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दिनकर पर गांधीजी का गहरा प्रभाव था, पर उन्होंने कभी अंध-समर्थन नहीं किया। नेहरू युग में वे उनके आलोचक भी रहे और संकट के क्षणों में सहारा भी बने। एक प्रसिद्ध प्रसंग में, जब लालकिले की सीढ़ियों पर नेहरू का संतुलन बिगड़ा, तो दिनकर ने उन्हें थाम लिया। नेहरू के आभार पर दिनकर का उत्तर था— “जब-जब सत्ता लड़खड़ाती है, साहित्य उसे संभाल लेता है।”
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि भर नहीं, बल्कि अपने समय की राजनीति, समाज और साहित्य को समझने का एक अवसर भी है। दिनकर उन विरले साहित्यकारों में थे जो सत्ता के निकट रहे, पर कभी उसके मोहपाश में बंधे नहीं। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल जनता की आवाज़ उठाई, बल्कि डगमगाती सत्ता को भी आईना दिखाया और जरूरत पड़ने पर उसे संभालने का नैतिक साहस भी रखा।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ में दिनकर ने महात्मा गांधी पर विस्तृत विमर्श लिखा है। गांधी के विचारों को उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि भारत का मूल स्वभाव युद्धप्रिय नहीं, बल्कि शांति और सेवा का रहा है। यहां अर्जुन से अधिक युधिष्ठिर, चंद्रगुप्त से अधिक अशोक आदर्श रहे हैं। दिनकर का विश्वास था कि भविष्य का विश्व हिटलर और सिकंदर का नहीं, बल्कि बुद्ध और गांधी का होगा।
वे भारतीय परंपरा की उस धारा को रेखांकित करते हैं जो उपनिषदों से लेकर बुद्ध, महावीर, रामकृष्ण, विवेकानंद और गांधी तक अहिंसा, प्रेम और सहिष्णुता का संदेश देती आई है। उनके अनुसार प्रेम मनुष्य का सर्वोच्च धर्म है, और सहिष्णुता तथा परोपकार उसके सबसे बड़े साधन।
स्वतंत्रता संग्राम और वैश्विक उथल-पुथल के दौर में लिखी उनकी पंक्तियां आज भी चेतावनी की तरह गूंजती हैं—
“समर शेष है,
नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं,
समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
इन पंक्तियों में दिनकर ने स्पष्ट कर दिया कि अन्याय के सामने मौन रहना भी अपराध है, और इतिहास तटस्थों को भी कठघरे में खड़ा करता है।
गांधीजी की हत्या के बाद लिखी उनकी कविता में एक गहरी आत्मग्लानि और करुण पुकार है-
“लौटो, छूने दो एक बार फिर
अपना चरण अभयकारी…
रोने दो पकड़ वही छाती,
जिसमें हमने गोली मारी।”
यह केवल शोक नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आह्वान है।
दिनकर पर गांधीजी का गहरा प्रभाव था, पर उन्होंने कभी अंध-समर्थन नहीं किया। नेहरू युग में वे उनके आलोचक भी रहे और संकट के क्षणों में सहारा भी बने। एक प्रसिद्ध प्रसंग में, जब लालकिले की सीढ़ियों पर नेहरू का संतुलन बिगड़ा, तो दिनकर ने उन्हें थाम लिया। नेहरू के आभार पर दिनकर का उत्तर था—
“जब-जब सत्ता लड़खड़ाती है, साहित्य उसे संभाल लेता है।”
दिनकर ने अपने लेखन काल में कांग्रेस के प्रभुत्व वाले राजनीतिक दौर को देखा। उन्होंने नेहरू को ‘लोकदेव’ कहकर सम्मानित किया, पर चीन युद्ध के बाद उनकी नीतियों की तीखी आलोचना भी की। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में उनका आक्रोश साफ झलकता है।
समय के साथ उनका मोहभंग हुआ और वे जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की ओर आशा से देखने लगे। उनकी ओजस्वी पंक्तियां आंदोलन की आवाज बन गईं-
“सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है…
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”
दुर्भाग्य से, इस क्रांति के पूर्ण स्वरूप को देखने से पहले ही 24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी वाणी आज भी जीवित है—संसद से लेकर सड़क तक, हर संघर्ष और हर विमर्श में।
दिनकर केवल कवि नहीं थे, वे समय की चेतना थे—जो सत्ता के साथ खड़े होकर भी जनता के पक्ष में डटे रहे।
राष्ट्रकवि को विनम्र नमन
(राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर विशेष) गांधी दर्शन 24 अप्रैल 2026 से साभार
