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राजनीति में शांत रस काल चल रहा -प्रभाकर चौबे | महाराजा के चौथे राज्यारोहण पर प्रजा को एक पैसा बख्शीश--प्रभाकर चौबे | भाजपा की वक्रदृष्टि कर्नाटक सरकार पर...प्रभाकर चौबे | नीकी पर फीकी लगे... |

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नीकी पर फीकी लगे...
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पांच में से तीन विधानसभा कांग्रेस ने जीता और दो भाजपा ने। कांग्रेस खुश है और भाजपा मायूस। भाजपा को सबसे ज्यादा मलाल दिल्ली की हार का है। इस बार राजधानी की विधानसभा को जीतना वह चाहती थी और जीत के लिए पूरा जोर लगा दिया था क्योंकि बहुत जल्दी लोकसभा के चुनाव होंगे जिसमें दिल्ली फतह की दुंदुभी बजाकर लाभ लेने की सोच रही थी भाजपा। लेकिन ''पार्टी के मन कुछ और है, जनता के कछु और...। जनता ने बहुत सोच विचार कर दिल्ली से बाहर रखा भाजपा को। दिल्ली में हार भाजपा के लिए ''गढ़ आला पण सिंह गेला'' जैसे हो गई। भाजपा ने इस हार को अप्रत्याशित कहा। दिल्ली में जीत को लेकर भाजपा पूरे विश्वास में थी और उसका प्रचार देखकर लग भी रहा था कि इस बार भाजपा जीत सकती है। मिजोरम में तो नहीं लेकिन चार राज्यों में भाजपा अपनी जीत पक्की मान रही थी। ऐसा क्यों मान रही थी। ऐसा ही सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में मान रही थी कि शाइनिंग इंडिया के पोस्टर दिखाकर वह जनता का मन जीतेगी और अपनी सरकार बनाएगी। भाजपा थोड़े में इतराने क्यों लगती है और उसकी अतिप्रसन्नता, उसका अतिविश्वास, आसमान पर उड़ने लगता है। दरअसल भाजपा भावना की पार्टी है और जनता की भावनाओं का पूरा दोहनकर अपनी जीत पक्की करती है और इसीलिए ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार शुरु होते ही अपनी जीत का माहौल इस तरह खड़ा करती है कि एक बारगी जनता भी उसकी जीत के दावों के भ्रम में आ जाती है। भाजपा चुनाव प्रचार से ही माया बाजार लगा देती है। और उसका माया बाजार कई बार दीवालिया हो चुका लेकिन क्या कारण है कि भाजपा प्रचार के इस मायावी तरीके को नहीं छोड़ रही। इसका कारण है कि भाजपा का यह बुनियादी चरित्र है- वह किसी अदृश्य को ''दृश्यमान'' कहने कई-कई बार और जोर-जोर से उद्धोषणा करती है कि एकबारगी भ्रम पैदा हो ही जाता है। एकाध बार जनता भ्रम में आ चुकी है। भाजपा ने कुछ भावनात्मक बातों की एक गठरी बना ली है और हर चुनाव में चाहे विधानसभा के हों, पंचायतों के, नगर निगमों के अथवा लोकसभा के, उस गठरी से उन भावनात्मक बातों को बाहर निकालकर जनता को बताती है और इतनी बार बताती है कि थोड़ी देर सम्मोहित कर लेना बड़ी बात नहीं। भावनात्मक भभूत छिड़ककर जनता को सामूहिक सम्मोहन में डालना भाजपा को खूब आता है। राजनीति के विद्वानों, विश्लेषकों और व्याख्याकारों ने कई बार कहा है कि भावनात्मक मुद्दे छोड़ भाजपा एक परिपक्व राजनीतिक दल की तरह आचरण सीखे। हर जगह, हर चुनाव में वे ही मुद्दे काम नहीं आ सकते। ये क्या कि पंचायत के चुनाव तक में अफजल गुरु को फांसी देने में फेल होने, रामसेतु की रक्षा, मंदिर बनाने, कश्मीर में धारा 370 खत्म करने तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात लेकर कांग्रेस और धर्मनिरपेक्षता वादियों को कोसने लगे। अभी पूर्ण हुए चार राज्यों के चुनाव प्रचार में भी ऐसा ही प्रचार किया। दिल्ली के मतदाताओं