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मिशेल हनेके: बुर्जुआ आतंक का सिनेमैटिक स्टेटमेंट--आदित्य शुक्ला
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नेके दुनिया में वर्तमान समय के सर्वश्रेष्ठ फिल्मकार हैं और उनकी फिल्मों के विभिन्न पहलू पर आदित्य का यह लेख पेश है. आदित्य पेशे से इंजिनियर हैं पर उनका मिजाज़ एकदम साहित्यिक है. ख़ासकर कविता पर अच्छी पकड़ रखने वाले आदित्य विश्व सिनेमा को भी कुछ ऐसे ही बरतते हैं. मिशेल हनेके की फिल्मों में एक अंतर्निहित हिंसा है. बहुत से आलोचक उन्हें नाइलीस्ट फिल्मकार मानते हैं. बकौल हनेके उनके अंदर चीजों के नकारात्मक पहलुओं के लिए बाज-दृष्टि है. लेकिन हनेके ने ऐसी फिल्में नहीं बनाई जो आपके सामने हिंसा का एक टूर डी फोर्स परोस जाए और आप उस हिंसा से रोमांचित महसूस करते हुए सिनेमा हाल से निकलकर उसे भूल जाएं.हनेके की फिल्में हिंसा को इतनी महीनता से दिखाती हैं कि उससे हमारा कोई मनोरंजन नहीं होता बल्कि हममें भय उत्पन्न होता है. हिंसा मनुष्य के इतिहास का सबसे अधिक भयावह टूल है. मनुष्य ने इसका इस्तेमाल अधिकतर राजनैतजिक प्रयोजनों से किया है. मनुष्य का इतिहास रक्त-रंजित है और दिन-प्रतिदिन और भी रक्तरंजित होता जा रहा है. ऐसे में हनेके की फिल्में अपने समय की हिंसक प्रवृत्तियों पर पैनी दृष्टि रखते हुए एक समकालीन राजनैतजिक स्टेटमेंट बुनती हैं. हनेके ने एक इंटरव्यू में कहा कि वे राजनैतिक दृष्टिकोण से फिल्में नहीं बनाते लेकिन राजनीति उनकी फिल्मों में कूट-कूट कर भरी है. उनकी फिल्म फनी गेम्स का उदाहरण लेते हैं. यह फ़िल्म देखते हुए आप अचरज से भर जाएंगे कि यहां जो भी हो रहा है क्यों हो रहा है. लेकिन क्या हमारा समाज ऐसे सैडिस्ट लोगों से नहीं भरा पड़ा जो रास्ते चलते किसी छोटी सी बच्ची के साथ बलात्कार कर देते हैं और उसकी हत्या करके झाड़ी में फेंक देते हैं? क्या हिंसा का यह स्वरूप खतरनाक नहीं है? क्या हमारे पास ऐसे उदाहरणों की कोई कमी है जो इतने सैडिस्ट हैं कि किसी भी निर्दोष से भी अधिक निर्दोष व्यक्ति के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करें कि वह या तो अपना जीवन खो दे या फिर आजीवन एक तरह के मानसिक असायलम में पड़ा रहे? नहीं. ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं चाहे वह अफ्रीका हो, महान अमेरिका हो या एशिया हो. हनेके संवेदनशील हैं और उसी टूल से वे मनुष्यों के सामने उपस्थित सबसे बड़ी समस्याओं को उकेरते हैं. इसी मायनों में वे राजनैतिक हैं. जान बूझकर की हुई राजनीति नहीं बल्कि एक ऐसी राजनीति जो उनकी कला की अंतर्धारा बनकर ऑडियंस को उसके भिन्न-भिन्न आयामों पर अपने तरीके से विचार करने को विवश कर देता है. हनेके की कई फिल्मों के अंत भी बिल्कुल ओपन हैं. बिना कोई निष्कर्ष दिए वे अपनी फिल्म को खत्म कर देते हैं और इस प्रकार अपनी राय आप पर नहीं थोपते. उनकी फिल्मों में बुर्जुआ आतंक को बहुत ही क्रूरता से निरूपित किया गया है. चाहे वह काशे हो या द पियानो टीचर या कोड अननोन या फनी गेम्स या द व्हाइट रिबन या फिर कोई भी दूसरी फिल्म.