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मुफ्त सार्वजनिक परिवहन का यह एस्तोनियाई मॉडल बाकी दुनिया के लिए कितना व्यावहारिक है?
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जो लोग एस्तोनिया में नहीं रहते, उन्हें यह जान कर आश्चर्य और थोड़ी-बहुत जलन भी ज़रूर होगी कि इस यूरोपीय देश के निवासियों को, पहली जुलाई से, देश के भीतर बस और ट्राम से कभी भी और कहीं भी आने-जाने के लिए कोई पैसा नहीं देना पड़ता. उन्हें केवल दो यूरो (लगभग 160 रूपये) दे कर एक चिपकार्ड ख़रीदना होता है, जिस पर - भारत में प्रचलित आधार कार्ड की तरह - उनके एस्तोनियाई पहचान-कार्ड का नंबर लिखा होना चाहिये. यह चिपकार्ड ही एक ऐसे स्थायी टिकट का काम करता है, जिसे किसी बस या ट्राम में चढ़ते ही बस या ट्राम में लगे कार्ड-रीडर को दिखा कर अपनी यात्रा की वैधता को प्रमाणित करना पड़ता है. यात्रा के दौरान बस या ट्राम बदलने पर भी हर बार इसी क्रिया को दोहराना पड़ता है. हर यात्री से अपेक्षा की जाती है कि अपनी एस्तोनियाई नागरिकता प्रमाणित करने के लिए वह अपना पहचान-कार्ड (आइडेन्टिटी कार्ड) भी हमेशा अपने पास रखे. चिपकार्ड से डेटा संग्रह एक बार चिपकार्ड ख़रीदने और हर बार उसे कार्ड-रीडर को दिखाने के पीछे उद्देश्य ऐसे आंकड़े (डेटा) जमा करना है, जिन से बाद में पता चल सके कि किस मार्ग (रूट) का कब कितना उपयोग होता है और उसमें कोई परिवर्तन करने या सुधार लाने की ज़रूरत तो नहीं है. एस्तोनिया के कुल 15 ज़िलों (काउन्टी) में से 11 पहली जुलाई से इस योजना में शामिल हुए हैं, समझा जाता है कि शेष चार जि़ले भी बाद में शामिल हो जायेंगे. जिन बसों में ज़रूरी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अभी नहीं लग पाये हैं, उनसे यात्रा करने वाले अपना चिपकार्ड बस-चालक से ख़रीद सकते हैं. यात्री-किराया नहीं मिलने से सार्वजनिक बसें और ट्रामें चलाने वाली कंपनियों की आय में जो कमी आयेगी, उसे एस्तोनिया की सरकार पूरा करेगी. अनुमान है कि इसके लिए हर साल क़रीब तीन करोड़ 48 लाख यूरो की ज़रूरत पड़ेगी. इस अनुमान में सार्वजनिक परिहन को और अधिक बेहतर बनाने का ख़र्च भी शामिल है. देश छोटा, काम बड़े-बड़े केवल 45 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और 13 लाख 19 हज़ार जनसंख्या वाला एस्तोनिया यूरोप के उत्तर-पूर्व में स्थित बाल्टिक सागर के पूर्वी तट पर बसा देश है. 20 अगस्त 1991 को दोबारा स्वतंत्र देश बनने से पहले यह भूतपूर्व सेवियत संघ का एक गणराज्य हुआ करता था. अब वह यूरोपीय संघ और नाटो सैन्य संगठन के सबसे छोटे सदस्य देशों में से एक है और यूरो ही वहां की भी वैध मुद्रा है. एस्तोनिया की गिनती यूरोपीय संघ के उन देशों में होती है, जहां आर्थिक विकासदर सबसे अधिक है. संयुक्त राष्ट्र के मानवीय विकास सूचकांक तथा आर्थिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता और प्रेस स्वतंत्रता जैसे सूचकाकों वाली तालिकाओं में भी उसका नाम ऊपर ही मिलता है. शिक्षा मुफ्त है. स्वास्थ्य सेवाएं सर्वसुलभ हैं और कंप्यूटर आधारित डिजिटल समाज के निर्माण में उसे विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है. 