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मंत्री पद की लालसा, संवैधानिक दिक्कतें और जनमानस-- जीवेश चौबे
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मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र को चिट्ठी लिखकर मंत्रियों की संख्या बढ़ाने की मांग की है । मंत्रीमंडल का गठन एक मुख्य मंत्री का विशेषाधिकार होता है जिसे वह अपने विवेक, आपसी तालमेल, अनुभव व उपयोगिता के अनुसार व्यक्तियों को प्रदान करता है । मुख्य मंत्री संविधान के तहत सद्इरादों से किए गए प्रावधानो से बंधे हुए हैं जिसका सभी को सम्मान करना चाहिए ।एक तो मंत्रियों की संख्या में बढ़ोतरी करना इतना आसान नहीं है इसके अलावा जनता के पैसे का दुरुपयोग किया जाना किसी भी तरह जायज़ नही ठहराया जा सकता । मुख्य मंत्री के विशेषाधिकार को चुनौती देने और महत्वाकांक्षाओं के चलते स्वार्थी हो जाने की बजाय उनके साथ खड़ा होकर पार्टी को मजबूती प्रदान करना ज्यादा महत्वपूर्ण है । यह बात भी गौरतलब है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों की हर हरकतों पर जनता की बराबर नजर होती है । जनमानस पर पड़ने वाला प्रभाव काफी महत्वपूर्ण होता है जिसकी ओर चुनाव जीतने के बाद कम ही ध्यान दिया जाता है । यह तथ्य समझना जरूरी है कि जनता बड़ी उम्मीद व अपेक्षाओं से किसी भी पार्टी को सत्ता में लाती है, मगर पार्टी के अंतर्कलह का उसके मानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उसे काफी निराशा होती है । विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में जिस तरह हताश होकर जनता ने पूर्ववर्ती सरकार के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए कॉंग्रेस को लगभग तीन चौथाई बहुमत से सत्ता सौंपी है उससे जन अपेक्षाओं के प्रति कॉंग्रेस की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है । कॉंग्रेस के सभी विजयी प्रत्याशियों के साथ ही उनके समर्थकों व अन्य कार्यकर्ताओं को पदलोलुपता से ऊपर उठकर जन भावनाओं के प्रति संवेदनशील व जिम्मेदार होना होगा । क्या हर जीता हुआ जन प्रतिनिधि मंत्री बनाया जा सकता है ? संविधान के 91 वें संशोधन के अनुसार मंत्री पद की संख्या सदन की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से ज्यादा नही ही सकती । यह प्रावधान बहुत सोच समझकर जनता के पैसे की बर्बादी ,फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही सादगीपूर्ण प्रशासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया है । एक मंत्री के पीछे वेतन भत्तों के अतिरिक्त सुरक्षा मानकों व अन्य सुविधाओं पर सरकार पर काफी वित्तीय भार पड़ता है । प्रश्न ये उठता है कि क्या जनता की सेवा सिर्फ मंत्री बनकर ही की जा सकती है? जनसेवा के लिए राजनीति में आने का दावा करने वाले सत्ता पाते ही क्यों मंत्रिपद के लिए जूतमपैजार की हद तक उतर जाते हैं । उल्लेखनीय है कि मौजूदा परिस्थितियों में सांसद व विधायक के लिए जनसेवा व जन विकास कार्यों को अंजाम देने के उद्देश्य से प्रति वर्ष सांसद निधि व विधायक निधि का भी प्रावधान किया गया है। इस राशि को वे अपने स्वविवेक से जनहित के कार्यों में खर्च कर सकते हैं मगर हाल ही में आई रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश जन प्रतिनिधि इस राशि का उपयोग ही नही कर पाते और कई मामलों में तो यह राशि लेप्स भी हो जाती है । फिर आखिर ऐसा क्या है कि हर विधायक मंत्री बनना चाहता है। निश्चित रूप से मंत्री के पास विशेषाधिकार व संसाधन एक विधायक से ज्यादा ही होते हैं मगर इन सबसे इतर सामंतवादी मानसिकता के चलते मंत्रिपद के रुतबे के साथ सायरन व लाल बत्ती लगी दसियों गाड़ियों के काफिले का आडम्बर ही ज्यादा आकर्षित करता है । यह बात गौरतलब है कि मौजूदा दौर में एक विधायक या सांसद पद के बिना खुद को उपेक्षित सा महसूस करता है । मंत्रिपद न मिलने की दशा में वह किसी मंडल या आयोग के शीर्ष पद पर आसीन होना चाहता है । आजकल उसे मलाईदार पद से परिभाषित किया जाने लगा है । सभी के मंत्री या अन्य पदों पर काबिज होने की अदम्य लालसा विधायक की राजनीति में आने मंशा पर सवाल खड़ा करती है । हालांकि हर कोई जन सेवा के नाम पर मंत्रिपद की मांग करता है मगर अब हर आम मतदाता भी यह जानता व मानता है कि मंत्री पद अकूट कमाई का ज़रिया बन चुका है , कुछ अपवाद ज़रूर हो सकते हैं मगर अब यह साफ तौर पर देखा जा सकता है। हमारे आसपास ही ऐसे व्यक्ति हैं जो चुने जाने से पहले बहुत ही साधारण स्तर पर जीवन जी रहे होते हैं मगर मंत्री बनते ही रातों रात दौलत के अपार भंडार जमा कर लेते हैं । उधर मध्य प्रदेश में भी मंत्री पद को लेकर घमासान मचा हुआ है। तीन राज्यों में से इन दो राज्यों , छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश, में 15 साल बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी है । लम्बे समय के पश्चात सत्ता में लौटी कांग्रेस पार्टी में हर कोई मंत्री बनना चाहता है । महत्वाकांक्षाएं स्वाभाविक हैं मगर पार्टी अनुशासन का पालन और जनभावनाओं का सम्मान करना ज्यादा ज़रूरी है। विशेष रूप से मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां बहुमत का अंतर बहुत ही कम है, अपने नीहित स्वार्थ के चलते पार्टी की साख व संभावनाओं को दांव पर लगाना अनुचित तो है ही साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि जरा सी चूक पार्टी कार्यकर्ताओं की बरसों की मेहनत से हासिल उपलब्धियों को संकट में डाल सकती है । जीवेश चौबे


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