निर्देशक, निर्माता और लेखक दादा साहब फाल्के थे, जिन्होंने इंग्लैंड जाकर फिल्म तकनीक सीखने के लिए ज़ेवर बेच दिए थे और उनका यह प्रयास मील के पत्थर की तरह साबित हुआ. राजा हरिश्चंद्र फिल्म में हरिश्चंद्र का किरदार दत्तात्रेय दामोदर दबके, रानीमती तारा की भूमिका पीजी सेन और विश्वामित्र की भूमिका जीवी सेन ने निभाई थी. इस फिल्म में सारे पात्र पुरुष थे. 40 मिनट की इस फिल्म की रील 3 हज़ार 7 सौ फुट लंबी थी. सिनेमा जगत के इतिहास में दादा साहब फाल्के की यह फिल्म अविस्मरणीय है. फाल्के साहब के बनाए मार्ग पर कोलकाता स्थित मदन टॉकीज के बैनर तले ए ईरानी ने पहली बोलती फिल्म आलम आरा का निर्माण किया. इस फिल्म की शूटिंग रात में रेलवे लाइन के निकट की गई थी. इस फिल्म में डायलॉग कम गाने ज़्यादा थे. इस फिल्म के बारे में निर्माता श्याम बेनेगल ने बहुत खूब कहा है कि भारतीय सिनेमा की शुरुआत बातचीत के माध्यम से नहीं, बल्कि गानों के माध्यम से हुई है. हालांकि हिंदी सिनेमा में फिल्म आलम आरा ने प्राण फूंके हैं. उसके बाद ही एक से बढ़कर एक अभिनेता और अभिनेत्रियां फिल्मी पर्दे पर दिखाई देने लगीं और गीतकारों और संगीतकारों के बीच होड़ लग गई, जिससे हिंदी सिनेमा को पंख लग गए. शुरुआती दौर में धार्मिक और पारिवारिक फिल्में बनीं. वर्ष 1935 में बनी फिल्म हंटरवाली में पोशाक और पहनावे ने समाज में नए फैशन का आगाज़ किया. उसके बाद 1949 में राजकपूर की फिल्म बरसात ने तहलका मचा दिया. फिल्म हिट ही इसलिए हुई थी कि उसमें अभिनेत्री नरगिस ने दुपट्टा नहीं ओढ़ा था. जिस पौधे को फाल्के साहब ने लगाया, उसे पुष्पित पल्लवित करने का काम पृथ्वीराज राज कपूर खानदान ने किया. फिल्म निर्माता बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन ने देश के किसानों की दयनीय दशा दर्शायी. यह भारत की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसे कॉन फिल्म अवॉर्ड मिला था. फिर यहीं से शुरू हुआ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हिंदी फिल्मों का दौर. शांताराम की साल 1957 में बनी फिल्म दो आंखें बारह हाथ, फणीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी मारे गए गुल़फाम सशक्त कथानक के बल पर पूरे देश में छा गई. इसके अलावा बदनाम बस्ती, आषाढ़ का दिन, सूरज का सातवां घोड़ा और नदिया के पार जैसी कई फिल्में चर्चा में आईं. वहीं देवदास, बंदिनी, सुजाता और परख फिल्में का़फी सफल रहीं. महबूब खान की साल 1957 में बनी फिल्म मदर इंडिया मील का पत्थर साबित हुई. वहीं सत्यजीत रे की फिल्म पांथेर पांचाली और शंभू मित्रा की फिल्म जागते रहो को खूब शौहरत मिली. निर्माता निर्देशक आस़िफ ने म़ुगले आज़म के माध्यम से सिनेमा जगत की बुलंदियों को छुआ. त्रिलोक जेटली ने हिंदी सिनेमा के बल पर गोदान का फिल्मांकन कर सामाजिक कुरीतियों को लोगों के सामने रखा. साहित्य का यह प्रयोग फिल्मों के लिए प्राणदायी तो बना ही, वहीं प्रेरणादायी भी साबित हुआ. फिल्म निर्माता गुरु दत्त ने जहां प्यासा, काग़ज़ के फूल, साहब बीवी और ग़ुलाम बनाई, वहीं मुज़फ़्फर अली ने गमन और विनोद पांडे ने एक बार फिर का फिल्मांकन किया. यह दौर लता मंगेशकर, ऱफी मोहम्मद, किशोर कुमार जैसे गायकों के लिए स्वर्ण युग बनकर उभरा. उनकी आवाज़ का जादू फिल्मी