- राजनीती
- व्यापार
- महिला जगत
- बाल जगत
- छत्तीसगढ़ी फिल्म
- लोक कल
- हेल्पलाइन
- स्वास्थ
- सौंदर्य
- व्यंजन
- ज्योतिष
- यात्रा

ब्रेकिंग न्यूज़ :

साहित्य 2012- उम्मीद का उर्वर प्रदेश--दिनेश कुमार | चीन और श्रीलंका से भी ज्यादा 'भ्रष्ट' है भारत | रुक सकता है एड्स का कहर | नशे की समस्या से जूझता संपन्न पंजाब | सैमसंग अब दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी | खूबसूरती के बाजार की मल्लिका शहनाज हुसैन | बांग्लादेश में अस्तित्व की लड़ाई लड़ते बिहारी मुसलमान | बांग्लादेश में अस्तित्व की लड़ाई लड़ते बिहारी मुसलमान | डेढ़ महीने में दो अरब का नुकसान | आसमान को खोदने की तैयारी |

होम
प्रमुख खबरे
छत्तीसगढ़
संपादकीय
लेख  
विमर्श  
कहानी  
कविता  
रंगमंच  
मनोरंजन  
खेल  
युवा
समाज
विज्ञान
कृषि 
पर्यावरण
शिक्षा
टेकनोलाजी 
साहित्य 2012- उम्मीद का उर्वर प्रदेश--दिनेश कुमार
Share |

इस साल उपन्यास, कहानी, आलोचना, यात्रा-वृतांत, संस्मरण आदि सभी गद्य विधाओं में खूब हलचल रही। इस साल लगभग सभी विधाओं में अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें आर्इं। इस लिहाज से वर्ष दो हजार बारह को किसी एक साहित्यिक विधा के लिए नहीं, बल्कि तमाम विधाओं के लिए ऊर्वर वर्ष कहा जा सकता है। उपन्यास ही एक ऐसी विधा है, जिसमें पिछले कुछ सालों से निरंतरता दिखाई दे रही है। इस साल भी कुछ बेहतरीन उपन्यास आए। अच्छी बात है कि इधर उपन्यास के क्षेत्र में अनुसंधान की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका एक लाभ यह दिखता है कि हिंदी उपन्यास नए-नए इलाकों में प्रवेश कर रहा है। इस साल आए कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यासों की पृष्ठभूमि में गंभीर शोध कार्य है। महेश कटारे का दो खंडों में प्रकाशित कामिनी काय कांतारे भर्तृहरि के जीवन पर आधारित उपन्यास है। इसमें पठनीयता को सुरक्षित रखते हुए भर्तृहरि के व्यक्तित्व-कृतित्व के साथ-साथ उस समय और समाज की गहरी छानबीन की गई है। दूसरा उपन्यास राकेश कुमार सिंह का हुल पहाड़िया है, जो बिरसा मुंडा के समान ही क्रांतिकारी आदिवासी नायक तिलका मांझी की उपनिवेशवाद विरोधी समरगाथा है। उपन्यासकार ने इसके माध्यम से पहाड़िया जनजाति के जीवन-संघर्ष की प्रामाणिक गाथा भी प्रस्तुत की है। तीसरा उपन्यास महुआ माजी का मारंग गोड़ा नीलकंठ हुआ है, जिसका कथानक मारंग गोड़ा इलाके में यूरेनियम कारखाने के कारण होने वाले विकिरण आदि के दुष्प्रभावों पर केंद्रित है। यह कृति यूरेनियम की खोज से जुड़ी संपूर्ण प्रक्रिया और आदिवासी जीवन में संबंधित बारीक ब्योरों से भरा हुआ है। इस उपन्यास में पूंजीवादी विकास मॉडल को प्रश्नांकित करते हुए कई सभ्यतागत प्रश्नों को उठाने की कोशिश की गई है। चौथा उपन्यास नरेंद्र नागदेव का एक स्विच था भोपाल में है, जो भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित है। बीसवीं सदी की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना से जुड़े तथ्यों और घटनाओं का सिलसिलेवार, पर रोचक कथात्मक प्रस्तुति की दृष्टि से यह उपन्यास बेजोड़ है। उपन्यास प्रकारांतर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मानसिकता और उनकी कार्यपद्धति के प्रति भी हमें सचेत करता है। मदन मोहन का उपन्यास जहां एक जंगल था पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जन-जीवन