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मेरा दरद न जाने कोय... किसान---प्रभाकर चौबे
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किसानों की समस्या आसमान से नहीं टपकी है। किसानों की समस्या 'किसान द्वारा पैदा नहीं की गई है... किसान कह रहा है- मेरा दरद न जाने कोय..। और सरकार उसकी पीड़ा का इलाज मलहम-पट्टी से कर रही है- ले ऋण माफ। बीमारी भयानक है, इलाज मलहम-पट्टी का, ऐसी है सरकार और पूछती भी है कि आराम मिला? कहती फिर रही है कि सरकार को किसानों के प्रति हमदर्दी है। हे सरकार! किसान को हमदर्दीनहीं चाहिए- इलाज चाहिए। या कह दे सरकार कि हमारे पास दवा नहीं है। किसान की पीड़ा के कारणों को सरकार जान नहीं रही या जानकर भी अनजान बनी है क्योंकि उसे इस व्यवस्था को मजबूत करना है। किसान की पीड़ा क्या है। प्रखर समाजवादी सांसद मीनू मसानी ने लिखा है कि भारत का किसान पांच साल में तीन साल अकाल का सामना करता है-कभी अल्प वर्षा, कभी सूखा और दो वर्ष अकाल में लिए गए ऋण पटाने में बीतता है। इस तरह भारत का किसान हमेशा कर्ज में ही डूबा रहता है। एक कहावत भी है कि 'भारत का किसान कर्ज मेंपैदा होता है, कर्ज में बड़ा होता है और कर्ज छोड़कर मरता है। जबकि मध्यमवर्ग के लिए कहा जाता रहा है कि मध्यवर्ग का सिद्धांत रहा है 'न ऊधो का लेना, न माधो का देना। भारत का मध्यवर्ग पढ़कर नौकरी करता रहा, बच्चों की शादियां की, एक घर बनाया और शांति के साथ मरते रहा-कर्ज छोड़कर नहीं मरता रहा। लेकिन किसान के साथ ऐसा नहीं है। और एक बात अंग्रेजों ने ही अपनी शोषणकारी नीतियों के कारण किसान की कमर तोड़ी। उन दिनों भी किसान आंदोलन हुए। सौ साल पहले चम्पारन किसान आंदोलन हुआ, इसमें गांधीजी पहुंचे थे। आज़ादी के बाद भी किसान आंदोलन हुए। किसानों की दशा सुधारने सामूहिक खेती, सहकारी खेती की अवधारणा उपजी लेकिन इसका प्रयोग नहीं किया गया। इसके कई कारण हैं, उन पर यहां चर्चा करना असंगत होगा। इतना ही कहा जा सकता है कि सरकारों ने किसान की पीड़ा हरने के नाम पर केवल मलहम-पट्टी ही की। 'हां, अब ठीक हो जाओगे, जाओ। किसान ठगाते रहा। किसान को उस मजबूती के साथ संगठित भी नहीं किया गया कि वह इतनी ताकत पा ले कि क्रांति कर दे... किसान आंदोलन तो हुए, कुछ सफलताएं भी मिलीं- भूमि सुधार के प्रयोग हुए। लेकिन भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन ने ट्रेड यूनियन ज्यादा किया। उन पर फोकस रहा अत: पूरे देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन की तरह किसान आंदोलन नहीं फैला न उतना ताकतवर हुआ। ट्रेड यूनियन आंदोलन ने इतनी ताकत तो पा ही ली कि वह क्रांति भले न कर सके, लेकिन 'अर्थव्यवस्था को 'स्टैन्ड स्टिल यथावत रखता रहा। अब 'उदारवाद के दौर में वह ताकत भी खत्म-सी हो गई है। यह विषय विमर्श की मांग करता है। यहां इस किसानों की दशा पर ही अपनी बात पर केन्द्रित रखें अन्यथा भटक जाएंगे। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के साथ ही किसानों की पीड़ा बढ़ती गई। एक और बात कार्पोरेट हित और किसान हित के बीच द्वन्द्व की स्थिति पैदा हो गई या कर दी गई। वास्तव में नवउदारवादी आर्थिक नीति के कारण यह तो होना ही था। इसी नीति के चलते 'पुरा (प्रोवाइडिंग अरबन फेेंसलिटीज़ टू रूरल एरिया) की अवधारणा का उदय हुआ और सरकारों ने इसे हाथों हाथ लिया। कहा गया कि गांवों में शहरों सरीखी सुविधाएं मुहैया कराई जाना जरूरी हैं। कुछ गांवों को मिलाकर एक क्षेत्र विकसित किया जाएगा जहां ये सुविधाएं मिलेंगी। बहरहाल 'पुरा की अवधारणा पर तेजी से काम तो नहीं हुआ लेकिन विश्व बैंक की इस बात पर कि 50 वर्ष के अंदर 60 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को शहरों में लाना है। ऊपर से तो अच्छा लगा लेकिन इसमें बड़ा ठगपन है। बहरहाल नवउदारवाद तो पूंजीवादी अवधारणा है, उसकी कोख से जन्मा है। अत: उसे उद्योग चाहिए- हर हाल में उद्योग लगाना है अत: 'पुरा के संग-संग सेज (एस.ई.जे.) स्पेशल इकानॉमिक जोन की अवधारणा परोसी गई। लूट के नये आयाम, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नष्ट कर गांव को उजाडऩे के नये प्रोग्राम शुरु हुए और मध्यवर्ग के एक हिस्से ने इसकी सराहना की। अपने देश में लगातार बुर्जुआ पूंजीवादी दल सत्ता में आते-जाते रहे अत: 'सेज जैसी अवधारणा को अंगीकार करते रहे। यह अलग बात है कि किसानों के लिए 'तुमने कुछ नहीं किया..., 'तुमने कुछ नहीं किया का हल्ला मचा कर बुनियादी समस्याओं से ध्यान बंटाते रहे। इन तमाम दलों ने नवउदारवादी शोषणकारी नीतियों को अपना लिया है- अगर न अपनाए तो उन्हें 'वैश्विक पूंजीवाद की ताकत सत्ता से बेदखल न कर दे। बड़ी ताकत रखती हैं ये शक्तियां। हमारे यहां जब कार्पोरेट को लगा कि कांग्रेस आर्थिक सुधार के ट्रेक पर धीमी गति से दौड़ रही है तो उसने अपने प्रचार माध्यमों से ऐसा वातावरण बनाया कि कांग्रेस जनता की नजरों से उतर गई और सत्ता से हटा दी गई- ये ताकतें दिखती नहीं, लेकिन होती हैं, और अपना काम अपने हित में करने वालों को सत्ता देती रहती है। उन्हें लगा कि भाजपा आर्थिक सुधार के ट्रेक पर फर्राटा दौड़ लगाएगी-लगा भी रही है। आगे देखो भाजपा कितने दिन 'कार्पोरेट प्रिय बनी रहती है। क्षेत्रीय दलों की न कोई आर्थिक नीति है न कोई विदेश नीति- उनकी समझ सत्ता प्राप्ति तक ही केन्द्रित है। बहरहाल किसानों की समस्या आसमान से नहीं टपकी है। किसानों की समस्या 'किसान द्वारा पैदा नहीं की गई है। किसान का शोषण किसान नहीं करता। वैसे अब किसान मतलब 'अल्पमत अब तो पूरी कृषि नीति कार्पोरेट खेती तय कर रही है। आयात नीति क्या हो, कृषि की निर्यात नीति क्या हो, यह कार्पोरेट खेती से तय हो रहा है-मजेदार बात यह कि प्राय: हर राज्य में इनकी 'लॉबी है, यह लॉबी ही नीति कराती है। उसकी भी कृषि नीति कार्पोरेट हित से संचालित है। वह भी अन्य पूंजीवादी दलों से अलग कैसे हो सकती है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात में किसान आंदोलन शुरु हुए तो किसानों की दशा, कृषि नीति, कृषि की दशा आदि से संबंधित विषयों पर कई कोण से मीडिया में चर्चा शुरू हो गई। स्वाभाविक है। और यह भी स्वाभाविक है कि इसमें भाजपा व कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं के साथ ही कुछ कृषि विशेषज्ञ भी हों, सो हुए और प्राय: हर चैनल पर शोर शुरु हुआ। आखिर ये कृषि विशेषज्ञ भी किस व्यवस्था और किस आर्थिक