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छोड़ो कल की बातें...प्रभाकर चौबे
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42 वर्ष पूर्व 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाया गया था। कुछ लोग, कुछ दल, संगठन 25 जून को प्रतिवर्ष आपातकाल को याद करते हैं, बैठकें करते हैं,सभाएं करते हैं, गोष्ठियां करते हैं। वे यह बताते हैं कि आपातकाल में क्या-क्या ज्यादतियां की गईं। जनता को कैसे डराकर रखा गया। तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को तानाशाह के रूप में पेश करते हैं। वैसे लोकतांत्रिक देश में जनता में लोकतांत्रिक क्रियाकलापों पर, उनके अधिकारों पर प्रतिबंध तो लगना ही नहीं चाहिए। जनता को प्रतिरोध का जो अधिकार लोकतंत्र ने दिया है उसका सम्मान किया जाना चाहिए, मतलब वह यथावत रहे, उसके साथ छेड़छाड़ न की जाए। संवैधानिक अधिकारों का उपयोग किया जाना बाधित न हो। संविधान में प्रदत नागरिक व राजनीतिक अधिकार स्थगित न किए जाएं। लेकिन 25 जून 1975 को यह किया गया। गलत किया गया। आज की पीढ़ी को तो पता भी नहीं कि आपातकाल में क्या-क्या कैसे-कैसे हुआ। बहरहाल आपातकाल का समर्थन तो किया ही नहीं जा सकता। आपातकाल क्यों लगाया गया, इस पर बात नहीं की जाती, या कम की जाती है। आमजन को यह समझाया ही नहीं गया कि आपातकाल क्यों लगाया गया- आपातकाल में कुछ जो ज्यादतियां हुईं, जोर जबरदस्ती हुई, कुछ लूट-खसोट हुआ, अंदर करने और बाहर रहने देने में सौदेबाजी भी हुई- इन पर चर्चा केन्द्रित रहती है। प्रतिवर्ष 25 जून को इन्हीं बातों को कुछ सही, कुछ नमक-मिर्च लगाकर बताया जाता है। कुछ तो यह भी बताने में पीछे नहीं रहते कि उन्होंने क्या-क्या ज्यादतियां सहीं। जबकि 1975 में मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार लोगों के साथ कोई मारपीट नहीं की गई। पूरी तरह राजनीतिक नियमों के तहत जेल में व्यवहार किया जाता रहा। बंदियों के साथ सम्मान का व्यवहार भी किया जाता रहा। वास्तव में 1975 में पता चला कि लोकतंत्र में लोकतांत्रिक आंदोलन के कारण बंद लोगों के साथ किस तरह व्यवहार किया जाना चाहिए- वह लोकतांत्रिक जेल रही। यह बात सार्वजनिक भी हुई। इसका यह मतलब नहीं कि देश में संविधानिक अधिकारों पर बंदिश लगाई जाए। इसका मतलब केवल यह है कि लोकतांत्रिक संघर्ष में लोकतांत्रिक सरकारों, प्रशासन को लोकतांत्रिकता का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करना चाहिए। कुछ ज्यादतियां हुईं वह बाहर समाज में हुईं। कुछ अति उत्साही या यह भी कि कुछ भ्रष्ट आचरण के वशीभूत कुछ प्रशासकों या कार्यपालिका के अधिकारियों द्वारा की गई जैसे रुपये वसूलना। झूठा केस बनाकर अंदर कर देना। लेकिन यह भी तो हुआ कि जिन लोगों ने गरीबों के बर्तन, जेवर गिरवी रखे थे और ब्याज-पर-ब्याज चढ़ाते जा रहे थे उन्हें सजा भुगतनी पड़ी। ऐसे गिरवी रखने वालों को राहत मिली। यह अलग मामला है। वैसे मजेदार बात यह और इसे रेखांकित किया जाना चाहिए कि मध्य वर्ग एक हिस्सा, या