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कितना मुमकिन हैं कश्मीर में पंचायत चुनाव
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17 अप्रैल, 2015. दक्षिण कश्मीर में पुलवामा ज़िले के एक छोटे से गांव गुलजारपोरा में शाम रोज की तरह ढल रही थी. तभी अमीन पंडित के घर में कुछ बंदूकधारी दाखिल हुए और उन्हें पकड़कर बाहर ले गए. उनकी बीवी, शमीमा और तीन नाबालिग़ बच्चे सोच ही रहे थे कि क्या करें कि बाहर से गोलियों की आवाज़ सुनाई दी. हुआ बिलकुल वही था जिसका उन्हें अंदेशा था. पंडित की हत्या कर दी गई थी. उनका जुर्म यह था कि वे चुनाव लड़ककर गांव के सरपंच बन गए थे. अगले चार साल तक शमीमा अपने पिता ग़ुलाम हसन मल्ला के साथ सब्ज़ियां उगाकर बेचती रहीं और घर चलाने के साथ साथ बच्चों को पढ़ाती रहीं. वे बताती हैं, कोई नहीं था हमारे साथ, बस मैं और मेरे वालिद. न बड़ी बड़ी बातें करने वाले नेता, न पंचायत के वो मेंबर जिनके लिए मेरे शौहर हमेशा खड़े रहे और न ही सरकार. चार साल लंबी जद्दोजहद के बाद शमीमा को अब एक सरकारी नौकरी मिल गयी है, उनके बेटे का दाखिला एमबीबीएस में हो गया है. बेटियां भी पढ़ाई में आगे बढ़ रही हैं. लेकिन शमीमा की तरह किस्मत हर किसी का साथ नहीं देती, न ही सबके पिता उनके साथ खड़े रहते हैं. पिछले छह सालों के दरम्यान कश्मीर घाटी में कम से कम 15 पंचायत सदस्य अज्ञात बंदूकधारियों की गोलियों से मारे गए हैं. 30 से ज़्यादा लोग ऐसी घटनाओं में घायल भी हुए हैं. उनके परिवार अब किस्मत और गरीबी से अकेले ही जूझ रहे हैं. डर के माहौल में ही सही, जिंदगी किसी तरह बसर हो रही है इनकी. लेकिन पिछले कुछ दिन से इनके ज़ख्म फिर हरे हो उठे हैं. जो सदस्य, पंचायत की अवधि ख़तम होने के बाद अब एक सामान्य जीवन बिता रहे हैं, वे भी फिर से भयभीत हो गए हैं. वजह है राज्य में पंचायत चुनावों का ऐलान. इन दिनों सूबे के मुखिया राज्यपाल एनएन वोहरा ने ऐलान किया है कि पंचायत चुनाव अक्टूबर और दिसंबर में आयोजित किए जाएंगे. यह फैसला पंचायत की अवधि ख़तम होने के करीब दो साल बाद लिया गया है. राज्य में पंचायत चुनाव आखिरी बार 2011 में हुए थे. राज्यपाल ने कहा है कि प्रशासनिक स्तर पर इन चुनावों की तैयारियां तेजी से की जा रही हैं. यह निर्णय ऐसे समय पर लिया गया है जब कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू है, मिलिटेंसी पिछले कई सालों के मुक़ाबले बढ़ती दिखाई दे रही है और पुलिस वालों की एक के बाद एक हत्याएं हो रही हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या यह समय सही है या नहीं? नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व सरपंच कहते हैं, असल सवाल तो यह है कि अगर बीते सालों में, जब हालात बनिस्बत बेहतर थे, इतने सरपंचों और पंचों की हत्या हो सकती है तो अब क्या होगा. मेरी सोच सोच के रूह कांप उठती है. लेकिन माहौल हमेशा ऐसा नहीं था. जम्मू-कश्मीर में पिछले पंचायत चुनाव 2011 में हुए थे. 33 साल के बाद. वह भी तब जब मिलिटेंट्स ने लोगों को इस चुनाव में भाग लेने की छूट दे दी थी. पहली बार ऐसा हुआ था कि मिलिटेंट्स ने कश्मीर घाटी में लोगों को किसी चुनाव में हिस्सा लेने से रोका नहीं था. यूनाइटेड जिहाद कौंसिल (यूजेसी) के पाकिस्तान में रह रहे मुखिया सैयद सलाहुद्दीन ने कहा था कि ये चुनाव एक प्रशासनिक कसरत हैं और इनका हमारी आज़ादी के संघर्ष पे कोई असर नहीं पड़ेगा. नतीजा यह हुआ कि लोगों ने बड़ी संख्या में वोट डाले. 