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पटना: मोतीलाल बनारसीदास की प्रसिद्ध किताब दुकान बंद
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इस बार पटना गया तो मन बहुत उदास हुआ। 'प्रगतिशील साहित्य सदन' के Suman Ji ने बताया कि पटना में मोतीलाल बनारसीदास की किताब दुकान बंद हो गई है। भारतीय साहित्य, दर्शन और वाङ्मय की किताबों के बेहतरीन प्रकाशन मोतीलाल बनारसीदास से हुए हैं। मूलतः लाहौर के व्यापारी लाला मोतीलाल जैन ने किताबों की इस दुनिया की शुरुआत 1903 ई. में की थी। 1911 ई. में जब भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाई जा रही थी तब मोतीलाल बनारसीदास की एक शाखा अमृतसर में खोली गई। कहा जाता है कि राजेन्द्र प्रसाद की सलाह पर पटना में 1937 ई. में शाखा खोली गई। पटना विश्वविद्यालय के ठीक सामने। पटना शहर के ज्ञान पथ 'अशोक राजपथ' पर। एक से एक उच्च स्तरीय किताबें यहाँ से छपीं। हमलोग जब बीए में नाम लिखाए तो मोतीलाल बनारसीदास की दुकान में जाने लगे। कई लोगों से परिचय हुआ। इस परिचय में हमारे शिक्षकों का भी बहुत योगदान रहा। मुझे याद है जब एक बार हमारे हाथ में पी.वी. काणे की किताब 'हिस्ट्री ऑफ संस्कृत पोएटिक्स' और 'हर्षचरित' का संस्कृत-हिंदी संस्करण आया तो ख़ुशी दुगनी हो गई थी क्योंकि Yatindra भैया द्वारा संपादित पत्रिका 'सहित' में विद्यानिवास मिश्र का एक लेख भारत पर था जिसमें उन्होंने 'हर्षचरित' और 'रत्नावली' की चर्चा की थी। बाद में शालिग्राम शास्त्री द्वारा आचार्य विश्वनाथ की किताब 'साहित्यदर्पण' भी वहीं मिला। और भी अनेक किताबें वहीं से लीं। आचार्य नरेन्द्र देव का 'बौद्ध धर्म दर्शन' भी इसी प्रकाशन से छपा है। नलिनविलोचन शर्मा और केसरी कुमार द्वारा संपादित 'स्वर्ण-मंजूषा' जो ब्रजभाषा कविता का शानदार संकलन है, यहीं से छपा है। वह दुकान जिसमें चारों तरफ किताबें ही किताबें ! ऊपर-नीचे ! नीचे किताबों के बीच से गलियारा नुमा रास्ता। प्राकृत का कोश 'पाइअ- सद्द-महण्णवो' एक बार यहीं देखा था। संभवतः एमए. हिंदी में पढ़ रहा था। उस समय ही 1000 रु. के आस-पास दाम था। नहीं खरीद पाया था जिसका आज तक अफ़सोस है। एक दुखती रग है वह कोश ! यह अजब दौर है कि हिंदी के वे प्रकाशक या किताब दुकान वाले जिनके पास विभिन्न प्रकाशकों की किताबों का व्यापक संकलन हुआ करता था, अब धीरे-धीरे मरणासन्न हैं। पटना में ही अंग्रेजी किताबों की बेहतरीन दुकान 'रीडर्स काॅर्नर' पहले ही बंद हो गई। बनारस के विश्वविद्यालय प्रकाशन का हाल भी इस बार गर्मी छुट्टी में गया तो कुछ ठीक नहीं महसूस हुआ। पटना के ही अनुपम प्रकाशन के मालिक अनूप जी मिलने पर हर बार हिंदी प्रकाशन के संघर्ष की चर्चा करते हैं। एक तरफ सरकारी नीतियों ने पढ़ने-लिखने की संस्कृति का नाश किया और दूसरी तरफ़ व्यापारिक प्रतियोगिता इतनी बढ़ गई है कि कैसे कोई टिक पाएगा ! इलाहाबाद में दिनेश जी का लोकभारती प्रकाशन भी बंद ही हो गया। पर चूँकि राजकमल प्रकाशन ने लोकभारती प्रकाशन खरीद लिया इसलिए वहाँ से प्रकाशित किताबें मिल जाती हैं। अनपढ़ बनाए रखने की साज़िश लगातार जारी है। स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक। ऐसा न होता तो गया जैसे शहर में 'डाॅमिनोज' का पिज्जा सेंटर खुल सकता है पर रूटलेज जैसे प्रकाशक का शो रूम नहीं। ऐसा सब जगह है। सार्वजनिक पुस्तकालय की संस्कृति भी समाप्त है। कुल मिलाकर यह कि सब को सोचने से दिक्कत है। गाना तो आ ही चुका था कि "गोली मारो भेजे में, भेजा शोर करता है।" अब शायद यह कहा जा रहा कि "सोचने का टेंशन मत लीजिए। हम सोच देंगे आप के लिए। आप बस मोबाइल पर वीडियो देखिए और मैसेज शेयर कीजिए।" इंसान सोचने की सिफ़त के कारण ही बाक़ी पशुओं से अपने को अलग मानता रहा है। अब सोचने पर अरुचि, पाबंदी और दमन एक साथ है। इस कोलाहल के बीच यह सवाल अनुत्तरित ही है कि इंसान का अगला मामला क्या होगा ? वक़्त की प्रतीक्षा है। (योगेश प्रताप शेखर- फेसबुक से साबार)


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