2005 में वह इंटरनेट के माध्यम से संसदीय चुनाव करवाने वाला विश्व का पहला देश बन गया था. सभी देशों को पीछे छोड़ा इसलिए आश्चर्य नहीं कि सार्वजनिक परिवहन को निःशुल्क बनाने में भी एस्तोनिया ने विश्व के सभी देशों को पीछे छोड़ दिया है. इस दिशा में पहला क़दम राजधानी ताल्लिन के तत्कालीन मेयर एदगार साविस्सार ने 2013 में उठाया था. राजधानी के नागरिकों के बीच 2012 में करवाये गये एक जनमतसंग्रह में 75 प्रतिशत समर्थन मिलने के बाद, मई 2013 में, उन्होंने ताल्लिन के नागरिकों के लिए बस और ट्राम यात्रा को निःशुल्क बना दिया. शर्त इतनी ही थी कि दो यूरो का एक चिपकार्ड ख़रीदने के बाद यह सुविधा उन्हीं लोगों को मिलेगी, जो ताल्लिन की सीमाओं के भीतर रहते हैं और उनके पहचान-कार्ड में वहीं का पता लिखा हुआ है. शहर से बाहर रहने वालों और देश-विदेश के पर्यटकों को पहले की ही तरह टिकट लेना होगा. ताल्लिन में शहरी परिवहन मुफ्त हो जाने के बाद एक दिलचस्प बात यह देखने में आई कि पास-पड़ोस की जगहों में रहने वाले इस सुविधा से वंचित लोग धड़ल्ले से वहां आ कर बसने लगे. शहर की उस समय चार लाख 16 हज़ार की जनसंख्या बढ़ कर इस बीच चार लाख 45 हज़ार से भी अधिक हो गयी बतायी जाती है. परिवहन मुफ्त, तब भी आय बढ़ी ताल्लिन की नगरपालिका इससे बहुत खुश है. शहर की जनसंख्या बढ़ने से नगरपालिका का कर-राजस्व भी बढ़ने लगा है. ताल्लिन में रहने वाला हर नागरिक देश की सरकार को जो आयकर इत्यादि देता है, उसमें से हर वर्ष औसतन एक हज़ार यूरो प्रतिव्यक्ति ताल्लिन की नगरपालिका को वापस मिलता है. यही उसकी आय का मुख्य स्रोत है. मुफ्त परिवहन सेवा चलाने के पहले वर्ष में नगरपालिका को उस पर एक करोड़ 12 लाख यूरो का ख़र्च आया, जबकि शहर के नये नागरिकों से मिले कर-राजस्व के रूप में उसे एक करोड़ 10 लाख यूरो की अतिरिक्त आय हुई. यानी, पहले वर्ष में ताल्लिन की नगरपालिका को कुल मिलाकर 10 लाख यूरो का घाटा हुआ. किंतु मुफ्त परिवहन के लालच में नये लोगों का वहां आ कर बसना जारी रहने से पहले वर्ष का घाटा, 2016 तक, एक करोड़ 37 लाख यूरो, और 2017 के अंत तक, दो करोड़ 20 लाख यूरो की अतिरिक्त आय में बदल चुका था. इसका एक लाभ यह हुआ कि ताल्लिन की उपनगरीय ट्रेनों को भी वहां की निःशुल्क नागरिक परिवहन योजना में शामिल कर लिया गया. सवारियों की संख्या 14 प्रतिशत बढ़ी ताल्लिन में निःशुल्क नागरिक परिवहन सेवा शुरू करने के पहले वर्ष में बस और ट्राम यात्रियों की संख्या 14 प्रतिशत बढ़ गयी. यह बढ़ोतरी मुख्यतः निम्न आयवर्ग के लोगों के कारण हुई थी. शहरी नागरिक परिवहन को मुफ्त बनाने के पीछे ताल्लिन की नगरपालिका