ने कहा भी कि आतंकी हमलों के लिए शीला जी क्या करें। यह केन्द्र का सवाल है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा अपने चिर आजमाए भावनात्मक मुद्दों के बल पर नहीं जीती, इन राज्यों में जीत के भौतिक कारण रहे। मुख्यमंत्री का सौम्य व्यवहार और कांग्रेस की अपनी बड़ी भयानक गलतियों ने भाजपा को इन दो राज्यों में भाजपा को जीत दिलाई। यहां न तो आतंकवाद, न रामसेतु बचाना, न मंदिर बनाना आदि मुद्दे चले और न ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सुशासन, सुचिता की राजनीति आदि के नारे काम आए। यहां जनता से सीधी जुड़ी समस्याओं का सवाल जिन्हें राज्य सरकार देखती है, राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र में हैं, काम आए। भाजपा ने मंहगाई की बात जरूर की लेकिन महंगाई रोकना राज्य सरकार की भी जवाबदारी है यह सच्चाई दबाती रही। बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे को भाजपा ने छुआ तक नहीं। बहरहाल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार के लिए कांग्रेस का हाईकमान पूरी तरह जवाबदार है- यहां पार्टी में चल रही गुटबाजी को रोकने तथा पार्टी को अनुशासित करने में हाईकमान असफल रहा, या रुचि नहीं दिखाया। बात यह हो रही है कि विधानसभा के चुनाव में राज्य के मुद्दे सामने रखने थे, भाजपा वे मुद्दे रखती रही जिसे संसद देखती है- यह तो ऐसा हुआ कि जो काम स्कूल के प्रधानपाठक का है उसके लिए स्कूल क्लर्क के सामने बात की जाए। इन साठ सालों में जनता राजनीतिक रूप से चेतना सम्पन्न और परिपक्व हो गई है। जान गई है कि राशनकार्ड बनाने कौन जवाबदार है और कार की कीमतें कैसे तय हो रही हैं। आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, सुरक्षा के लिए उपाय, सांप्रदायिकता पर अंकुश के लिए कानून, आतंकवाद से निपटने सख्त नियम, आर्थिक नीतियां, आर्थिक मंदी, निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग विनिवेश, विदेश नीति, परमाणु समझौता, उसके परिणाम बढ़ती बेरोजगारी के लिए वर्तमान नीतियां, देश में अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, आदि आदि सवालों पर संसद में बहस हो अत: आगे लोकसभा के चुनाव के प्रचार के दौरान ये मामले जनता के बीच उठाए जाएं और जनता क्या सोचती है, क्या तय करती है यह चुनाव परिणाम से साफ हो। विधानसभा चुनाव के समय संसद के मामलों को उठाने पर यह कहा जा सकता है-नीकी पै फीकी लगे बिन अवसर की बात...। एक और बात- जनता ने अपने संविधान में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता स्वीकार किया है उन पर हमला न हो, उन्हें कमजोर न किया जाए। धर्मनिरपेक्षता को छद्म धर्म निरपेक्षता जैसे शब्दों से अपमानित व कमजोर न किया जाए। ऐसा कहना मात्र ही देश को संप्रदाय व धर्म के नाम पर बांटना है। हर दल जो संविधान के तहत चुनाव में हिस्सा लेता है धर्म निरपेक्षता को मजबूत करे। ऐसा नहीं कि मौके-मौके पर धर्म निरपेक्ष बन गए, मतलब सधा और इसके खिलाफ कर्म करने लगे। लोकतंत्र के मजबूत होने के लिए धर्म निरपेक्षता जरूरी है। एक तरह से लोकतांत्रिक संस्कृति का धर्मनिरपेक्षता आतंरिक उत्स है। आगामी लोकसभा चुनाव में देश की जनता इन पर सोचेगी और अपना वोट देगी। अब देश की पंचवर्षीय योजनाओं पर बात करना ही राजनीतिक दलों ने छोड़ दिया है। क्यों? आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ के नाम पर योजना आयोग नौकरशाहों के हवाले कर दिया गया है। जबकि इसे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप निर्णय लेने होते हैं अत: योजना आयोग किसी राजनीतिज्ञ को दिया जाना चाहिए और तभी इस पर जनता के बीच बहस भी होगी। पांच में से तीन विधानसभा कांग्रेस ने जीता और दो भाजपा ने। कांग्रेस खुश है और भाजपा मायूस। भाजपा को सबसे ज्यादा मलाल दिल्ली की हार का है। इस बार राजधानी की विधानसभा को जीतना वह चाहती थी और जीत के लिए पूरा जोर लगा दिया था क्योंकि बहुत जल्दी लोकसभा के चुनाव होंगे जिसमें दिल्ली फतह की दुंदुभी बजाकर लाभ लेने की सोच रही थी भाजपा। लेकिन ''पार्टी के मन कुछ और है, जनता के कछु और...। जनता ने बहुत सोच विचार कर दिल्ली से बाहर रखा भाजपा को। दिल्ली में हार भाजपा के लिए ''गढ़ आला पण सिंह गेला'' जैसे हो गई। भाजपा ने इस हार को अप्रत्याशित कहा। दिल्ली में जीत को लेकर भाजपा पूरे विश्वास में थी और उसका प्रचार देखकर लग भी रहा था कि इस बार भाजपा जीत सकती है। मिजोरम में तो नहीं लेकिन चार राज्यों में भाजपा अपनी जीत पक्की मान रही थी। ऐसा क्यों मान रही थी। ऐसा ही सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में मान रही थी कि शाइनिंग इंडिया के पोस्टर दिखाकर वह जनता का मन जीतेगी और अपनी सरकार बनाएगी। भाजपा थोड़े में इतराने क्यों लगती है और उसकी अतिप्रसन्नता, उसका अतिविश्वास, आसमान पर उड़ने लगता है। दरअसल भाजपा भावना की पार्टी है और जनता की भावनाओं का पूरा दोहनकर अपनी जीत पक्की करती है और इसीलिए ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार शुरु होते ही अपनी जीत का माहौल इस तरह खड़ा करती है कि एक बारगी जनता भी उसकी जीत के दावों के भ्रम में आ जाती है। भाजपा चुनाव प्रचार से ही माया बाजार लगा देती है। और उसका माया बाजार कई बार दीवालिया हो चुका लेकिन क्या कारण है कि भाजपा प्रचार के इस मायावी तरीके को नहीं छोड़ रही। इसका कारण है कि भाजपा का यह बुनियादी चरित्र है- वह किसी अदृश्य को ''दृश्यमान'' कहने कई-कई बार और जोर-जोर से उद्धोषणा करती है कि एकबारगी भ्रम पैदा हो ही जाता है। एकाध बार जनता भ्रम में आ चुकी है। भाजपा ने कुछ भावनात्मक बातों की एक गठरी बना ली है और हर चुनाव में चाहे विधानसभा के हों, पंचायतों के, नगर निगमों के अथवा लोकसभा के, उस गठरी से उन भावनात्मक बातों को बाहर निकालकर जनता को बताती है और इतनी बार बताती है कि थोड़ी देर सम्मोहित कर लेना बड़ी बात नहीं। भावनात्मक भभूत छिड़ककर जनता को सामूहिक सम्मोहन में डालना भाजपा को खूब आता है। राजनीति के विद्वानों, विश्लेषकों और व्याख्याकारों ने कई बार कहा है कि भावनात्मक मुद्दे छोड़ भाजपा एक परिपक्व राजनीतिक दल की तरह आचरण सीखे। हर जगह, हर चुनाव में वे ही मुद्दे काम नहीं आ सकते। ये क्या कि पंचायत के चुनाव तक में अफजल गुरु को फांसी देने में फेल होने, रामसेतु की रक्षा, मंदिर बनाने, कश्मीर में धारा 370 खत्म करने तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात लेकर कांग्रेस और धर्मनिरपेक्षता वादियों को कोसने लगे। अभी पूर्ण हुए चार राज्यों के चुनाव प्रचार में भी ऐसा ही प्रचार किया। दिल्ली के मतदाताओं ने कहा भी कि आतंकी हमलों के लिए शीला जी क्या करें। यह केन्द्र का सवाल है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा अपने चिर आजमाए