- राजनीती
- व्यापार
- महिला जगत
- बाल जगत
- छत्तीसगढ़ी फिल्म
- लोक कल
- हेल्पलाइन
- स्वास्थ
- सौंदर्य
- व्यंजन
- ज्योतिष
- यात्रा

ब्रेकिंग न्यूज़ :

रायपुर - स्मृतियों के झरोखे से -1 - प्रभाकर चौबे ..कुछ नहीं मालूम दिल्ली-- पी चितंबरम.बुद्धिजीवियों ने किया हांसदा की किताब पर प्रतिबंध का विरोध..नफ़रत के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ की आवाज : *बहुरंगी भारत* द्वारा मौन प्रदर्शन का आयोजन..जब देश का प्रधानमंत्री ही गाली-गलौज करने वालों को फॉलो करेगा तो उन पर लगाम कौन लगाएगा..जहाँ लक्ष्मी कैद है --- राजेंद्र यादव मुक्तिबोध ः पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान -जीवेश प्रभाकर---जब पहली बार खेला गया 'जिस लाहौर... | नोटबंदी पर देश कहां जा रहा, मोदी भी नहीं जानते : अमेरिकी अर्थशास्‍त्री सत्ता के खेल में वतन की आबरू पर हमले- आलोक मेहता शहीद लेखकों के गृह नगरों के भ्रमण पर हिंदी लेखक अमेरिकी वित्तीय पूंजीपतियों की सलाह पर मोदी जी ने नोटबंदी का अपराध किया --अरुण माहेश्वरी भारतीय तबला वादक संदीप दास ने जीता ग्रैमी अवॉर्ड क्‍लॉड ईथरली--- गजानन माधव मुक्तिबोध Trump, Modi and a Shaft of Worrying Similarities मधुबनी पेंटिंग की जादूगर :बौआ देवी | चुनाव घोषणापत्र या प्रलोभन पत्र- प्रभाकर चौबे | विमर्श सिद्धांतों की व्यर्थता--- हरिशंकर परसाई विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ निकले लोगों और पहले से बाहर लोगों ने जनमोर्चा बनाया था। ये लोग आदर्शवाद के मूड के थे। विश्वनाथ प्रताप को आदर्शवाद का नशा आ गया था। मोर्चे के नेता की हैसियत से उन्होंने घोषणा की ------------- | तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन पुनरुज्जीवित होंगे--- तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने १४ जनवरी को फेसबुक पर लिखा, लेखक पेरूमल मुरुगन मर गया.वह भगवान नहीं है, लिहाजा वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता. ------------------ | अध्यादेश सरकार---प्रभाकर चौबे---- कार्पोरेट पूरा परिवेश अपने हित में चाहता है। वह दिखाता है कि वह लोकतंत्र की मजबूती का पक्षधर है---------------- | ग्वालियर के दिग्गज लक्ष्मण पंडित हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ग्वालियर घराना अन्य सभी घरानों की गंगोत्री माना जाता है. इस घराने की गायनशैली की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हद्दू खां, हस्सू खां और नत्थू खां नाम के तीन भाइयों ने की थी.इनके शिष्य शंकर पंडित और उनके पुत्र कृष्णराव शंकर पंडित अपने समय के दिग्गज गायकों में थे. कृष्णराव शंकर पंडित के पुत्र लक्ष्मण कृष्णराव पंडित ने भी अपने पिता और दादा की तरह गायन के क्षेत्र में खूब नाम कमाया.......... | लंदन में नाटकघरों का सुनहरा युग देश के लीग फुटबॉल से तुलना की जाए तो लंदन के थियेटर हॉल में नाटक देखने ज्यादा लोग आते हैं.सोसाइटी ऑफ लंदन थियेटर एंड नेशनल थियेटर की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय ब्रिटेन में थियेटर का स्वर्णयुग चल रहा है.......... | अपनी भाषा से उदासीनता नहीं: ओरसिनी More Sharing ServicesShare | Share on facebook Share on myspace Share on google Share on twitter फ्रांचेस्का ओरसिनी इटली की हैं और हिन्दी भाषा और समाज की गंभीर अध्येता हैं. उनका कहना है कि भूमंडलीकरण के बावजूद अपनी भाषा से उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए.फ्रांचेस्का ओरसिनी अपनी मातृभाषा इटैलियन के अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और जर्मन बहुत अच्छी तरह जानती हैं. | मध्यपूर्व पर बदलता भारतीय रुख भारत ने रूस, ब्राजील, दक्षिणी अफ्रीका और चीन के साथ मिल कर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पेश फलिस्तीनी प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि यूरोपीय देशों ने वोट में हिस्सा नहीं लिया और अमेरिका ने उसके खिलाफ वोट डाला......... |

होम
प्रमुख खबरे
छत्तीसगढ़
संपादकीय
लेख  
विमर्श  
कहानी  
कविता  
रंगमंच  
मनोरंजन  
खेल  
युवा
समाज
विज्ञान
कृषि 
पर्यावरण
शिक्षा
टेकनोलाजी 
कर्जदार होती बेरोजगार पीढ़ी
Share |

नौकरियों का संकट बढ़ा तो एजुकेशन लोन बनाने लगा छात्रों को डिफॉल्टर, तीन साल में 51 फीसदी तक बढ़ गया एनपीए, अभिभावक और छात्र करने लगे कर्ज लेने से तौबा, लिहाजा देश के युवाओं को उच्च शिक्षा के प्रति आकर्षित करके बेहतर जिंदगी का सपना दिखाने के लिए धूम-धड़ाके से प्रचारित योजना सरकारी अदूरदर्शिता और कामचलाऊ रवैए की भेंट चढ़ गई -कर्नाटक के आदर्श बीजी ने 2009-13 के सत्र में बीटेक किया। यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया से 3,86,000 रुपये का एजुकेशन लोन लिया। सितंबर 2014 में जब नौकरी मिली तो कर्ज बढ़कर 5,65,000 रुपये हो चुका था। तनख्वाह 15 हजार रुपये थी और लोन का ईएमआइ 12 हजार रुपये। अब उसका नाम बैंक के डिफॉल्टरों की सूची में है। -झारखंड में धनबाद के कृष्‍णा चौधरी ने भारतीय स्टेट बैंक से तीन लाख रुपये का लोन लेकर 2014 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। दो साल तक नौकरी नहीं मिली। बकौल कृष्‍णा, बैंक ने पैसे के लिए इतना दबाव बनाया कि पिता ने खेत बेच कर लोन चुकाया। -बिहार में मधुबनी के अश्विनी कुमार ने पंजाब नेशनल बैंक से साढ़े तीन लाख रुपये का एजुकेशन लोन लेकर जयपुर के एक निजी संस्‍थान से 2010 में एमबीए किया। सालभर की बेरोजगारी के बाद पहली नौकरी दिल्ली में दस हजार रुपये की मिली। बकौल अश्विनी, इतने कम पैसे में गुजारा कर ईएमआइ देना मुश्किल था। सो, पिता ने किस्तें भरीं। लगातार सिकुड़ती नौकरियों के कारण समस्या विकराल है और ये तो महज कुछ मिसालें हैं। हाल तक बेहतर जिंदगी और युवा पीढ़ी को उच्च शिक्षा से हुनरमंद बनाने के लिए पारस पत्‍थर (जिससे लोहा भी सोना बन जाए) की तरह पेश की जा रही शिक्षा कर्ज की योजना औंधे मुंह गिरती जा रही है। यह न सिर्फ छात्रों और उनके परिवारों के लिए आफत बनती जा रही है, बल्कि सरकारी बैंकों के डूबत कर्ज या गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) में भारी इजाफा कर रही है। लिहाजा, शिक्षा कर्ज लेने की दर में भारी गिरावट आई है और बैंक भी कर्ज अदायगी में टालमटोल करने लगे हैं। इससे देश में उच्च शिक्षा का संकट और गहरा गया है। पहले आंकड़ों पर ही गौर करें। भारतीय बैंक संघ (आइबीए) के मुताबिक मार्च 2017 में एजुकेशन लोन के रूप में फंसा हुआ कर्ज (एनपीए) बढ़कर 5191.72 करोड़ रुपये हो गया था। एजुकेशन लोन के रूप में सरकारी बैंकों के कुल बकाया 67,678.50 करोड़ रुपये का यह 7.67 फीसदी है। 