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कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने से दुखी क्यों हैं ये कश्मीरी पंडित
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मेरा जन्म कश्मीर में एक पंडित परिवार में हुआ है. दहशतगर्दी का वह दौर जिसमें पंडितों ने कश्मीर से पलायन किया, मैंने अपनी आँखों से देखा है. मैं इस बात को अच्छी तरह महसूस कर सकती हूँ कि दहशत के साये में जीना कितना तकलीफ़देह होता है. जब मेरे परिवार ने कश्मीर से पलायन किया तो मैं सिर्फ़ पांच बरस की थी. मुझे अच्छी तरह याद है सड़क पर जाते हुए कर्फ्यू का अचानक लग जाना और फिर मुख्य रास्तों के बजाय गलियों से होते हुए वापस घर पहुंचना, आंसू गैस के गोले, बंदूक़धारी दहशतगर्द. मुझे आज भी वो रात अच्छी तरह याद है जब कुछ दहशतगर्द हमारे घर में बन्दूक़ लेकर घुस आए थे. उस रात और अगली कई रातों तक हम सो नहीं पाए थे. ठिठुरती ठंड में आधी रात को हमेशा के लिए कश्मीर छोड़ देने की बात मैं आज तक भूल नहीं पाई हूँ. कश्मीर से पलायन किए हुए आज लगभग 30 साल का समय बीत चुका है. इतने अरसे बाद भी मैं उस ख़ौफ़नाक मंज़र को अपने ज़ेहन से निकाल नहीं पाई हूँ. अगर मेरे ये ज़ख्म आज भी इतने ताज़ा हैं तो सोचिए कश्मीर में उन मासूम बच्चों का क्या हश्र होता होगा जो बन्दूक़ के साये में बड़े हो रहे हैं? उस मासूम बचपन पर क्या बीतती होगी जिसे 'दुश्मन' बताकर पेलेट गन से टार्गेट किया जाता है? उस नौजवान का क्या हश्र होता होगा जिसे महज़ शक के आधार पर हिरासत में लिया जाता है? कैसा महसूस होता होगा उन कश्मीरी औरतों को जिनके पति या जवान बेटे कभी हिरासत के बाद वापस लौटकर नहीं आते? मुझे नहीं मालूम कि आपको कभी ये सारे सवाल परेशान करते भी हैं या नहीं, मगर कश्मीर की समस्या की त्रासदी झेलने वाले एक कश्मीरी के तौर पर तो मुझे ये सवाल बेचैन करते हैं. मुझे तकलीफ़ होती है उन लोगों से जो अपने ही देश के नागरिकों की तकलीफ़ों पर जश्न मनाते हैं. कश्मीरी पंडितों को ढाल बनाकर कश्मीर के मुसलमानों पर होने वाली ज़्यादती को पहले भी जायज़ ठहराया जाता रहा है. अब तो सांप्रदायिक नफ़रत का उन्माद अपने चरम पर है. एक कश्मीरी पंडित होने के नाते मैं पुरज़ोर तरीक़े से इसका प्रतिकार करती हूँ. मेरी पहचान के नाम पर किसी भी तरह की नाइंसाफ़ी को जस्टिफ़ाई करने की कोशिशों का हिस्सा बनना मुझे क़त्तई मंज़ूर नहीं. पीड़ित होने का मतलब ये नहीं कि मैं किसी और की तबाही का जश्न मनाऊँ. मुझे ये देखकर दुख होता है कि मेरे नाम और मेरी पीड़ा का इस्तेमाल इंसानियत के उसूलों के ख़िलाफ़ किया जा रहा है. हर तरह का उत्पीड़न ग़लत है, किसी भी समुदाय का उत्पीड़न ग़लत है. इतनी बुनियादी बात लोग समझने को तैयार नहीं हैं कि इंसाफ़ और बदले की भावना एक ही नहीं है. मुसलमानों का पीड़ित होना कश्मीरी पंडितों के लिए न्याय नहीं है, यह समझना चाहिए. 'जैसी करनी-वैसी भरनी' की शैली में बात करने वाले अक्सर इस बात से मुँह चुराते हैं कि जिन्होंने खोया है वो न तो पंडित हैं न ही मुसलमान, वो हैं तो सिर्फ़ कश्मीरी. अनुच्छेद 370 के रद्द होने की घोषणा के साथ ही सोशल मीडिया पर नफ़रत की आँधी ने ज़ोर पकड़ा. कश्मीरी लोगों के ख़िलाफ़ बेहूदा बयानों की झड़ी-सी लग गयी. नेताओं ने कश्मीरी लड़कियों पर बेहद शर्मसार करने वाली बेहूदा टिप्पणियाँ कीं. सोशल मीडिया पर भी कश्मीरी लड़कियों का फूहड़ मज़ाक़ बनाया जा रहा था और कई लोग इस गंदगी का मज़ा लेने में जुटे थे. यहाँ तक कि इस पर बेहद फूहड़ और अश्लील क़िस्म के गाने तक बनाए जा रहे हैं. यक़ीन मानिए, इस फूहड़ता से नफ़रत करने के लिए हिंदू या मुसलमान होने की ज़रूरत नहीं, बल्कि एक सच्चा इंसान और सच्चा कश्मीरी होने की ज़रूरत है. कश्मीर पर हर वह शख़्स टिप्पणी देता हुआ नज़र आ रहा था जो न तो कश्मीर के इतिहास से परिचित था न ही कश्मीरियत से. वैसे ऐसे लोगों के लिए कश्मीर के मायने ज़मीन के एक टुकड़े से ज़्यादा कुछ और है भी नहीं. ये वही लोग हैं जिन्होंने एक ज़माने में कश्मीरी पंडितों की बर्बादी का भी तमाशा देखा था और उसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. मगर आज यही लोग बात-बात पर कश्मीरी पंडितों का हवाला देते हुए नज़र आते हैं. असल बात तो ये है कि ऐसी पार्टियाँ, संगठन और लोग जो आज कश्मीरी पंडितों के रहनुमा बनने का दावा करते हैं उनके लिए कश्मीरी पंडितों का दर्द कोई मायने नहीं रखता. वे तो कश्मीरी पंडितों को केवल मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं और उनकी पीड़ा को भुनाकर अपनी राजनीति करते हैं. कश्मीर छोड़े हुए आज मुझे एक अरसा हो गया है. लेकिन आज भी अगर कहीं कश्मीरी भाषा बोलते हुए कोई शख़्स सुनाई पड़ता है तो स्वाभाविक तौर पर अपनापन महसूस होता है. ये अपनापन उस कश्मीरियत और साझा सांस्कृतिक पहचान की देन है जिस पर सांप्रदायिकता का रंग चढ़ाकर ख़त्म करने की लगातार कोशिश की जा रही है. कश्मीर के पूरे मुद्दे को भारत बनाम पाकिस्तान और कश्मीरी पंडित बनाम कश्मीरी मुसलमान का मुद्दा बनाकर पेश किया जाता रहा है और इस तरह शेष भारत में कश्मीरी अवाम के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करने की कोशिशें की गई हैं. ये त्रासदी है कि कश्मीर के राजनीतिक मुद्दे को आज एक सांप्रदायिक मुद्दे में बदल दिया गया है. कश्मीर की त्रासदी का दंश वहां के पंडितों और मुसलमानों दोनों ने झेला है. कश्मीरी पंडितों के साथ नाइंसाफ़ी और ज़्यादती हुई है, इस आधार पर आज कश्मीरी मुसलमानों के साथ होने वाली नाइंसाफ़ी को भला कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है? कश्मीरियत कश्मीर की रूह है. कश्मीरियत को धार्मिक चोला पहनाने वाले आज इसी कश्मीरियत को दाग़दार कर रहे हैं, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान. एक सच्ची कश्मीरी होने के नाते मैं इस तरह की हर कोशिश का पुरज़ोर विरोध करती हूँ. कश्मीर की पहचान महज़ ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में नहीं है. उसकी पहचान वहाँ बसने वाले लोगों से हैं और उन लोगों से है जो तहेदिल से कश्मीरियत को महसूस करते हैं. (लेखिका कश्मीरी पंडित हैं जिन्हें पाँच वर्ष की उम्र में विस्थापन झेलना पड़ा. वे अब एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ये उनके निजी विचार हैं.) विस्थापित कश्मीरी पंडित, बीबीसी हिंदी के लिए साभार ः बीबीसी हिंदी


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