दुनिया में छा गया. निपुण गीतकार संगीतकार और कलाकारों के चलते सिनेमा का चस्का लोगों को लग चुका था. युवाओं में सिनेमा देखने की ललक इस क़दर बढ़ी कि वे अब आने वाली हर इस पिक्चर की बाट जोहने लगे. सिनेमा देखने के लिए देहात से दूर शहरों के सिनेमाघरों तक जाने लगे. सिनेमा घरों में सत्यजीत रे की कमर्शियल फिल्मों का चलन पर्दे पर हो चुका था.60 के दशक में धर्मेंद्र, देवानंद, राजकुमार और दिलीप कुमार जैसे सितारे बुलंदी पर थे. चुलबुले अंदाज़ के शम्मी कपूर ने अपना अलग मुक़ाम बनाया. फिल्म गंगा-यमुना, मुग़ले-आज़म ने मानो तहलका मचा रखा था. 70 के दशक के राजेश खन्ना सुपरस्टार बनकर उभरे. बॉक्स ऑफिस में एंग्री यंग मैन की भूमिका में अमिताभ बच्चन का पदार्पण हुआ. यहीं से मिलना शुरू हुआ फिल्मों को गोल्डेन जुबली और डायमंड जुबली का खिताब. 80 का दशक आते-आते फिल्मी विधा बदलने लगी. जादूगर, तू़फान, नास्तिक जैसी फिल्मों में अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, राजकुमार, सुनील दत्त से दिग्गज अभिनेताओं ने क़िरदार निभाया था. अच्छे हीरो और हीरोइनों का पारिवारिक फिल्मों में एक छत्र राज था. उन्हें देखने के लिए देश के सिनेमाघरों में दर्शकों की अपार भीड़ होती थी. एक ओर हिंदी सिनेमा का नया स्वाद चखने के लिए जनता बेक़रार तो दूसरी तऱफ कलर टेलीविजन का आग़ाज़. ऐसे में सिनेमा प्रेमियों ने सिनेमाघरों को सप्ताहांत तक ही सीमित कर दिया. फिर भी फिल्म निर्माता शांत नहीं थे, इनका प्रयोग जारी रहा. इनके नए आविष्कार ने घिसे-पिटे डांस की जगह डिस्को डांस का प्रचलन ला दिया, जिसके आधार पर एक्शन फिल्में तैयार की जाने लगीं. इसी दौरान इंसा़फ का तराज़ू, उमराव जान जैसी सफल फिल्में बनीं. जहां फिल्म राजा बाबू, गोविंदा का जादू चल गया, वहीं एक दो तीन में माधुरी दीक्षित और मिथुन चक्रवर्ती छा गए. पारिवारिक फिल्मों में जितेंद्र, श्रीदेवी, जयाप्रदा, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल की भूमिका सराहनीय थी. जयाप्रदा और माधुरी दीक्षित बप्पी लहरी की धुन में नाचने लगे. 90 के दशक में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल का दौर चल निकला, लेकिन गानों से मिठास ग़ायब थी. बॉलीवुड अब हॉलीवुड की नक़ल करने लगा था. इसके कारण पारिवारिक फिल्में फिल्मकारों के ज़ेहन से हटने लगीं, क्योंकि वह हॉलीवुड की दुनिया की चकाचौंध में खोने लगे थे. हिंदी सिनेमा को वह इंटरनेशनल बनाने का उपक्रम सोचने लगे. लिहाज़ा बिना सिर पैर की फिल्में बनने लगीं. हॉलीवुड की नक़ल से फिल्में फ्लॉप होने लगीं, लेकिन कुछ फिल्में जैसे दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, जो जीता वही सिकंदर, इत्यादि फिल्में पर्दे पर छा गईं. आमिर खान, सलमान खान और शाहरू़ख खान जैसे सितारे उभरे. इस तिकड़ी ने हिंदी सिनेमा को चार चांद लगा दिए. ये सितारे हर अदा में नाचे, इनका जादू सिनेमा प्रेमियों के सिर चढ़कर बोला. खलनायकों की बात करें तो अजीत, प्राण, अमजद खान, अमरीश पुरी, गुलशन ग्रोवर, शक्ति कपूर, रंजीत आदि ने विलेन की भूमिका निभाकर अपने अभिनय का लोहा मनवाया. वहीं विश्व सुंदरियों ने अपनी प्रतिभा सिनेमा जगत में उडेलने में कसर नहीं छोड़ी है


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