भावनात्मक मुद्दों के बल पर नहीं जीती, इन राज्यों में जीत के भौतिक कारण रहे। मुख्यमंत्री का सौम्य व्यवहार और कांग्रेस की अपनी बड़ी भयानक गलतियों ने भाजपा को इन दो राज्यों में भाजपा को जीत दिलाई। यहां न तो आतंकवाद, न रामसेतु बचाना, न मंदिर बनाना आदि मुद्दे चले और न ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सुशासन, सुचिता की राजनीति आदि के नारे काम आए। यहां जनता से सीधी जुड़ी समस्याओं का सवाल जिन्हें राज्य सरकार देखती है, राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र में हैं, काम आए। भाजपा ने मंहगाई की बात जरूर की लेकिन महंगाई रोकना राज्य सरकार की भी जवाबदारी है यह सच्चाई दबाती रही। बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे को भाजपा ने छुआ तक नहीं। बहरहाल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार के लिए कांग्रेस का हाईकमान पूरी तरह जवाबदार है- यहां पार्टी में चल रही गुटबाजी को रोकने तथा पार्टी को अनुशासित करने में हाईकमान असफल रहा, या रुचि नहीं दिखाया। बात यह हो रही है कि विधानसभा के चुनाव में राज्य के मुद्दे सामने रखने थे, भाजपा वे मुद्दे रखती रही जिसे संसद देखती है- यह तो ऐसा हुआ कि जो काम स्कूल के प्रधानपाठक का है उसके लिए स्कूल क्लर्क के सामने बात की जाए। इन साठ सालों में जनता राजनीतिक रूप से चेतना सम्पन्न और परिपक्व हो गई है। जान गई है कि राशनकार्ड बनाने कौन जवाबदार है और कार की कीमतें कैसे तय हो रही हैं। आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, सुरक्षा के लिए उपाय, सांप्रदायिकता पर अंकुश के लिए कानून, आतंकवाद से निपटने सख्त नियम, आर्थिक नीतियां, आर्थिक मंदी, निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग विनिवेश, विदेश नीति, परमाणु समझौता, उसके परिणाम बढ़ती बेरोजगारी के लिए वर्तमान नीतियां, देश में अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, आदि आदि सवालों पर संसद में बहस हो अत: आगे लोकसभा के चुनाव के प्रचार के दौरान ये मामले जनता के बीच उठाए जाएं और जनता क्या सोचती है, क्या तय करती है यह चुनाव परिणाम से साफ हो। विधानसभा चुनाव के समय संसद के मामलों को उठाने पर यह कहा जा सकता है-नीकी पै फीकी लगे बिन अवसर की बात...। एक और बात- जनता ने अपने संविधान में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता स्वीकार किया है उन पर हमला न हो, उन्हें कमजोर न किया जाए। धर्मनिरपेक्षता को छद्म धर्म निरपेक्षता जैसे शब्दों से अपमानित व कमजोर न किया जाए। ऐसा कहना मात्र ही देश को संप्रदाय व धर्म के नाम पर बांटना है। हर दल जो संविधान के तहत चुनाव में हिस्सा लेता है धर्म निरपेक्षता को मजबूत करे। ऐसा नहीं कि मौके-मौके पर धर्म निरपेक्ष बन गए, मतलब सधा और इसके खिलाफ कर्म करने लगे। लोकतंत्र के मजबूत होने के लिए धर्म निरपेक्षता जरूरी है। एक तरह से लोकतांत्रिक संस्कृति का धर्मनिरपेक्षता आतंरिक उत्स है। आगामी लोकसभा चुनाव में देश की जनता इन पर सोचेगी और अपना वोट देगी। अब देश की पंचवर्षीय योजनाओं पर बात करना ही राजनीतिक दलों ने छोड़ दिया है। क्यों? आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ के नाम पर योजना आयोग नौकरशाहों के हवाले कर दिया गया है। जबकि इसे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप निर्णय लेने होते हैं