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राजनीति में शांत रस काल चल रहा -प्रभाकर चौबे | महाराजा के चौथे राज्यारोहण पर प्रजा को एक पैसा बख्शीश--प्रभाकर चौबे | भाजपा की वक्रदृष्टि कर्नाटक सरकार पर...प्रभाकर चौबे | नीकी पर फीकी लगे... |

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भाजपा की वक्रदृष्टि कर्नाटक सरकार पर...प्रभाकर चौबे
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कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद का शपथग्रहण समारोह शांति के साथ सम्पन्न हुआ। कुछ के मन में संशय था कि राजनीति में मौका देखकर सक्रिय हो जाने वाली शक्तियां सब कुछ होने देंगी या नहीं। कहीं ऐसा न हो कि शपथग्रहण समारोह टालना पड़ जाए। राजनीति में दुष्ट आत्माएं हमेशा मंडराते रहती हैं और अपने आका की आज्ञा पाकर विघ्न पैदा कर देती हैं। लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं। विघ्न डालने वाले समझ गए थे कि अभी नहीं 'वेट एंड वॉच'। यह तो साफ लग रहा था कि कांग्रेस और जे.डी.एस. दोनों को मिलकर सरकार बनाना भाजपा को राई-रत्ती पसंद नहीं आ रहा था। अभी भी यह शंका तो उठ ही रही है कि इस सरकार को भाजपा राजनीति ग्रास बनाने की तैयारी में है और पांच साल क्या 2019 तक भी चलने दे तो बड़ी बात- आज कर्नाटक की सरकार में शामिल राजनीतिक दलों और भाजपा के राजनीतिक रिश्तों को देखकर मुगलेआजम में अकबर द्वारा बोला गया डायलाग याद आ रहा है- अनारकली! सलीम तुझे मरने नहीं देगा और हम तुझे जिंदा नहीं रहने देंगे। मतलब कांग्रेस और भाजपा का अपना पोलीटिकल एजेंडा है। हर पार्टी का होता है। वह यह कि किसी भी हाल में 2019 में लोकसभा का चुनाव जीतना है। अगर कर्नाटक में यह मिली-जुली सरकार कायम रहती है तो भाजपा को अन्यथा अपनी मजबूती सिद्ध करने में दिक्कत आएगी। अत: अब भाजपा का उद्देश्य है इस सरकार को न चलने दिया जाए- राजनीतिक लड़ाई है। यह सरकार का जाना इसलिए जरूरी है कि भाजपा देश भर में प्रचार कर सके कि ये एक राज्य में तो मिलकर रह नहीं सके- देश में क्या रहेंगे। और मिली-जुली सरकार भी कैसे भाजपा चला रही है इसका डंका बजाएगी। उधर कांग्रेस, खासकर कांग्रेस-जे.डी.एस. को यह जरूर लग रहा है कि कर्नाटक का यह प्रयोग सफल हो। कांग्रेस राष्ट्रीय दल है अत: वह राष्ट्रीय फलक पर सोच रही है- दूसरी बात कांग्रेस को अभी एक पोलीटिकल प्रोग्राम को पूरा करना है- कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है केन्द्र से मोदी सरकार को किस तरह अपदस्थ किया जाए- देश को फासीवाद की ओर ले जाने वाली ताकतों से कैसे मुक्त किया जाए। 2019 में केन्द्र में भाजपा की हार एक वृहत राजनीतिक लड़ाई में तीन चौथाई जीत उत्साह पैदा करेगा। इस समय देश कई तरह की उलझनों में उलझा दिया जा रहा है और कर्नाटक में शपथग्रहण समारोह में देश के प्राय: अधिकांश विपक्ष के नेता उपस्थित रहे- यह स्वागतेय तो है और उत्साह भी देता है लेकिन इस उत्साह को उद्देश्य के प्रति समर्पण तक खींचकर ले जाना है। कई मर्तबा ऐसी उपस्थिति एक तात्कालिक समारोह में उत्पन्न उत्साह जोश के रूप में रह जाती है। यह उत्साह अपने लक्ष्य तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि विपक्ष को निरंतर संवाद करते चलना होगा- ऐसा नहीं कि मौके-मौके पर मिल लिए- इसमें राजनीतिक कुशलता की जरूरत है। इनमें अपने उद्देश्य की स्पष्टता होनी चाहिए यह स्पष्टता निरंतर संवाद से आएगी। इसके लिए एक राजनीतिक मुहिम चलाने की जरूरत है और अभी जो जनता में यह धारणा है कि विपक्ष के ऐसे लोग जल्दी बिखर जाते हैं- इस धारणा को फैलाने सरकारी मीडिया लगा है। बार-बार सवाल उठाता है- मायावती जी के साथ मुलायम सिंह ने क्या