30,000 से ज़्यादा पंच चुने गए और 4000 से ज़्यादा सरपंच. यह चुनाव अभी तक पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रमुख उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन फिर 2013 से हालात बदलने शुरु हुए और यही पंचायत के सदस्य बंदूकधारियों के निशाने पे आ गए. लेकिन बंदूक के पीछे हमेशा अज्ञात लोग ही थे और ये पूर्व सदस्य भी किसी का नाम लेने से कतराते हैं. जहां पुलिस मिलिटेंट्स को दोष देती रही वहीं मिलिटेंट्स इस उसके आरोप को नकारते रहे. लेकिन इसी दौरान मिलिटेंट गुटों की तरफ से लगातार पोस्टर भी छपते रहे. इनमें पंचायत के सदस्यों को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा जाता. 2014 और 2016 के बीच सैकड़ों पंचायत सदस्यों ने अपने इस्तीफे अख़बारों में छपवाए, मस्जिदों में पढ़वाए. लेकिन सरकार इन इस्तीफों को मानने से इन्कार करती रही. फिर इस साल जनुअरी में मिलिटेंट गुट हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर रियाज़ नैकू ने एक ऑडियो क्लिप के जरिये चेतावनी दी कि जो पंचायत चुनाव में हिस्सा ले उसकी आंख में एसिड डाल कर उसे अंधा कर दिया जाए. संदेश में आगे कहा गया था, इनको और इनके घरवालों को पता चलना चाहिए कि जो बच्चे पैलेट गन्स से अंधे कर दिए जाते हैं उनकी जिंदगी कैसी होगी. इस चेतावनी से यह तो साफ हो गया कि पंचायत सदस्यों को मिलिटेंट्स से ही खतरा है. इस बीच अप्रैल 2017 में श्रीनगर लोक सभा सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान हुई हिंसा ने लोगों के दिल और दहला दिए. आठ अप्रैल को हुए इस चुनाव में न सिर्फ सात फीसदी मतदान हुआ बल्कि सुरक्षा बलों की फायरिंग में चुनाव के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले आठ नागरिक भी मारे भी गए. नतीजा यह हुआ कि 12 अप्रैल को होने वाले अनंतनाग लोक सभा के उपचुनाव स्थगित कर दिए गए जो ख़राब हालात के चलते अभी तक नहीं हुए हैं. यह सीट महबूबा मुफ़्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हो गयी थी और अभी तक खाली ही है. उसके बाद से अभी तक हालात बदतर ही हुए हैं. जाहिर है, ऐसे माहौल में सरकार का पंचायत चुनाव कराने का फैसला इन पंचायत के पूर्व सदस्यों के लिए चौंकाने वाला है. सत्याग्रह से बातचीत में जम्मू कश्मीर पंचायत फोरम के महासचिव मोहिउद्दीन कुरैशी सवाल करते हैं, मुझे समझ नहीं आता इन लोगों को ये राय देता कौन है. कुरैशी बड़गाम ज़िले में सरपंच रहे हैं. वे एक रिटायर्ड सरकारी अफसर भी हैं. वे यह भी पूछते हैं कि जब सरकार अप्रैल 2017 में सिर्फ तीन उम्मीदवारों को सुरक्षा नहीं दे पाई थी तो अब यह कैसे मान लिया जाए कि वह 40 हजार उम्मीदवारों का जिम्मा लेगी. कुरैशी कहते हैं, ये लोग श्रीनगर में हाई सिक्योरिटी वाले अपने महलों से फैसले लेते हैं और दूर दराज़ इलाक़े के देहातों में ऐसे माहौल में चुनाव कराने की बात करते हैं. अगर ऐसा ही है तो सबसे पहले इनको अनंतनाग लोक सभा सीट पे उपचुनाव कराना चाहिए जो एक साल से खाली पड़ी है. हम उनसे पूछते हैं कि अगर ये चुनाव किसी तरीके से हो गए तो क्या वे इनमें फिर से हिस्सा लेंगे. इस पर वे कोई साफ जवाब नहीं देते. कहते हैं, हम गवर्नर साहब से मिलने जाएंगे और ये चुनाव न कराने की दुहाई देंगे. कुरैशी भले ही कोई स्पष्ट जवाब न दे पाए हों, बाकी लोग अपने निर्णय में काफी स्पष्ट हैं. पुलवामा के मुज़फ्फर अहमद मल्ला, जो सरपंच भी थे और जिला पंचायत फोरम के सदस्य भी,-कहते हैं कि वे किसी तौर यह चुनाव नहीं लड़ेंगे. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, हालात का आपको पता है कैसे हैं. इसके बावजूद कि मैं अभी भी लोगों की समस्याओं को लेके सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगता रहता हूं, मैं ये चुनाव नहीं लडूंगा. वे आगे जोड़ते हैं, सर सलामत तो टोपियां हज़ार. जान ही नहीं रहेगी तो लोगों की मदद क्या करूंगा. लेकिन मल्ला जैसे लोगों को सिर्फ मिलिटेंट्स का खतरा ही उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोकता. कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के द्वारा पंचायतों को राजनैतिक रंग देकर ज़रूरत के वक़्त सामने न आना भी इसकी एक बहुत बड़ी वजह मानी जाती है. कुलगाम के बाशिंदे और सरपंच रह चुके ग़ुलाम क़ादिर कहते हैं, पहले तो हर राजनीतिक पार्टी पंचों और सरपंचों को अपने आदमी बता कर वोट लूटने के चक्कर में रहे, और फिर जब इसी राजनीतिक ठप्पे के चलते हममें से लोग मारे गए तो ये नेता कहीं नज़र नहीं आए. आल जम्मू एंड कश्मीर पंचायत कांफ्रेंस के अध्यक्ष शफ़ीक़ मीर का मानना है कि पंचायतों को राजनीति से दूर रखा जाए तो बेहतर है. वे कहते हैं, ज़बरदस्ती पंचों और सरपंचों को राजनीति से जोड़ने के नतीजे हम भुगत चुके हैं. भले ही पंचायत के सदस्य चाहते हों कि इन चुनावों को राजनीतिक रंग न दिया जाए, लेकिन राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों पर बयानबाज़ी करने से कहां चूकती हैं. हाल ही में नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) के मुखिया फ़ारुक़ अब्दुल्ला ने एक बयान में कहा कि पंचायत चुनाव ज़रूर होने चाहिए और यह भी कि उन्होंने यह बात राज्यपाल वोहरा को भी बताई है. उनका कहना था, इन चुनावों से जनतंत्र ज़मीनी सतह पर मज़बूत होता है. उनका यह बयान उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के उस बयान के कुछ दिन बाद ही आया है जिसमें कहा गया था कि कश्मीर में इस समय हालात चुनाव के लिए अनुकूल नहीं हैं. उनका कहना था, जहां अभी तक अनंतनाग लोक सभा सीट का उपचुनाव होना बाक़ी है वहां कैसे आशा की जा सकती है कि कोई और चुनाव हो. वहीं दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता अली मुहम्मद सागर कुछ दिन पहले राज्यपाल से मिले और वही दोहराया जो उनके पार्टी अध्यक्ष ने कहा था. उधर, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के महासचिव रफ़ी मीर का कहना है कि सरकार को माहौल मददगार बनाना पड़ेगा ताकि ये चुनाव हो सकें. मीर कहते हैं, ये चुनाव तभी हो सकते हैं जब मार धाड़ बंद होगी और माहौल मुफीद होगा. प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष, ग़ुलाम अहमद मीर के मुताबिक सरकार को देखना पड़ेगा कि हालात चुनाव कराने के अनुकूल हैं या नहीं. वे कहते हैं, और यह सरकार ही बताएगी हम नहीं. हमारे पास ज़मीनी हालात जांचने के साधन नहीं हैं, सरकार के पास हैं. कुल मिला कर सिर्फ भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो स्पष्ट रूप से यह चुनाव कराने के पक्ष में हैं, लेकिन उसकी कश्मीर घाटी में कोई साख नहीं है. उधर सुरक्षा एजेंसियां इस मुद्दे पर बात करने से साफ़ इनकार कर रही हैं. सत्याग्रह ने एक पुलिस अफसर से इस बारे में बात की तो उनका सिर्फ यही कहना था, हम इस बारे में बात नहीं कर सकते. अगर हम से कल कहा जाता है कि चुनाव हैं तो हम तैयारी में जुट जाएंगे. हमने और भी अधिकारियों से बात करनी चाही, लेकिन सबका जवाब कमोबेश यही था. हालांकि, अनौपचारिक रूप से उनका कहना था कि हालात बहुत ख़राब हैं और ये चुनाव हुए तो खून-खराबा बहुत होगा. वहीं दूसरी तरफ मारे गए पंचायत सदस्यों के परिवार और आम जिंदगी बिता रहे पूर्व सदस्य यह सोच के परेशान हैं कि वे बिना बात के फिर से हिंसा की चपेट में न आ जाएं. (ctc- satgrah)


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