बड़ा हिस्सा आपातकाल से खुश इसलिए था कि रेलें टाइम पर चल रही हैं, दफ्तर टाइम पर खुल रहे हैं और दफ्तरों में पूरे समय काम हो रहा है। कर्मचारी पूरे समय हाजिर रहते हैं। विद्यालयों में पढ़ाई हो रही है। ऊपरी लेन-देन पर रोक लग गई है। मध्यवर्ग का यही चरित्र है। वह जरा सुविधा में खिल उठता है- जरा तकलीफ में लाल-पीला होने लगता है। वह इसलिए भी खुश था कि राशन समय पर मिल रहा है और ठीक तौल से मिल रहा है। शक्कर भी मिल रही है। मध्यवर्ग केवल अपनी जरूरतों तक सीमित रहता है। उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि संवैधानिक अधिकार स्थगित कर दिए गए हैं। उसे इस गूढ़ बात से कोई मतलब नहीं था। वह तो रेलगाड़ी के टाइम पर चलने से ट्रैफिक में नियमानुसार चलित होने से प्रसन्न था- कहता ऐसा ही हो, तभी लोग चेतेंगे। मध्यवर्ग आत्मकेन्द्रित वर्ग होता है। आज भी वह इसे ही देख रहा है कि सरकार जीएसटी ला रही है, सरकार ने एंटी रोमियो स्कवाड बना दिया कि सरकार ने तीन तलाक पर कड़ा रुख अख्तियार किया है कि सरकार सबका विकास सबके साथ का नारा दे रही है। योग करवा रही है। मध्यवर्ग ऐसे ही छोटे-छोटे अवसर खोजकर खुश होते रहता है। लेकिन मध्यवर्ग की खुशी काफूर भी होते देर नहीं लगेगी। छोटे-छोटे काम, छोटे-छोटे सुधार स्थायी सुधार नहीं देते। मध्यवर्ग जब देखेगा, भोगेगा कि नौकरियां नहीं है। जब भोगेगा कि उसे हर छोटे-बड़े काम के लिए सर्विस टैक्स देना पड़ रहा है। जब देखेगा कि बैंक तक में अब अपना रुपया निकालना कठिन हो रहा है, महंगा पड़ रहा है। 3 बार से ज्यादा पर शुल्क लगेगा। जब वह देखेगा, भुगतेगा कि शहर से बाहर रहकर पढऩे वाले उसके पाल्य को एटीएम से रुपया निकालने के लिए भटकना पड़ रहा है तब उसका गुस्सा फूटेगा- शायद वक्त लगे। शायद ज्यादा वक्त न भी लगे। हर तरह से आर्थिक-सामाजिक कार्य के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता और उसके लिए उत्पन्न परेशानियां उसे गुस्सा दिलाएंगी। तब वह गुस्से में आएगा और कुछ तय करेगा। उसका 'तय करना सत्ता को भारी पड़ेगा। मध्यवर्ग ने इस वायदे को सुना कि विदेशों में जमा कालाधन 15 दिन में वापस लाया जाएगा। और हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख जमा होंगे। वह यह चुनावी जुमलेबाजी है। मध्यवर्ग सब समझता है। वह यह भी समझ रहा था कि चुनाव में यह कहना कि प्रतिवर्ष 2 करोड़ को रोजगार दिया जाएगा, केवल चुनावी नारा है। बहरहाल कुछ को लग रहा है कि देश हिन्दूराष्ट्र बनेगा... इसलिए भी आशान्वित है। लेकिन आर्थिक भार सब भावनात्मकता को पीछे ढकेल देता है। नोटबंदी के समय की मन:स्थिति जो रहा वह आज उत्पन्न हो रही आर्थिक स्थिति के कारण मध्यमवर्ग चौकन्ना हो गया है। रोजगार घटने, व्यापार-उद्योग मंदा पडऩे, सरकार नौकरी में बंदिश उसके सामने है और वह चुनावी जुमलों से बाहर आने लगा है। लेकिन अब क्या इस पर बात नहीं की जानी चाहिए कि सीधे-सीधे आपातकाल तो नहीं लगाया गया है लेकिन उस जैसी स्थिति पैदा की जा रही है। 