अत: योजना आयोग किसी राजनीतिज्ञ को दिया जाना चाहिए और तभी इस पर जनता के बीच बहस भी होगी। पांच में से तीन विधानसभा कांग्रेस ने जीता और दो भाजपा ने। कांग्रेस खुश है और भाजपा मायूस। भाजपा को सबसे ज्यादा मलाल दिल्ली की हार का है। इस बार राजधानी की विधानसभा को जीतना वह चाहती थी और जीत के लिए पूरा जोर लगा दिया था क्योंकि बहुत जल्दी लोकसभा के चुनाव होंगे जिसमें दिल्ली फतह की दुंदुभी बजाकर लाभ लेने की सोच रही थी भाजपा। लेकिन ''पार्टी के मन कुछ और है, जनता के कछु और...। जनता ने बहुत सोच विचार कर दिल्ली से बाहर रखा भाजपा को। दिल्ली में हार भाजपा के लिए ''गढ़ आला पण सिंह गेला'' जैसे हो गई। भाजपा ने इस हार को अप्रत्याशित कहा। दिल्ली में जीत को लेकर भाजपा पूरे विश्वास में थी और उसका प्रचार देखकर लग भी रहा था कि इस बार भाजपा जीत सकती है। मिजोरम में तो नहीं लेकिन चार राज्यों में भाजपा अपनी जीत पक्की मान रही थी। ऐसा क्यों मान रही थी। ऐसा ही सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में मान रही थी कि शाइनिंग इंडिया के पोस्टर दिखाकर वह जनता का मन जीतेगी और अपनी सरकार बनाएगी। भाजपा थोड़े में इतराने क्यों लगती है और उसकी अतिप्रसन्नता, उसका अतिविश्वास, आसमान पर उड़ने लगता है। दरअसल भाजपा भावना की पार्टी है और जनता की भावनाओं का पूरा दोहनकर अपनी जीत पक्की करती है और इसीलिए ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार शुरु होते ही अपनी जीत का माहौल इस तरह खड़ा करती है कि एक बारगी जनता भी उसकी जीत के दावों के भ्रम में आ जाती है। भाजपा चुनाव प्रचार से ही माया बाजार लगा देती है। और उसका माया बाजार कई बार दीवालिया हो चुका लेकिन क्या कारण है कि भाजपा प्रचार के इस मायावी तरीके को नहीं छोड़ रही। इसका कारण है कि भाजपा का यह बुनियादी चरित्र है- वह किसी अदृश्य को ''दृश्यमान'' कहने कई-कई बार और जोर-जोर से उद्धोषणा करती है कि एकबारगी भ्रम पैदा हो ही जाता है। एकाध बार जनता भ्रम में आ चुकी है। भाजपा ने कुछ भावनात्मक बातों की एक गठरी बना ली है और हर चुनाव में चाहे विधानसभा के हों, पंचायतों के, नगर निगमों के अथवा लोकसभा के, उस गठरी से उन भावनात्मक बातों को बाहर निकालकर जनता को बताती है और इतनी बार बताती है कि थोड़ी देर सम्मोहित कर लेना बड़ी बात नहीं। भावनात्मक भभूत छिड़ककर जनता को सामूहिक सम्मोहन में डालना भाजपा को खूब आता है। राजनीति के विद्वानों, विश्लेषकों और व्याख्याकारों ने कई बार कहा है कि भावनात्मक मुद्दे छोड़ भाजपा एक परिपक्व राजनीतिक दल की तरह आचरण सीखे। हर जगह, हर चुनाव में वे ही मुद्दे काम नहीं आ सकते। ये क्या कि पंचायत के चुनाव तक में अफजल गुरु को फांसी देने में फेल होने, रामसेतु की रक्षा, मंदिर बनाने, कश्मीर में धारा 370 खत्म करने तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात लेकर कांग्रेस और धर्मनिरपेक्षता वादियों को कोसने लगे। अभी पूर्ण हुए चार राज्यों के चुनाव प्रचार में भी ऐसा ही प्रचार किया। दिल्ली के मतदाताओं ने कहा भी कि आतंकी हमलों के लिए शीला जी क्या करें। यह केन्द्र का सवाल है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा अपने चिर आजमाए भावनात्मक मुद्दों के बल पर नहीं जीती, इन राज्यों में जीत के भौतिक कारण रहे। मुख्यमंत्री का सौम्य व्यवहार और कांग्रेस की अपनी बड़ी भयानक गलतियों