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तर्कशील, वैज्ञानिक, समाजवादी विवेकानंद-- डा दत्तप्रसाद दाभोलकर
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ब्राह्मणों ने हमें अन्धविश्वास में फंसा रखा है २० अगस्त १८९३ की बात है। विवेकानन्द केट सनबोर्न के फार्म हाऊस में ठहरे हुए थे। केट सनबोर्न एक प्रसिद्ध लेखिका थीं और मैसाचुसेट्स के स्मिथ कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य की भूतपूर्व अध्यापिका रह चुकी थीं। उस समय लोग विवेकानन्द का मज़ाक उड़ा रहे थे, क्योंकि वे विश्‍व धर्म संसद में बिना आमंत्रण के पहुँच गए थे। किंतु विवेकानन्द को इसकी कोई चिंता नहीं थी। उन्हें पूर्ण आत्मविश्‍वास था कि वे आमंत्रण प्राप्ति का कोई न कोई रास्ता खोज लेंगे। उस दिन किसी भी प्रकार के धार्मिक विमर्श उनके मन में नहीं थे। अपने अनुयायियों को किसी और ही मुद्दे पर वे पत्र लिखते हैंभारत में गरीबों और पतितों की स्थिति के बारे में। वे लिखते हैं, उनके पास न कोई अवसर है, न बचने की राह और न उन्नति के लिए कोई मार्ग ही है, और सदियों के अत्याचार के फलस्वरूप पीड़ा, दुख, हीनता, दारिद्र्य की आह भारत-गगन में गूँज रही है। वे आगे कहते हैं कि उन्होंने इस स्थिति से उबरने का रहस्य और भारत में युगों से संचित पर्वताकार अनंत दुखराशि को आग लगाने का मार्ग खोज लिया है। यद्यपि यह एक दिन का काम नहीं है और रास्ता भी अत्यंत भयंकर काँटों से भरा है लेकिन हम सफल होंगे। विवेकानन्द ने यह सब इतने आत्मविश्‍वास से कहा, इसके पीछे कारण था। उन्होंने बारानगर मठ को १८९० में सत्ताईस साल की उम्र में छोड़ दिया था, और एक घुमक्कड़ संत बन गए थे। तीन साल तक वे घूमते रहे, और जब वे ३१ मई १८९३ को कलकत्ता से अमेरिका के लिए रवाना हुए, तब तक उन्होंने लगभग पूरे भारत की यात्रा कर ली थी। इस यात्रा में उन्होंने जो देखा उससे वे बहुत व्यथित हुए। अपने मित्रों और अनुयायियों को लिखे उनके पत्र देश में गरीबों और वंचितों की भयंकर परिस्थिति के प्रति उनकी पीड़ा को उजागर करते हैं। इन पत्रों में गरीबों को इस पीड़ा और दरिद्रता से बाहर लाने की उनकी लालसा साफ झलकती है। बहुत चिंतन-मनन के पश्‍चात बाद के कुछ पत्रों में वे लिखते हैं कि उन्होंने उन २० करोड़ हिंदू, मुसलमान और ईसाई पुरुष, महिलाओं और बच्चों की मुक्ति का मार्ग खोज लिया है जो गरीबी, अज्ञानता, कुरीतियों, परंपराओं और अंधविश्‍वास में छटपटा रहे हैं। और यह मार्ग तीन सिद्धांतों पर आधारित हैतार्किकता, विज्ञान और समानता। किसी भी बात पर आँखें बंद करके भरोसा मत करो। वैज्ञानिक एवं तर्कशील विवेकानन्द विवेकानन्द एक असाधारण वैज्ञानिक संत थे। वे स्पष्ट रूप से कहते थे कि, हम चमत्कारों में बिल्कुल विश्‍वास नहीं रखते। . . . बहुत सी आश्‍चर्यजनक चीज़ें जो भारत में की जाती हैं और विदेशी पत्रों में जिनका विवरण दिया जाता है, वे हाथ की सफाई या सम्मोहनजन्य भ्रम हैं, वे ज्ञानियों के कार्य नहीं हैं। ८ मार्च १८९५ को दिए एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि, मैं चमत्कारों को सत्य के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखता हूँ। ३० नवंबर १८९४ को किडी (सिंगारावेलू मुदालियर) को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं: (चमत्कार) कुछ भी सिद्ध नहीं करते। जड़ के द्वारा चेतन का प्रमाण नहीं दिया जा सकता। ईश्‍वर, आत्मा का अस्तित्व अथवा अमरत्व के साथ चमत्कारिक क्रियाओं का भला क्या संबंध हो सकता है? . . . तुम इस तरह की अलौकिक बकवास में अपना सिर मत खपाओ, और अपनी धर्मांधता से दूसरों को परेशान न करो। इसी तरह वे ज्योतिषशास्त्र को भी खारिज करते थे: ज्योतिष और ये सब रहस्यमयी वस्तुएँ बहुधा दुर्बल मन की द्योतक हैं; इसलिए जब हमारे मन में इनका उभार हो, तब हमें किसी डॉक्टर के यहाँ जाना चाहिए, उत्तम भोजन ग्रहण करना चाहिए और विश्राम करना चाहिए। गौतम बुद्ध के कहे का हवाला देकर