द वाइट रिबन, मेरी दृष्टि में उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है. यह फ़िल्म जर्मनी के एक गांव की कहानी कहता है जहां पर अचानक से कुछ रहस्यात्मक घटनाएं होने लगती हैं, जहां पर पिता अपने अपने बच्चों से क्रूरतम तरीके से पेश आते हैं, जहां एक डॉक्टर जो गांव में सबसे अधिक प्रतिष्ठित है और घुड़सवारी करते समय घायल हो जाता है, बाद में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करता पाया जाता है. असल में ये एक पूरी पीढ़ी की कहानी है जिनके तानाशाही प्रवृति ने जर्मनी को युद्ध के दोराहे पर ला खड़ा किया. फ़िल्म का घटनावर्ष 1913 है और फ़िल्म के खत्म होने तक हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यह देश अब एक युद्ध की कगार पर आ खड़ा हुआ है. हनेके की इस फ़िल्म ने जितनी निष्पक्षता से एक तानाशाही प्रवृत्ती को पोर्ट्रे किया है वह दुर्लभ है. यह फ़िल्म बिना किसी प्रोपगैंडा के सिर्फ एक स्टेटमेंट की तरह आते हुए अपनी बात को विमर्श में केंद्र में लाती है. द व्हाइट रिबन निष्पक्ष राजनैतजिक फ़िल्ममेकिंग का एक बेहतरीन नमूना है. आगे चलकर हनेके ने अपनी फिल्मों को और समकालीन बनाया और बुर्जुआ आतंक को निशाना बनाया. इस धारा की प्रतिनिधि फ़िल्म है काशे. इस फ़िल्म में एक बुर्जुआ दंपत्ति अचानक से कुछ टिप्स पाने लगते है कि उनके घर को बाहर से सर्विलांस किया जा रहा है. आखिर वे टिप्स कौन भेज रहा है की तलाश नायक के अतीत में जाकर रूकती है जहां पर उनके परिवार द्वारा प्रताड़ित एक अरब व्यक्ति उसके जीवन में दुबारा आता है और उसके जीवन को लगभग नर्क कर देता है. नायक मजीद अंततः आत्महत्या तो कर लेता है लेकिन उसके साथ किए गए अन्याय को जॉर्जेज के अंतःकरण पर छाप जाता है. किस तरह से फ्रांस के इतिहास की एक छोटी सी घटना जिसमें दो सौ लोग मारे गए थे को भुला दिया गया. किस तरह से ये छोटी-छोटी राजनैतिक दुर्घटनाएं प्रभावित लोगों का जीवन हमेशा के लिए बदल देती हैं और कई बार लगभग नष्ट ही कर देती हैं. फनी गेम्स और पियानो टीचर बहुत ही सैडिस्टिक या निहिलिस्टिक फिल्में हैं लेकिन अपनी क्रूरता और हनेके की दुर्लभ फ़िल्म मेकिंग की शैली का अलहदा उदाहरण है. फनी गेम्स के बारे में जो एक नई बात मेरे जेहन में आई वो यह कि कहीं ऐसा तो नहीं कि फनी गेम्स के असाल्ट ट्रूपर काफ्का के उपन्यास द कासल से निकलकर आये हों?असल मे हनेके ने फ्रैन्ज़ काफ्का के उपन्यास द कासल पर एक टीवी फ़िल्म भी बनाई है. उस फिल्म में के और फ्रीडा ही फनी गेम्स के कपल बने हैं और के के दोनों असिस्टेंट में से एक फनी गेम्स में भी है जो कपल्स को असाल्ट करते हैं. असल में काफ्का के उपन्यास में के के असिस्टेंट जो के के लिए काम करते हैं लेकिन कहीं न कहीं के को हानि पहुंचाने के लिए भी प्रयासरत रहते हैं. वे फ्रीडा को के के खिलाफ भड़काते हैं और जब अंत मे के उन्हें नौकरी से निकाल देता है तो उसके विरुद्ध शिकायत लेकर कासल भी जाते हैं. दोनों असिस्टेंट के के साथ काम करते हुए भी उसके विरुद्ध होते हैं और उसे प्रताड़ित करने की मंशा रखते हैं. काफ्का ने उपन्यास में उनकी इस मंशा को प्रतीकात्मक रूप में ही दिखाया है इसलिए मुझे ऐसा लगता है कहीं हनेके ने उसी थ्रेड को लेकर इस फ़िल्म का कांसेप्ट तो नहीं डेवेलप किया? पता नहीं. हनेके ने ही कहा किसी इंटरव्यू में कि कई बार दिखते हुए कबूतर सिर्फ कबूतर होते हैं! सम्भव कुछ भी है लेकिन हनेके पर काफ्का का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. हनेके अपने शुरुआती समय मे उपन्यासकार बनना चाहते थे. यही वजह है कि उनकी फिल्मों में एक औपन्यासिक धीरता है. वे अपनी फिल्मों के स्क्रिप्ट खुद लिखते हैं और वे उन गिने-चुने फिल्मी हस्तियों में से हैं जिन्हें पेरिस रिव्यु ने अपने साक्षात्कार कॉलम में बाकायदा जगह दी है. हनेके की फिल्मों पर काफी कुछ कहा जा सकता है लेकिन सबसे जरूरी बात यह कि उनकी फिल्में आधुनिक जगत के बुर्जुआ आतंक का सिनेमैटिक स्टेटमेंट हैं. साभार- सतुक


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