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क्या सीपीएम में बहुमतवादियों ने पार्टी को फिर एक बार तोड़ने का निर्णय ले लिया है? -अरुण माहेश्वरी
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ऐसा लगता है कि सीपीआई(एम) में प्रकाश करात के नेतृत्व में बहुमतवादियों ने भाजपा के खिलाफ एकजुट प्रतिरोध में कांग्रेस को शामिल करने के मामले में चल रहे मतभेदों को उनकी अंतिम परिणति तक ले जाने, अर्थात पार्टी को तोड़ डालने तक का निर्णय ले लिया है । पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' में, जिसके संपादक प्रकाश करात है, बिहार में नीतीश के विश्वासघात के प्रसंग में निहायत अप्रासंगिक तरीक़े से कांग्रेस को घसीट कर यह फैसला सुनाया गया है कि भाजपा के खिलाफ ऐसा कोई भी संयुक्त प्रतिरोध सफल नहीं हो सकता है जिसमें कांग्रेस दल शामिल होगा । इसमें कांग्रेस को नव-उदारवादी नीतियों को लादने के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार बताते हुए कहा गया है कि भाजपा को हराने के लिये जरूरी है कि हिंदुत्व की सांप्रदायिकता के साथ ही नव-उदारवाद से भी लड़ा जाए । हमारा इन 'सिद्धांतकारों' से एक छोटा सा सवाल है कि नव-उदारवाद से उनका तात्पर्य क्या है ? क्या यह इक्कीसवी सदी के पूँजीवाद से भिन्न कोई दूसरा अर्थ रखता है ? तब क्या फासीवाद-विरोधी किसी भी संयुक्त मोर्चे की यह पूर्व-शर्त होगी कि उसे पूँजीवाद-विरोधी भी होना पड़ेगा ? क्या मार्क्सवादी सिद्धांतकारों ने फासीवाद को पूँजीवाद के दायरे में भी एक अलग स्थान पर नहीं रखा था ? स्टालिन ने जब कहा था कि जनतंत्र के जिस झंडे को पूँजीवाद ने फेक दिया है, उसे उठा कर चलने का दायित्व कम्युनिस्टों का है, तब क्या वे प्रकारांतर से पूँजीवाद की ताक़तों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की पैरवी ही नहीं कर रहे थे ? दरअसल, सीपीआई(एम) का यह बहुमतवादी धड़ा शुद्ध गुटबाज़ी में लगा हुआ दिखाई देता है जो एक सैद्धांतिक संघर्ष की आड़ में पार्टी की पिछली कांग्रेस में सीताराम येचुरी को महासचिव बनाये जाने की अपनी पराजय का आगामी कांग्रेस में प्रतिशोध लेना चाहता है । इसके लिये थोथी लफ़्फ़ाज़ी के जरिये वह अभी जो खेल खेल रहा है, कहना न होगा, वह पार्टी को अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिये विभाजित कर देने तक की हद तक चले जाने के उन्माद की दशा में पहुंचता जा रहा है । पार्टी के अख़बारों का इस प्रकार की झूठी अंदरूनी सैद्धांतिक लड़ाई में खुल्लम-ख़ुल्ला प्रयोग करना कुछ इसी प्रकार के संकेत देता है


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