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'पद्मावती' पर हंगामा : ऐतिहासिक मिथकों की कड़ी पकड़ -राम पुनियानी
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करीब एक वर्ष पूर्व, राजस्थान में पद्मावती फिल्म की शूटिंग के दौरान जबरदस्त हंगामा और हिंसा हुई थी। फिल्म के निर्माता संजय लीला भंसाली को कुछ समय के लिए शूटिंग रोकनी पड़ी थी। अभी कुछ समय पूर्व, जब यह फिल्म रिलीज होने वाली थी, एक बार फिर इस मुद्दे पर बवाल शुरू हो गया। यह मांग की गई कि फिल्म रिलीज नहीं की जानी चाहिए। करणी सेना नामक संस्था ने फिल्म के ट्रेलर के आधार पर इसका विरोध किया। कुछ भाजपा नेताओं ने दीपिका पादुकोण, जिन्होंने फिल्म में पद्मावती का किरदार निभाया है, की नाक और संजय लीला भंसाली का सिर काटकर लाने वाले के लिए करोड़ों के इनाम घोषित किए। करणी सेना का यह आरोप है कि फिल्म इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करती है और राजपूतों की शान में गुस्ताखी है। करणी सेना और अन्यों की यह मांग कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला और घोर असहिष्णुता का परिचायक था। सरकार ने अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया और कलाकारों की आजादी पर इस हमले का अपरोक्ष रूप से समर्थन किया। पांच भाजपा-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने घोषणा कर दी कि यह फिल्म उनके राज्यों में रिलीज होने नहीं दी जाएगी और एक कांग्रेस-शासित राज्य के मुख्यमंत्री ने भी फिल्म का विरोध किया। फिल्म की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी के प्रसिध्द उपन्यास 'पद्मावत' पर आधारित है। उपन्यास की कथावस्तु में फिल्म निर्माता ने अपने हिसाब से कुछ परिवर्तन भी किए हैं। अपने उपन्यास में जायसी ने अलाउद्ीन खिलजी की प्रेमकथा का वर्णन किया है। खिलजी, 13वीं-14वीं सदी में दिल्ली के शासक थे। इस काल्पनिक कथा के अनुसार, पद्मावती की सुंदरता पर मोहित हो खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। वह पद्मावती को पाना चाहता था। जब उसने चित्तौड़ के किले पर घेरा डाला हुआ था उस समय पद्मावती ने कई अन्य वीर राजपूत महिलाओं के साथ जौहर कर लिया और इस तरह, खिलजी पद्मावती को नहीं पा सका। करणी सेना, भाजपा और इस तरह के अन्य संगठनों को इस फिल्म के एक तथाकथित दृश्य पर आपत्ति है, जिसमें कथित तौर पर खिलजी और पद्मावती को स्वप्न में प्रेमालाप करते दिखाया गया है। फिल्म के निर्माताओं का कहना है कि फिल्म में ऐसा कोई दृश्य नहीं है। वैसे भी, जायसी का उपन्यास दरअसल सत्ता की निरर्थकता और मुक्ति के लिए आत्मा की तड़प का रूपक है। इतिहासकार रजत दत्ता (https://thewire.in/200992/rani-padmini-classic-case-lore-inserted-history/) बताते हैं कि पद्मावती या पद्मिनी ऐतिहासिक चरित्र नहीं है। खिलजी ने 1303 में चित्तौड़ के किले पर हमला किया था। पद्मावत, इसके 200 वर्ष से भी अधिक पश्चात सन् 1540 में लिखा गया। इस बीच लिखी किसी पुस्तक में पद्मावती की कोई चर्चा नहीं है। जायसी द्वारा पद्मावती का चरित्र गढ़ने के बाद, कई कवियों ने इसके बारे में लिखा और इस तरह यह लोकसाहित्य का हिस्सा बन गया। इसे ब्रिटिश इतिहासकारों ने साम्प्रदायिक रंग में रंग दिया। अंग्रेजों ने इस देश के इतिहास को जानते-बूझते इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा जिससे उसका इस्तेमाल हिन्दुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाने के लिए किया जा सके। जहां कवियों ने इस कथा को केवल एक प्रेम कहानी के रूप में प्रस्तुत किया - हिन्दू-मुस्लिम युध्द के रूप में नहीं - वहीं ब्रिटिश लेखकों जेम्स टोड व विल्यिम क्रुक ने अपनी पुस्तक 'ऐनल्स एंड एंटीक्यीटिज ऑफ राजस्थान' (1829) में इस कथा को मुस्लिम और खिलजी विरोधी रूप दे दिया। यह एक कपोल कल्पित कथा को इतिहास का भाग बनाने का प्रयास था। शनै:-शनै: इस काल्पनिक कथा को लोग सही मानने लगे। आज राजपूत महिलाओं और मुस्लिम राजाओं के पारस्परिक रिश्तों के बारे में दो तरह की बातें कही जाती हैं। पहली यह कि वीर राजपूत महिलाओं ने मुस्लिम राजाओं को अपने शरीर को स्पर्श करने देने की बजाए अग्नि में स्वयं को भस्म कर लेना बेहतर समझा। दूसरी यह कि राजपूत परिवारों ने राजनीतिक और रणनीतिक कारणों से अपनी महिलाओं का विवाह मुस्लिम राजाओं से करवाया। इसे शनै:-शनै: राजपूतों की कमजोरी का प्रतीक बताया जाने लगा। ऐसा कहा जाने लगा कि राजपूत शासकों द्वारा अपनी लड़कियों को मुस्लिम राजाओं को 'देना', एक तरह से उनके समक्ष आत्मसमर्पण था। 