और वनटंगिया जनजाति को लेकर लिखा गया है। उपन्यास भूमंडलीकरण की बाजारवादी अर्थव्यवस्था के फलस्वरूप गांवों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में हो रहे बदलावों का जायजा लेता है। राकेश रंजन का उपन्यास मल्लू मठफोड़वा एक चरित्र प्रधान उपन्यास है। इस उपन्यास की विशिष्टता इस बात में है कि इसका रचनात्मक स्रोत तो स्थानीय है, लेकिन दृष्टि वैश्विक है। काशीनाथ सिंह का लघु उपन्यास महुआ चरित अपने प्रवाहमयी काव्यात्मक कथाशैली के कारण एक नई ताजगी का अहसास कराता है। उपन्यास आधुनिकता और रूढ़िवादी संस्कारों के कशमकश में फंसे समाज और सामाजिक मान्यताओं के दोहरेपन की शिकार एक स्त्री की कथा को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त करता है। इस साल महिला रचनाकारों के भी कई उपन्यास आए। इनमें नीलेश रघुवंशी के एक कस्बे के नोट्स को काफी सराहना मिली। उपन्यास में एक निम्न मध्यवर्गीय कस्बाई पारिवारिक जीवन का यथार्थवादी शैली में अंतरंग चित्रण है। शरद सिंह के उपन्यास कस्बाई सिमोन का भूगोल एक कस्बा है, लेकिन यह बिल्कुल भिन्न विषय लिव-इन रिलेशन पर आधारित है। उपन्यास कस्बाई परिवेश में सहजीवन की जटिलता और उसके निहितार्थों को बेहतर ढंग से सामने लाता है। रजनीगुप्त ने अपने उपन्यास कुल जमा बीस में उपभोक्ता दौर में रिश्तों और मूल्यों के क्षरण की कथा को एक जवान होते हुए लड़के (आशु) के माध्यम से कहने की कोशिश की है। अन्य उपन्यासों में बदलती राजनीतिक पृष्ठभूमि में आंदोलनधर्मी संघर्षशीलता को लेकर लिखा गया अशोक भौमिक का शिप्रा एक नदी का नाम है, अस्मितावादी उभार के संदर्भ में असमिया समाज पर केंद्रित देश भीतर देश (प्रदीप सौरभ), संपूर्णता में नारी जीवन के संघर्ष, आकांक्षा और उसके भीतरी द्वंद्व को सामने लाता है कशमकश (मनोज सिंह), दलित जीवन को केंद्र में रख कर लिया गया एक सुबह यह भी (शैलेंद्र सागर) तथा घर परिवार और समाज के अंतर्द्वद्व के बीच प्रेम संबंधों को कशमकश को चित्रित करता मेरा पता कोई और है (कविता) आदि महत्त्वपूर्ण उपन्यास रहे। जिस्म जिस्म के लोग (शाजी जमां), हलफनामा (शैलेय), हिचकी (नीलाभ), शालभंजिका (मनीषा कुलश्रेष्ठ), तलघर (ज्ञानप्रकाश विवेक), आखेट (केशव), गाथा लंपटतंत्र की (विभांशु दिव्याल), एक सुबह यह भी (शैलेंद्र सागर), जीने के लिए (सरिता शर्मा) उपन्यास भी इस साल उल्लेखनीय रहे। इस वर्ष कई महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह भी आए। कहानी के क्षेत्र में युवा रचनाकारों की धूम रही। इस साल आए अल्पना मिश्र के कहानी संग्रह कब्र भी कैद औ, जंजीरें भी में कुल नौ कहानियां हैं। ये कहानियां अपने आसपास के जीवन से बुनी गई हैं। लगभग सभी कहानियों के केंद्र में मानवीय या प्राकृतिक हादसा है। वे अपनी कहानियों में प्रचलित विमर्शों का सहारा लिए बिना व्यापक मानवीय सरोकार को अभित्यक्त कर देती हैं। इसके ठीक विपरीत गीतांजलिश्री की कहानियां अपनी संरचना में काफी जटिल होती हैं, जो काफी मुश्किल से पकड़ में आती हैं। इस साल उनका नया कहानी संग्रह यहां हाथी रहते थे आया है। इन कहानियों में पर्याप्त विविधता है। सांप्रदायिकता, प्रेम, स्त्री जीवन, प्राकृतिक तबाही आदि पर कहानियां लिखी गई हैं। संजीव का संग्रह झूठी है तेतरी दादी इस बात का प्रमाण है कि उनकी रचनात्मकता में ठहराव नहीं आया है। इस संग्रह