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तमाशा बनतीं फ़िल्में--सुप्रिया वर्मा
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कमल हासन की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म "विश्वरूप' (तमिल में "विश्वरूपम' और हिंदी में "विश्वरूप' के नाम से प्रदर्शित) तमाम विवादों के बावजूद दर्शकों को लुभाने में कामयाब नहीं हो पायी। फिल्म ने अब तक केवल 10 करोड़ रुपये का ही मुनाफा कमाया है। हालांकि कमल हासन ने खुद यह बात कही थी कि वे फिल्म पैसे कमाने के मकसद से नहीं बना रहे। अगर फिल्म बिना किसी विवाद के रिलीज होती, तो अच्छा मुनाफा कर पाती, लेकिन कुछ राजनीतिक पार्टियों और मुसलिम संगठनों ने फिजूल ही हंगामा खड़ा कर फिल्म की सोच को दर्शकों के सामने आने ही नहीं दिया। किसी फिल्म पर समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाने का यह पहला मुद्दा नहीं है। लेकिन यह बात मीडिया में लहर की तरह इसलिए फैली, क्योंकि फिल्म काफी लागत के साथ बनी है। साथ ही इसे डीटीएच के साथ रिलीज करने की बात थी। टिकट के दाम भी कहीं अधिक थे। कमल हासन ने इस संदर्भ में सच ही कहा है कि "यह विवाद धर्म की वजह से नहीं, बल्कि राजनीति की वजह से है।' दरअसल, होना यह चाहिए था कि पहले फिल्म देख ली जाये और देखने के बाद निर्णय लिया जाये कि विवाद उचित है या नहीं। फिल्म में ऐसी कोई बात नहीं दर्शायी गयी है, जिससे किसी भी समुदाय की भावना आहत हो। जाने-माने समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज इस बारे में अपनी सटीक राय रखते हैं कि "फिल्म के कुछ दृश्यों को लेकर हंगामा बरपा। चूंकि फिल्म तालिबान के कैंप की छवि पेश करती है, जिसमें दिखाया गया है कि इस्लाम की रूढ़ियों का पालन करने के साथ इस्लाम के नाम पर वे किस तरह के कुकृत्य में शामिल हैं और कैसा समाज रच रहे हैं। फिल्म के एक दृश्य में आतंकवादी ओमर अफसोस करता है कि उसने अपने बेटे को डॉक्टर बनने की इजाजत क्यों नहीं दी? "विश्वरूप' निश्चित रूप से इस्लाम की कट्टर धारणाओं पर हल्की चोट करती है।' गौर करें तो "विश्वरूप' किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि कट्टरता के साथ जन्मे आतंकवाद के मुद्दे को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती है। भारत में सिनेमा प्राय: राजनीतिज्ञों के लिए हमेशा सबसे आसान हथकंडा रहा है। सिनेमा के बहाने वे किसी न किसी समुदाय से अपनी भावना और हमदर्दी जोड़ते हैं और फिर अपने मकसद में कामयाब होते हैं। इससे पहले भी "आजा नच ले' के गीत से "मोची' शब्द हटाया गया था। "बिल्लू बारबर' फिल्म से "बारबर' हटाया गया था। शाहरुख खान की फिल्म "माइ नेम इज खान' पर भी महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ने काफी दिनों तक प्रतिबंध लगाने की कोशिश की थी, जबकि इस फिल्म में शाहरुख ने यह समझाने की कोशिश की थी कि हर खान आतंकवादी नहीं होता। लेकिन आमतौर पर हमारी यह फितरत बन चुकी है कि हम किसी सामान्य से मुद्दे को भी फिल्मों से जोड़ दें और उस पर विवाद शुरू कर दें। स्वतंत्रता के अधिकार का सबसे कम इस्तेमाल शायद फिल्मकारों को ही करने की इजाजत है। भारत में सिनेमा को जिन परीक्षाओं से पास होना होता है, वह है सेंसर बोर्ड। जब सेंसर बोर्ड से कोई फिल्म पास हो जाती है, तो उस पर किसी भी राजनीतिक पार्टी को यह हक नहीं मिलना चाहिए कि वे इस पर एक्शन ले सकें। इसका सीधा अर्थ है कि हमें अपने सेंसर बोर्ड पर भी भरोसा नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि कई बार जान-बूझकर फिल्मों से विवादों को जोड़ा जाता है, ताकि फिल्मों के प्रति दर्शकों का रुझान बढ़े और आंकड़े साफ बताते हैं कि जिन फिल्मों के साथ भी किसी तरह के विवाद जुड़े हैं, वे सुपरहिट रही हैं। लेकिन "विश्वरूप' के साथ ऐसा नहीं हो रहा। फिल्म की पहले से ही काफी नकारात्मक पब्लिसिटी कर दी गयी हैऔर कमल का साथ देनेवालों में काफी कम लोगों का नाम सामने आ रहा है। रजनीकांत, सलमान खान, रेखा, जीतेंद्र जैसी हस्तियों ने कमल को सहयोग तो दिया है, लेकिन फिर भी कमल अपनी सोच में कामयाब नहीं हो पा रहे। आंध्रप्रदेश और केरल जहां मुस्लिमों की अच्छी-खासी आबादी है, वहां "विश्वरूप' को