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फिल्म आर्ट कल्चर एंड थिएट्रिकल सोसायटी FACTS रायपुर *मौजूदा मज़हबी जुनून और उर्दू सहाफत पर ब यादगारे कामरेड अकबर द्वारा गुफ्तगू का आयोजन*
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हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे , जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे ", ब यादगारे कामरेड अकबर के दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन फ़िल्म आर्ट कल्चर एंड थियेट्रिकल सोसायटी के बैनर तले गुफ्तगू का आयोजन महंत घासीदास संग्रहालय के सभागार में किया गया । गुफ्तगू का मौज़ू "मौजूदा कौमी जुनून और उर्दू सहाफत" रखा गया था ।सहाफत यानी पत्रकारिता पर केंद्रित इस गुफ्तगू के मुख्य वक्ता हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक सियासत के न्यूज़ एडिटर जनाब आमिर अली खान व बदायूं से आये वरिष्ठ शायर हसीब सोज़ थे । गुफ्तगू की सदारत रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज जनाब सैयद इनाम उल्लाह शाह ने की व संचालन जनाब आबिद अली ने किया । मौजूदा मज़हबी जुनून और उर्दू सहाफत पर चर्चा की शुरुवात मशहूर शायर हसीब सोज़ साहब ने करते हुए अपने उद्बबोधन में कहा कि एक ज़माने में सहाफत की बहुत इज़्ज़त थी मगर आज ये बहुत निम्न स्तर पर आ गई है । उन्हीने कहा कि उर्दू सहाफत में मज़हबी जुनून की अभी तक ती कोई दखल नही हुई है और उर्दू सहाफत कौमी जुनून के नापाक मन्सूबो से पाक साफ रही है । उन्होंने कहा कि सहाफत में सच को सच लिखने का साहस होना चाहिए । हालांकि हिंदी उर्दू अंग्रेज़ी सभी भाषाई सहाफत में अब उस साहस की कमी साफ देखी जा रही है मगर तमाम सहाफ़्त में आ गई गंदगी के लिए हम सभी ज़िम्मेदार हैं । गुफ्तगू के मुख्य वक्ता डेली हैदराबाद से प्रकाशित हिने वाले उर्दू अखबार सियासत के न्यूज़ एडिटर आमिर अली खान साहब थे । उन्होनेव कौमी जुनून के चलते बने पाकिस्तान के हालातों का ज़िक्र करते हुए कहा कि आज भी इस जुनून के नुकसान पाकिस्तान के साथ ही हमारे देश को भी भुगतना पड़ रहे हैं । ब्रेकिंग न्यूज़ के बढ़ते ट्रेंड के नुकसान व इज़के दुष्प्रभावों से उर्दू सहाफत भी अछूती नही रही है ।आज जो मज़हबी जुनून का जो उफान चल रहा है उसके चलते मुसलमानो में भय का माहौल बढ़ रहा है जिसके चलते वे मज़हब की तरफ ज्यादा जा रहे हैं । उन्हीने आगे कहा कि आज़ादी के बाद जो मुसलमान हिंदुस्तान में रह गए वे अपनी पसंद से रहे और इस भरोसे पे रहे कि उन्हें हिंदुस्तान में बराबरी का हक मिलेगा । वो भरोसा आज भी कायम है मगर मज़हबी जुनून के बढ़ते प्रभाव से इस भरोसे में संदेह के बादल घिर रहे हैं । उन्होंने गोकशी पर अपनी बात करते हुए कहा कि गोकशी सीधे सीधे सियासत की बात है और यह अर्थव्यवस्था से जुड़ा मसला है मगर लोग इसे अपनी सियासत चमकाने के लिए उपयोग में ला रहे हैं । उन्होंने हिन्दू मुसलमान दोनों के कौमी जुनून को देश की एकता व अखण्डता के लिए सबसे बड़ा खतरा व चुनौती बताया साथ ही इस पर तत्काल लगाम लगाई जाने की ज़रूरत बताई । उन्होंने कहा कि मुसलमान जितना हिन्दू जैन बौद्ध सिख को जानता है उतना दूसरे धर्म के लोग मुसलमान को नही जानते । मुलमान का जितना नुकसान मुसलमानों के कौमी लीडरों ने किया उतना किसी ने नही किया । अपनी कौमी सियासत कायम रखने के लिए वे आम मुसलमानों को अशिक्षित व बैकवर्ड रखने में लगे रहते हैं । उर्दू सहाफत की ताजा हालात पर भी उन्होंने अपनी बात की । उन्होंने कहा कि उर्दू सहाफत आज भी आर्थिक तंगी से जूझ रहा है । तमाम संकटों के बावजूद कौमी एकता और देश की अखंडता के लिए आज भी उर्दू सहाफत अपनी जिम्मेदारियों का गम्भीरता से निर्वाह कर रहा है । आखिर में गुफ्तगू के सदर जनाब इनाम उल्लाह शाह ने पूरी चर्चा पर अपनी राय रखी । मशहूर शायर व रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज इनाम उल्लाह शाह साहब ने अपने उद्बबोधन में कहा कि मज़हबी जुनून आज पूरे विश्व की समस्या है । उन्हीने मशहूर शायर फ़ैज़ का ज़िक्र करते हुए कहा कि " हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे ,जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे ", यानी सहाफत में हिम्मत का बड़ा रोल होता है । उन्होंने कहा कि सहाफत का म्यार कभी बदलना नही चाहिए चाहे वह किसी भी भाषा मे हो । मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा ^सच घटे या बढ़े तो सच न रहे ,झूट की कोई इंतिहा ही नहीं ^ । उन्हीने कहा कि उर्दू मोहब्बत की ज़बान है जिसमे मज़हबी जुनून की कोई जगह नही है । इसीलिए मज़हबी जुनून में डूबे लोग उर्दू सहाफत के खिलाफ हैं । उर्दू सहाफत आज भी सर उठाकर चल रही है । कौमी जुनून के खिलाफ आज शाफ़ई, शायर कलाकार सभी की जिम्मेदारियां बढ़ गई है । गुफ्तगू के इस अहम अदबी आयोजन के आखिर में सवाल जवाब का दौर भी हुआ।फ़िल्म आर्ट कल्चर एंड थियेट्रिकल सोसायटी ,फैक्ट्स के इस अहम अदबी गुफ्तगू में नगर के बुद्धिजीवी , कलाकार व अमनपसंद हज़रात बड़ी संख्या में मौजूद रहे ।


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