'हमारी' लड़कियों को 'दूसरों' को सौंपने की बात करना दरअसल विवाह को पितृसत्तात्मक नजरिये से देखना है। इसे राजपूतों के लिए 'शर्मनाक' बताया जाता है। इसके विपरीत, 'बाजीराव मस्तानी' जैसी फिल्मों का कोई विरोध नहीं होता। यद्यपि फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है परंतु इसका ट्रेलर देखने से यह पता चलता है कि इसमें खिलजी को एक बर्बर और क्रूर शासक के रूप में दिखाया गया है जो हमेशा अस्त-व्यस्त रहता है और खाने पर जानवरों की तरह टूट पड़ता है। उसकी सेना का झंडा पाकिस्तान के वर्तमान झंडे से मिलता-जुलता दिखाया गया है। ऐसा लगता है कि मुसलमानों की जो छवि वर्तमान में बनाई जा रही है, फिल्म में खिलजी उसी छवि का प्रतिनिधित्व करता है। मुसलमानों को 'दुष्ट' और 'शैतान' के रूप में प्रस्तुत करना, अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति का भाग था। अंग्रेज अधिकारियों और इतिहासविदों ने भी शासकों की इस नीति के अनुरूप, ऐतिहासिक घटनाओं को इस तरह से प्रस्तुत किया जिससे मुस्लिम राजाओं की छवि को खराब किया जा सके। राजा अपने धर्म के सगे नहीं थे। सभी धर्मों के राजा केवल और केवल सत्ता के भूखे थे। उनके अपने-अपने गुणदोष थे। इतिहास यह नहीं कहता कि खिलजी एक अत्यंत दुष्ट और क्रूर राजा था। इतिहास में तो सिर्फ इतना बताया गया है कि खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के राज्यक्षेत्र का विस्तार किया और मंगोलों के आक्रमण से उसकी रक्षा की। हमारे देश में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति असहिष्णुता का भाव बढ़ता जा रहा है। 'मुगले आजम' को भारत की महानतम फिल्मों में से एक माना जाता है। यह भी कल्पना पर आधारित थी और उसमें दिखाया गया था कि जोधाबाई नामक एक राजपूत राजकुमारी का विवाह अकबर से हुआ था। परंतु इस फिल्म का कहीं कोई विरोध नहीं हुआ। किसी ने इस बात पर प्रश्न नहीं उठाया कि उसमें एक राजपूत महिला को मुगल बादशाह की पत्नी के रूप में क्यों दिखाया गया है। यह फिल्म कुछ दशकों पहले बनी थी और उस समय तक समाज का इतना साम्प्रदायिकीकरण नहीं हुआ था। कुछ वर्षों पूर्व, 'जोधा अकबर' नामक फिल्म आई। इस फिल्म का छुट-पुट विरोध हुआ परंतु इसका प्रदर्शन रोकने के कोई प्रयास नहीं हुए। पद्मावती के मामले में विरोध अत्यंत व्यापक और भयावह है। निश्चित तौर पर फिल्म पद्मावती इतिहास पर आधारित नहीं है। पद्मावती का चरित्र काल्पनिक है। परंतु शिवसेना और भाजपा - शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक काल्पनिक हिन्दू महिला का मुस्लिम शासक के साथ प्रेम संबंध पर्दे पर देखना तक मंजूर नहीं है। यह फिल्म खिलजी का दानवीकरण करती है और उसे उन 'दुर्गुणों' की खान बताती है, जिन्हें आज के मुसलमानों की मानसिकता का हिस्सा बताया जाता है। परंतु फिल्म निर्माताओं को अपनी तरह से किसी कहानी को प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता है। फिल्म को रिलीज होने दिया जाना चाहिए और फिर गुणदोष के आधार पर उसकी समीक्षा की जानी चाहिए। पद्मावती को ऐतिहासिक चरित्र बताना और खिलजी को एक क्रूर और बर्बर शासक के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है परंतु केवल इस आधार पर फिल्म का प्रदर्शन ही न होने दिए जाने की मांग अनुचित है और असहिष्णुता की परिचायक भी। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)


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