व्यवहार किया था। वाम मोर्चा कब तृणमूल के साथ बैठेगा- ममता बनर्जी क्या तैयार होंगी? कांग्रेस अपने को क्षेत्रीय दल की स्थिति में क्यों लाएगा। कई सवाल खड़े कर जनता को सोचने में व्यवधान पैदा कर रहा है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह सरकारी भाषा बोल रहा है और जनता में यह भरने की कोशिश कर रहा है कि विपक्ष का तीसरा मोर्चा कभी नहीं बनेगा। जनता को दल बदलकर सरकार बनाने को लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राजनीति को नई थ्योरी दी है। जब उनसे पूछा जाता है कि मणिपुर, मेघालय में आपने भी तो ''दलबदल'' सरकार बनाई तो उनका उत्तर होता है कि यह दलबदल नहीं है। उस दल के सदस्य खुद हमसे मिलना चाहते थे- उन्हें हमारे साथ काम करना अच्छा लगता है अत: वे हमारे साथ आए। यह आपसी सद्भावना है। मतलब वे कराएं तो दलदबल नहीं। और कोई कराए तो दलबदल। वाह! यह तो ऐसा ही हुआ कि आपके सब राजनीतिक कर्म नैतिक दूसरों के अनैतिक- इधर एक समय नारा चला था- हमारे पैर पैर, आपके पैर चरण। बहरहाल संत कवि तुलसीदास ने कहा है कि समर्थवान जो बोले वह सत्य- समरथ को नहिं दोस गुसाईं। सुर सरि पावक रवि की नाई।। कर्नाटक में कांग्रेस ने मिली-जुली सरकार बना ली। भाजपा भन्नाई हुई है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन अनैतिक है। और एक मजेदार बात कही कि हमें 15 दिन मिले होते तो सरकार बना लेते। कांग्रेस ने अपने विधायकों को बंधक बनाया यह लोकतंत्र के खिलाफ है। अब वे यह नहीं बताते कि 104 सीटें हैं उनकी पार्टी के पास। ये 15 दिन में क्या करिश्मा करते कि सरकार बन जाती। कर्नाटक में जो हुआ वह दूरगामी परिणाम कितना देगा, आगे दिखेगा, लेकिन तात्कालिक रिजल्ट लोकतंत्र को भ्रम में डाल रहा है और जनता अपने उसी विचार की ओर लौट-लौट जाती है कि- हुइए वही जो राम रचि राखा। को कर तर्क बढ़ाए शाखा।। जनता को नैराश्य में डालने का काम मीडिया कर रहा है। राजनीति में जब जरूरत होती है और जनता का दबाव बढ़ता है तो दो विपरीत राजनीतिक ताकतें एक मंच पर आकर शत्रु से लड़ती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका के साथ सोवियत संघ (कम्युनिस्ट) आया था या नहीं। मिली-जुली सरकार को छोटा दिखाने कुछ दल हमेशा ही एक मुहावरा कहते रहे हैं- कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा। भानुमति ने कुनबा जोड़ा।। लेकिन राजनीति जरूरत के अनुसार ही यह होता है। इनका बिखरना भी राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।भाजपा कर्नाटक में सरकार नहीं बना सकी। यह विपक्ष की बड़ी जीत रही। लेकिन इससे भाजपा तिलमिला गई है। भाजपा एक सफलता के रूप में इसे देश भर में प्रचारित करती। और यह कहते नहीं थकती कि भाजपा का रथ अजेय है। कर्नाटक भी ले लिया। एक और मजेदार बात यह कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक चुनाव और बाद में सरकार न बना सकने की असफलता को लेकर बहुत ही खिन्न हैं। वे जब भी प्रेस कांफ्रेंस लेते सबसे पहले राहुल पर बरसते और फिर कांग्रेस की जमकर आलोचना करते। अमित शाह जी को पूरा भरोसा था कि हर हाल में कर्नाटक में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी। कर्नाटक रिजल्ट आने से पूर्व ही यह कहा था कि 120 सीट लेकर भाजपा आ रही है और भाजपा ही सरकार बनाएगी। दक्षिण में अपनी उपस्थिति के लिए उसके लिए जरूरी भी है। दरअसल हमारा लोकतंत्र अर्द्धसामंती लोकतंत्र है- यह सामंतवाद के विचारों को लेकर लोकतंत्र के घोड़े पर बैठता है। हमारे यहां सामंतवाद के साथ कोई लड़ाई लोकतंत्र के लिए हुई नहीं विदेशों में लोकतंत्र ने खुद को स्थापित करने के लिए सामंतवाद से लम्बी लड़ाई लड़ी। यह विस्तृत विमर्श का विषय है। हमारे