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जो खुद कठघरे में हो-- विनीत कुमार
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सोलह दिसंबर की रात दिल्ली में चलती बस में तेईस साल की एक मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना को लेकर अगले चौबीस घंटे के भीतर देश के तमाम राष्ट्रीय समाचार चैनल देखते-देखते कठघरे और प्रदर्शन स्थल में तब्दील हो गए। एक तरफ इस कठघरे में दिल्ली पुलिस और सरकार को बारी-बारी से खड़ी करने की कवायदें शुरू हुर्इं वहीं दर्जनों छात्र और स्वयंसेवी संगठनों के लिए टीवी स्क्रीन धरना-प्रदर्शन स्थल में बदल गया! धूमिल के रचना-शीर्षक संसद से सड़क तक में फांसी, फांसी सिर्फ फांसी जोड़ कर चैनलों ने प्रसारित किया कि इस घटना के विरोध में 19 दिसंबर को इंडिया गेट पर जो कैंडल मार्च हुआ, लोग अपराधियों के लिए फांसी से कम की सजा नहीं चाहते। एक के बाद एक चैनल दर्शकों को शपथ दिलाने में जुट गए कि हम कसम खाते हैं कि इस घटना से मुंह नहीं मोड़ेंगे। टीवी स्क्रीन को छह-आठ विंडो में काटा गया और बताया गया कि पूरा देश इस घटना को लेकर गुस्से में है और फांसी की मांग कर रहा है। कुल मिलाकर समाचार चैनल इस घटना को लेकर उसी भूमिका में नजर आए जैसे अप्रैल, 2010 में भ्रष्टाचार के विरोध में शुरू हुए अण्णा आंदोलन के समय आए थे। इस घटना की जितनी भर्त्सना की जाए कम है। मीडिया ने जो सवाल खड़े किए हैं, उनका लगातार बने रहना जरूरी है। समाज में एक ऐसे दबाव की जरूरत है, जो ऐसी घटनाओं के दोहराव पर लगाम लगा सके। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या मीडिया अपने रोजमर्रा की गतिविधियों में ऐसा दवाब बनाने में सक्रिय है? दूसरा कि हर ऐसी घटना के बाद उसकी सक्रियता पत्रकारिता से कहीं ज्यादा चैरिटी और सोशल एक्टिविज्म पर ज्यादा नजर आती है। क्या वह कॉरपोरेट गवर्नेंस से अलग है? इन सवालों से गुजरे बिना ऐसे मौके पर मीडिया की तत्परता, आक्रामकता और सरोकार को सही अर्थों में नहीं समझा जा सकता। सोलह दिसंबर की घटना को लेकर जब परिचर्चा, विरोध-प्रदर्शन की लाइव कवरेज, यौन उत्पीड़न और स्त्री हिंसा के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे और अपराधियों के लिए फांसी की सजा की मांग से जुड़ी खबरें प्रसारित की जा रही थीं, उसी बीच लगातार चुलबुल पांडे नाम के सिनेमाई चरित्र का महिमामंडन (प्रोमोशन) जारी था। सामूहिक बलात्कार की दर्दनाक घटना से जुड़ी खबर और परिचर्चा के बीच लौंडिया पटाएंगे मिस्ड कॉल से प्रसारित करना कम अश्लील और दुर्भाग्यपूर्ण नहीं था। दबंग-2 ने विज्ञापन के लिए छांट-छांट कर सिनेमा के जो संवाद और फुटेज समाचार चैनलों को दिया, उन पर गौर करें तो एक परस्पर विरोधी सांस्कृतिक पाठ नजर आता है। वह प्रस्तावित करता है कि समाज में स्त्री देह इतनी सस्ती और सुलभ है कि मिस्ड कॉल भर से हासिल की जा सकती है। समाज में स्त्रियां कितनी सुरक्षित हैं पर बहस के लिए चैनल ऐसे ही सिनेमा से आॅक्सीजन ग्रहण कर रहे थे, जो खबरों और परिचर्चा के बीच लगातार हावी होने की कोशिश कर रहे थे। इतना ही नहीं, एक चैनल ने जिस स्पेशल स्टोरी रात में डराती है दिल्ली के लिए घटना के कुछ घंटे बाद दस महिला संवाददाताओं को दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में भेजा और यह स्थापित करने की कोशिश की कि इस मसले पर महिला संवाददाता ज्यादा संवेदनशील तरीके से बात कर सकती हैं, इस स्टोरी के बीच चार स्त्री विज्ञापन लगातार प्रसारित किए। पहला, बॉडी स्प्रे का, जिसमें लड़की आसमान से गिरती है, दूसरा कंडोम का, तीसरा नेहा स्वाहा, स्नेहा स्वाहा और चौथा प्रेग्नेंसी चेक करने वाली मशीन का। इन विज्ञापनों के प्रसारण पर सवाल उठाने पर संभव है, संपादकीय डेस्क का यह तर्क हो कि चैनल की सामग्री और विज्ञापन दो अलग-अलग मुद्दे हैं और इन्हें एक-दूसरे से मिलाया नहीं जा सकता। दूसरा कि यह सब मार्केटिंग टीम