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शब्द वर्षा से बीज नहीं उगते--प्रभाकर चौबे
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संसद का मानसून सत्र शुरु होने से एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री ने विपक्ष को नसीहत दी। उन्होंने गोरक्षा के नाम पर हिंसा पर नाराजगी जताई और राज्य सरकारों से ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने कहा। इस तरह उन्होंने मानसून सत्र से पूर्व सर्वदलीय बैठक में तीन पक्ष को एड्रेस किया- एक विपक्ष को, दूसरा राज्य सरकारों को और तीसरा गोरक्षा के नाम हिंसा करनेवालों को। इन तीनों 'पक्ष' पर बात की जानी चाहिए। लेकिन मीडिया ने उतनी चर्चा कराई नहीं। हम क्यों खामोश रहें। पहली बात को पहले लें या दूसरी बात को अथवा तीसरी बात को। चलिए उनकी पहले कथन को ही लेते हैं और बात करते हैं। विपक्ष से प्रधानमंत्री ने एक तरह से निवेदन किया। यद्यपि वह निर्देश जैसा कुछ लगा। उन्होंने कहा कि 'हर राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है कि अपने बीच मौजूद ऐसे नेताओं को पहचानें और उन्हें अपने दल की राजनीतिक यात्रा से दूर करते चलें।' यह संकेत बिहार के महागठबंधन के लिए था और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी था- लालू यादवजी को लेकर। उनका आशय यह था कि नीतीश कुमार जी अब लालूजी को जरा भी प्रश्रय न दें- सरकार में उनके दल की उपस्थिति को खारिज करें। लालूजी से दूरी बना लें। महागठबंधन को भी शायद संदेश था कि वह लालूजी से छुटकारा पाए। उन्होंने परोक्षरूप से विपक्ष से कहा कि विपक्ष भ्रष्ट नेताओं से दूर रहे। उन्होंने आप्त वचन भी बोले- 'भ्रष्ट गतिविधियों के कारण जनसेवा में लगे लोगों पर प्रश्नचिन्ह लगा है। इसे दुरुस्त करने सभी नेताओं को आगे आना होगा। इस नसीहत में एक शब्द है 'जनसेवा'- वैसे जनसेवा में लगा कोई भी व्यक्ति भ्रष्ट गतिविधियों में नहीं लगा रहता-महात्मा गांधी विनोबा भावे क्या जनसेवा में नहीं लगे थे? और क्या केवल राजनीति में जो हैं वे ही जनसेवा में लगे होते हैं? दूसरी बात राजनेता किस तरह सुधार देंगे जबकि राजनेता इस भ्रष्ट राजनीति के अंदर ही खेलते हैं। राजनीतिक खेल में राजनीति ही नियम तय करती है। किसी उपदेश से राजनीति अपना रास्ता, अपने नियम नहीं बदल देती। भाजपा में वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी 'शुचिता' बोलते-बोलते थक गए। बहरहाल भाजपा की नजर बिहार पर लगी है। यूपी जीत लिया, अब बिहार जीतना है और बिहार की जीत में लालूजी का खुटका है- लालूजी भाजपा को मैदान मारने नहीं देंगे, यह भाजपा को पता है। अपने सेक्युलर स्टैण्ड पर लालूजी डटे हुए हैं चट्टान की तरह। पूरी प्रतिबद्धता के साथ। बिहार में नीतीशजी नहीं लालूजी चुनौती हैं। आडवानी जी का रथ भी लालू जी ने ही रोका था। संसद के मानसून सत्र के पूर्व किसी प्रदेश की राजनीति पर प्रधानमंमत्री को कटाक्ष करने की क्या जरूरत आन पड़ी। अपने को संसद के कामकाज तो वक्तव्य उपयोगी होता। लेकिन प्रधानमंत्री मोदीजी क्या करें- 'कटाक्ष' से उबर नहीं पा रहे। वैसे विपक्ष को शुचिता की नसीहत देते समय खुद की पार्टी के अंदर भी झांक लेना चाहिए। केवल विपक्ष ही भ्रष्ट है, विपक्ष ही भ्रष्ट आचरण को प्रश्रय दे रहा- यह तो आरोप हुआ। भाजपा ने अभी तक दिगर पार्टी से अपने दल में लिए शायद ठोक बजाकर लिया हो। इस बात को यहीं छोड़ें। भ्रष्टाचार पर बात करना अनंत कथा की तरह है। एक के बाद एक परतें खुलती जाएंगी। उधर से एक मामला उठाया जाएगा तो इधर से तीन मामले सामने रख दिए जाएंगे। तो अब प्रधानमंत्री के दूसरे कथन पर गौर किया जाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि 'गाय के नाम पर हिंसा बरदास्त नहीं होगी।' प्रधानमंत्री इस हिंसा से काफी व्यथित हैं तभी तो गाय के नाम पर हिंसा करने वालों को 'तीसरी बार' हड़काया। तीसरी बार गुस्सा दिखा चुके। लेकिन हिंसा हो ही रही है। अब क्या करें।