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पश्चिम एशिया और पश्चिम--भारत डोगरा
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हाल के समय में मध्य-पूर्व में- पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के एक बड़े भाग में- बाहरी और आंतरिक तनाव बढ़े हैं जिससे हिंसा भड़की है और अधिक व्यापक स्तर पर हिंसा का खतरा उत्पन्न हुआ है। सीरिया, ईरान, इराक, मिस्र, ट्यूनीशिया और फिलस्तीन के एक बड़े हिस्से में खदबदाता तनाव किसी भी समय विस्फोटक रूप ले सकता है। हालांकि इस समय मिस्र सुर्खियों में है, पर सीरिया की स्थिति सबसे चिंताजनक है। सीरिया गृहयुद्ध जैसी स्थिति में है, और सबसे दुख की बात तो यह है कि ऐसी स्थिति लाने में काफी हद तक उन बाहरी ताकतों का हाथ है जो लोकतंत्र की दुहाई देती रहती हैं। इसमें संदेह नहीं कि सीरिया में लोकतांत्रिक सुधारों की जरूरत थी। यह भी सही है कि ऐसे सुधारों में देर होने के कारण कुछ क्षेत्रों या व्यक्तियों को जोर-जुल्म सहना पड़ा हो। पर दूसरी ओर यह भी सच है कि चाहे कुछ देर में ही सही, सीरिया के सत्ताधारी लोकतांत्रिक सुधारों के लिए तैयार होने लगे थे। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि चाहे सीरिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था में कमजोरियां रही हों, पर वहां कट््टरपंथ की राह से हट कर सब धर्मों की बराबरी और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर की उदार नीतियां अपनाई गई थीं, जिससे विभिन्न समुदायों के लोग यहां बिना भेदभाव और दबाव महसूस किए एक साथ रह सकते थे, जबकि इस क्षेत्र के अनेक अन्य देशों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसके बावजूद अपने रणनीतिक कारणों से पश्चिमी देशों ने सीरिया में सत्ता-बदलाव के उद््देश्य को अपनाया और तेजी से आगे बढ़ाया। यह रणनीतिक वजह मुख्य रूप से ईरान से सीरिया की मित्रता और नजदीकी है। इस क्षेत्र की मौजूदा कूटनीति और रणनीति में पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका का उद््देश्य यह है कि ईरान को अलग-थलग और कमजोर किया जाए। क्षेत्र के विभिन्न देशों में सीरिया उसे ईरान का सबसे नजदीकी देश नजर आया तो सीरिया में सत्ता-विरोध की रणनीति अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों ने अपना ली। इस नीति के अंतर्गत सीरिया के अनेक क्षेत्रों विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में हिंसक विद्रोह भड़काया गया। इसमें सीरिया के कुछ पड़ोसी देशों जैसे तुर्की का भी समर्थन हासिल किया गया, जिसके साथ कुछ तनावों के बावजूद अमेरिका और पश्चिमी देशों के कहीं बेहतर संबंध रहे हैं। इस कारण एक समय तो सीरिया और तुर्की के बीच ही तनाव बहुत बढ़ गया था। सीरिया में हिंसक विरोध भड़काने में पश्चिमी देशों ने कट््टरपंथी तत्त्वों से भी कोई परहेज नहीं किया। धर्म के मामले में उदारवादी सरकार के विरुद्ध कट्टरपंथी तत्त्वों को भड़काना पश्चिमी देशों के अपने घोषित सिद्धांतों के विरुद्ध है, पर ये देश अपने रणनीतिक स्वार्थ साधने में सिद्धांतों को प्राय: पीछे धकेल देते हैं और यही सीरिया में भी हुआ है। पश्चिमी देशों और अमेरिका की विदेश नीति का एक घोषित उद््देश्य अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा और महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता को बढ़ाना रहा है। पर यह आशंका उत्पन्न हो गई है कि कभी सीरिया की मौजूदा सरकार गिरी तो कट्टरपंथी तत्त्व वहां की सत्ता में आएंगे जो अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव की नीति अपनाएंगे और महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर भी आघात करेंगे। फिलहाल यह तो आगे की बात है। पर इस समय गृहयुद्ध जैसी स्थिति ने जनसाधारण पर कहर बरपा रखा है। सरकार के पास तो खैर आधुनिक शस्त्र होते ही हैं। यहां के विद्रोहियों को भी काफी विनाशक शस्त्र उपलब्ध हो गए हैं। इस तरह जब इन दोनों पक्षों में खूनी टकराव होता है तो लोगों के मारे जाने या घायल होने और तबाही का आंकड़ा बढ़ जाता है। एक बड़ा सवाल यहां यह उठता है कि लोकतांत्रिक सुधारों की मांग के आधार पर ऐसी नीतियां अपनाना, जो किसी देश में इतना खून-खराबा कराए, कहां तक उचित है? निश्चय ही यह अनुचित और अनैतिक है कि लोकतंत्र की मांग की आड़ में हिंसक तत्त्वों को भड़काया जाए। दूसरी ओर, मिस्र के बारे में कहा जा सकता है कि वहां लोकतांत्रिक सुधारों की मांग में जन-आंदोलन की बड़ी भूमिका थी। वहां हुस्नी मुबारक की तानाशाही के विरुद्ध जन-ज्वार आया, जिसने मुबारक की तानाशाही को समाप्त कर दिया। पर सवाल है कि उसके बाद क्या हुआ? उसके बाद सेना की परिषद हो या सर्वोच्च अदालत या नव-निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद मुरसी हों, उन सभी ने लोकतंत्र-विरोधी आचरण किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि अपने शैशवकाल में ही लोकतंत्र बुरी तरह आहत हो गया और तरह-तरह के नए तनाव उत्पन्न हो गए हैं। यहां यह कहना भी जरूरी है कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनावों का आयोजन करना नहीं है और अगर लोकतंत्र के नाम पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों और महिलाओं के अधिकारों को छीना जाता है या कट््टरपंथ को बढ़ाया जाता है तो इसका भी विरोध होना चाहिए। मुरसी के विरोध में बहुत-से लोग इसीलिए सड़क पर उतर आए, क्योंकि उन्हें लगा कि कट््टरपंथ को बढ़ा कर तो लोकतांत्रिक आंदोलन की मूल भावना पर आघात किया जा रहा है। इसके अलावा, मिस्र में मुबारक-विरोध के आंदोलन और उसके बाद जो हुआ उसे समझने के लिए पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका की भूमिका और उनकी प्लान बी की कूटनीति को समझना भी जरूरी है। अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों के बीच कई बार विदेशी मामलों पर काफी मतभेद होते हैं और हाल के वर्षों में ये मतभेद बढ़े भी हैं। इसके बावजूद प्राय: वे विश्व के मौजूदा शक्ति-समीकरणों को बनाए रखने और इसमें पश्चिमी हितों को ऊपर रखने के लिए आपस में नजदीकी सहयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में इराक, लीबिया, ईरान, सीरिया, अफगानिस्तान जैसे देशों के संदर्भ में पश्चिमी देशों में आपसी मतभेद कई बार सामने आए, पर कुल मिला कर अमेरिकी नेतृत्व के गठबंधन में उन्होंने आपसी सहयोग से कार्य किया। इन पश्चिमी देशों के हितों को शेष विश्व में (और विशेषकर कुछ महत्त्वपूर्ण देशों और क्षेत्रों) में आगे बढ़ाने के लिए पहला प्रयास तो यह रहता है कि कुछ महत्त्वपूर्ण देशों में इनकी समर्थक सरकार बनी रहे। इस सरकार से एक बड़ी अपेक्षा यह होती है कि यह पश्चिमी देशों के व्यापक रणनीतिक और कूटनीतिक हितों का अधिकतम साथ देने के साथ-साथ पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निर्बाध व्यवसाय करने और मोटा मुनाफा कमाने की अधिक से अधिक सहूलियत दे। ऐसी सरकार लोकतांत्रिक औपचारिकताएं निभाने वाली हो या तानाशाही के अधिक नजदीक हो, इससे पश्चिमी देशों को बहुत फर्क नहीं पड़ता। जैसे पहले उन्होंने ईरान के शाह को अनेक वर्षों तक भरपूर समर्थन दिया, फिर मिस्र में मुबारक की तानाशाही को और सऊदी अरब में आज तक राज-परिवार को दे रहे हैं, उससे पता चलता है कि अपने हित साधने हैं तो तानाशाही से और यहां तक कि कट््टरपंथियों की तानाशाही और राजशाही से भी उन्हें परहेज नहीं है। पर अमेरिका के समर्थन से चल रही तानाशाहियां हों या पश्चिमी देशों का हित साधने वाले लोकतंत्र हों, जनता में इनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता ज्यादा दिन टिकती नहीं है, इसलिए वे विपक्ष की ताकतों में भी अपने संपर्क सूत्र बनाए रखते हैं, फिर चाहे वे कट््टरपंथी ताकते हों या आंदोलनकारी हों। उनका प्लान ए तो यह है कि अपने समर्थन की सरकार, जो है वही बनी रहे। पर अगर अलोकप्रियता के कारण यह सरकार गिर जाए तो फिर जो भी विकल्प सामने आए चाहे- वह कट््टरपंथी ताकतों का हो या आंदोलनकारियों का- उसमें भी पश्चिमी हित मौजूद हों, यह प्लान बी का उद््देश्य होता है। यही मिस्र में भी देखा गया। इस आंदोलन में बहुत-से निस्वार्थ आंदोलनकारी थे जो बड़े आदर्श के लिए लड़े। पर दूसरी ओर ऐसे भी आंदोलनकारी थे जिनके तार अमेरिकी हितों से जुड़े थे और जिन्हें बड़ी चालाकी से आंदोलन की अग्रणी पंक्ति में पहुंचाया गया। इसके साथ मुसलिम ब्रदरहुड जैसे कट््टरपंथी संगठन से भी पश्चिमी संपर्क बने रहे हैं। इस तरह के प्लान बी के माध्यम से वह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि मुबारक की सत्ता पश्चिमी हितों के साथ थी तो उसका जो विकल्प तैयार हो वह भी पश्चिमी हितों के साथ हो। यही प्लान बी की कूटनीति है, जिसे जगह-जगह देखा जा सकता है। दूसरी ओर, ईरान में अमेरिका की हाल की नीति कम से कम इस हद में सार्थक रही कि इसने इजराइल के ईरान पर संभावित हमले को रोकने की भूमिका निभाई। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से पहले तीन-चार महीने तक यह चर्चा गर्म रही थी कि ईरान के परमाणु संयंत्रों और भंडारण के ठिकानों पर इजराइल जबर्दस्त हवाई हमला कर सकता है, पर यह नहीं हुआ। इसकी एक वजह यह बताई जा रही है कि इजराइल की नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार को अमेरिका की हरी झंडी नहीं मिल पाई और अमेरिका की सहमति के बिना हमला करने का जोखिम इजराइल उठाना नहीं चाहता था। दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि इजराइल के कुछ बड़े सैन्य सलाहकारों ने भी हाल के समय के ऐसे हमले के औचित्य पर सवाल उठाए थे। फिलहाल तो यह खतरा टल गया, पर ईरान के विरुद्ध ऐसे हवाई हमले की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है और अगर ऐसा कुछ हुआ तो इस क्षेत्र में हिंसा और तनाव का ऐसा ज्वालामुखी फूट सकता है जो यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। गाजा पट्टी में तनाव बहुत बढ़ जाने के बाद वहां भी अमेरिका ने मिस्र के राष्ट्रपति मुरसी की सहायता से स्थिति को और बिगड़ने से रोकने में कुछ हद तक सार्थक भूमिका निभाई। पर यह भी मात्र मरहम-पट्टी ही थी और फिलस्तीन-इजराइल के बीच तनाव बढ़ने की तमाम आशंकाएं मौजूद हैं। समस्या गाजापट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) क्षेत्र में भी जिस तरह इजराइल तेजी से अपनी बस्तियां बढ़ा रहा है, उससे आज नहीं तो कल बड़ा विवाद उत्पन्न होना ही है। उधर इराक में दुख-दर्द कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। समय-समय पर बड़े विस्फोटों या हिंसक वारदातों का दौर वहां अभी तक चल रहा है। हिंसा के साथ आंतरिक तनाव और अलगाववाद के खतरे बढ़ रहे हैं, जबकि युद्ध से नष्ट हुर्इं बुनियादी जरूरतों की संरचनाएं अभी तक क्षत-विक्षत स्थिति में हैं। तेल और गैस भंडारों पर नियंत्रण के सबसे धनी देशों के लालच ने एक समय समृद्ध रहे इस देश को और यहां की प्राचीन सभ्यता को तहस-नहस किया, यह आधुनिक इतिहास की एक बड़ी त्रासदी है।


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