की कहानियों में एक तरफ नए अर्थतंत्र के कारण गांवों की सामंती संरचना में हो रहे बदलावों का चित्रण है, तो दूसरी तरफ कॉरपोरेट घरानों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के कारण आम जनता की विडंबनापूर्ण स्थिति का मार्मिक चित्रण भी। जिनकी मुट्ठियों में सुराख था नीलाक्षी सिंह का नया कहानी संग्रह है। इसकी कहानियां आश्वस्त करती हैं कि लेखिका ने परिंदे का इंतजार-सा कुछ में जिस रचनात्मक क्षमता का परिचय दिया था, वह अब भी बरकरार है। अजय नावरिया का कहानी संग्रह यस सर अपने संवेदनात्मक बुनावट की दृष्टि से बेजोड़ है। नावरिया दलित विमर्श की अपनी मजबूत जमीन पर खड़े होकर उसके दायरे को लगातार विस्तृत कर रहे हैं। प्रेम भारद्वाज के पहले कहानी संग्रह इंतजार पांचवें सपने का में स्पष्ट विजन और सरोकार है। ये कहानियां समकालीन यथार्थ को तीक्ष्णता के साथ अभिव्यक्त करती हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ का संग्रह गंधर्व गाथा लीक से हट कर चलने वाले कुछ मध्यवर्गीय पात्रों के चित्रण की दृष्टि से विशिष्ट है। अलका सिन्हा का संग्रह मुझसे कैसा नेह में नई आर्थिक स्थितियों के दबाव में अपने आत्म को खोते जा रहे मनुष्य की कहानियां हैं। इन कहानियों में बिना किसी शोर-शराबे के स्त्री पक्षधरता को महसूस किया जा सकता है। पंकज सुबीर के संग्रह महुआ घटवारिन और अन्य कहानियां का दायरा विस्तृत है। किसानों की आत्महत्या, सांप्रदायिकता, मूल्यहीन बाजारवादी समय आदि को वे अपनी कहानियों की परिधि में समेटते हैं। गोविंद मिश्र का कहानी संग्रह नए सिरे से इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि यह उनके कहानीकार के रूप में एक विशिष्ट पड़ाव है। योजना रावत का कहानी संग्रह पहाड़ से उतरते हुए तमाम बाहरी-भीतरी दबावों के बीच मानवीय संबंधों को सहेजने का सुंदर प्रयास है। कर्मेंदु शिशिर का संग्रह लौटेगा नहीं जीवन ठेठ गंवई भाषा के सर्जनात्मक इस्तेमाल की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। भाषा में ठेठपन है। इस साल आए अन्य कहानी संग्रहों में तुम्हें छू लूं जरा (जयश्री राय), तलघर और अन्य कहानियां (प्रभात त्रिपाठी), कहानी सुनाती यात्राएं (कुसुम खेमानी), चिड़िया ऐसे मरती है (मधु कांकरिया), तेजाब (राजीव कुमार), अधूरे अंत की शुरुआत (विमलेश त्रिपाठी), ब्रेकिंग न्यूज (अनंत कुमार सिंह) आदि उल्लेखनीय रहे हैं। मादा (सुमन सारस्वत), जिजीविषा और अन्य कहानियां (कमर मेवाड़ी), सौगात तथा अन्य कहानियां (बसंत कुमार), संघर्ष (सुशीला टाकभौरे), खुली छतरी (भावना शेखर), ब बॉय... (कृष्ण बिहारी), देवता बोलते नहीं (लता शर्मा), महुआवन का प्रेत (गीता सिंह), दीवार में रास्ता (तेजेंद्र शर्मा), धोखा (सूरजपाल चौहान), मछली मछली कितना पानी (प्रताप सहगल), मत हंसो पद्मावती (निर्मला भुड़ारिया), सफर में अकेली लड़की (जवाहर चौधरी), फिर से इंतजार (सेरा यात्री), भीड़ में (रूप सिंह चंदेल), मर्द नहीं रोते (सूरज प्रकाश), हम कौन हैं (रजतरानी मीनू) भी उल्लेखनीय कहानी संग्रह हैं। आलोचना के क्षेत्र में भी इस वर्ष कई उल्लेखनीय पुस्तकें आर्इं। अब हिंदी साहित्य का मुकम्मल इतिहास लिखना लगभग असंभव हो गया है। आधुनिक काल में विधाओं की संख्या इतनी अधिक हो गई है और रचनाकर्म इतना विपुल कि अब विधावार इतिहास लेखन ही संभव है। इस दिशा में नंदकिशोर नवल ने आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास लिख कर एक बड़ा काम किया है। इसमें उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र से शुरू करके धूमिल तक की कविताओं का लेखा-जोखा किया है। यह अच्छी बात है कि नामवर सिंह के व्याख्यान अब संग्रहित होकर पुस्तकाकार रूप में सामने आ रहे हैं। पूर्ववर्ती चार किताबों के बाद इस साल उनकी चार और किताबें आर्इं। इनमें दो किताबें साक्षात्कारों की हैं, पर दो अन्य किताबें- साहित्य की पहचान और आलोचना और विचारधारा अच्छी आलोचना पुस्तकें हैं। इस वर्ष कृष्णदत्त पालीवाल की दो आलोचना पुस्तकें आर्इं। एक, निर्मल वर्मा और उत्तर औपनिवेशिक विमर्श, दूसरी, अज्ञेय। अज्ञेय एक मुकम्मल पुस्तक है, जिसमें अज्ञेय की संपूर्ण रचनाशीलता पर विचार किया गया है। इसके अलावा उन्होंने स.ही. वात्स्यायन अज्ञेय के अभिभाषण शीर्षक से अज्ञेय द्वारा देश भर में विविध अवसरों पर दिए गए दुर्लभ व्याख्यानों को संकलित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। हाल ही में दिवंगत हुए अरुण प्रकाश की पुस्तक गद्य की पहचान कथेतर गद्य रूपों की आलोचना की दृष्टि से इस साल की महत्त्वपूर्ण पुस्तक रही। रामाज्ञा शशिधर की किसान आंदोलन की साहित्यिक जमीन हिंदी में संभवत: पहली बार तीन स्तरों पर किसान कविता की खोज करती है। पुष्पपाल सिंह की पुस्तक भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास भूमंडलीकरण के संदर्भ में हिंदी उपन्यासों पर विचार करती है। इसमें उन्होंने 1985 से लेकर 2009 तक के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों को अपने अध्ययन का विषय बनाया है। उनकी दूसरी पुस्तक कहानीकार कलेश्वर: पुनर्मूल्यांकन कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का मूल्यांकन करती है। सत्यकाम की पुस्तक भारतीय उपन्यास की दिशाएं भारतीय उपन्यास की देशज अवधारणा के संदर्भ में भारतीय भाषाओं के उपन्यासों का विस्तृत विवेचन करती है। इसी क्रम में वैभव सिंह की पुस्तक भारतीय उपन्यास और आधुनिकता को भी रखा जा सकता है। जितेंद्र श्रीवास्तव की पुस्तक भारतीय समाज, राष्ट्रवाद और प्रेमचंद उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष और उस संघर्ष के दौरान समाज की ज्वलंत समस्याओं- अस्पृश्यता, सांप्रदायिकता, स्त्री प्रश्न, किसान समस्या आदि के संदर्भ में प्रेमचंद के विचार और उनकी रचनाओं का व्यापक विश्लेषण करती है। विजय कुमार की पुस्तक खिड़की के पास कवि इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि यह विश्व कविता से हिंदी पाठकों का परिचय कराती है। इस साल व्यक्तित्व केंद्रित कुछ महत्त्वपूर्ण आलोचना पुस्तकें भी आई हैं। इनमें उन रचनाकारों और आलोचकों का समग्र मूल्यांकन हुआ है, जिन पर ये पुस्तकें केंद्रित हैं। इस तरह की आलोचना पुस्तकों में नामवर सिंह: एक मूल्यांकन (सं.- प्रेम भारद्वाज), अमरकांत: एक मूल्यांकन (सं. रवींद्र कालिया), आलोचना की चुनौतियां (मैनेजर पांडेय पर केंद्रित- सं. दीपक प्रकाश त्यागी) और मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान (सं. सुधा अरोड़ा) उल्लेखनीय रहीं। इन सबके अलावा इस साल आई आलोचना पुस्तकों में साहित्य सृजन: बदलती प्रक्रिया (शंभु गुप्त), पुनर्वाचन (पंकज पराशर), रचना का अंतरंग (नंदकिशोर आचार्य) महत्त्वपूर्ण रहीं। बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध (विद्याभूषण), नया साहित्य: नया साहित्यशास्त्र (राधावल्लभ त्रिपाठी), प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य (रेखा अवस्थी), अज्ञेय और प्रकृति (रूपा गुप्ता), आधुनिकता पर पुनर्विचार (अजय तिवारी) भी उल्लेखनीय हैं। स्त्री विमर्श में इस साल कई गंभीर पुस्तकें आर्इं। चारु गुप्ता की स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक औपनिवेशक भारत में जेंडर विमर्श और यौनिकता के सवाल को समग्रता में उठाती है। लेखिका ने उस दौर के हिंदू संगठनों के सांस्कृतिक विचारों में जेंडर की निर्णायक भूमिका और सांप्रदायिक उभार से उसके अंत:संबंध की गहरी छानबीन की है। नीरजा माधव की पुस्तक हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में भारतीय नारियों के योगदान को सामने लाने का उल्लेखनीय प्रयास है। इस पुस्तक से स्त्री विमर्श पर एक नई रोशनी पड़ सकती है। संजय गर्ग के संपादन में आई पुस्तक स्त्री विमर्श का कालजयी इतिहास स्त्री विमर्श की भारतीय जमीन को तलाशने में मदद करती है। स्त्री विमर्श की ओर से हिंदी आलोचना में हस्तक्षेप की दृष्टि से मैत्रेयी पुष्पा की किताब तबदील निगाहें इस साल की सर्वाधिक उल्लेखनीय पुस्तक रही। इस पुस्तक द्वारा लेखिका ने हिंदी आलोचना में सार्थक हस्तक्षेप किया है। इसमें एक स्त्री के नजरिए से हिंदी की उसने कहा था, गोदान, चित्रलेखा, ध्रुवस्वामिनी, त्यागपत्र, मैला आंचल और राग दरबारी जैसी कालजयी रचनाओं की विचारोत्तेजक समीक्षा की गई है। स्त्री विमर्श की अन्य महत्त्वपूर्ण किताबें स्त्री विमर्श की उत्तर गाथा (अनामिका), स्त्री मुक्ति: संघर्ष और इतिहास (रमणिका गुप्ता), आवाज (मैत्रेयी पुष्पा) आदि रहीं। इस साल कथेतर विधाओं में काफी हलचल रही। यात्रा-वृतांत में अनिल यादव का संस्मरण यह भी कोई देस है महराज सर्वाधिक सराहा गया। पूर्वोत्तर भारत को लेकर ऐसा यात्रा संस्मरण प्राय: नहीं लिखा गया है। यह पुस्तक पूर्वोत्तर को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है। असगर वजाहत का रास्ते की तालाश में शीर्षक यात्रा वृतांत में चार यात्राओं का वर्णन है। इस साल आई यात्रा वृतांत की एक अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तक पंकज बिष्ट की खरामा-खरामा है। वर्णन शैली में रोचकता के कारण पुस्तक अत्यंत पठनीय है। अमरेंद्र किशोर की पुस्तक बादलों के रंग हवाओं के संग यात्रा और संस्कृति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है। जीवनी साहित्य के अंतर्गत नरेंद्र मोहन द्वारा लिखित सआदत हसन मंटो की जीवनी मंटो जिंदा है काफी उल्लेखनीय रही। यह जीवनी मंटो को संपूर्णता में पाठकों से रूबरू कराती है। नामवर सिंह के बनारस में बिताए, खासकर 1941 से 1953 तक के जीवन और कृतित्व को सामने लाने का महत्त्वपूर्ण काम भारत यायावर ने अपनी पुस्तक नामवर होने का अर्थ में किया। लगभग बारह वर्षों के उनके जीवन का ब्योरा कहीं और नहीं मिलता। यह इस साल की चर्चित पुस्तकों में रही। संस्मरण की पुस्तकों में इस साल नीलाभ की पुस्तक ज्ञानरंजन के बहाने की काफी चर्चा रही। इस पुस्तक में लेखक ने उस दौर के इलाहाबाद को पूरी तरह जीवंत कर दिया है। इस विधा की अन्य पुस्तकों में लता: ऐसा कहां से लाऊं (पदमा सचदेव), आलोचक का आकाश (मधुरेश), और दूरवन में निकट मन में (अजितकुमार) उल्लेखनीय रहीं। बलराम की संस्मरण पुस्तक माफ करना यार, सत्यकाम का यात्रा संस्मरण विदुशा की छांव में, असगर वजाहत का पाकिस्तान का मतलब क्या, देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक मेरी विज्ञान डायरी, शिवेंद्र कुमार सिंह यह जो है पाकिस्तान, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अमेरिका यूरप में एक भारतीय मन उल्लेखनीय पुस्तकें हैं। पत्र साहित्य के अंतर्गत विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के संपादन में अज्ञेय पत्रावली का प्रकाशन हुआ। अज्ञेय के पत्रों को पढ़ने से न सिर्फ उनके व्यक्तित्व और मानसिकता को समझने में मदद मिलती है, बल्कि उस समय के साहित्यिक वातावरण का भी भरपूर आभास मिलता है। इस साल हिंदी में कुछ ऐसी पुस्तकें भी आर्इं, जो अपने समय और समाज की बारीक पड़ताल करती और उसे समझने की नई दृष्टि देती हैं। श्रीभगवान सिंह की गांधी एक खोज ऐसी ही पुस्तक है। यह इस भूमंडलीय उपभोक्तावादी दौर में गांधी चिंतन के कई बिंदुओं की प्रासंगिकता की तलाश करती है। प्रेमपाल शर्मा की पुस्तक विकल्प के सूत्र इस बात को सामने लाती है कि अगर इस व्यवस्था का विकल्प जल्दी नहीं खोजा गया तो हमारा अंत निश्चित है। सुभाष शर्मा विकास के समाजशास्त्र में भारतीय संदर्भ में विकास के अवरोधक तत्त्वों पर गहन विचार-विमर्श करते हैं। इन सबसे इतर भाषा सिंह अदृश्य भारत के जरिए इस भयावह सच्चाई की हमारे सामने लाती हैं कि आज भी कानूनन प्रतिबंधित होने के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में सिर पर मैला ढोने की प्रथा जारी है। इस साल नाटक और व्यंग्य के क्षेत्र में लगभग सन्नाटे की स्थिति रही। नाटक में मीराकांत का अंत हाजिर हो, असगर वजाहत का गोडसे@गांधी डॉट कॉम, राजेश जोशी का नाटक पांसे और सपना मेरा यही सखी, हृषिकेश सुलभ का माटीगाड़ी उल्लेखनीय पुस्तकें रहीं। व्यंग्य संग्रहों में फिट है बॉस (सतपाल) और ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग (प्रेम जनमेजय) को महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है। इस साल अनुवाद के माध्यम से कुछ अच्छी पुस्तकें भी आर्इं। इनमें सीमोन द बोउवा के आत्मकथात्मक उपन्यास ए वेरी ईजी डेथ (अनु. गरिमा श्रीवास्तव), ख्वान मान्वेल मार्कोस की रचना गुंतेर की सर्दियां (मूल स्पेनिश से अनुवाद- प्रभाती नौटियाल), कुलदीप नैयर की आत्मकथा एक जिंदगी काफी नहीं (अनु. युगांक धीर), और आहत देश (अरुंधती राय) पठनीय पुस्तकें रहीं। इस साल कथेतर साहित्य में फिल्म और ललित कलाओं पर कई उल्लेखनीय पुस्तकें आर्इं। फिल्म समीक्षा के क्षेत्र में ललित जोशी की बॉलीवुड पाठ, दिनेश श्रीनेत की पश्चिम और सिनेमा, जवरीमल्ल पारख की साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिंदी सिनेमा, मिहिर पंड्या की शहर और सिनेमा: वाया दिल्ली, विजय शर्मा की वॉल्ट डिज्नी: एनीमेशन का बादशाह आदि उल्लेखनीय पुस्तकें रहीं। कला विमर्श में ज्योतिष जोशी की दो पुस्तकें आर्इं- आधुनिक भारतीय कला और रवींद्रनाथ ठाकुर: घर और बाहर। इसके अलावा रीता शर्मा की बिहार की कला परंपरा उल्लेखनीय पुस्तकों में रही। संगीत के क्षेत्र में शिवकुमार शर्मा की आत्मकथा संतूर मेरा जीवन संगीत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। सोज. जनसत्ता


Send Your Comment
Your Article:
Your Name:
Your Email:
Your Comment:
Send Comment: