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भाजपा में भर्ती अभियान--प्रभाकर चौबे
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चुनाव आता है और भाजपा में नेताओं की भर्ती शुरू हो जाती है- कह सकते हैं लोकतंत्र में चुनाव लड़ाकों की भर्ती शुरू होती है। 2014 चुनाव से पूर्व भी हुई थी। आगे 2017 में 4 राज्यों की विधानसभा के चुनाव हैं तो भाजपा ने भर्ती शुरू कर दी है। कुछ दिन पूर्व ही उत्तर प्रदेश की मजबूत नेता रीता बहुगुणा को भाजपा ने पार्टी में भर्ती किया है। आगे और भर्ती होगी। 2014 में तो थोक से भर्ती की गई थी- जितना बड़ा चुनाव उतनी ज्यादा भर्ती। हमारा मीडिया आम चुनाव को महासंग्राम, दंगल आदि से सम्बोधित करता है। तो महासंग्राम के लिए चुनाव लड़ाका चाहिए। इसलिए भाजपा में भर्ती शुरू हो जाती है। सामंती काल में जब दो राजाओं के बीच युद्ध छिड़ता तो सेना में आम भर्ती होती। मुनादी की जाती कि जिसके पास खुद का घोड़ा और तलवार है वह सेना में भर्ती हो सकता है। कुछ राजा दो तरह की सेना रखते थे। एक रेगुलर आर्मी जिन्हें राजकोष से वेतन-भत्ता मिलता और युद्ध के समय घोड़ा भी दिया जाता। दूसरे प्रकार की सेना एडहाक होती। तत्कालिकता के लिए। जिस तरह आजकल सरकारें सरकारी दफ्तरों में एडहाक नियुक्तियां करता है। लड़ाई के समय उन दिनों सेना में नियुक्ति दी जाती। अब राजशाही, राजतंत्र, सामंतकाल तो रहा नहीं यह लोकतंत्र है। पहले अगर तलवार के बल पर सत्ता प्राप्त की जाती तो अब वोट के बल पर सत्ता प्राप्त की जाती है। तलवार के बल पर सत्ता पाने के लिए बढिय़ा लड़ाका भर्ती किए जाते। अब लोकतंत्र में सत्ता के लिए बढिय़ा वोट केचर भर्ती किए जाते हैं- लड़ते दोनों हैं, तरीका जुदा-जुदा हो गया है। अब कद्दावर नेता मिल जाए तो पोलिटिक पार्टी की बांछें खिल जाती हैं और पूरे सम्मान के साथ समारोहपूर्वक उसकी भर्ती की जाती है। लड़ाई के समय उन दिनों यह देखा जाता था कि उसके पास तलवार और घोड़ा है या नहीं। अब इस लोकतंत्र में यह देखा जाता है कि जिसे लिया जा रहा है वह हर तरह से सम्पन्न है कि नहीं। गरीब-गुरबा तो नहीं लिया जाता। नाम हो, पिछला काम हो और उसे लेने पर मीडिया में एकाध हफ्ते तो समाचार बने। देश में चर्चा हो कि वह उधर तो लिया गया। राजनीति में क्या माया, मोह क्या संवेदना क्या करुणा। जीत दिला दे वह काम का। राजनीति में कह सकते हैं-यहां न लागे राऊर माया। राजनीति में माया-मोह का कोई स्थान नहीं। तो आगे चार राज्यों में चुनाव होने को हैं और भाजपा में भर्ती शुरू हो गई है। इसे भाजपा में आउट सोर्सिंग चल रही है, ऐसा भी कह सकते हैं। लगता है भाजपा को चुनाव काल की आउट सोर्सिंग इतनी भा जाती है कि वह जिस राज्य में भी सत्ता में आती है उस राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में आउट सोर्सिंग शुरू कर देती है। तर्क देती है कि राज्य में योग्य मिल नहीं रहे हैं- जैसे चुनाव में योग्य केंडीडेट न मिलने की बात हो और बाहर से भर्ती की जा रही है। भाजपा राज्य की सत्ता और चुनाव दोनों को आउट सोर्सिंग के भरोसे चलाती है। मजेदार बात यह कि चुनाव के पूर्व भाजपा जब पार्टी में भर्ती अभियान चलाती है तो यह नहीं देखती, इस पर नहीं सोचती कि पूर्व में उस नेता ने पार्टी, पार्टी के पदाधिकारी के बारे में क्या-क्या उल्टा-सीधा कहा था। इसे याद नहीं करतीं-बस भर्ती कर लेती है। यही तो राजनीति है और भाजपा सही राजनीतिक खेल खेलती है। जीतने के लिए खेले गए दांव में इधर-उधर की बातों पर कान नहीं दिया जाता। आज की जरूरत है। राजनीति में तात्कालिकता का महत्वपूर्ण रोल होता है। लोग पूछेंगे कि भइया ये सुचिता, सुशासन पार्टी विथ डिफरेंट का क्या मतलब है। तो बात साफ है कि ये चुनाव जीतने के गोला-बारूद हैं- चुनाव खत्म तोप अंदर और तोप के गोले हथियारखाना में दाखिल। अगले चुनाव से पूर्व इनकी सफाई की जाएगी, धारदार बनाया जाएगा। एक और बात यह कि पार्टी में मतलब भाजपा में सबसे ज्यादा सुचिता, सुशासन का उच्चारण करने वाले बुजुर्ग नेता क्षेत्र संन्यास में हैं- और दूसरा कोई है नहीं जो सुचिता कहता फिरे। ऐसी चर्चा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा जो 283 सीट मिली उन 283 में कुछ (कुछ का कहना है कि बड़ी संख्या में) आउट सोर्सिंग वाले हैं- मतलब बाहर से भर्ती किए गए हैं। और ऐसा मजाक भी चल रहा है कि ऐसे आउट सोर्सिंग वाले अगले चुनाव में भाजपा में सुविधाओं की संभावना क्षीण होते देख अपने-अपने ओरिजिनल स्टेट (पार्टी) में वापस न चल दें कि लो घर वापसी कर ली हमने। राजनीति में ऐसा करने वालों की भी भारी संख्या रही है-उन्हें बस जीत चाहिए, कुर्सी चाहिए। जिधर मिले, उधर खिसक लेते रहे हैं। ये भविष्य की बातें हैं और राजनीति में भूत-भविष्य की बात नहीं वर्तमान ही देखा जाता है। ऐसा भी नहीं है कि अन्य दलों में भर्ती न होती हो। पहले कांग्रेस में होती रही- पं. नेहरू से लेकर आगे तक बड़ी संख्या में समाजवादी एक-एक कर कांग्रेस में जाते रहे। निकलते भी रहे। इसलिए कांग्रेस के बारे में कहा जाता कि कांग्रेस तो पार्टी नहीं, एक मंच है। बहरहाल राजनीति में जो अन्य पार्टी से इस पार्टी में दाखिला लेता है उसे बाहरी नहीं माना जाता। अपना ही माना जाता है। उसकी थाली सबके साथ परसी जाती है और वह उन तमाम सुविधाओं का हकदार बन जाता है जो ओरिजिनल सदस्य पाते हैं। राजनीति इस मामले में सर्वग्राही है। राजनीति की हाजमा शक्ति भी गजब की होती है। पार्टी सब हजम कर लेती है। पार्टी में दो दरवाजे ही रखे जाते हैं: अंदर प्रवेश का और बाहर निकलने का...। मजेदार बात यह कि राजनीति पार्टी का बनना और उसमें इन दो दरवाजों का बनना साथ-साथ शुरू होता है। पार्टी बनी और दरवाजे बन गए-आओ भाई। कांग्रेस पुरानी पार्टी है तो यह खेल खूब देखा है। कोई भी खिडक़ी से बाहर नहीं खिसकता, मेन दरवाजे से ही बाहर जाता है- फिर मिलेंगे, कहते हुए। कभी-कभी पार्टी को अंदाज लग जाता है कि यह अब कभी भी उधर चल देगा- हावभाव से दिख जाता है। लेकिन राजनीति सबको समोककर चलती है, इसलिए कोई उससे कुछ कहता नहीं केवल वॉच किया जाता है और एक दिन पत्ता डाल से गिर पड़ता है। गिरने की प्रक्रिया पहले शुरू हो चुकी होती है। सबसे बढिय़ा भाजपा की राजनीति। वह बड़ी शान से जरूरत के आदमी को पार्टी में प्रवेश देती है। गाजे-बाजे के साथ स्वागत किया जाता है और उस पार्टी को जिससे वह आया या आई, मीडिया के माध्यम से गरिया दिया जाता है। कितना त्याग किया लेकिन पार्टी ने क्या दिया। वहां केवल वंशवाद ही है। भाजपा की नीति है इस समय कि चुनाव जीतो-पहला लक्ष्य है चुनाव जीतना, राज्यों में जीतो, बहुमत लाओ तो राज्यसभा में बहुमत हो और फिर जरूरी संवैधानिक संशोधन की ताकत मिले। जहां से भी मिले, लाओ चुनाव समर में। भर्ती करो। जिनके पास चुनाव जीतने की थोड़ी भी सम्भावना है, उसे भर्ती कर लो। जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान की तर्ज पर भर्ती के समय उसके पार्टी मत देखो, चुनाव जीतने की योग्यता देखो- इस समय चुनाव जीतना ही एकमात्र लक्ष्य है। भाजपा के पास अच्छा खासा थिंक टैंक है- खूब से सदस्य व रणनीतिकार हैं, धन बल में पार्टी शायद नम्बर वन हो, विदेशों तक में उसके लिए प्रार्थना करने वाले हैं तो चुनाव के लिए भर्ती शुरू करो...। बसपा से कुछ गए, कांग्रेस से आ रहे और आगे आ सकते हैं- पार्टी खुश है कि उसका काम हो रहा है। और राजनीति में कुछ तो ऐसे होते हैं जो बातें नीति की, सिद्धांत की करें लेकिन नार सुविधा पर रखते हैं। कुछ नेता तो हर किसी को सरकार बनाने में मदद देकर सुविधा बटोरते रहते हैं लेकिन वह भाई, बातें सिद्धांत की ही करेंगे। बातों के धनी होते हैं। बहरहाल कुछ लोगों को देखो, उनकी राजनीति में चाल-ढाल देखो तो लगता है कि जीवन जीने की कला इन्हें ही आती है। ये ही जानते हैं- सरकार किसी की हो, ये अपना स्थान पा ही लेते हैं। पार्टी ने सब कुछ दिया, एकाध चीज रह गई तो रुष्ट हुए और पाला बदल दिया। कुछ का लक्ष्य सत्ता केन्द्र ही होता है। एक कहावत है-जो करे शरम, उसके फूटे करम। राजनीति में यह एकदम फिट बैठती है। राजनीति में शरम किया और प्राप्य से चूके। इसलिए भाजपा में चुनाव के वक्त भर्ती शुरू होती है तो उसका मकसद फौज बढ़ाना नहीं होता, उसका उद्देश्य होता है पूरे तंत्र पर एकाधिकार एक छत्र राज...। ctc desbndhu


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