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राजनीति का समाजशास्त्रीय अध्ययन---प्रभाकर चौबे | राजनीति में शांत रस काल चल रहा -प्रभाकर चौबे | महाराजा के चौथे राज्यारोहण पर प्रजा को एक पैसा बख्शीश--प्रभाकर चौबे | भाजपा की वक्रदृष्टि कर्नाटक सरकार पर...प्रभाकर चौबे | नीकी पर फीकी लगे... |

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महाराजा के चौथे राज्यारोहण पर प्रजा को एक पैसा बख्शीश--प्रभाकर चौबे
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मोदीजी इस समय देश में आपकी जोड़ का कोई चुनावी भाषण देने वाला नहीं है। भावना उभार देना। आप जो चाहते हैं उस सोच में श्रोताओं को ले आना और मंत्रमुग्ध कर देना, आपकी बड़ी कला है, लेकिन ये नहीं बताते कि 2014 के वायदों का क्या हुआ? अमित शाह ने कहा था कि हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख आएंगे, कहना चुनावी जुमलेबाजी थी। मानते हैं कि चुनाव में कहा जाता है, लेकिन दो करोड़ रोजगार हर साल देना, ऐसा नहीं कहना था युवा इससे निराश हुए। क्या जुमलेबाजी है कि पकौड़ा, पान, चाय बेचने की सलाह देना, ये युवकों में किस प्रकार उत्साह पैदा करना हुआ? और दुख की बात यह है कि इन को महिमामंडित किया जाता है। बुंदेली कहावत है- भरोसे की भैंस पड़ा ब्यानी... मतलब भरोसा था कि भैंस इस बार भैंस ही पैदा करेगी... जरा कहावत की बैक ग्राउंड पर भी एक नजर डाल दी जाए। लेख की कहानी को भी देखना चाहिए। एक गांव में एक छोटा किसान था। मेहनत कर एक भैंस खरीदी-भैंस ने तो भैंस ही पैदा किया। किसान खुश हुआ कि अब घर में दो भैंसे हो गईं। इधर दूसरी भैंस गाभिन भई तो किसान सोचने लगा कि यह भी भैंस दे तो तीन भैंस हो जाएं- दूध-दही बेचकर कुछ धन कमाया जाए। लेकिन हुआ यूं कि इस भैंस ने पड़ा को जन्म दिया- किसान बोला- भरोसे की भैंस पड़ा ब्यानी... निराश हुआ। देश ने 2014 में भरोसे से जो किया। उसने कितना निराश किया है। अब आगे इस पर बात करें कि मोदी सरकार के चार साल घूम-घूम के मनाया गया। कुछ सालों में रिवाज सा बन गया है। कुछ राज्य सरकारें तो 100 दिन पूरा होने पर जश्न मनाती हैं। बहरहाल मनाने दो। मोदी सरकार की आलोचना भी हो रही है। ऐसा नहीं है कि केवल मोदी सरकार की आलोचना हो रही है। पूर्व में भी आलोचनाएं होती रही हैं। 1954 में नेहरू सरकार के चार साल होने पर पार्लियामेंट (उस समय पार्लियामेंट चल रहा था) में नेहरू जी ने अपनी सरकार के चार साल के कार्यों का विवरण देना शुरू किया। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी नेता हिरेन मुखर्जी ने विपक्ष की ओर से बोलते हुए कहा (1952 में लोकसभा में कम्युनिस्ट कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी थी। हिरेन मुखर्जी ने कहा कि प्रधानमंत्रीजी आपने जो-जो गिनाया वो-वो किया है। और भी बहुत किया है लेकिन आपने ये-ये ये नहीं किया जो जरूरी था। 1954 में ही पहली बार यू.के. का ध्यान भारत की ओर गया। गार्जन पत्र में एक वरिष्ठ पत्रकार भारत में चार माह रहे और जाकर नेहरू सरकार के चार साल शीर्षक से एक लेख लिखा- इसमें उनकी औद्योगिक नीति की आलोचना थी। वास्तव में गार्जन में लेख नहीं पढ़ा। मुंबई से निकलने वाले एक अंग्रेजी अखबार फ्रीप्रेस जनरल (इसका रविवारीय अंक भारत ज्योति के नाम से निकलता था और बहुत ही लोकप्रिय था- अच्छे कार्टून के कारण भी। तो फ्री पे्रस जनरल ने गार्जन से लेख उठा लिया था- लेख में यह भी था कि अगला साल 1955 चुनाव वर्ष है- नेहरू को खूब सारा काम निपटाना है। कहने का आशय यह कि हर समय प्रधानमंत्री की आलोचना होती रही है- लेकिन मोदीजी इसे बरदास्त नहीं कर पाते और हंसी में उड़ाकर छोटा बनाते हैं। जनसंघ भी नेहरू को तंग करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। एक समय दिल्ली में विशाल जुलूस निकाला और नारा उछाला- गूंजे धरती और पाताल गद्दी छोड़ जवाहर लाल। पहले आम चुनाव की चुनाव सभाओं