गाय के नाम पर मारपीट करने हिंसक वारदात करने वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा। रह-रहकर हिंसक घटनाएं हो रहीं और देश कांप रहा। ये क्या हो रहा है। गाय की रक्षा करना सबका कर्तव्य है। लेकिन कोई इसका उल्लंघन करे तो कानून है, पुलिस है, कोर्ट है- वहां जाएं। नियमानुसार कार्रवाई होने दें। पुलिस को शिकायत करें। पुलिस को सौंपें। लेकिन ये क्या कि जगह-जगह कानून हाथ में लिया जा रहा है और सरकार केवल वचनों से उन्हें नसीहत दे रही है। वचनों की वर्षा से बीज अंकुरित नहीं होते। कड़े कानून किताब की शोभा ही बढ़ाते हैं अगर लागू करने वाले ढीले-पोले हों या पक्षपात करने वाले हों। कानून नदी की तरह है, पानी लेने नदी तक जाना होता है, नदी चलकर आंगन में नहीं आ जाती। लेकिन गाय के नाम पर हिंसा को लेकर कड़ी कार्रवाई की बातें भर की जा रही हैं। दरअसल जब वोट की राजनीति का सवाल खड़ा होता है तब राजनीति में कार्रवाई के अर्थ बदलते चलते हैं। एक बात तो यह है कि आवाम को डराकर रखने की नीति जब सरकार की हो तो कई तरह से भय का वातावरण पैदा किया जाता है। जरा भी विरोध हो तो उस पर सरकार और उसके समर्थक टूट पड़ें। असहिष्णुता की बात की जाए तो ऐसा कहने वालों के खिलाफ जुलूस निकाला जाए और उन्हें सहिष्णुता का अर्थ समझाया जाए। आवाम को डराकर रखने के कई तरीके सत्ता के पास हैं। जरूरी नहीं कि सरकारी डंडे का ही प्रयोग हो। निजी डंडे भी मुहैया करा दिए जाते हैं। जब सरकारें फेल होने लगती है तो अपनी असफलता छिपाने कई चोंचले करती हैं और जनता को भरमाकर रखती हैं- इसमें धन और प्रचारतंत्र का बड़ा सहयोग मिलता है। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से कानून अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ 'बेहद सख्त' कार्रवाई करने कहा। ठीक कहा। कानून व्यवस्था तो राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र की बात है। राज्य सरकारें सख्त कार्रवाई करें। कर रही है क्या। सब सामने है। मतलब यह भी लगाया जा सकता है-'उनका काम है कहना, कहते रहें कहते रहे हैं, कहते रहेंगे।' राज्य सरकारें अपने-अपने हित को ध्यान में रखकर काम करेंगी। किसी भी विचार को दबाने की कोशिश किसी भी रूप में न हो। बहस और विमर्श को पूरी आजादी हो। अपने विचार किसी पर लादने की हिंसक कोशिश करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए। लोकतंत्र व्यक्ति को फलने-फूलने, खिलने-सुगंध बिखेरने का शानदार अवसर देता है। लेकिन बुर्जुआ लोकतंत्र धन बल और बाहुबल तथा हर तरह के बल पर अपनी व्यवस्था स्थापित करने की जुगत करता है। बुर्जुआ लोकतंत्र अपने प्रचारतंत्र से एक 'माया नगरी' रचता है। माया नगरी जनता को मोहती है। इस माया नगरी के तामझाम से जनता मोहित हो जाती है- नशे की स्थिति में आ जाती है। उसे माया नगरी वास्तविक नगरी लगती है। वह वहां उपलब्ध हर चीज का उपयोग-उपभोग करने दौड़ती है- जनता जब मोहभंग की स्थिति तक पहुंचने इससे पूर्व सत्ता और मोह माया रचती जाती है, पैदा करती है। यही हो रहा है। आज जनता को भ्रम में रखने नये-नये मुहावरे भी गढ़े जा रहे हैं। नये-नये फार्मूला ईजाद किए जा रहे हैं और ईजाद करने के काम में विशेषज्ञ लगा रखे हैं। देश इस समय बहुत ही भयावह व संकट की स्थिति से गुजर रहा है। कई तरह के संकट। सच बोलना भी संकट बन गया है। सच पर पहरेदार बिठा दिए गए हैं। किसी भी तरह के सच पर किधर से हमला कर दिया जाए कहा नहीं जा सकता-इस समय जो साथ हैं, वे सुखी हैं। जो सवाल उठा रहे हैं वे कटघरे में खड़े कर दिए गए हैं। न्यूज चैनल्स पर सच बोलने लावे प्रवक्ता, वार्ताकार की ऐसी घेरेबंदी कर दी जाती है कि उसकी आवाज ही दब जाती है और श्रोता सुन भी नहीं पाते कि बात किस मोड़ पर आ गई है- न्यूज चैनल ही पार्टी बन रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के बयान केवल बयान बनकर रह जाते हैं। इस समय रोजी-रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन मूल समस्याएं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं निजी हाथों में जा रही हैं- सरकारी संस्थाएं कमजोर की जा रही हैं। इसमें बड़े-बड़े लोगों के हित हैं- उनके हित पूरे किए जा रहे। अत: आज इन पर बात न हो इसलिए इतर विषय उठाए जा रहे हैं। महंगी होती जा रही शिक्षा पर बात तक नहीं की जा जाती-न्यूज चैनल्स इसे छूते तक नहीं कि शिक्षकों के कितने पद रिक्त हैं कि प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की क्या स्थिति है। शिक्षक तथा संसाधनों की कितनी कमी है। मातृ भाषाओं के विद्यालय 'गरीबी रेखा' के नीचे पहुंचा दिए गए हैं। कितने आश्चर्य व पीड़ादायक स्थिति है कि रिजर्व बैंक में नौ माह से 'कितने नोट आए' इसकी गिनती ही चल रही है। आज 9 माह बीतने के बाद भी रिजर्व बैंक यह बताने की स्थिति में नहीं है, कि कितने नोट आए। हो सकता हो बताना न चाहता हो, कोई राज छिपा हो। जनता को पता तो चले। क्या मामला है। पारदर्शिता की बातें सब करते हैं। लेकिन राजनीति उतना ही दिखाती है जितना 'उसके हित' में हो। ctc- dehbnhu


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