सिद्धांत की उपज है। घुमा-फिराकर चर्चा किसानों के ऋण माफी तथा समर्थन मूल्य पर टिक जाती है और उसी पर लगातार चर्चा होती है कि इससे सरकारी खजाने पर कितना असर पड़ेगा। यह भी कि इस तरह ऋण माफ करना 'आर्थिक ईमानदारी के खिलाफ है। केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो साफ कर दिया कि राज्य अपने संसाधनों का उपयोग का ऋण माफी करे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि हर क्षेत्र में, हर जगह किसान पीडि़त है- लेकिन उन्होंने हर पीड़ा के पैदा होने का कारण तथा निदान पर कुछ नहीं कहा- वे भी इस नवउदारवादी नीति के ही वाहक हैं और केन्द्र में वे और उनकी पार्टी सत्ता में बैठ जाएगी तो वह भी इन नीतियों के चलते पूंजीवाद को मजबूत करने वाले प्रोग्राम ही आएंगे। वास्तव में किसान पीड़ा इस व्यवस्था की देन है। यह फोड़ा इस गंदे पानी के कारण हुआ है। पूंजीवाद को मारो, पीड़ा दूर होगी। गैरबराबरी दूर होगी। पूंजीवादी में हर वर्ग पीडि़त है- कार्पोरेट में ऋण की बात उठाई जाती है- कहा जाता है कि कार्पोरेट का कर्ज माफ कर दिया जाता है, किसानों का क्यों नहीं। लेकिन यह इस तरह का सवाल भी उठाएगी कि किसानों का कर्ज माफ तो आम आदमी का क्यों नहीं। मतलब पूंजीवाद वर्ग में बांटता है। और वर्ग के अंदर वर्ग पैदा कर झगड़े कराकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। ऋण माफी व समर्थन मूल्य में समस्या का हल नहीं छिपा है-पूंजीवाद ही कारण है। लेकिन देश के दोनों बड़े दल एक-सी नीति पर चल रहे हैं। आर्थिक नीतियों के, कार्यक्रमों के मामले में भाजपा तो कांग्रेस की 'कार्बन कापी है। उसकी अपनी कोई नीति नहीं। वह कांग्रेस की आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है। किसानों के कर्ज पर उनकी स्थिति पर चर्चा के साथ ही पूंजीवाद पर चर्चा हो। लेकिन मीडिया भी तो इस पूंजीवाद का हितसाधक है। किसानों की पीड़ा पर इस तरह हल्ला मचाते चर्चा करने का और क्या अर्थ? लगता है कोई 'प्रहसन देख रहे हों। ऋण माफी, समर्थन मूल्य की बातों में उलझाना मूल मुद्दे से भटका रहा मीडिया और पूंजीवाद का ही पोषण कर रहा। किसान को या किसी भी आदमी को 'दया नहीं चाहिए, दया न परोसें, व्यवस्था बदलें- गैरबराबरी तो दूर हो। जनता उकता रही है। गुस्से में भी है। यह सवाल तो खड़ा ही है कि चुनाव में बड़े-बड़े वायदे करना और सत्ता में आने पर पूरा न करना क्या लोकतंत्र में गलत नहीं है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किसानों के लिए जो वायदे किए उन्हें पूरा करने में पीछे हट गई। लोकतंत्र में क्या बड़बोलेपन और भावनात्मक नारे उछालकर सत्ता पाना उचित है। चुनाव आयोग क्या करता है? जनता तो देखेगी लेकिन जनता इन कारणों से कुछ समय तक भुगतती भी है। मुक्तिबोध ने लिखा है- तब मनुष्य ऊबकर उकताकर ऐसे सब अर्थों की छाती पर पैर जमा तोड़ेगा काराएं कल्मष की तोड़ेगा दुर्ग सब अर्थों के अनर्थों के ...। ( पहले ही घंटे में किसानो को कर्ज माफ करने पर पूर्व में लिखा गया प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. प्रभाकर चौबे का यह आलेख देशबंधु से साभार)


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