2014-17 के बीच एनपीए में लगभग 51 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2001 में शुरू की गई शिक्षा कर्ज देने की योजना लगभग डेढ़ दशक में ही लोगों पर बोझ बनने लगी तो इसकी वजह शिक्षा के साथ अर्थव्यवस्था का संकट और नौकरियों का अकाल है। जस्टजॉब्स नेटवर्क के वरिष्ठ सलाहकार और जेएनयू में अर्थशास्‍त्र के प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, यह तो होना ही था। पिछले चार-पांच साल में अर्थव्यवस्‍था में निजी निवेश दर 38 फीसदी से घटकर 29 फीसदी पर आ गई है। नौकरी बढ़ने की दर इतनी घट गई है कि 2011-12 और 2015-16 के बीच 15-29 वर्ष आयुवर्ग के युवाओं में कृषि को पेशा बताने वालों की संख्या करीब तीन करोड़ बढ़ गई। हालांकि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) के चेयरमैन अनिल सहस्रबुद्धे इसे कोई बड़ी समस्या नहीं मानते। वे कहते हैं, यह अस्थाई दौर है। दो साल में आइटी और इंजीनियरिंग में तेजी लौटेगी तो हालात सुधर जाएंगे। एनपीए बढ़ा, कर्ज लेने वाले घटे लेकिन संकट दोहरी मार कर रहा है कि शिक्षा कर्ज पर बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है, जबकि पिछले चार-पांच साल में कर्ज लेकर उच्च शिक्षा हासिल करने वालों की संख्या में कमी आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के मुताबिक, लोन की वृद्ध‌ि दर 2009-10 में 43.8 फीसदी से घटकर 2014-15 में 8.39 फीसदी और 2016 में तो शून्य से नीचे -0.05 पर पहुंच गई। आइबीए के आंकड़े बताते हैं कि 2013-14 में करीब 7.66 लाख छात्रों ने लोन लिया जो 2015-16 में घटकर 5.98 लाख हो गया। तथ्य यह भी है कि शिक्षा कर्ज लेने वालों की संख्या बहुत बड़ी कभी नहीं रही। 2014 में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों में करीब दस फीसदी ही एजुकेशन लोन ले पा रहे थे। 2011 में योजना आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2020 तक उच्च शिक्षा में दाखिले की दर 30 फीसदी तक पहुंचाने के लिए एजुकेशन लोन को कम से कम 20 फीसदी छात्रों की पहुंच में लाना जरूरी है। लेकिन बाद के वर्षों में कर्ज लेने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने के बजाय कम होती गई। हालांकि उच्च शिक्षा में दाखिले की दर नहीं घटी है। कम से कम सरकारी आंकड़े तो यही गवाही देते हैं। पांच जनवरी 2018 को जारी मानव संसाधन विकास मंत्रालय की अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे (एआइएसएचई) की रिपोर्ट के मुताबिक 18-23 अायु वर्ग में उच्च शिक्षा में दाखिले की दर 2016-17 में बढ़कर 25.2 फीसदी हो गई। 2010-11 में यह 19.4 फीसदी थी। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 30 फीसदी दाखिला दर 2022 तक हासिल करने की उम्मीद जताई। ये आंकड़े ही नहीं, शिक्षा का बढ़ता बाजार भी कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश करता है। केंद्रीय वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय से जुड़े ट्रस्ट इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की दिसंबर 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 2016 में शिक्षा उद्योग 97.8 अरब डॉलर का था, जिसके 2020 में बढ़कर 144 अरब डॉलर हो जाने का अनुमान है। मतलब यह कि उच्च शिक्षा पाने की ललक कम नहीं हुई है। ज्यादा से ज्यादा लोग अपने बच्चों को अधिक से अधिक शिक्षित करके बेहतर जिंदगी की उम्मीद करते हैं। यानी संकट कहीं और है। संकट देश में औद्योगिक और अर्थव्यवस्‍था की नाकामी से जुड़ा है। अगर कई उच्च शिक्षण संस्‍थान बंद हो रहे हैं तो उसकी भी वजहें कुछ और हैं, जो सरकारी योजनाओं और सरकारों के कामचलाऊ और अदूरदर्शी रवैए से जुड़ी हैं। तो, क्या कर्ज चुकाने में नाकाम छात्र शिक्षा क्षेत्र से जुड़े एक गहरे संकट की मार झेल रहे हैं? दरअसल यही हो रहा है। आइए देखें, शिक्षा कर्ज और शिक्षण संस्‍थाओं के संकट की वजहें क्या हैं? कैसे पैदा हुए ये हालात एजुकेशन लोन लेने वालों की संख्या में कमी और बढ़ते एनपीए का सबसे बड़ा कारण ‌‌इंजी‌नियरिंग और मैनेजमेंट डिग्रीधारकों की बेरोजगारी है। लोन नहीं चुकाने वाले ज्यादातर छात्रों ने इंजी‌नियरिंग या मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। पढ़ाई खत्म होने के बाद नौकरी नहीं मिलने या बेहद मामूली तनख्वाह की नौकरी के कारण वे ईएमआइ का भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं। इन छात्रों में से ज्यादातर ने चार लाख रुपये से कम का लोन लिया है। केंद्रीय ब्याज सब्सिडी योजना के तहत जुटाए गए आंकड़े से पता चलता है कि लोन लेने वाले छात्रों की कुल संख्या का करीब 88 फीसदी चार लाख रुपये तक का लोन लेते हैं। 80 फीसदी लोन अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के लिए लिया जाता है। करीब 69 फीसदी लोन इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए लिए जाते हैं। इनमें से भी 61 फीसदी से ज्यादा छात्र इंजी‌नियरिंग के हैं। यही कारण है कि देश में प्रोफेशनल डिग्रीधारियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी अनुपात में बेरोजगार और डिफॉल्टर भी बढ़ते जा रहे हैं। ऑल इंडिया ग्रामीण बैंक ऑफिसर्स ऑर्गेनाइजेशन (एआइजीबीओओ) के महासचिव आरके गौतम ने बताया कि लोन लेने वालों की संख्या में कमी और डिफॉल्टरों का बढ़ना चिंता का विषय है। वे इसका कारण उन संस्‍थानों को मानते हैं जिनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं है। इसके कारण छात्रों को पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद छह महीने या सालभर तक नौकरी नहीं मिलती या फिर मिलती है तो वे इतनी तनख्वाह वाली नहीं होतीं कि लोन की राशि चुका सकें। निजी संस्‍थानों की मिलीभगत वैसे लोन के इस प्रकरण का एक घोटाले-घपले वाला पहलू भी है। नाम न छापने की शर्त पर एक सार्वजनिक बैंक के शीर्ष अधिकारी ने बताया कि छोटी राशि यानी चार लाख रुपये तक के एजुकेशन लोन के डिफॉल्टर होने की वजह निजी शिक्षण संस्थान भी हैं। चार लाख रुपये तक के लोन के लिए बैंकों को गारंटर की जरूरत नहीं होती है। ऐसे में ये संस्थान छात्रों को दाखिले के लिए यह कहकर आकर्षित करते हैं कि कोर्स के लिए वे खुद एजुकेशन लोन दिला देंगे। लेकिन इन संस्‍थानों की डिग्रियों से अच्छी नौकरियां नहीं मिलतीं। इसके कारण लोन डिफॉल्ट के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हुनर पर संदेह फिर इन निजी शिक्षण संस्‍थानों के पढ़ाई के गैर-पेशेवर तरीके भी इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं। यानी ये छात्रों का दोहरा दोहन कर रहे हैं। उन पर पैसे का बोझ तो पड़ता ही है, उनकी पढ़ाई और डिग्रियों पर भी संदेह मंडराता रहता है। सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योग संगठन नैसकॉम के एक सर्वे के मुताबिक देश में हर साल ग्रेजुएट होने वाले कुल इंजीनियरों में से 17.5 फीसदी ही रोजगार के योग्य होते हैं। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के अनुसार सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग जैसे कोर सेक्टर के 92 फीसदी इंजीनियर और डिप्लोमाधारी रोजगार के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं। हालांकि एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक और दिल्ली विवि के पूर्व प्रोफेसर शिक्षाशास्‍त्री कृष्‍ण कुमार रोजगार के काबिल न पाए जाने के तर्क को ही बेमानी बताते हैं। वे कहते हैं, दरअसल आर्थिक क्षेत्र के परिवर्तनों को शिक्षा के संदर्भ में समझने के प्रयास ही नहीं किए गए। रोजगार के लिए जो-जो अपेक्षाएं हैं, उसे समझना और उस आधार पर प्रशिक्षण देना रोजगार देने वाले का काम है। उद्योग जगत अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए हुनर के विमर्श को बढ़ावा दे रहा है, जिसका इस्तेमाल विश्वविद्यालयों की जड़ें खोदने के लिए किया गया। मेहरोत्रा के मुताबिक आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी निवेश हुआ और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) ने अनाप-शनाप ढंग से कॉलेज/संस्‍थानों को मान्यता दी, जिससे ये हालात पैदा हुए हैं। नौकरियों का टोटा लेबर ब्यूरो के 2015-16 रोजगार-बेरोजगारी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, स्नातक और इससे अधिक शिक्षा हासिल करने वाले 18.4 फीसदी बेरोजगार हैं। ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, देश की बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच फीसदी पर पहुंच गई जो पांच साल का उच्च स्तर है। लेबर ब्यूरो के अनुसार, 2013-14 में बेरोजगारी दर 4.9 फीसदी, 2012-13 में 4.7 फीसदी, 2011-12 में 3.8 फीसदी रही। इन आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 1.3 करोड़ युवा हर साल जॉब मार्केट में आते हैं। लेकिन, 2012 के बाद से देश में हर साल पांच लाख से कम नौकरियां पैदा हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन का आकलन है कि 2018 में भारत में बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 1.8 करोड़ हो सकती है। 2016 में यह संख्या 1.77 करोड़ और 2017 में 1.78 करोड़ थी। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के मुताबिक 2018 के पहले सप्ताह में बेरोजगारी की दर 5.7 फीसदी थी, जो पिछले 12 महीने में सबसे अधिक है। सीएमआइई के एमडी और सीईओ महेश व्यास ने लिखा है कि 2017 के रोजगार संबंधित सर्वे से रोजगार में मात्र 0.5 फीसदी की वृद्धि के संकेत मिलते हैं। संख्या के लिहाज से यह 20 लाख है। शहरी रोजगार में दो फीसदी की वृद्धि हुई है, लेकिन ग्रामीण रोजगार में 0.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। व्यास ने लिखा है कि देश में श्रम भागीदारी दर ग्लोबल औसत से बहुत कम है। ग्लोबल औसत 63 फीसदी है, जब‌कि भारत का 2017 में 44 फीसदी रहा। 2016 में यह 47 फीसदी पर था। लेख में कहा गया है कि 1 करोड़ 10 लाख लोगों को रोजगार मार्केट में आना चाहिए था, मगर डेढ़ करोड़ लोग इस मार्केट से निकल गए। इस तरह श्रम भागीदारी दर 46.6 फीसदी से घटकर 43.9 फीसदी हो गई। श्रम भागीदारी दर में गिरावट का मतलब है नौकरी या काम मिलने की बहुत कम उम्मीद है। बैंक अधिकारियों का मानना है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती के चलते छात्रों को अच्छी नौकरियां नहीं मिल रही जिसके कारण कर्ज की वापसी में कमी आई है। उन्होंने एमबीए और इंजीनियरिंग करने वाले छात्रों का विशेष रूप से जिक्र किया जिन्हें डिग्री मिलने के बाद अच्छे वेतन वाली नौकरियां नहीं मिल रही हैं। आइडीबीआइ बैंक के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक आर.एम. मल्ला भी मानते हैं कि पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद नौकरी नहीं मिलना एजुकेशन लोन डिफॉल्ट की बड़ी वजह है। उन्होंने बताया कि जब विकास दर बढ़ रही होती है तो रोजगार मिलने में दिक्कत नहीं होती है। लेकिन, जब अर्थव्यवस्था सही हालत में नहीं हो तो कोर्स पूरा होने के बाद सभी को नौकरी नहीं मिल पाती। ऐसे में एजुकेशन लोन का डिफॉल्ट होना स्वाभाविक है। देश की अर्थव्यवस्‍था की हालत कैसी है इसे केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के ताजा आंकड़ों से समझा जा सकता है। चालू वित्त वर्ष (2017-18) में जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 7.1 फीसदी लगाया गया था मगर केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह 6.5 फीसदी आंकी गई है। मेहरोत्रा कहते हैं, आज हम भले दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्‍था हों पर रोजगार उस तेजी से पैदा नहीं हो रहे जैसा 2011-12 में था। पिछले कुछ समय में दुनिया भर में आई मंदी और भारत में मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में ग्रोथ की कमी भी इसका एक बड़ा कारण है। एसोचैम के हाल के सर्वे में कहा गया है कि नोटबंदी, अटके प्रोजेक्ट और लगातार खराब कारोबारी माहौल की वजह से भी नौकरी के लाले पड़े हैं। तकनीकी बेरोजगारी देश में तकनीकी शिक्षा में 70 फीसदी हिस्सेदारी इंजीनि‌यरिंग कॉलेजों की हैं। बाकी 30 फीसदी में एमबीए, फार्मा, आर्किटेक्चर जैसे सारे कोर्स आते हैं। कुछ साल पहले तक इंजीनियरिंग और एमबीए का जबर्दस्त क्रेज था। अच्छी नौकरी और बेहतर भविष्य की ये गारंटी माने जाते थे। पर हालात में बदलाव के साथ दोनों सेक्टरों की हालत धीरे-धीरे खराब होती जा रही है। उद्योग संगठन एसोचैम की दिसंबर 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक बी श्रेणी के बिजनेस स्कूलों से निकलने वाले छात्रों में केवल 20 फीसदी को ही रोजगार मिल पा रहा है (आइआइएम और नामचीन संगठनों को श्रेणी ए में रखा जाता है)। 2016 में यह आंकड़ा 30 फीसदी था। बिजनेस स्कूलों और इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों को मिलने वाले वेतन पेशकश में भी ‌2016 की तुलना में 40-45 फीसदी की कमी आई है। एसोचैम एजुकेशन काउंसिल (एईसी) की रिपोर्ट के मुताबिक, टॉप 20 को छोड़ दें तो भारतीय बी-स्कूलों के केवल सात फीसदी एमबीए डिग्रीधारी ही कोर्स खत्म करने के बाद नौकरी हासिल कर पाते हैं। 2009-10 में डिग्री पूरी करने के बाद 60 फीसदी इंजीनियर जॉब पाते थे। एआइसीटीई के मुताबिक इस समय पढ़ाई पूरी करने के बाद 60 फीसदी इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिल पाती है। एसोचैम एजुकेशन काउंसिल (एईसी) की रिपोर्ट के मुताबिक जिन इंजीनियरों को नौकरी मिल रही है, उनमें से करीब आधे अपनी तकनीकी योग्यता से कम वेतन की नौकरी करते हैं। एआइसीटीई की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 2016-17 में इंजीनियरिंग कॉलेजों में 15,43,214 छात्रों ने दाखिला लिया। लेकिन, इन कॉलेजों से पढ़ाई पूरी कर निकले इंजीनियरों में से महज 5,07,736 को ही नौकरी मिली। 