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फासीवाद ऐसे ही आता हैअरुण माहेश्वरी
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नोटबंदी के भूचाल के धक्के अभी थमे भी नहीं हैं कि जीएसटी का भागमभाग; अर्थनीति के क्षेत्र में व्यापक अराजकता से जीडीपी में तेज़ी से गिरावट, बैंकों से क़र्ज़ों में, अर्थात औद्योगिक क्षेत्र में निवेश में भारी कमी, ग्रामीण क्षेत्र तो क़र्ज़-माफ़ी के ज़रिये ज़िंदगी की भीख माँग रहा है। इसके अलावा, देश के कोने-कोने में सांप्रदायिक और जातिवादी हिंसा का विस्फोट। इन सब पर सरहदों पर भारी तनाव- पाकिस्तान की सीमाओं पर लगातार गोलीबारी, कश्मीर में आए दिन पाकिस्तानी मदद से आतंकवादियों के हमले और अब भूटान की सीमा पर चीन से ऐसी तनातनी कि चीन ने युद्ध तक की धमकी दे दी है। वस्तुत: नोटबंदी को अभी भी कानून की परीक्षा में पास होना है! इसी 4 जुलाई 2017, अर्थात नोटबंदी के लगभग आठ महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट ने नोटबदली के एक मामले में केंद्र सरकार से यह मांग की है कि जो लोग सच्चे कारणों से अमान्य कर दिये गये नोट को बैंक में जमा नहीं करा पाए उन्हें इन रुपयों को जमा कराने का एक मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि कानून की पूरी प्रक्रिया का पालन किये बिना उनसे उनका रुपया छीना नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक संविधान पीठ ने सालिसिटर जनरल से कहा कि कोई व्यक्ति विदेश में हो सकता है, या उस समय बीमार हो सकता है या जेल में हो सकता है। यदि मैं यह साबित कर देता हूं कि यह मेरा रुपया है तो आप मुझे अपनी संपत्ति से वंचित नहीं कर सकते हैं। वह गलत होगा। भले ही जांच के बाद आप ऐसे सभी दावों को खारिज कर दें, लेकिन इस वास्तविक समस्या का रास्ता आपको खोजना होगा। जीएसटी तो एक पहेली ही बनता जा रहा है! इस पहेली को बुझाने के लिये हजारों रुपये की किताबें, सीडी और नाना प्रकार की सामग्रियों से बाजार पट गया है। कुछ ऐसे लोग भी बाजार में उतर गये हैं जो लोगों को जीएसटी के बारे में पूरा कोर्स करके उसकी डिग्रियां भी बांटने का काम करेंगे। व्यापार से जुड़े लोगों की दशा यह है कि वे इस नये कर पर जितना दिमाग लगा रहे हैं, उतना ही यह मामला उनकी समझ के बाहर जा रहा है। राज्य सरकारों ने अपने बिक्री कर, चुंगी आदि के दफ्तरों पर एक बार के लिये ताला लगा दिया है। पता नहीं राज्य और केंद्र के बीच इस कर की वसूली के बारे में यह कैसी समझ बनी है कि राज्य सरकारें अपने हिस्से के कर को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत दिखाई देती हैं। हम नहीं जानते कि क्या राज्य सरकारों को केंद्र से ऐसा कोई आश्वासन दिया गया है कि जीएसटी के मातहत करों की उगाही कम हो या ज्यादा, राज्यों को उनके पुराने हिसाब के अनुसार एक न्यूनतम राशि केंद्र सरकार अपने कोष से दे देगी। अगर ऐसा है तो यह आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के बीच वित्त के मामले में एक भयावह तनाव का कारण बन सकता है। सचमुच, अभी की अराजकता को देख कर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। ऊपर से प्रधानमंत्री को विदेश यात्राओं का नशा! वे दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े ख़रीदार बन कर तमाम हथियारों के सारे सौदागर से गलबहियां करते घूम रहे हैं। आरएसएस के लोग ख़ुश हैं कि यही तो है उनके हिंदुओं के सैन्यीकरण का उनका इच्छित लक्ष्य! लेकिन किसी भी विवेकवान व्यक्ति को इन सबके बीच भारत की पूर्ण तबाही के मंज़र दिखाई दे सकते हैं। आर्थिक दुरावस्था और देश के अंदर और देश की सीमाओं पर युद्ध - किसी भी राष्ट्र के लिये इससे बड़ा अशुभ संकेत क्या हो सकता है। इनके साथ ही जुड़ कर आती है सभ्यता की बाक़ी सारी निशानियों के अंत की कहानी। जनतंत्र के, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के, नागरिक अधिकारों के, आपसी भाईचारे के अंत की कहानी। अंध-राष्ट्रवाद की इसी आंधी से फासीवाद के आगमन की ध्वनि साफ सुनी जा सकती है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के शासकों ने साम्राज्यवादी ताक़तों के साथ मिल कर कुछ इसी प्रकार उन देशों की बर्बादी की कहानियाँ लिखी थी। पूरा मध्य पूर्व इसी प्रकार, धीरे-धीरे, धरती के नक़्शे पर अभिशप्त क्षेत्रों की शक्ल लेता चला गया है। आज ट्रंप और नेतन्याहू जैसों के साथ मोदी जी जितना खिलखिलाते हुए गले मिलते हैं, हमारी रूह भारत के भविष्य को लेकर उतनी ही ज्यादा काँप उठती है। (लेखक साहित्यकार, स्तंभकार और लेखक हैं। अध्यापन का काम करने के बाद आजकल कोलकाता में रहते हैं।)


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