की एक मंशा ग़रीबों को घर से बाहर निकलने, घूमने-फिरने और समाज के साथ घुलने-मिलने के लिए प्रेरित करना भी थी. दूसरी ओर, यह भी देखा गया कि पहले जो लोग पैदल चला करते थे, वे अब ट्रामों और बसों से यात्रा करने लगे, जिसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी नहीं कहा जा सकता. ताल्लिन की नगरपालिका के एक अधिकारी अलान अलाक्युला का कहना है कि शहर की जनसंख्या बढ़ने के कारण बसों और ट्रामों की परिवहन क्षमता को अब तक केवल 10 प्रतिशत बढ़ाना पड़ा है. परिवहन क्षमता बढ़ाने की अपेक्षा बसों- ट्रामों को साफ़-सुथरा रखने और आरामदेह बनाने पर अधिक पैसा ख़र्च किया गया है. बसें और ट्रामें पहले की अपेक्षा अब ज़्यादा भरी हुई होती हैं, हालांकि बहुत ज़्यादा भी नहीं. कारों के लिए लाल बत्ती देर तक अलाक्युला का यह भी कहना है कि 2013 में ताल्लिन में जब मुफ्त सेवा शुरू की गई, तब सबसे पहले कह सकते हैं कि रातोंरात सड़कों पर केवल बसों के लिए आरक्षित विशेष लेन बनाये गये. ट्रैफ़िक सिग्नलों को इस तरह सेट किया गया कि बसों और ट्रामों को प्राथमिकता मिले. कार-चालक इससे चिढ़ते हैं, क्योंकि सिग्नल की लाल बत्ती उन्हें अब देर तक रोके रखती है. पहले की अपेक्षा अब उन्हें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ती है. होना तो यह चाहिये था कि ताल्लिन का शहरी परिवहन जब मुफ्त हो गया, तो वहां के कार-चालक भी अपनी कारें घर पर छोड़ कर बसों और ट्रामों से मुफ्त यात्रा का लाभ उठाते. किंतु ऐसा केवल 10 प्रतिशत ही हुआ है, मुफ़्त सवारी की सुविधा के बाद से ताल्लिन की बसों और ट्रामों से जो अधिक लोग यात्राएं करने लगे हैं, उनमें बड़े-बूढ़ों, छात्रों, कम आय वालों और नौकरी-धंधा ढूंढने वालों का ही अनुपात सबसे अधिक पाया गया. दूसरे शब्दों में, ताल्लिन में शहरी परिवहन को मुफ्त बना देने से सड़कों पर टैफ़िक-जाम और पर्यावरण प्रदूषण को घटाने में कोई बड़ा योगदान मिलता नहीं दिखता. कार चालकों पर रंग नहीं चढ़ा अब तक के सर्वे यही इशारा करते हैं कि धनी-मानी लोग बस-ट्राम में सफ़र करना या तो अपनी हेठी समझते हैं या फिर उनमें भीड़ होने की आशंका से डरते हैं. वैसे भी, जिस किसी के पास पैसे की कमी नहीं है, वह बस या ट्राम के आने-जाने के समय से बंधना भला क्यों पसंद करेगा? वह तो अपनी सुविधा और मन-मर्ज़ी के अनुसार, जब चाहे तब, अपनी कार या किसी टैक्सी से ही कहीं आना-जाना चाहेगा! एस्तोनिया के धनी-मानी भी इस मानसिकता का अपवाद नहीं हैं. ऐसा भी नहीं लगता कि पांच वर्ष पूर्व राजधानी ताल्लिन में और अब, बीती एक जुलाई से पूरे एस्तोनिया में, बस-ट्राम सेवाओं को निःशुल्क बना देने से कोई ऐसे बड़े परिवर्तन देखने में आयेंगे, जो ताल्लिन में नहीं देखने में आये. इसका मुख्य कारण यही है कि एस्तोनिया एक बहुत छोटा और खुशहाल देश है. वहां भारत जैसी भीड़-भाड़ या ग़रीबी-अमीरी के बीच बहुत चौड़ी खाई नहीं