2016-17 में उन छात्रों की पढ़ाई पूरी हुई होगी जिन्होंने 2013-14 के सत्र में नामांकन कराया था। 2013-14 के सत्र में 17,97,807 छात्रों ने दाखिला लिया था। इसका मतलब हुआ कि चार में से एक इंजीनियर को ही प्लेसमेंट मिली। मैनेजमेंट क्षेत्र की हालत भी इससे अलग नहीं है। एआइसीटीई की वेबसाइट के मुताबिक 2016-17 में मैनेजमेंट संस्‍थानों में 2,32,679 छात्रों ने दाखिला लिया, जबकि 91,461 को ही पढ़ाई पूरी होते ही नौकरी मिली। एआइसीटीई के आंकड़े बताते हैं कि 2014-17 के बीच इंजीनियरिंग की 3.11 लाख और मैनेजमेंट की 61 हजार सीटें कम हुई हैं। संकट की दूसरी बड़ी वजह आइटी क्षेत्र है। आइटी का संकट अमेरिकी ‌रिसर्च संस्‍था एचएफएस के आंकड़ों के मुताबिक भारत का आइटी सेक्टर कर्मचारियों की ‌अ‌धिकता के बोझ तले दबा है। भारत में आइटी क्षेत्र इस समय करीब 35 लाख लोगों को रोजगार दे रहा है। इसके मुताबिक भारत का आइटी सेक्टर लगभग 6.4 लाख नौकरियां खत्म करने जा रहा है। यानी हर पांच में से एक नौकरी खत्म होने वाली है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारतीय आइटी इंडस्ट्री में ऑटोमेशन, रोबोटिक, आर्टिफिशल इंटेलीजेंस तकनीक का आना है। इससे बहुत सी नौकरियां जाएंगी और कुछ नई तरह की नौकरियां पैदा होंगी। यानी अगले कुछ वर्षों में नौकरियों का स्वरूप बदलना तय है। एचएफएस रिसर्च के सीईओ फिल फ्रेस्ट के मुताबिक, पिछले दो दशकों में भारत के आइटी सेक्टर ने जबरदस्त उछाल देखा है, लेकिन यह पहली बार है जब ऐसी मंदी छाई है। भारत की कंपनियों और कर्मचारियों के लिए ये बुरा समय है। नैसकॉम के हवाले से सरकार ने बीते साल संसद में बताया था कि 2014-15 सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 34.85 लाख लोग काम कर रहे थे जो 2016-17 में बढ़कर 3,8.63 लाख हो गया। लेकिन, आइटी सेक्टर में 2014-15 में 2,17,000 नए रोजगार का सृजन हुआ था जो 2016-17 में घटकर 1,75,000 हो गया। पिछले तीन साल में आइटी क्षेत्र में छह लाख नए रोजगार का सृजन हुआ। लेकिन 2016-17 में नए रोजगार की वृद्ध‌ि दर पांच फीसदी पर आ गई, जो 2010-14 के बीच आठ फीसदी थी।इलाज के साथ बढ़ता मर्ज 2001 में आइबीए आदर्श एजुकेशन लोन की घोषणा करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा था कि इससे उच्च शिक्षा हासिल करने की राह में आने वाली आर्थिक बाधाएं समाप्त होंगी। छात्रों को राहत देने के लिए समय-समय पर इसमें बदलाव भी किए गए हैं। 2009 में ऐसे छात्र जिनके माता-पिता की आय साढ़े चार लाख रुपये सालाना से कम है, उनके लिए ब्याज स‌ब्सिडी की शुरुआत की गई। पिछले साल संसद में सरकार ने बताया था कि तीन साल में लोन लेने वाले 23,61,546 छात्रों को इसका लाभ मिला है। इस दौरान करीब 3877 करोड़ रुपये की राशि ब्याज सब्सिडी के तौर पर दी गई। एनपीए में कमी लाने के लिए 2015 में सरकार ने साढ़े सात लाख रुपये तक के लोन के लिए ऋण गारंटी निधि योजना (सीजीएफईएल) की भी शुरुआत की थी। इसके तहत 75 फीसदी की सीमा तक गारंटी प्रदान की जाती है। साथ ही कर्ज चुकाने की समय सीमा भी 15 साल के लिए बढ़ा दी गई है। केरल की सरकार ने उन छात्रों जिनकी परिवार की सालाना आमदनी छह लाख रुपये से कम है, उनके लिए 900 करोड़ रुपये की लोन रीपेमेंट योजना 2017 में शुरू की। इसके तहत चार लाख रुपये तक के डिफॉल्ट एजुकेशन लोन का 60 फीसदी हिस्सा सरकार देगी, जबकि 40 फीसदी रकम छात्र को देनी होगी। एजुकेशन लोन का करीब 40 फीसदी हिस्सा दक्षिण के दो राज्यों तमिलनाडु और केरल का है। लेकिन तथ्य यह भी है कि एनपीए से भी यही दोनों राज्य सर्वाधिक प्रभावित हैं। दोनों राज्यों में सरकारी बैंकों द्वारा एनपीए का बड़ा हिस्सा एसेट्स रीकंस्ट्रक्‍शन कंपनियों को बेचने और इन कंपनियों द्वारा भुगतान के लिए छात्रों पर दबाव बनाने के मामले भी हाल में सामने आए हैं। कुछ राज्यों में शिक्षा ऋण गारंटी योजना चल रही है। लेकिन, कड़ी शर्तों के चलते छात्रों को फायदा नहीं हो रहा। बिहार में सरकार अब खुद छात्रों को कर्ज बांटने के लिए ‌निगम का गठन करने पर विचार कर रही है। यही कारण है कि एजुकेशन लोन को लेकर 2012 तक छात्रों ने जो उत्साह दिखाया था, अब उसमें साल-दर-साल कमी आ रही है। कैसे निकलेगा हल प्रो. सहस्रबुद्धे ने बताया कि शुरुआत में कोर से ज्यादा आइटी इंडस्ट्री में जॉब होने के कारण इंजीनियरों को नौकरी मिलने में समस्या नहीं हो रही थी। लेकिन, आज आइटी सेक्टर में जो हैं उनके लिए बने रहना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि मैन्युफैक्चरिंग, टेक्सटाइल, ख्‍ानन जैसे सेक्टर में रोजगार बढ़ने से इसका समाधान निकलेगा। आरके गौतम के अनुसार इस स्थिति से निकलने के लिए शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता, प्लेसमेंट आदि बातों पर ध्यान देना होगा। एजुकेशन को रोजगार से जोड़ना होगा। मल्ला ने बताया कि एजुकेशन लोन डिफॉल्ट से बचने के लिए सरकार को कारगर रोजगार गारंटी योजना लानी होगी। बैंक लोन को री-स्ट्रक्चर कर भी एनपीए में कमी ला सकते हैं। उन्होंने बताया कि नौकरी नहीं मिलने पर एजुकेशन लोन लेने वाले छात्रों को स्वरोजगार के लिए लोन मुहैया कराकर बैंक दोनों लोन को प्रोजेक्ट लोन में बदल सकते हैं। इससे लोन रिकवर होने की संभावना बढ़ जाएगी। मेहरोत्रा के अनुसार इसके लिए यूजीसी और एआइसीटीई में सुधार कर नए कॉलेजों को मंजूरी देने पर रोक लगानी होगी। केंद्र और राज्य सरकारों को उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाना होगा। रोजगार बढ़ाने के साथ-साथ नौवीं से बारहवीं स्तर पर गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास के पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे। मेहरोत्रा ने बताया कि मौजूदा कौशल विकास कार्यक्रम इस लिहाज से मुफीद नहीं हैं। बहरहाल, संकट गहरा है मगर सरकारी क्षेत्र को इसका एहसास कम ही लगता है। मल्ला कहते हैं, दरअसल इसकी शुरुआत 2001 में वाइ2के संकट से निबटने के लिए आइटी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लोगों की दरकार को समझकर किया गया था। लेकिन अब वह पूरा हो गया और आइटी क्षेत्र में स्थायित्व आ जाने से ज्यादा लोगों की जरूरत नहीं रह गई। इसके आगे कभी सोचा ही नहीं गया। कृष्ण कुमार कहते हैं, दरअसल सब कुछ कामचलाऊ ढंग से चल रहा है। कभी यह आंका ही नहीं गया कि उदारीकरण की अर्थव्यवस्था से शिक्षा का क्या रिश्ता है। यही कामचलाऊ रवैया आज शिक्षा का बोझ बढ़ा रहा है और देश में शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ा कर रहा है।


Send Your Comment
Your Article:
Your Name:
Your Email:
Your Comment:
Send Comment: