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'विद्रोही कवि' काजी नजरूल इस्लाम, जिन्होंने लिखे कृष्ण भजन और पौराणिक नाटक | बीज उपचार का महत्व | मनाली |

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बीज उपचार का महत्व
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कृशि उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु बीज उपचार की आवष्यकता दिनों दिन बढ़ता जा रहा है, क्योंकि हमारे फसलों में रोग पहले से ही बीजों में, मृदा में पहुंच जाते है, जिसका ज्ञान किसानों को नहीं होता और ग्रसित बीज को बुवाई के लिए उपयोग में लाते हैं, अत: फसल को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बीजों का सुध्दिकरण आवष्यक है। बीज उपचार की विधी :- 1- 17 प्रतिषत नमक घोल से बीज उपचार। 2- रासायनिक विधी से बीज उपचार। (1) 17 प्रतिषत नमक घोल से बीज उपचार :- बुवाई से पहले बीज को उपचार करने के लिए 17 प्रतिषत नमक घोल तैयार करना आसान व सस्ता विधी है, सर्वप्रथम किसी साफ बर्तन में 10 लीटर पानी लेते हैं। तत्पष्चात 1 किलों 700 ग्राम नमक को डालकर 17 प्रतिषत नमक घोल तैयार कर लेते है। घोल में किसी भी फसल के बीज, जिसका बुवाई करना है, डालते है डालने के तुरंत बाद देखेगें कि हल्का व अस्वस्थ बीज उपर तैरने लगता है एवं स्वस्थ बीज नीचे तली में बैठ जाता है, उपर तैरते बीज को अलग कर स्वस्थ बीज को बुवाई के लिए उपयोग किया जा सकता है। साथ ही ध्यान रखें स्वस्थ बीज को नमक घोल से निकाल कर साफ पानी में धोकर उपयोग करें। (2) रासायनिक एवं जैविक विधी से बीज उपचार :- बीज को रासायनिक दवा जैसे बाविस्टीन, कार्बेन्डाजिम, मैलाथियान, टी. विरडी 2 से 3 ग्राम प्रति किलों बीज के लिए उपयुक्त होता है, इन रासायनों से बीज को अच्छी तरह उपचारित कर बोने से फंफूदी व जीवाणु जनित रोग कम आते है। रासायनिक दवाओं का उपयोग फसलानुसार चयन किया जाता है। जैसे उकटा रोग वाले फसल बीज के लिए टी.विरडी प्रभावी साबित हुआ है, इसके अलावा बावेस्टिन,मैलाथियान, कार्बेन्डाजिम सभी प्रकार के फसल बीज के लिए उपचार हेतु उपयोग में लाया जा सकता है।


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