आज डॉ बी आर अम्बेडकर की जन्मतिथि है । जून १९४२ में डॉ अम्बेडकर ने फिल्मों पर फ़िल्म इंडिया से बातचीत की थी। मूल बातचीत अंग्रेज़ी में है। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने फ़िल्म इंडिया की बातचीत का हिंदी अनुवाद किया है । आइए आज पढ़ते हैं – (संपादक)
फिल्मइंडिया पत्रिका के जून 1942 के अंक में डॉ बि आर अंबेडकर का यह इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था। इंटरव्यू पत्रिका के विशेष प्रतिनधि ने किया था। चूंकि पत्रिका के एडिटर बाबूराव पटेल थे, इसलिए ऐसा हो सकता है कि विशेष प्रतिनिधि वे स्वयं हों। अगर यह बातचीत उन्होंने नहीं की होगी तब भी बतौर एडिटर उन्होंने कॉपी देखी होगी और प्रकाशन की सहमति दी होगी।
‘ओह, यह अभागा हिंदुस्तान!’ डॉ. अंबेडकर कहते हैं!
मनुष्य के देवीकरण की उन्होंने भर्त्सना की।
राम और अन्य देवताओं की मूर्तियाँ चकनाचूर करो।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर से बात करने का मतलब है अपने दिमाग को विभिन्न प्रकार की उपयोगी जानकारी से भरने का अवसर प्राप्त करना है। इसके साथ ही लोगों और चीजों के बारे में उनके कुछ अनोखे विचार सुनने का सुख मिलना है। जब आप उनसे बात शुरू करते हैं तो वे आपको बोलने का मौका देने को तैयार रहते हैं, लेकिन आप चाहते हैं कि वे ही बात को आगे बढ़ाएं, क्योंकि यह हमारे अपने फायदे के लिए है। बातचीत में वह विश्वकोश हैं।
इस विद्वान डॉक्टर की ज्यादा रुचियां नहीं हैं। उनका एकमात्र जुनून है पढ़ना। लेखन का स्थान उनके लिए दूसरा है। वे केवल तभी लिखते हैं, जब उनके भीतर से कोई प्रेरणा मिलती है। लेकिन पढ़ते वे हर समय हैं। मुझे अक्सर उनके साथ सार्वजनिक हित के मामलों पर चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और कई बार उन्होंने स्वयं इन विषयों पर विस्तार से बात करने की पहल की है। इस बार मैं उनसे फिल्मों, उनके निर्माताओं, उनके कार्यों के बारे में उनके विचार जानने गया था। मैं चाहता था कि वह सब कुछ बताएं।
उनके दादर स्थित घर पर उनसे मिलना तय हुआ था। लेकिन चूंकि वे इस समय अपनी किताब ‘हिंदुओं ने हमारे साथ क्या किया?’ लिख रहे हैं, इसलिए अपने पूरे जीवन में कितनी फिल्में देखी होंगी? शायद एक दर्जन से ज्यादा नहीं। क्या मुझे नहीं पता कि सैकड़ों अन्य फिल्में थीं, जिन्हें अगर मैं देखता तो मुझे अच्छा लगता? लेकिन मैंने खुद को एक जायज आनंद से वंचित रखा। यह एक तरह की आत्मयातना है, जिसमें सभी भारतीय लिप्त हैं और वे खुद को यह समझाते हैं कि वे महान दार्शनिक हैं, जीवन की निरर्थकता में विश्वास करने वाले और ईश्वर के सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिशाली होने में यकीन करने वाले। मेरी पत्नी इतनी अच्छी थीं, लेकिन वह सोचती थीं कि जब भी वह दिल खोलकर हंसती या थोड़ा हंसी-मजाक या खुशी की बात करती हैं तो वह कोई पाप कर रही हैं और अपने ईश्वर के खिलाफ कोई गलती कर रही है। यही हमारा स्वभाव है और मुझे उम्मीद है कि फिल्में इस मामले में हम में कुछ सुधार करेंगी।‘
