- राजनीती
- व्यापार
- महिला जगत
- बाल जगत
- छत्तीसगढ़ी फिल्म
- लोक कल
- हेल्पलाइन
- स्वास्थ
- सौंदर्य
- व्यंजन
- ज्योतिष
- यात्रा

ब्रेकिंग न्यूज़ :

नोटबंदी पर देश कहां जा रहा, मोदी भी नहीं जानते : अमेरिकी अर्थशास्‍त्री सत्ता के खेल में वतन की आबरू पर हमले- आलोक मेहता शहीद लेखकों के गृह नगरों के भ्रमण पर हिंदी लेखक अमेरिकी वित्तीय पूंजीपतियों की सलाह पर मोदी जी ने नोटबंदी का अपराध किया --अरुण माहेश्वरी भारतीय तबला वादक संदीप दास ने जीता ग्रैमी अवॉर्ड क्‍लॉड ईथरली--- गजानन माधव मुक्तिबोध Trump, Modi and a Shaft of Worrying Similarities मधुबनी पेंटिंग की जादूगर :बौआ देवी | चुनाव घोषणापत्र या प्रलोभन पत्र- प्रभाकर चौबे | विमर्श सिद्धांतों की व्यर्थता--- हरिशंकर परसाई विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ निकले लोगों और पहले से बाहर लोगों ने जनमोर्चा बनाया था। ये लोग आदर्शवाद के मूड के थे। विश्वनाथ प्रताप को आदर्शवाद का नशा आ गया था। मोर्चे के नेता की हैसियत से उन्होंने घोषणा की ------------- | तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे--- तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने १४ जनवरी को फेसबुक पर लिखा, लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया.वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. ------------------ | अध्यादेश सरकार---प्रभाकर चौबे---- कार्पोरेट पूरा परिवेश अपने हित में चाहता है। वह दिखाता है कि वह लोकतंत्र की मजबूती का पक्षधर है---------------- | ग्वालियर के दिग्गज लक्ष्मण पंडित हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ग्वालियर घराना अन्य सभी घरानों की गंगोत्री माना जाता है. इस घराने की गायनशैली की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हद्दू खां, हस्सू खां और नत्थू खां नाम के तीन भाइयों ने की थी.इनके शिष्य शंकर पंडित और उनके पुत्र कृष्णराव शंकर पंडित अपने समय के दिग्गज गायकों में थे. कृष्णराव शंकर पंडित के पुत्र लक्ष्मण कृष्णराव पंडित ने भी अपने पिता और दादा की तरह गायन के क्षेत्र में खूब नाम कमाया.......... | लंदन में नाटकघरों का सुनहरा युग देश के लीग फुटबॉल से तुलना की जाए तो लंदन के थियेटर हॉल में नाटक देखने ज्यादा लोग आते हैं.सोसाइटी ऑफ लंदन थियेटर एंड नेशनल थियेटर की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय ब्रिटेन में थियेटर का स्वर्णयुग चल रहा है.......... | अपनी भाषा से उदासीनता नहीं: ओरसिनी More Sharing ServicesShare | Share on facebook Share on myspace Share on google Share on twitter फ्रांचेस्का ओरसिनी इटली की हैं और हिन्दी भाषा और समाज की गंभीर अध्येता हैं. उनका कहना है कि भूमंडलीकरण के बावजूद अपनी भाषा से उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए.फ्रांचेस्का ओरसिनी अपनी मातृभाषा इटैलियन के अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और जर्मन बहुत अच्छी तरह जानती हैं. | मध्यपूर्व पर बदलता भारतीय रुख भारत ने रूस, ब्राजील, दक्षिणी अफ्रीका और चीन के साथ मिल कर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पेश फलिस्तीनी प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि यूरोपीय देशों ने वोट में हिस्सा नहीं लिया और अमेरिका ने उसके खिलाफ वोट डाला......... | इज़राइल की बर्बरता के खिलाफ़ आवाज़ उठाना क्यों ज़रूरी है? -- क्योंकि अंधराष्ट्र वादी विचारों ने इनकी मानवीय संवेदनाओं को बहुत गहरी नींद में सुला दिया है. जो लोग इस बेहूदे तर्क की आड़ लेकर इस नरसंहार को न्याय-संगत ठहरा रहे हैं कि इज़राइल यह सबकुछ आत्मरक्षा में कर रहा है....... |

होम
प्रमुख खबरे
छत्तीसगढ़
संपादकीय
लेख  
विमर्श  
कहानी  
कविता  
रंगमंच  
मनोरंजन  
खेल  
युवा
समाज
विज्ञान
कृषि 
पर्यावरण
शिक्षा
टेकनोलाजी 
नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादियों ताक़तों को अलग-थलग करना होगा
Share |