1975 में सोशल मीडिया था नहीं और न मीडिया का ऐसा विस्फोटक रूप ही था। लेकिन आज सोशल मीडिया को देखो तो डर लगता है। कुछ तो विरोध की भाषा पढ़कर ही इतने गुस्से में आ जाते हैं कि सुधार देने की धमकी देने लगते हैं। बात-बात पर पाकिस्तान जाओ बोलना। गाय के नाम पर सरेराह मारपीट करना, मार-मार कर हत्या कर देना- ये क्या है।राष्ट्रवाद को इस तरह पेश करना मानो बाकी के लोग देशद्रोही है। राष्ट्रवाद मतलब वे जो परिभाषा राष्ट्रवाद की दें वही परिभाषा मानी जाए और उसी के अनुरूप आचरण किया जाए। पुलिस का काम खुद अपने हाथ में ले लेना और सरेआम कहना कि हां ऐसा होगा... देशद्रोहियों से इसी तरह निपटा जाएगा। आपातकाल में भी कुछ डरावने वाक्य छोड़े जाते रहे। प्रतिरोध को जरा भी बरदास्त न करना। प्रतिपक्ष की भूमिका को ही नकारना। राजनीतिक मतभेद को सामंती तरीके से निपटने की जुगत करना- शब्दों के चयन में इस पर जोर कि सामंती सोच उजागर हो- लोग डरंे। किसी का मजाक बनाना उसका कद छोटा करना। हमारे महान नेताओं को जनस्मृति से लोप करने का उद्यम करना। मीडिया को साध लेना और ऐसे मुद्दों पर चर्चा प्रायोजित करना, जिससे उत्तेजना फैले। राजनीति की चालें बड़ी कुटिल होती हैं। राजनीति की चाल कई मर्तबा जो दिखती है, वैसी होती नहीं। उनका चेहरा और उनका अर्थ अलग-अलग होता है। सत्ता के पेट में दांत होते हैं। तो सत्ता नहीं, कभी-कभी सत्ता के औजार-उपकरण जिनके बल पर राज करती है, वे ही आपातकाल-सा व्यवहार कर मालिक की इच्छा की पूर्ति करते हैं। आज यही हो रहा है। इनमें से कुछ केवल भय पैदा करने का काम कर रहे हैं। इन्हें सत्ता का पूरा साथ मिला होता है। मजेदार बात यह कि अपने ही आर्थिक चरित्रवाली सत्ता को अपदस्थ कर उसकी कार्बन कापी ने सत्ता पाया और वही, उसी वर्ग चरित्र की सत्ता आपातकाल को याद कर लोगों को सावधान कर रही- यह राजनीति का चरित्र है। 25 जून को तो विपक्ष को चाहिए कि वह वर्तमान सत्ता के छिपे एजेंडा को उजागर करे- मतलब 25 जून को 'वायदा निभाओ दिवस के रूप में मनाना चाहिए। लेकिन विपक्ष केवल बिखरा हुआ ही नहीं है वरन दिशाहीन-कमजोर है। इतना लुंज-पुंज विपक्ष हमारे लोकतंत्र में पहले कभी नहीं रहा। विपक्ष को सुध नहीं कि करे तो क्या करें...। बहरहाल 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया। काफी समय बीत गया। उस पर लाठी पीटने से क्या हासिल होगा। आज जागरुक बनें और हमारे संत कवियों की इस वाणी को याद करें, उस पर अमल करें- भूत-भविष्य को छोड़ो रे भाई! वर्तमान को बरतो...। तो आज सत्ता के चरित्र को देखें और उसे बदलने आज पर ध्यान दें। 25 जून को वही घिसी-पीटी बातें, वैसे ही भाषण जिन्हें 35 सालों से सुनते आ रहे- इन्हें सुनते रहने से क्या समस्या हल होगी। सरकार जनता का ध्यान बांटने ऐसा करती है। मीडिया भी इस समय उसी का है। अत: इन्हें क्या सुनना। आज पर बोलो। मुक्तिबोध ने लिखा है- आज मैं तुमसे मुलाकात नहीं करुंगा क्योंकि तुम वही कहोगे जो मैं हजारों सालों से सुनता आया हूं।


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