ने भाजपा को इन दो राज्यों में भाजपा को जीत दिलाई। यहां न तो आतंकवाद, न रामसेतु बचाना, न मंदिर बनाना आदि मुद्दे चले और न ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सुशासन, सुचिता की राजनीति आदि के नारे काम आए। यहां जनता से सीधी जुड़ी समस्याओं का सवाल जिन्हें राज्य सरकार देखती है, राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र में हैं, काम आए। भाजपा ने मंहगाई की बात जरूर की लेकिन महंगाई रोकना राज्य सरकार की भी जवाबदारी है यह सच्चाई दबाती रही। बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे को भाजपा ने छुआ तक नहीं। बहरहाल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार के लिए कांग्रेस का हाईकमान पूरी तरह जवाबदार है- यहां पार्टी में चल रही गुटबाजी को रोकने तथा पार्टी को अनुशासित करने में हाईकमान असफल रहा, या रुचि नहीं दिखाया। बात यह हो रही है कि विधानसभा के चुनाव में राज्य के मुद्दे सामने रखने थे, भाजपा वे मुद्दे रखती रही जिसे संसद देखती है- यह तो ऐसा हुआ कि जो काम स्कूल के प्रधानपाठक का है उसके लिए स्कूल क्लर्क के सामने बात की जाए। इन साठ सालों में जनता राजनीतिक रूप से चेतना सम्पन्न और परिपक्व हो गई है। जान गई है कि राशनकार्ड बनाने कौन जवाबदार है और कार की कीमतें कैसे तय हो रही हैं। आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, सुरक्षा के लिए उपाय, सांप्रदायिकता पर अंकुश के लिए कानून, आतंकवाद से निपटने सख्त नियम, आर्थिक नीतियां, आर्थिक मंदी, निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग विनिवेश, विदेश नीति, परमाणु समझौता, उसके परिणाम बढ़ती बेरोजगारी के लिए वर्तमान नीतियां, देश में अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, आदि आदि सवालों पर संसद में बहस हो अत: आगे लोकसभा के चुनाव के प्रचार के दौरान ये मामले जनता के बीच उठाए जाएं और जनता क्या सोचती है, क्या तय करती है यह चुनाव परिणाम से साफ हो। विधानसभा चुनाव के समय संसद के मामलों को उठाने पर यह कहा जा सकता है-नीकी पै फीकी लगे बिन अवसर की बात...। एक और बात- जनता ने अपने संविधान में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता स्वीकार किया है उन पर हमला न हो, उन्हें कमजोर न किया जाए। धर्मनिरपेक्षता को छद्म धर्म निरपेक्षता जैसे शब्दों से अपमानित व कमजोर न किया जाए। ऐसा कहना मात्र ही देश को संप्रदाय व धर्म के नाम पर बांटना है। हर दल जो संविधान के तहत चुनाव में हिस्सा लेता है धर्म निरपेक्षता को मजबूत करे। ऐसा नहीं कि मौके-मौके पर धर्म निरपेक्ष बन गए, मतलब सधा और इसके खिलाफ कर्म करने लगे। लोकतंत्र के मजबूत होने के लिए धर्म निरपेक्षता जरूरी है। एक तरह से लोकतांत्रिक संस्कृति का धर्मनिरपेक्षता आतंरिक उत्स है। आगामी लोकसभा चुनाव में देश की जनता इन पर सोचेगी और अपना वोट देगी। अब देश की पंचवर्षीय योजनाओं पर बात करना ही राजनीतिक दलों ने छोड़ दिया है। क्यों? आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ के नाम पर योजना आयोग नौकरशाहों के हवाले कर दिया गया है। जबकि इसे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप निर्णय लेने होते हैं अत: योजना आयोग किसी राजनीतिज्ञ को दिया जाना चाहिए और तभी इस पर जनता के बीच बहस भी होगी।


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