त्रिपुरा के प्रियजनों, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सबका अभिनंदन और सबको शुभकामनाएं । मैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों की अमर स्मृतियों को श्रद्धांजलि देता हूँ । उन स्वतंत्रता सेनानियों में जो आज भीहमारे बीच मौजूद हैं उन सबके प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ । स्वतंत्रता दिवस को मनाना कोई आनुष्ठानिक काम भर नहीं है । इसके ऐतिहासिक महत्व और इस दिन के साथ जुड़ी भारतवासियों की गहरी भावनाओं के चलते इसे राष्ट्रीय आत्म - निरीक्षण के एक महत्वपूर्ण उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए । इस स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर हमारे सामने कुछ अत्यंत प्रासंगिक, महत्वपूर्ण और समसामयिक प्रश्न उपस्थित हैं । विविधता में एकता भारत की परंपरागत विरासत है । धर्म निरपेक्षता के महान मूल्यों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट बनाये रखा है । लेकिन आज धर्म-निरपेक्षता की इसी भावना पर आघात किये जा रहे हैं । हमारे समाज में अवांछित जटिलताएँ और दरारें पैदा करने के षड़यंत्र और प्रयत्न किये जा रहे हैं; धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर, भारत को एक खास धर्म पर आधारित देश में बदलने तथा गाय की रक्षा के नाम पर उत्तेजना फैला कर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर हमला किया जा रहा है । इनके कारण अल्प-संख्यक और दलित समुदाय के लोगों पर भारी हमले हो रहे हैं । उनके बीच सुरक्षा का भाव ख़त्म हो रहा है । उनके जीवन में भारी कष्ट हैं । इन नापाक रुझानों को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है, न बर्दाश्त किया जा सकता है । ये विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के उद्देश्यों,स्वप्नों और आदर्शों के विरुद्ध हैं । जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, उल्टे उसमें भीतरघात किया, जो अत्याचारी और निर्दयी अंग्रेज़ लुटेरों के सहयोगी थे और राष्ट्र-विरोधी ताक़तों से मिले हुए थे, उनके अनुयायी अभी विभिन्न नामों और रंगों की ओट में भारत की एकता और अखंडता पर चोट कर रहे हैं ।प्रत्येक वफ़ादार और देशभक्त भारतवासी के आज एकजुट भारत के लिये और इन विध्वंसक साज़िशों और हमलों को परस्त करने के लिये शपथ लेनी चाहिए । हम सबको मिल कर संयुक्त रूप में अल्प-संख्यकों, दलितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने और देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने की कोशिश करनी चाहिए । आज ग़रीबों और अमीरों के बीच का फर्क तेज़ी से बढ़ रहा है । मुट्ठी भर लोगों के हाथ में राष्ट्र के विशाल संसाधान और संपदा सिमट रहे हैं । आबादी का विशाल हिस्सा ग़रीब है । ये लोग अमानवीय शोषण के शिकार हैं । उनके पास न भोजन है, न घर, न कपड़ें, न शिक्षा, न चिकित्सा और न निश्चित आय के रोजगार की सुरक्षा । यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विपरीत है । इन परिस्थितियों के लिये हमारी आज की राष्ट्रीय नीतियाँ सीधे ज़िम्मेदार हैं । इन जन-विरोधी नीतियों को ख़त्म करना होगा । लेकिन यह काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता । इसके लिये वंचित और पीड़ित जनों को जागना होगा, आवाज उठानी होगी, और निर्भय हो कर सामूहिक रूप से बिना थके प्रतिवाद करना होगा । हमारे पास निश्चित तौर पर ऐसी वैकल्पक नीति होनी चाहिए जो भारत के अधिकांश लोगों के हितों की सेवा कर सके । इस वैकल्पिक नीति को रूपायित करने के लिये वंचित, पीड़ित भारतवासियों को इस स्वतंत्रता दिवस पर एकजुट होकर एक व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन शुरू करने की प्रतिज्ञा करनी होगी । बेरोज़गारी की बढ़ती हुई समस्या ने हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में निराशा और हताशा के भाव को पैदा किया है । एक ओर लाखों लोग अपना रोजगार गँवा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों बेरोज़गार नौजवान काम की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके लिये मृग मरीचिका की तरह है । राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बिना बदले इस विकराल समस्या का समाधान संभव नहीं है । यह नीति मुट्ठी भर मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट के स्वार्थ को साधती है । भारत की आम जनता की क्रय शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हो रही है । इसीलिये इस स्वतंत्रता दिवस पर छात्रों, नौजवानों और मेहनतकशों को इन विनाशकारी नीतियों को बदलने के लिये सामूहिक और लगातार आंदोलन छेड़ने का प्रण करना होगा । केंद्र की सरकार की जन-विरोधी नीतियों की तुलना में त्रिपुरा की सरकार अपनी सीमाओं के बावजूद दबे-कुचले लोगों के उत्थान पर विशेष ध्यान देते हुए सभी लोगों के कल्याण की नीतियों पर चल रही है । यह एक पूरी तरह से भिन्न और वैकल्पिक रास्ता है । इस रास्ते ने न सिर्फ त्रिपुरा की जनता को आकर्षित किया है बल्कि देश भर के दबे हुए लोगों में सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है । त्रिपुरा में प्रतिक्रियावादी ताकतों को यह सहन नहीं हो रहा है । इसीलिये शांति, भाईचारे और राज्य की अखंडता को प्रभावित करने के लिये जनता के दुश्मन एक के बाद एक साज़िशें रच रहे हैं । विकास के कामों को बाधित करने की भी कोशिश चल रही है । इन नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादियों ताक़तों को अलग-थलग करना होगा । इसी पृष्ठभूमि में, स्वतंत्रता दिवस पर, त्रिपुरा के सभी शुभ बुद्धिसंपन्न, शांतिप्रिय और विकासकामी लोगों को इन विभाजनकारी ताक़तों के खिलाफ आगे आने और एकजुट होकर काम करने का संकल्प लेना होगा । अनुवादःअरुण माहेश्वरी


Send Your Comment
Your Article:
Your Name:
Your Email:
Your Comment:
Send Comment:

Top Stories

नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादियों ताक़तों को अलग-थलग करना होगा
सेक्सिस्ट बयानों और ट्रोलिंग के खिलाफ आगे आये लेखक: जारी किया वक्तव्य
प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर का आयोजन : प्रेमचंद आज ज्यादा प्रासंगिक हैं - तेजिन्दर
भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद पर जानलेवा हमला
पिछले 3 साल में 41 फीसदी बढ़े धार्मिक और नस्लीय घृणा के अपराध