रिलीज किया गया और कई थियेटरों के शोज हाउसफुल रहे। वहां के कई मुसलिम संगठनों ने यह बात मानी कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं, जिससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हों। स्पष्ट है कि राजनीतिक फायदे के लिए इस बात को तूल दिया गया। फिल्म क्रिटिक एल रामचंद्र कहते हैं कि "क्या हम किसी ऐसे देश में रहते हैं जहां अपनी सोच को स्वतंत्र रूप से दर्शाने पर हमारे साथ ऐसा सलूक होगा?' फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर इस बारे में अपना तर्क रखते हैं कि "किसी भी फिल्म पर प्रश्नचिह्न लगाने से पहले फिल्म से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों को फिल्म देखना जरूरी है। साथ ही, भारत में अब भी सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम माना जाता है, जबकि इसे विषय के रूप में छात्रों को पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि नयी पीढ़ी खुद इस बात को समझे कि क्या अच्छा है, क्या बुरा और अगर किसी फिल्म के साथ नाइंसाफी हो तो वह उस पर अपनी सार्थक प्रतिक्रिया दे सके।'"विश्वरूप' के तुरंत बाद रिलीज हुई फिल्म "मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' भी कुछ इसी तरह विवादों की शिकार हुई। एक दौर था जब फिल्मों से किसी विवाद का जुड़ना फिल्म की 100 फीसद गारंटी होती थी। लेकिन हाल ही में कमल हासन के साथ-साथ दीपा मेहता की रिलीज हुई फिल्म "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' के प्रति दर्शकों का रुझान देखकर यही तसवीर साफ हो रही है कि अब दर्शक विवादित फिल्मों के प्रति उदासीन हो जाते हैं। कमल हासन की फिल्म "विश्वरूप' की तरह ही दीपा मेहता की इस फिल्म को भी भारत में कई स्थानों पर रिलीज होने से रोका गया। वजह थी कि भारत के कुछ राजनीतिज्ञों का मानना है कि "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' में भारत की निंदा की गयी है और फिल्म भारत की गलत छवि प्रस्तुत करती है। बकौल दीपा मेहता, "भारत के दर्शक और भारत के लोग आज भी सिनेमा को व्यापक तौर पर नहीं देख पा रहे। मैं लगातार भारतीय सिनेमा बनाने और फिर उसे भारत में रिलीज करने के लिए संघर्ष करती रहती हूं। सलमान रुश्दी की किताब "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' या फिर किताब पर आधारित मेरी फिल्म में वास्तविक तसवीर पेश की गयी है। "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' से पहले भी लिखे गये उपन्यास "द सैटेनिक वर्सेज' विवादित रही थी। रुश्दी और रुश्दी की किताबें हमेशा विवादित रही हैंऔर "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' भी उनमें से एक है। हिंदुस्तान में अब भी कम लोग ही ऐसी कहानियां कहने की हिम्मत रख पाते हैं, जिसमें राजनीतिक हस्तियों की जिंदगी से जुड़ी कहानियों को प्रस्तुत किया जा सके। राजनीतिज्ञ इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं कि सिनेमा की पहुंच कितनी व्यापक है और अगर वह लोगों तक पहुंचा तो कई राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं का असली चेहरा या सरकार की कमजोरियां किसी न किसी रूप में प्रस्तुत जरूर करेगा। सो, वे आम लोगों की भावनाओं को हथियार बना कर विवाद छेड़ देते हैं और फिर तमाशबीन होकर देखते हैं। प्रकाश झा की फिल्में भी प्राय: ऐसे विवादों से घिर जाती हैं। हाल ही में रिलीज उनकी फिल्म "चक्रव्यूह' के एक गीत को लेकर भी काफी हंगामा बरपा था। फिल्म समीक्षक और आलोचक जयप्रकाश चौकसे मानते हैं कि "अब भी भारत का दर्शक संवेदनशील विषयों पर आधारित फिल्मों को हजम नहीं कर पाता। जिन्हें हमेशा मिर्च-मसाला खाने की आदत है, उन्हें उबला खाना कभी स्वादिष्ट नहीं लग सकता। यही वजह है कि "द मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' हो या "विश्वरूप', ये फिल्में आम दर्शकों तक पहुंचना तो दूर, दर्शकों को दिलचस्पी भी हासिल नहीं कर पातीं। ये फिल्में अगर बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो रहीं, तो इसका मतलब यह नहीं कि इनकी सार्थकता खत्म हो गयी है। सुप्रिया वर्मा ( सौज. पब्लिक एजेंडा)


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