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दर्शक की फिक्र किसे है--मुकेश कुमार
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टेलीविजन चैनलों के प्रबंधक-स्वामी विज्ञापनों की समय-सीमा निर्धारित किए जाने से बहुत नाराज हैं। भारतीय दूरसंचार नियामक यानी ट्राई द्वारा तय किए गए नियम को वे टेलीविजन उद्योग के लिए घातक बता रहे हैं। उनकी मांग है कि इसे लागू न किया जाए। मुमकिन है कि वे इस फैसले के खिलाफ अदालत जाएं और एक बार फिर उसे रुकवाने में कामयाब हो जाएं। ऐसा पहले भी हो चुका है। पिछले साल मई में जब ट्राई ने नियम जारी किए तो टीवी उद्योगपतियों ने खूब हो-हल्ला मचाया था। लिहाजा उन पर अमल स्थगित करना पड़ा था। इस बार ट्राई ने सभी पक्षों से विचार-विमर्श करके संशोधित नियम लागू करने का एलान किया है। उसने तय किया है कि एक घंटे की अवधि में बारह मिनट से ज्यादा विज्ञापन नहीं दिखाए जा सकेंगे। इन बारह मिनटों में से दस मिनट व्यवासायिक विज्ञापनों के लिए होंगे और दो मिनट अपने कार्यक्रमों के प्रचार के लिए। तमाम उपभोक्ता संगठनों ने इसका स्वागत किया है, लेकिन प्रसारक इन संशोधित नियमों का भी विरोध कर रहे हैं। जाहिर है वे चाहते हैं कि उनकी मनमानी पहले की तरह चलती रहे। टेलीविजन प्रसारक विरोध के पीछे कई वजहें बता रहे हैं, जिनमें टीवी चैनलों के कारोबारी मॉडल के लड़खड़ाने का खतरा भी शामिल है। लेकिन असली कारण कुछ और हैं। दरअसल, वे नहीं चाहते कि उन्हें किसी नियमन में बांधा जाए, ताकि वे जो ठीक समझें करते रहें। इसीलिए वे आत्म-नियमन और अंतरराष्ट्रीय चलन की दुहाई दे रहे हैं। सवाल है कि अगर आत्म-नियमन के प्रति वे इतने ही गंभीर होते तो ट्राई के हस्तक्षेप की जरूरत क्यों पड़ती। ट्राई ने ये नियम अचानक लागू करने का फैसला नहीं किया है। उसने नया नियम-कानून नहीं बनाया, बल्कि वह 1994 में बने केबल नेटवर्क नियमन अधिनियम के प्रावधान को ही लागू करने की कोशिश कर रहा है। इन बीस सालों में प्रसारकों को भरपूर समय मिला था, जब वे पहले से बने नियमों को लागू करके अपनी ईमानदारी और आत्म-नियमन का परिचय दे देते, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। दरअसल, बार-बार यह सिद्ध हो रहा है कि प्रसारकों को दर्शकों की कोई चिंता नहीं है। वे सिर्फ अपने कारोबारी हितों या मुनाफे में लगातार बढ़ोतरी के बारे में सोच रहे हैं। वे दलील दे सकते हैं कि ज्यादातर चैनलों की आर्थिक हालत खराब है और उन्हें अपना खर्च निकाल पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में पूछा जा सकता है कि उन्हें ऐसे उद्योग में आने की क्या जरूरत थी, जिसमें घाटे की आशंका ज्यादा हो। फिर वे ढेर सारे चैनल जो कतार में हैं, क्यों ओखली में सिर देने पर आमादा हैं? पिछले साल जारी हुए ट्राई के नियमों में कई विसंगतियां थीं, इसलिए प्रसारकों का विरोध समझा जा सकता था। लेकिन अब उन्हें दूर कर लिया गया है। ट्राई ने दो ब्रेक के बीच के अंतर को तीस मिनट से घटा कर पंद्रह मिनट कर दिया है और खेल चैनलों के लिए विशेष छूट भी दी है। विज्ञापन के कुछ प्रकारों पर से पाबंदी भी हटा ली है। कुल मिलाकर अधिकतर आपत्तियां दूर कर दी गई हैं। प्रसारक फिर भी क्यों विरोध कर रहे हैं? दरअसल, जिस तरह टेलीविजन की सामग्री के मामले में आत्म-नियमन सुधारों को लागू न करने या उन्हें जब तक हो सके टालने का बहाना बना लिया गया है, उसी तरह यहां भी उसे ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल है कि प्रसारकों के आत्म-नियमन के तर्क पर भरोसा कैसे किया जाए? अभी तक उन्होंने एक भी ऐसी मिसाल नहीं पेश की है, जिससे यकीन हो सके कि उन्हें दर्शकों की चिंता है? चैनलों में दर्शनीय सामग्री से ज्यादा विज्ञापनों की भरमार है। दो-चार खबरें देखने के बदले ढेर सारे विज्ञापन झेलने पड़ते हैं। नियमानुसार उन्हें छह मिनट विज्ञापन दिखाने चाहिए, मगर वे बारह से बीस मिनट तक दिखाते हैं। मनोरंजन चैनलों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। हर दृश्य के बाद लंबा अंतराल। तीस मिनट के धारावाहिक में पंद्रह से अठारह मिनट की सामग्री होती है, बाकी विज्ञापन। दो घंटे की फिल्में साढ़े तीन-चार घंटों में खत्म होती हैं। खास मौकों, जैसे दिवाली या किसी अन्य त्योहार के समय तो यह अवधि