है. वायुप्रदूषण, सड़कों पर ट्रैफिक जाम और ग़रीबी घटाने की दृष्टि से भारत में भी ऐसा ही कोई प्रयोग, एस्तोनिया की अपेक्षा, कई गुना अधिक अनुकूल परिणाम ला सकता है. पर भारत में वह संभवतः इस कारण चल नहीं पायेगा कि बसों और मेट्रो ट्रेनों पर लोगों की ऐसी अपार भीड़ टूट पड़ेगी कि सारा आधारभूत ढांचा ही चरमरा जायेगा. जब मुफ्त परिवहन चल नहीं पाया बोइंग विमान बनाने वाली अमेरिकी कंपनी के गृहनगर सीएटल में यही हुआ. 2012 तक वहां के लोग भी शहर की मेट्रो ट्रेनों में मुफ्त यात्रा कर सकते थे. लेकिन यह मुफ्त सेवा समय के साथ शहर की नगरपालिका को इतनी मंहगी पड़ने लगी कि उसे दोबारा टिकट-प्रणाली लागू करनी पड़ी. बेल्जियम के एक शहर हासेल्ट की नगरपालिका को भी, वित्तीय कारणों से ही, अपने नागरिकों लिए मुफ्त बस सेवा का, 16 वर्षों बाद, 2013 में अंत कर देना पड़ा. इन 16 वर्षों में बस-यात्रियों की संख्या 13 गुनी बढ़ गयी थी! कुछ ऐसा ही 16 हज़ार की जनसंख्या वाले पूर्वी जर्मन शहर टेम्पलीन में भी हुआ. वहां की नगरपालिका नें 1998 में अपने सभी नागरिकों के लिए शहर के भीतर बस-यात्रा मुफ्त कर दी. बाद के वर्षों में यात्रियों की संख्या बढ़ते-बढ़ते दस गुनी बढ़ गयी. नगरपालिका ने अंततः 2013 में इस सुविधा का अंत कर दिया. करदाता के पैसे से मुफ्त सवारी विशेषज्ञों का कहना है कि जिन देशों में ग़रीबी अधिक है और ग़रीबी-अमीरी के बीच की खाई बहुत चौड़ी है, वहां मुफ्त सार्वजनिक परिवहन इस अंतर को घटाने का एक कारगार माध्यम बन सकता है, लेकिन तभी, जब सरकारें कर-राजस्व से उसका वित्तपोषण करें और इसे सामाजिक न्याय के प्रति अपना एक नैतिक दायित्व मानें. जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित जो पर्यावरणवादी कारों की संख्या घटाने को बढ़ते हुए तापमान और वायुप्रदूषण को घटाने के एक उपाय के रूप में देखते हैं. वे भी यही चाहते हैं कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन सरकारी पैसे से सब के लिए मुफ्त होना चाहिये. फ्रांस के इसी प्रकार के चिंतकों के आग्रह पर, राजधानी पेरिस की मेयर अन इदाल्गो ने, पेरिस में मुफ्त सार्वजनिक परिवहन के लाभ-हानि का आकलन करने वाला एक अध्ययन तैयार करने का आदेश दिया है. तथ्य यह भी है कि शहरी सार्वजनिक परिवहन का सारा ख़र्च टिकटों की बिक्री से वैसे भी वसूल नहीं हो पाता. हर शहर की नगरपालिका अथवा राज्य या देश की सरकार को अपनी तरफ़ से भी कुछ न कुछ अनुदान देना ही पड़ता है. जर्मनी में सार्वजनिक परिवहन 80 प्रतिशत तक घाटे में उदाहरण के लिए, जर्मनी की राजधानी बर्लिन की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का एक ही टिकट या पास सभी बसों और ट्रामों ही नहीं, भूमिगत और भूतलीय उपनगरीय रेल सेवाओं के लिए भी वैध है, पर टिकट और पास की बिक्री से होने वाली आय कुल ख़र्च के केवल 37 प्रतिशत के बराबर ही बैठती है. बाक़ी 63 प्रतिशत बर्लिन की राज्य