विवेकानन्द ने यहाँ तक कहा कि जो लोग इस तरह की बेकार बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं वे वास्तव में ठग हैं: जो लोग नक्षत्रों की गणना या इसी प्रकार की कला और अन्य मिथ्या-प्रपंचों से जीविकोपार्जन करते हैं, उनसे दूर ही रहना चाहिए। इसी बात को वे एक कहानी के द्वारा समझाते हैं: तुममें से प्रत्येक व्यक्ति अंधविश्‍वासी होने के बदले घोर नास्तिक भी हो जाए तो मुझे वह ज्यादा अच्छा लगेगा, क्योंकि नास्तिक जीवित है, और उसका तुम कुछ कर सकते हो। परंतु यदि अंधविश्‍वास घुस जाए तो दिमाग बिगड़ जाएगा, कमजोर हो जाएगा और मनुष्य विनाश की ओर अग्रसर होने लगेगा। विवेकानन्द साहित्य, खण्ड 5, पृ. 172; Volume 3, Lectures from Colombo to Almora, The Work Before Us. किसी ज्योतिषी के बारे में एक प्राचीन कथा है। एक राजा के यहाँ जाकर उसने कहा, छः महिने में आपकी मृत्यु हो जाएगी। राजा इस बात से इतना डर गया कि उसकी हालत मरणासन्न जैसी हो गई। लेकिन उसका मंत्री बड़ा चतुर था। उसने राजा से कहा कि ये ज्योतिषी मूर्ख होते हैं। लेकिन राजा उसकी बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। मंत्री को समझ में आया कि राजा के सामने ज्योतिषी को प्रत्यक्ष रूप से मूर्ख सिद्ध किए बिना और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ज्योतिषी को राज दरबार में बुलवाया गया और उससे पूछा गया कि क्या उसकी गणना सही है? ज्योतिषी ने जवाब दिया कि उसकी गणना में कोई गलती नहीं हो सकती। लेकिन मंत्री को संतुष्ट करने के लिए उसने सारी गणना फिर दुबारा की, और फिर कहा कि पूरी गणना बिलकुल सही है। इस पर राजा का चेहरा फीका पड़ गया। तब मंत्री ने ज्योतिषी से पूछा, आपकी मृत्यु कब होगी, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं? ज्योतिषी ने जवाब दिया, बारह वर्ष में। मंत्री ने तुरंत तलवार खींच ली और ज्योतिषी का सिर धड़ से अलग कर दिया और राजा से कहा, इस झूठे को आप देख रहे हैं, यह तो इसी समय मर गया है। इसी तरह, विवेकानन्द ने लोगों का आह्वान किया था कि वे किसी भूत या अंधविश्‍वास में भरोसा नहीं करें। ९ फरवरी १८९७ को मद्रास में ट्रिप्लिकेन लिटरेरी सोसाइटी में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था: हमें उन सैंकड़ों अंधविश्‍वासों से बाहर निकलना है जिन्हें हम सदियों से अपनी छाती से लगाते आए हैं। . . . अंधविश्‍वास और हर बात को रहस्यमय बनाना कमजोरी की निशानी है। ये पतन और मृत्यु के चिन्ह हैं। . . . मानव जाति का धिक्कार है कि शक्तिशाली लोग इन अंधविश्‍वासों पर अपना समय गँवा रहे हैं, दुनिया के सबसे सड़े अंधविश्‍वासों की व्याख्या करने के लिए रूपकों का आविष्कार करने में अपना समय नष्ट कर रहे हैं। १८९६ में लाईट ऑफ द ईस्ट के संपादक को लिखे पत्र में वे कहते हैं: मैंने जादू-टोना को हमेशा मानवता को कमजोर करने वाला और हानिकारक माना है। महान बुद्ध कहते हैं, जो तुमने सुना है, उसमें विश्‍वास मत करो। सिद्धांतों पर विश्‍वास इसलिए मत करो कि ये तुम्हें पिछली पीढ़ियों से प्राप्त हुए हैं, किसी बात पर इसलिए विश्‍वास मत करो कि बहुत लोग उसे आँखें बंद करके मानते हैं, इसलिए विश्‍वास मत करो क्योंकि किसी वृद्ध महर्षि ने कहा है, उन सत्यों में विश्‍वास मत करो जिनको तुम आदतन मानने लगे हो, इसलिए विश्‍वास मत करो कि तुम्हारे गुरुओं या वृद्ध जनों ने प्रमाणित किया है। खुद सोचो और विश्‍लेषण करो, और तब यदि निष्कर्ष तर्कसंगत तथा सबके लिए हितकर लगे, तो उसमें विश्‍वास करो और उसे अपने जीवन में उतार लो। विवेकानन्द साहित्य, खण्ड 2, पृ. 276; Volume 4, Lectures and Discourses, The Claims of Religion. जनता में अंधविश्‍वासों के प्रसार के लिए विवेकानन्द ब्राह्मणों को दोषी मानते हैं। वे आरोप लगाते हैं कि आम जनता का शोषण करने के हेतु से ब्राह्मण आम लोगों को पिछड़ेपन में फंसाये रखना चाहते हैं।


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