में नेहरू की कृषि नीति को लेकर कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टी आक्रामक रही। नेहरू की विदेश नीति की सबसे बड़े क्रिटिक तो जयप्रकाश नारायण रहे। कम्युनिस्ट भी 1954 के पूर्व तक नेहरू की विदेश नीति के कटु आलोचक रहे। प्रधानमंत्री आलोचना से परे कैसे हो सकते हैं। नेहरू ने आलोचना का स्वागत ही किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवादी देश नेहरू के आलोचक थे। गुटनिरपेक्ष शब्द और अर्थ की आत्मा को ही अमरीकी विदेश मंत्री जान फास्टर डालेस ने शुरू से रिजेक्ट किया था- जान फास्टर डालेस ने एक साक्षात्कार में गुटनिरपेक्ष देख को लेकर टिप्पणी की थी कि यह कैसा बोगस क्लब है। मोदीजी को तो आज सुविधा है कि मोदी जी प्राय: हर राष्ट्राध्यक्ष से व्यक्तिगत मित्र हैं। अमेरिका ने कश्मीर पर हमेशा ही विरोध किया- साथ नहीं दिया कभी भी- अब मोदीजी का नवाज शरीफ के घर तो आना-जाना हो गया था। चीन के प्रमुख के साथ झूला झूलते हैं। फिर क्यों सीमा में बीच-बीच में तनाव पैदा करती है। भारत के उद्योग जगत ने (उन दिनों कार्पोरेट शब्द) प्रचलन में नहीं था। उद्योग जगत ही चलता था। भारत के उद्योग जगत नेहरू से चाहता था कि वह सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योग लगाना बंद करे। वह केवल सुझाव ही करे। सरकार की नीति बन रही थी कि बुनियादी उद्योग सरकार खड़ा करेगी और उद्योग जगत उपभोक्ता वस्तुएं बनाएंगे। उद्योग जगत नेहरू से नाराज रहा आया। आज तो मोदी के दोस्ताने संबंध हैं उद्योग जगत से। सवाल यह भी है कि चार सालों में एक भी बुनियादी उद्योग सरकार खड़ा क्यों नहीं कर पाई। भारत विशेष कर नेहरू साम्राज्यवादियों के निशाने पर भी थे। अमेरिका पाकिस्तान की पीठ थपथपा रहा था। अमेरिका चाहता था सियाचीन में हवाई अड्डा खोलने की परमिशन भारत दे। अमेरिका ने एक बार भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए हवाई छतरी यहां स्थापित करे ऐसा सुझाव दिया था। नेहरूजी उनकी चालों को खूब समझ रहे थे इसलिए अमेरिका सुरक्षा परिषद में कश्मीर पर वीटो करता था। सुरक्षा परिषद में भारत के रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णा मेनन खुद देश का पक्ष रखते थे। और आठ-आठ घंटे कई बार भाषण दिया। सुरक्षा परिषद में अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि ने एक बार कहा था कि यह आदमी (कृष्णा मेनन) बोलता है तो लगता है कि सुनते ही जाएं, लेकिन जब भाषण खत्म करता है तो छड़ी से उसकी पिटाई की जाए। इतनी आग उगलता है ये मेनन अमेरिका के खिलाफ। अमेरिका के एक वकील ने कहा था- मेनन रॉस्कल! मुझे किसी फुटपाथ पर चलता दिख जाए तो अपनी छड़ी इसके पैर में फंसाकर गिरा दूंगा। तो मोदीजी अभी तो आपको सब तरफ हरियाली ही हरियाली है, लेकिन विदेशी विनिवेश आंकड़े आप बताते ही नहीं। आलोचकों को हंसी ठठ्ठे में उड़ा देना, व्यंग्य करना-ये प्रमुख का काम नहीं है। मोदीजी एक समय जनसंघ ने नेहरू के खिलाफ विशाल रैली निकाली और नारा दिया- गूंजे धरती और पाताल। गद्दी छोड़ जवाहर लाल।। इंदिरा गांधी की भी जनसंघ ने कई तरह से आलोचना की और एक नारा यह खूब चलाया- देखा इंदिरा तेरा खेल। खा गई शक्कर, पी गई तेल।। मोदीजी जब जनता त्रस्त होती है, तब लोक से विरोध के स्वर फूटते हैं। राजनीति को मत उलझाइये। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस के बढ़े हुए दाम पर आप मुंह तक नहीं खोलते। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक में अपनी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि दो-चार दिन में बढ़ी कीमतों पर चर्चा होगी, लेकिन पखवाड़ा बीत गया, कोई चूं-चपड़ नहीं। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान क्या बोलते हैं? आप लिखें, खुदा बांचे की तरह मुंह में ही बात रह जाती है। रोज दाम बढ़ रहे, सरकार हिल-डुल नहीं रही। यह तो यही कहावत हुई कि ''रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था।'' मोदीजी इस समय देश में आपकी जोड़ का कोई चुनावी भाषण देने वाला नहीं है। भावना उभार देना। आप जो चाहते हैं उस सोच में श्रोताओं को ले आना और मंत्रमुग्ध कर देना, आपकी बड़ी कला है, लेकिन ये नहीं बताते कि 2014 के वायदों का क्या हुआ? अमित शाह ने कहा था कि हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख आएंगे, कहना चुनावी जुमलेबाजी थी। मानते हैं कि चुनाव में कहा जाता है, लेकिन दो करोड़ रोजगार हर साल देना, ऐसा नहीं कहना था युवा इससे निराश हुए। क्या जुमलेबाजी है कि पकौड़ा, पान, चाय बेचने की सलाह देना, ये युवकों में किस प्रकार उत्साह पैदा करना हुआ? और दुख की बात यह है कि इन को महिमामंडित किया जाता है। मोदी जी आप जानते हैं कि देश की नब्बे प्रतिशत आबादी गैरसरकारी काम में लगी है और स्व उद्योग में लगी है, आपको सलाह की जरूरत नहीं है, किसी तरह अपना परिवार पाल रही है। क्या उन्हें उसी हालत में रहने देना चाहते हैं? हमारे देश के युवा कंडा बेचकर, लकड़ी बेचकर परिवार चला रहे हैं। मोदीजी इस समय गदगद कार्पोरेट ही है। वैश्विक पूंजीवाद तमाम देशों को अर्थव्यवस्था, सामाजिक, राजनैतिक क्षेत्रों को नियंत्रित और निर्देशित कर रहा है। हमारे यहां कहा गया है कि हम तो निमित मात्र हैं, कर्ता तो कोई और है। अब राष्ट्रीय सरकारों को कुछ नहीं करना है, सब वैश्विक पूंजीवाद से निर्देश आ रहा है। अपने यहां कहते हैं कि राक्षस की जान तोते में। उसी तरह हमारी समस्त क्रियाओं पर वैश्विक पूंजीवाद ने नियंत्रण जमा लिया है। आज की लड़ाई पूंजी की वर्चस्वता के खिलाफ लड़ाई है। आज भारत दोराहे पर खड़ा है। मोदीजी कहते हैं 'सबका विकास सबके साथ' यह आध्यात्मिक नारे जैसा लगता है, जैसे प्राणीमात्र का कल्याण हो। मोदीजी विकास के लिए बोलते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि विकास किस आर्थिक नीति के तहत होगा। हवा में तो नीतियां पैदा नहीं होतीं। आज हमारी सरकार ने पूंजीवादी विकास को पकड़ा है और उस रास्ते पर चल रही है, यह रास्ता विकास की ओर नहीं ले जाकर अंधेरी गुफा की ओर ले जा रही है। यह समझने की जरूरत है, विकास-विकास भजने से विकास नहीं होता। मोदीजी की आर्थिक नीति आखिर है क्या? और उनका वंचित वर्ग के प्रति कितना सरोकार है, उनकी समस्याएं किस रूप में समझती हैं सरकार। उनके आने के बाद गैरबराबरी बढ़ रही है। देश के नब्बे प्रतिशत संसाधनों पर दस प्रतिशत सजोर वर्ग का अधिकार है और बाकी पर वंचित वर्ग है और वंचित वर्ग अपने रोजी-रोटी के संघर्ष में ही लगा है। घर-परिवार, सामाजिकता, मनोरंजन से जानबूझ कर वंचित किया जा रहा है। गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन उच्च शिक्षा दिलाने सोच नहीं सकता। मातृभाषाओं की स्कूलों में ऐसी दुर्दशा आज की जा रही है, वैसी कभी नहीं रही। प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में पचास-साठ लाख रुपए फीस ली जा रही है। इन तमाम बातों पर मोदीजी मौन रहते हैं। मौन रहना मजबूरी है, क्योंकि बोलेंगे तो जनता उठ खड़ी होगी और सवाल करेगी। देश में ऐसी स्थिति पर मोदीजी कभी बोलते ही नहीं, सिर्फ विकास-विकास बोलते हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही थीं और मोदीजी मौन साधे रहे। काफी हो-हल्ले के बाद सरकार ने मेहरबानी कर 'एक पैसा' की छूट दी, जैसे पुण्य कमाने के लिए एक पैसा का दान दिया हो। सरकार को एक पैसों की छूट देते लज्जा भी नहीं आई। जबकि केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने एक रुपए की छूट दी। 2019 का चुनाव जीतना भाजपा के लिए कोई कठिन नहीं है, न कोई चैलेंज है। क्योंकि दुनिया में इस समय सबसे रईस पार्टी है। ढेरों तो उनके प्रकल्प हैं, 2019 में भाजपा जीत भी गई तो भी चुनाव जीतेगी, जनता का दिल नहीं, क्योंकि लोकतंत्र का जबरदस्त क्षरण हुआ है।prabhakarchaube@gmail.com


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