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नज़रिया: सीरिया, इराक़ से तुलना के राहुल के तर्क में कितना दम? --अदिति फड़नीस
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जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय दर्शकों से बातें करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ठीक इसी बात को उठाया है कि भारत अलगाव की राजनीति की ओर बढ़ रहा है जिसका पूरे विश्व पर गंभीर परिणाम पड़ सकता है. राहुल गांधी ने 'वंचितों' की श्रेणी में न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों को, बल्कि दलितों, आदिवासियों और मध्यम वर्ग का संदर्भ दिया और कहा कि जान-बूझकर इन समूचे लोगों को सरकारी नीतियों से अलग किया गया है, जिन्हें बहुत मुश्किलों से पिछली सरकारें सिस्टम में लाई थी.राहुल गांधी ने मनमोहन सरकार की उपलब्धियों को गिनाया, जैसे रोजगार गारंटी कार्यक्रम और दलित अधिकार क़ानून. उन्होंने वर्तमान सरकार पर इन दोनों क़ानूनों को कमज़ोर करने का आरोप लगाया. राहुल ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर बात की, जैसे कि नोटबंदी और जीएसटी और आरोप लगाया कि इन्होंने लाखों लोगों के रोजगार-धंधे छीन लिए और केवल अमीरों और कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाया. अपने भाषण के दौरान उन्होंने सरकार की आंतरिक और विदेश नीति की आलोचना भी की. उन्होंने भारत की तुलना चीन से की, दोनों देशों की विकास दरों और नौकरियों को पैदा करने की क्षमता की तुलना की और चेतावनी दी कि अलगाव की राजनीति के गंभीर परिणाम हो सकते हैं- जैसा कि सीरिया में दिख रहा है और इराक़ में दिख चुका है. तर्क के रूप में यह बेहद शक्तिशाली था. इसके अलावा, भविष्य में कांग्रेस के बहस के मुद्दों की झलक भी दिखी, जो 2019 के चुनावों की ओर बढ़ रहा है. "हम बेतुके और मनमौजी नीतियों का विरोध करते हैं, दरअसल ये अमीरों को लाभ पहुंचाने वाले हैं." राहुल गांधी ने मनमोहन सरकार की उपलब्धियों को गिनाया, जैसे रोजगार गारंटी कार्यक्रम और दलित अधिकार क़ानून. उन्होंने वर्तमान सरकार पर इन दोनों क़ानूनों को कमज़ोर करने का आरोप लगाया. राहुल ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर बात की, जैसे कि नोटबंदी और जीएसटी और आरोप लगाया कि इन्होंने लाखों लोगों के रोजगार-धंधे छीन लिए और केवल अमीरों और कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाया. अपने भाषण के दौरान उन्होंने सरकार की आंतरिक और विदेश नीति की आलोचना भी की. उन्होंने भारत की तुलना चीन से की, दोनों देशों की विकास दरों और नौकरियों को पैदा करने की क्षमता की तुलना की और चेतावनी दी कि अलगाव की राजनीति के गंभीर परिणाम हो सकते हैं- जैसा कि सीरिया में दिख रहा है और इराक़ में दिख चुका है. तर्क के रूप में यह बेहद शक्तिशाली था. इसके अलावा, भविष्य में कांग्रेस के बहस के मुद्दों की झलक भी दिखी, जो 2019 के चुनावों की ओर बढ़ रहा है. "हम बेतुके और मनमौजी नीतियों का विरोध करते हैं, दरअसल ये अमीरों को लाभ पहुंचाने वाले हैं." राहुल के भाषण में और क्या-क्या "हम अपना हाथ (कांग्रेस का चुनाव चिह्न) अपने अधिकार से वंचित लोगों को देते हैं और हम उनकी लड़ाई लड़ेंगे." यह तर्क कुछ साल पहले राहुल गांधी की 'सूट-बूट की सरकार' वाली टिप्पणी से सीधे निकाला गया लगता है. तब राहुल ने मोदी के उस सूट की आलोचना की थी जो उन्होंने तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाक़ात के दौरान पहनी थी और जिस पर मोदी के नाम की कढ़ाई की गई थी. राहुल का यह भाषण खरा, तर्कसम्मत और दलीलों के साथ था, लेकिन इसे अपेक्षाकृत आलोचना नहीं करने वाले विदेशी दर्शकों के सामने दिया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने किसी भी भाषण में गांधी परिवार की आलोचना और अपनी सरकार की 'सबका साथ, सबका विकास' का गान कभी नहीं भूलते. वो हमेशा यह प्रश्न पूछते हैं कि "क्या हम समर्थ हुए? उन्होंने (कांग्रेस और गांधी परिवार ने) क्या किया? केवल अपना विकास." दोनों नेता भारत के विषय में एक कहानी बताते हैं. मुहावरों के इस्तेमाल वाली मोदी की भाषण कला के सामने राहुल गांधी की हिंदी में अस्वाभाविक भाषण शैली है. लेकिन एक अंडरडॉग की तरह दिए उनके उग्र भाषण में एक अलग खिंचाव है. बड़ी सभाओं में मोदी के पास लोगों को खींचने, उत्तेजित करने और उकसाने की बेशक क्षमता है, फिर भी राहुल गांधी के स्वर में एक वास्तविकता सी दिखती है. आखिर में आपके किए गए काम ही गिने जाते हैं. मोदी सरकार ने अपने किए कितने वादे पूरे किए? और जिन कुछ राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है वहां उसने कितने सकारात्मक काम किए, ये ही गिना जाएगा. फ़ैसला अभी बाकी है. लेकिन इससे भी नकारा नहीं जा सकता कि सड़कें बनी हैं, डिज़िटल कनेक्टिविटी में सुधार हो रहा है, इंटरनेट से चलने वाले व्यवसाय से लोगों के काम करने का तरीका बदल रहा है. जीएसटी से कई उद्यमों की राह आसान हुई है और दिल्ली से फ़ोन कॉल बंद हो गए हैं. लिंचिंग, धार्मिक अलगाव, जाति पर आधारित हिंसाओं पर राहुल गांधी की चिंताएं यह बताती हैं कि कांग्रेस सही दिशा में आगे बढ़ रही है. लेकिन क्या यह चुनाव जीतने के लिए काफी होगा? क्या उसे अगली सरकार बनाने के लिए पर्याप्त आंकड़े मिल जाएंगे? यह कहना मुश्किल है. लेकिन जर्मनी में राहुल के भाषण में दिए तर्कों से पता चलता है कि कांग्रेस फिर से 'ग़रीबी हटाओ' पर लौट रही है. दरअसल, 2016 में केरल में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में एक शीर्ष केंद्रीय मंत्री ने खुल कर मोदी के भाषण पर अपनी निराशा जताई. उन्होंने पूछा कि "ग़रीबी की इतनी बातें क्यों? भारत अच्छा कर रहा है, यह निश्चित रूप से आगे बढ़ रहा है. फिर हमें इतना नकारात्मक क्यों होना चाहिए?"


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