विद्वान डॉक्टर का हमारे बीच फिल्मों का स्वागत करने का यही तरीका था। जब उन्होंने अपनी दिवंगत पत्नी का वर्णन किया तो मुझे लगा कि वे पारंपरिक भारतीय नारी का वर्णन कर रहे हैं, जो रूढ़िगत परिवेश में पली-बढ़ी है।
भारतीय बच्चे का जन्म
देश की जनता को शिक्षित करने में फिल्में जो प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, इस पर बोलते हुए, उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि अमेरिका और यूरोप में भी ब्लैकबोर्ड और व्याख्यानों के बजाय फिल्मों का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ है या नहीं? उन्होंने माना कि रूस के लोग अपनी विशेषज्ञता के साथ कुशल तरीके से हर संभव कोशिश कर रहे होंगे।
‘हमारे लोगों, केवल बच्चे ही नहीं, वयस्क और बड़ों को भी, सिखाने की जरूरत है। शहरी और ग्रामीण सभी क्षेत्रों में लोगों को बताना होगा कि कैसे जीना है, शरीर की देखभाल कैसे करनी है, बीमारियों से कैसे बचना है? इस देश में फिल्मों के निर्माता महान देशभक्ति का कार्य करेंगे, यदि वे ऐसी फिल्में बनाएं और उन्हें जनता को दिखाएं।
‘मैंने कुछ समय पहले एक फिल्म देखी थी जिसका नाम था ‘द बर्थ ऑफ ए बेबी।’ मेरे विचार में शैक्षिक और प्रचारात्मक फिल्म ऐसी ही होनी चाहिए। उस फिल्म में एक भी प्रसिद्ध स्टार नहीं था। उसमें जो डॉक्टर, नर्स, मरीज, पति और पत्नियां थीं, वे सभी बिल्कुल साधारण लोग थे। कितने शानदार तरीके से वह फिल्म सिखाती है कि किशोर लड़के और लड़कियां, विवाह पूर्व, विवाह के समय और विवाह के बाद के चरणों में कैसे व्यवहार करें और नवजात शिशुओं की देखभाल कैसे करें? अवांछित गर्भपात के खिलाफ और सही प्रकार के जन्म नियंत्रण के पक्ष में कितना प्रभावी प्रचार था उस फिल्म में! मैं चाहता हूं कि यहां कोई निर्माण कंपनी उस फिल्म को कॉपी करने की अनुमति ले। भारतीय परिदृश्य के अनुरूप थोड़े बदलाव के साथ उसे बनाए। यह एक बहुत जरूरी सामाजिक सेवा होगी।‘
डॉक्टर का दुर्भाग्य
‘मैं किसी भी तरह से फिल्मों का आदमी नहीं हूं, न ही प्रशंसक हूं। मैं इसे एक दुर्भाग्य मानता हूं। लेकिन जब आप जीवन में काफी आगे बढ़ चुके होते हैं तो आप अपनी आदतें और रुचियां नहीं बदल सकते। मेरा एकमात्र जुनून किताबें हैं। मैं पढ़ाकू और समझदार पाठक हूं। मैं कभी-कभी किताब लिखता हूं, जब मुझे एक अनिवार्य प्रेरणा मिलती है। लेकिन मैं सोचता हूं कि फिल्में मेरा जुनून होतीं। शिक्षा के लिए वे निस्संदेह किताबों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और संभावनाशील साधन हैं। ज्यादातर लोग दृश्य छवियों और चित्रों के माध्यम से सीखते हैं। जब आप एक फिल्म देखते हैं तो आप अपनी सभी इंद्रियों का पूरा उपयोग करते हैं और यह शिक्षा को आसान और अधिक प्रभावी बनाता है। अगर मेरा संदेश ‘फिल्मइंडिया’ के पाठकों के लिए कोई मूल्य रखता है, तो मैं उन्हें कहूंगा कि वे फिल्मों और उनके सामाजिक कल्याण और सामाजिक सेवा के लिए उनके विविध उपयोगों में जितनी हो सके उतनी गहरी रुचि लें।‘
यहां मैंने बीच में टोका, ‘क्या आपको नहीं लगता कि यदि कोई आदर्शवादी और प्रगतिशील निर्माता दबे-कुचले वर्गों के उत्थान और मुक्ति के आंदोलन की फिल्म बनाए तो यह हमारे बीच से छुआछूत को हटाने के लिए उत्कृष्ट प्रचार होगा?’