यहां शुरू से ही राजे-महाराजे, सामंत, धनवान लोकतंत्र में टिकिट पाते रहे और यह भाजपा ने भी किया। अभी बात कर्नाटक तक रखें। वर्ना बहकने का डर है। सबसे पहली जरूरत है कि लोकतंत्र के लिए कर्नाटक की वर्तमान सरकार को अपना पांच साल का समय पूरा करने का पूरा अवसर प्रदान किया जाए। भाजपा रोड़े अटकाएगी। लेकिन कांग्रेस और जेडीएस की पहली जवाबदारी है कि वे दोनों ही लोकतंत्र को मजबूत करने एकजुटता के साथ काम करें। काम कठिन है। हर कोने पर इस गठबंधन को तोड़ने का प्रयास होगा। तरह-तरह के प्रलोभन दिए जाएंगे और प्रलोभनों के लिए साधनों की इनके पास कमी नहीं है। कबीर ने कहा है- माया महा ठगनी हम जानी। आज के माहौल में इसे यूं भी कहा जा सकता है- राजनीति महाठगनी हम जानी। कबीर ने ही कहा है। कई बार बताया जा चुका है- तेरी गठरी में लागा चोर। मुसाफिर जाग जरा...।। लोकतंत्र को बचाने लोकतंत्र वादियों को जागते रहना होगा। कर्नाटक की घटनाओं से न केवल कर्नाटक वरन देश की जनता में नवसंचार हुआ है। अब वह सरकार से सीधे-सीधे सवाल पूछेगी। पूछेगी कि 2019 के पहले तो विदेश से कालाधन ले आओ। 2019 से पूर्व दो करोड़ युवा रोजगार पा लें। 2019 से पूर्व क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होंगंी। सरकार कहेगी होंगी क्योंकि चुनाव है। अभी तक जनता मुखर नहीं हो रही थी। उसे एक संकोच सता रहा था। अब वह मुखर हो गई है। आज लोकतंत्र को लेकर कई तरह के विमर्श चल रहे हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि जनता अब लोकतंत्र व लोकतंत्र में प्राप्त उन्मुक्तता को कभी नहीं छोड़ेगी। कोई भी पोलीटिकल पार्टी कितना भी जोर लगा ले लेकिन अब देश में अधिनायकवाद से जबरदस्त लड़ाई के लिए जनता तैयार है। इन 70 सालों में कई परीक्षाओं से गुजरने के बाद आज यहां पहुंचे हैं। वैसे कुछ हो जनता गुलाम बनकर नहीं रहेगी। आज कुछ दलों के तौर-तरीके ऐसे हैं कि यह अपनी मर्जी के अनुसार जनता को हांकना है। मुक्तिबोध ने कहा है- अनर्थ जब शोषण की दुनिया का नियम और जनता का नियम जबकि संघर्षों दिग्विजय तो शब्दों का अर्थ भी अपना अलग होता है। आज जनता जान चुकी है। यद्यपि उसकी संघर्ष क्षमता को उसे गरीब, दीन-हीन रखकर कमजोर करने की कोशिश चल रही है। आज भी लोकतंत्र में धनबल व बाहुबल का वर्चस्व है और इसे तोड़ने में जनता को लम्बी लड़ाई लड़नी होगी। तरह-तरह के प्रलोभन रोड़ा बन संघर्ष को कमजोर करते चलते हैं। देखो राजनीति के धुरंधर इस सरकार को कितने दिन चलने देते हैं- राजनीति की आंख की किरकिरी बनी है- भाजपा हर हाल में कर्नाटक होना- प्राणवायु है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस द्वारा अपने विधायकों को इधर-उधर घुमाना अच्छा नहीं लगा। उन्हें इसकी आलोचना की, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को जनसंघ के बारे में याद रखना चाहिए कि 1967-69 में देश में संविद सरकारें बनीं। मध्यप्रदेश में भी बनाने की कवायद शुरू हुई इसका नेतृत्व ग्वालियर की महारानी विजया राजे सिंधिया कर रही थीं। भोपाल, बीना, इधर इटारसी प्राय: इस स्टेशन पर कांग्रेस छोड़ संविद में शामिल कांग्रेस नेता मुश्तैदी के साथ ट्रेनों की प्रतीक्षा कर रहे थे और मजेदार दृश्य पैदा हो रहा था- जो संविद में शामिल नहीं हो रहे थे उन्हें संविद में शामिल नेता जिसमें जनसंघ के नेता भी शामिल थे सुरक्षापूर्वक ग्वालियर पहुंचाना चाहते थे। खूब धक्का-मुक्की हो रही थी। अंतत: म.प्र. में भी संविद सरकार बनी। जनसंघ (तात्कालीन) के सदस्यों की भी भूमिका रही। वैसे कर्नाटक में भाजपा ने शपथग्रहण समारोह में ही अपनी मंशा दिखा दी। आगे देखिए...। prabhakarchaube@gmail.com


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