सकार (बर्लिन शहर अपने आप में एक राज्य भी है) को जुटाना पड़ता है. जर्मनी के ही कुछ दूसरे शहरों में सार्वजनिक परिवहन का 80 प्रतिशत तक घाटा करदाता के पैसे से पाटा जाता है. शहरी सार्वजनिक परिवहन को सबके लिए हर दिन मुफ्त कर देने के बदले सप्ताह के एक या कुछेक दिन, कुछ घंटों या फिर बड़े-बूढ़ों, छात्रों, महिलाओं जैसे जनता के कुछ विशेष वर्गों के लिए ही मुफ्त कर देना भी ऐसे विकल्प हैं, जिन्हें कई देशों के शहरों में आजमाया जा रहा है. जर्मनी के ही ट्युबिंगन शहर में, 10 फ़रवरी 2018 से, हर शनिवार का दिन, शहर की बसों में सब के लिए, बिना टिकट यात्रा करने का मुफ्त शनिवार बन गया है. जुलाई में वहा के अधिकारियों ने कहा कि यह सुविधा 2019 में भी बनी रहेगी. यूरोपीय संघ ने जर्मनी को चेतावनी दी जर्मनी के कुछ शहरों में यातायात के कारण वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि यूरोपीय संघ को जर्मनी के विरुद्ध दंडात्मक क़दम उठाने की चेतावनी देनी पड़ी है. जिन शहरों में कारों के धुंए में पाए जाने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की मात्रा ख़तरनाक़ सीमा से कहीं ज़्यादा हो गयी है, वहां डीज़ल से चलने वाले वाहनों पर अभी से रोक लगने लगी है. यूरोपीय संघ के संभावित दंडात्मक क़दमों से बचने के लिए जर्मनी की सरकार ने देश के पांच अपेक्षाकृत छोटे शहरों बॉन, एसन, हेरनबेर्ग, रोएटलिंगन और मानहाइम से कहा है कि वे अपने यहां मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करें. किंतु ये सभी शहर ऐसा करने से फ़िलहाल आनाकानी कर रहे हैं. वे केंद्र सरकार से मुफ्त सार्वजनिक परिवहन से होने वाले घाटे की पूरी भरपाई चाहते हैं. निःशुल्क बना देना ही पर्याप्त नहीं अब तक के अनुभव और अध्ययन दिखाते हैं कि वायु प्रदूषण और सड़कों पर जाम घटाने तथा समाज के ग़रीब वर्ग के हाथ मज़बूत करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को निःशुल्क बना देना ही पर्याप्त नहीं है. कार वाले कार छोड़ कर बस और ट्राम में चढ़ने की बात तभी सोचते हैं, जब ऐसे क़दम उठाये जायें, जिन से कार का इस्तेमाल उन्हें बहुत महंगा लगने लगे, न कि बस-ट्राम का टिकट सस्ता हो जाये. नीदरलैंड में सार्वजनिक परिवहन के प्रोफ़ेसर ओदेद कात्स का कहना है कि बस, ट्राम और मेट्रो ट्रेनों की यात्रा निःशुल्क बनाने के साथ ही नगरपालिकाओं और सरकारों को कार रखना और चलाना मंहगा करना होगा. ऐसा ईंधन-कर, वाहन-कर और कार-पार्किंग की फ़ीस बढ़ा कर किया जा सकता है. इस बढ़ी हुई आय से सार्वजनिक परिवहन मुफ्त बनाने के ख़र्च के यदि पूरे नहीं, तो एक बड़े हिस्से की भरपाई भी हो सकती है. सड़कों पर केवल बसों के लिए अलग लेन बनाने और उनके लिए ट्रैफ़िक सिग्नल की बत्ती अन्य वाहनों से पहले हरी करने से भी बसों की लोकप्रियता बढ़ाई जा सकती है. (ctc-satgrah)


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