सारी सीमाएं लांघ जाती है। उस समय तीस से चालीस मिनट तक के विज्ञापन न्यूज चैनलों पर चलते देखे गए हैं। मुख्य समाचारों के बाद ही विज्ञापन शुरू हो जाते हैं। दर्शकों को इस समस्या से कौन उबारेगा? टीवी उद्योग जगत कहता है कि सब कुछ आत्म-नियमन के भरोसे छोड़ दो। यह शेर के सामने मेमनों को डाल देने जैसी बात है। बाजार की दाढ़ में मुनाफे का खून लग चुका है और वह किसी तरह की रहम को तैयार नहीं दिखता। ऐसे में ट्राई अगर नियमन के जरिए दर्शकों के अधिकारों की रक्षा करना चाहता है तो उसकी राह में रोड़े नहीं अटकाए जाने चाहिए। ध्यान रहे कि ट्राई और सरकार बाजार-विरोधी नहीं हैं और उनका यह कदम भी बाजार को बचाने के लिए ही है। आखिरकार उपभोक्ता भी बाजार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है और उसे असंतुष्ट रख कर प्रसारक अपने भले की बात कैसे सोच सकते हैं! ट्राई के इस कदम का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि टीवी के दर्शकों की संख्या में इजाफा होगा, वे ज्यादा देर तक और ध्यान से टीवी देखेंगे। यानी प्रसारकों के पास पहले से बड़ा दर्शक वर्ग होगा, जिसे वे विज्ञापनदाताओं को बढ़ी हुई दरों पर बेच कर पहले से ज्यादा राजस्व अर्जित कर सकेंगे। अभी तो ब्रेक आते ही दर्शक चैनल बदलने लगता है, जिसका मतलब है विज्ञापनों पर होने वाले खर्च का बरबाद होना। विज्ञापनों की समय-सीमा निर्धारित हो जाने से टीवी चैनलों को भरपाई के लिए विज्ञापनों की दरें बढ़ानी पड़ेंगी। इस बढ़ोतरी से विज्ञापन उद्योग मात्रा के बजाय गुणवत्ता पर जाएगा। बड़े चैनलों में अवधि कम हो जाने से जाहिर है कि उन्हें दरें बढ़ाने में सुविधा होगी और यही सिलसिला नीचे तक जाएगा। नतीजतन, इसका लाभ सभी चैनलों को होगा। दिलचस्प बात है कि टीवी उद्योग द्वारा जारी किए जाने वाले आंकड़े ही कहते हैं कि उसके वार्षिक विकास की दर चौदह फीसद के आसपास है। उसका विज्ञापन राजस्व भी दूसरे सभी माध्यमों की बनिस्बत तेजी से बढ़ रहा है। प्रिंट मीडिया को मिलने वाले विज्ञापनों के वह बिल्कुल करीब पहुंच गया है और अगले तीन साल में उसे पीछे छोड़ देगा। यानी मंदी का उसका रोना ठीक नहीं है। वैसे 2008 की घोषित मंदी के दौरान भी टीवी उद्योग की विकास दर करीब बारह फीसद थी, जो कि दूसरे उद्योगों की तुलना में अच्छी-खासी थी। प्रसारकों का यह कहना एक हद तक सही है कि हिंदुस्तान में टीवी चैनलों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं। उन्हें सदस्यता शुल्क से कोई कमाई नहीं होती, जैसी कि पश्चिमी देशों में होती है। इसके विपरीत चैनल के वितरण के लिए उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। एक अनुमान के मुताबिक एक राष्ट्रीय चैनल को देश भर में कायदे से दिखने के लिए पचास से पचहत्तर करोड़ रुपए सालाना खर्च करने पड़ते हैं। वितरण के इस भारी-भरकम खर्च ने टीवी चैनलों की कमर तोड़ रखी है। स्थापित चैनलों के लिए तो फिर भी ठीक है, मगर बाकी के लिए वितरण और दूसरे खर्चों को विज्ञापन के जरिए निकाल पाना असंभव सा लक्ष्य होता जा रहा है। केबल नेटवर्क के डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया ने वितरण खर्च में कमी का रास्ता खोल दिया है। पहले दौर में चार महानगरों के नेटवर्क डिजिटल हो गए हैं और इससे वितरण का खर्च बीस से तीस फीसदी तक कम हो गया है। डिजिटाइजेशन के दूसरे चरण के पूरा हो जाने के बाद वितरण का खर्च काफी कम हो जाएगा। प्रसारक चाहते हैं कि यह काम पूरा हो जाए, तब जाकर विज्ञापनों की समय-सीमा तय की जाए। लेकिन दो-तीन साल तक दर्शकों को प्रताड़ना झेलनी पड़े, इसकी कोई तुक नहीं है। यह अवश्य हो सकता है कि विज्ञापनों की अवधि को छह महीने से लेकर साल भर तक की अवधि में दो या तीन चरणों में बांट दिया जाए, जिससे टीवी उद्योग जगत इस झटके को बर्दाश्त करने की ताकत पैदा कर ले। आज भारतीय टेलीविजन उद्योग बहुत अव्यवस्थित है और उसमें तमाम अवांछित और अनैतिक प्रवृत्तियां काबिज हो गई हैं। बहुत आवश्यक है कि बड़ी सफाई हो। यह काम नियमन के जरिए ही संभव होगा। बेहतर अनुशासन और नियमन भविष्य में आने वाले चैनलों को भी सावधान करेगा और वे पूरी तैयारी से आएंगे। लिहाजा बदलाव की पहलों का रास्ता रोका नहीं जाना चाहिए।


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