पहले से तय कर देती है और सामग्री तय करने वाले लोग इसमें कुछ नहीं कर सकते। विज्ञापन क्या, यह भी कुरूप सच है कि व्यावसायिकता के दबाव में ऐसी सामग्री तक में बदलाव नहीं किया जा सकता। तभी जिस आजतक ने 9 बज कर 24 मिनट (3 दिसंबर, 2010) पर मीडिया की लक्ष्मण रेखा पर स्पेशल स्टोरी की, अगले पांच मिनट में उसकी स्टोरी थी- मैं मुन्नी नहीं बनूंगी। इस स्टोरी में स्त्रियां आइटम गर्ल हो गई थीं और उनके रेटकार्ड जारी किए जाने लगे थे। क्या इससे दर्शकों में यह संदेश नहीं जाता कि स्त्री देह हासिल करना और उसे रौंदना बहुत मुश्किल नहीं है? एक चैनल जिस तारीख को दबंग-2 देखने और फिर उसी दिन स्त्री हिंसा के खिलाफ इंडिया गेट पर भी आने की अपील कर रहा है, दर्शक के सामने सवाल है कि वह इसे किस तरह ले? चैनल एक ही समय सौ-सवा सौ रुपए का थर्मोकॉट बेचने के लिए नेहा, स्नेहा जैसी छह लड़कियों के लिए स्वाहा शब्द वाला विज्ञापन प्रसारित कर रहा है और ऐसे ही स्त्री-विरोधी विज्ञापनों के अंत:पुर में बैठ कर स्त्री हिंसा के खिलाफ माहौल बनाने की कवायदें कर रहा है, यह दर्शकों पर कैसा असर छोड़ेगा? इधर पत्रकारिता से अलग हट कर सोशल एक्टिविज्म पर बात करें तो सवाल है कि वह कितना विश्वसनीय है? ताजा उदाहरण गुवाहाटी यौन उत्पीड़न मामले में 7 दिसंबर को आए फैसले का लें। 9 जुलाई को गुवाहाटी में बीस साल की छात्रा के साथ संस्कृति रक्षा के नाम पर दर्जनों लोगों के बीच उत्पीड़न हुआ था। इसके लिए भीड़ को उकसाने के आरोप में न्यूजलाइन चैनल के संवाददाता गौरव ज्योति नियोग को गिरफ्तार भी किया गया। 17 जुलाई को बीइए ने तीन सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की और इस पर जल्द ही जांच रिपोर्ट जारी करने की बात कही। 7 दिसंबर को गुवाहाटी की निचली अदालत ने कुल सोलह में से ग्यारह आरोपियों को तीन साल की कैद और तीन हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई, जबकि सबूत के अभाव में संवाददाता गौरव ज्योति को बरी कर दिया। लेकिन इस संबंध में बीइए की तरफ से अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं आई है। गौरव ज्योति ने इस यौन उत्पीड़न की वीडियो शूट की थी, उसे देश के सभी प्रमुख चैनलों ने दिखाया। क्या घटना के छह महीने बाद भी बीइए इस संवाददाता को लेकर कोई ऐसी रिपोर्ट या निर्देश जारी करने की स्थिति में है, जिससे कि यकीन हो सके कि मीडिया स्त्री हिंसा और यौन उत्पीड़न को लेकर वाकई संवेदनशील है। और फिर यह सिर्फ मीडिया के सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में विश्वसनीय होने का मामला नहीं है। खुद उस पर लगातार लगे आरोपों और उसके भीतर मौजूद दर्जनों आरोपियों के खिलाफ खड़े होने का भी है, जिन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं, मगर वे मीडिया के धंधे में न केवल बने हुए, बल्कि तरक्की भी पा रहे हैं। ऐसे में मीडिया अपनी व्यावसायिक रणनीति के तहत कुछ घंटे के लिए टीवी स्क्रीन को जनाना डब्बे में तब्दील कर दे (स्त्री संवाददाता और विशेषज्ञों को शामिल करके) और पीड़िता के पक्ष में सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में उतर आए, लेकिन इन दोनों ही स्थितियों में ये सवाल उसका पीछा करेंगे कि वह खुद उन मुद्दों को लेकर कितना संवेदनशील है? अगर दिल्ली में स्त्रियां सुरक्षित नहीं हैं तो क्या छाती ठोंक कर मीडिया दावा कर सकता है कि वारदात, जुर्म, सनसनी और एसीपी अर्जुन की टीम रहते उसके लिए काम करने वाली स्त्रियां सिर्फ टीआरपी की कठपुतलियां नहीं हैं। उन्हें वे सब अधिकार हासिल हैं, जिनकी मांग के लिए वह इंडिया गेट और जंतर मंतर पर उतरा है। यह ज्यादा बड़ा सवाल है, जिसके जवाब के लिए मीडिया को शायद आत्महंता बनने तक की स्थिति पैदा हो जाए और उसे अपने कठघरे का आकार थोड़ा बढ़ाना पड़ जाए। क्या वह ऐसा करने के लिए तैयार है? सौ.जनसत्ता


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