‘बिल्कुल होगा। लेकिन हमारे निर्माताओं को अभी भी पौराणिक मूर्खताओं, विचित्रताओं और साधारण लोगों के देवीकरण से बाहर निकलना बाकी है। वास्तव में आप एक अत्यंत स्वागत योग्य प्रस्ताव दे रहे हैं। एकनाथ और चोखा मेला की कहानियों को हमारे कीर्तनकार और पुराणिक सारी सनक और चमत्कारों के साथ रस लेकर दोहराते और सुनाते हैं। 20वीं सदी के आविष्कारों और तकनीक के साथ अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली कहानियों को स्क्रीन पर लाने के बजाय अगर हमारे निर्माता यह दिखाने में रुचि लें कि दबे-कुचले वर्ग का आंदोलन अपनी मानवीय और धार्मिक खोल से बाहर निकलकर एक आत्मनिर्भर आंदोलन में बदल गया है। वह मनुष्य के अधिकारों की मांग करता है।
“मैं यह भी चाहूंगा कि हमारे मूर्तियां स्क्रीन पर चकनाचूर हों। मेरा मतलब है कि राम जैसे मूर्तियों का खुलासा करना चाहिए और उनके असली रंगों को दिखाना चाहिए। हमारी पुराणों की कहानियों को आधुनिक शोध के प्रकाश में पूरी तरह से संशोधित करना होगा और उन्हें सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना होगा। मुझे किसी निर्माता से उम्मीद नहीं है कि वह ऐसा करेगा। वे अपने वर्तमान सीधे-सादे दर्शकों की नाराजगी और अस्वीकृति को सहन नहीं कर पाएंगे। लेकिन हमारे आंदोलन का एक वृत्तचित्र, जिसमें वी. आर. शिंदे जैसे सामाजिक सुधारकों और गांधी, बिरला और ठक्कर जैसे मानवतावादियों की भूमिका का खुलासा हो या सही प्रतिनिधित्व हो। नासिक और महाड सत्याग्रह की घटनाएं हों, तो मुझे बहुत खुशी होगी। हम केवल हरिजन कहलाने या दया किए जाने से तंग आ चुके हैं। हम सभी अन्य मनुष्यों के साथ समान अवसर चाहते हैं और वह भी केवल अमेरिका के संविधान में प्राप्त अधिकारों की घोषणा की शैक्षणिक शैली में नहीं। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हमें आर्थिक समानता नहीं मिलती, जो केवल एक समाजवादी समाज और समाजवादी राज्य के तहत सुरक्षित होगी। अगर मुझे अपने आंदोलन का एक वृत्तचित्र बनाने का मौका मिले, तो मैं इसमें इस आदर्शवाद के लिए जगह ढूंढूंगा।”
ओह, यह अभागा हिंदुस्तान!
विद्वान डॉक्टर ने हमारे निर्माताओं को एक उत्कृष्ट थीम सुझाई थी और चूंकि मैं पहले ही उनका काफी समय ले चुका था। मैं उन्हें हार्दिक धन्यवाद और अलविदा कहने वाला था, तभी वे अपनी सीट से उठे। उन्होंने मेरे कंधे पर एक हाथ रखा और बोले, “मुझे आपको फिल्मों के एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू के बारे में कुछ बताना चाहिए। फिल्में थिएटर में आनंद लेने के लिए होती हैं। हर किसी को मनोरंजन करने का अधिकार है, जब वह उसकी कीमत चुकाता है। लेकिन किसी को भी इससे ज्यादा दावा करने का अधिकार नहीं है।”
मैं सोच रहा था कि उन्होंने कौन सा नया विषय शुरू कर दिया। वे व्यंग्यात्मक हो रहे थे, जैसा कि वे अक्सर करते हैं, और जब वे ऐसा करते हैं तो उनका चेहरा एक खास तरह का हो जाता है, वे अपने हाथ पतलून की जेब में डाल लेते हैं, आपको घूरते हैं और कुछ ज्यादा स्थिरता से बोलते हैं, हर शब्द पर जोर देते हुए।
वे आगे बोले, ‘आपका शो के लिए टिकट खरीदना आपको अपने सामने की सीट पर पान की पीक या उससे भी बदतर चीज थूकने का हक नहीं देता, न ही आपको अपने दोस्त के साथ दुकान की बातें करने का अधिकार मिल जाता है, जिससे आपके बगल में बैठे लोग परेशान हों, या शो के दौरान खाने-पीने और दूसरों के कपड़े और आनंद को खराब करने का। यह सब तब रुकेगा जब सार्वजनिक स्थानों पर व्यवहार का एक छोटा सा कोड विकसित होगा। आपको हर थिएटर में एक बोर्ड लगाना होगा, जिसमें लिखा होगा कि यहां धूम्रपान की सख्त मनाही है, लेकिन कई लोग उस नियम को तोड़ते हुए पाए जाएंगे और कुछ गैर-धूम्रपान करने वाले पुरुषों और महिलाओं को परेशान करेंगे। हम में सामान्य शिष्टाचार और अच्छे व्यवहार की कमी है, जो पश्चिमी जीवन में आम हैं। हम इन्हें कब अपनाएंगे? और अचानक, उन्होंने मराठी में फटकार लगाई। मराठी फटकार का आशय था ‘हे भगवान, इस अभागे हिंदुस्तान का क्या करोगे!’
अनुवाद और प्रस्तुति अजय ब्रह्मात्मज
AjayBrahmatmaj की पोस्ट से साभार)
