प्रसिद्ध फ़िल्म ‘जजमेंट इन द न्यूरेम्बर्ग -1961’ पर वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज द्वारा लिखे गए निबंध का पहला भाग अपने पढ़ा । आज उसी निबंध के फुटकर नोट्स का यह एक और अंश, जिसमें एक आरोपी न्यायाधीश का अपराध बोध जाग्रत हो गया है और वह कन्फेशन में कुछ बयान दे रहा है।पढ़ें दूसरी पोस्ट –
मी लॉर्ड,
यदि आप इस मामले को समझना चाहते हैं तो आपको उस वक़्त को समझना ही पड़ेगा. वह नाज़ियों का वक़्त था. युद्धजन्य अपमान और असम्मान का बुख़ार फैला हुआ था. भूख और बेरोज़गारी थी. जिसकी ओट लेकर लोकतंत्र के सारे तत्व, सारे अवयव नष्ट कर दिए गए थे. सब तरफ़ सिर्फ़ भय ही भय था. आज का डर, कल का डर, पड़ोसियों का डर, यहाँ तक कि ख़ुद का भी डर. कि ‘न डरो तो डरो कि हुकुम होगा कि डर’! जब तक उस समय में भय की इस व्याप्ति को न समझा जाएगा तब तक आप नहीं समझ सकेंगे कि एक तानाशाह क्या होता है. तानाशाही में रहना क्या होता है.
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इसके अलावा हमें गौरव दिया गया. वह गर्व जो अंधा बना सकता है. कि सिर उठाकर जियो, अपने देश पर अभिमान करो. हम आर्यन हैं। शुद्ध और श्रेष्ठतम। असीम गर्व करो. और समझाया गया कि इस गौरव के रास्ते में, देश की प्रगति में कुछ चीज़ें, कुछ लोग बाधा हैं, जैसे- कम्युनिस्ट, उदारवादी, अल्पसंख्यक, बंजारे, आदिवासी. यदि ये नष्ट होंगे तो सभी देशवासी संपन्न हो जाएँगे. हम न्यायाधीश और बुद्धिजीवी होने के नाते समझ सकते थे कि तानाशाह के ये शब्द झूठे हैं. ख़तरनाक हैं. फिर हम चुप क्यों रहे? हमने कुछ किया क्यों नहीं? क्योंकि हमारे भीतर उस तथाकथित देशप्रेम की ज्वाला धधका दी गई थी. हम भी सोचने लगे थे कि यदि कुछ राजनीतिक विरोधियों, प्रतिवादियों के अधिकार ख़त्म हो जाएँ तो क्या? यदि कुछ अल्पसंख्यक नष्ट हो जाएँ तो क्या? राष्ट्रीय विकास के रास्ते में यह होता है.
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दूसरा हमें लगा कि यह सब देर तक और दूर तक नहीं चलेगा. हिटलर ने हमें जो समझाया गया, वही हमने मान लिया. कि देश ख़तरे में है, कुछ सख़्त क़दम उठाने होंगे. कठोर उपाय करना होंगे. संदेश दिया गया- ‘आगे बढ़ो.’ जैसे यही चाबी थी. यही कूट संकेत था, यही पासवर्ड: ‘गो फॉरवर्ड.’
कुचलते हुए भी आगे बढ़ो.
नतीज़ा यह हुआ कि हम इस गर्वीली आकांक्षा में जंगली हो गए. घृणा और ताक़त ने हिटलर को विस्मयकारी नेता बना दिया. संसार का बड़ा नेता. कई देश उसके मित्र बने, उन्होंने हिटलर की साम्राज्यवादी, हड़प नीति में साथ दिया. जब तक हमें अहसास होता कि हम कितने ख़तरे में हैं, पानी नाक तक आ चुका था. फिर हमें लगा कि यह एक छोटा-सा दौर है, जल्दी ही गुज़र जाएगा. लेकिन यह छोटा-सा दौर जीवन जीने के तरीक़े में बदल गया.
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यह समझने में देर लगी कि घृणा कुछ समय की बात नहीं होती, वह प्रवेश कर ले तो फिर जीवन-प्रणाली हो जाती है. इसलिए अब मैं यहाँ, अपने ही वकील की, मेरे बचाव पक्ष के ऐडवोकेट की यह जिरह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हूँ जो मुझे बचाने के लिए कह रहा है कि तानाशाही शासन ने यह सब जनता की भलाई के लिए किया था। कि अल्पसंख्यक होना भर मुसीबत की जड़ मान लिया जाएगा. हम भी उन अपराधों में शामिल रहे. हमें यह शर्मिंदगी स्वीकार करना चाहिए. चाहे इस बात में कितनी भी तकलीफ़ क्यों न हो.
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आज यह कहना कि हमें चीज़ों का संज्ञान या अंदाज़ा नहीं था, झूठ है. कई प्रकरणों में हम पहले से मन बना चुके होते थे कि तथाकथित राष्ट्रहित में क्या निर्णय करना है. विधर्मी को, अल्पसंख्यक को अपराधी ठहराना है. यही देशसेवा है. हमें अच्छी तरह पता था कि हमारा नेता घृणा का प्रचारक है, हम देख रहे थे कि ‘ख़ास’ पड़ोसियों की, लोगों की सरेबाज़ार हत्याएँ हो रही हैं. लोगों को ट्रेनों में ठूँसकर, जानवरों से भी बदतर और अधिक क्रूर तरीक़ों से विस्थापित किया जा रहा है. उन दिशाओं में भेजा जा रहा है जहाँ से आगे यम की दिशा है. जहाँ से आगे कोई रास्ता नहीं, सिर्फ़ मृत्यु है. उनकी चीख़ें सुनकर भी अगर आज हम कहते हैं कि हमें कुछ अंदाज़ा नहीं था, कि अरे, इतना ग़लत हो रहा था, तो क्या हम सब मूक-बधिर और अंधे थे?
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दरअसल, कई बार हम चीज़ों को इसलिए भी नहीं जानते थे क्योंकि हम जानना नहीं चाहते थे. क्योंकि इसी में हमारी व्यक्तिगत भलाई थी, इसी में हमारा निजी जीवन सुरक्षित था. हो सकता है हमें अंदाज़ा न रहा हो कि लाखों लोगों को गैस चैम्बर्स में मारा जा रहा है लेकिन हज़ारों लोगों का अनुमान तो था ही. मगर इस कम-ज़्यादा संख्या से हमारा अपराध क़तई कम नहीं होता है.
अब न्याय मंत्रालय को, देश को बताने का वक़्त आ गया है कि मेरी जानकारी अनुसार मेरे सह आरोपी न्यायाधीशों ने सत्ता के अनुकूल निर्णय देकर अकूत संपत्तियाँ बनाईं. ये नफ़रत और विद्वेष से भरे हुए थे. ये भ्रष्टाचार के ख़तरनाक उदाहरण थे. इन्होंने अपने को ‘सत्ता की मरज़ी’ के हवाले कर दिया था. और मैं!! मैं ख़ुद सब जान-समझकर भी इनके साथ बना रहा. इस क़दर कि आख़िर मैं एक अपवित्रता में, विष्ठा में तबदील हो गया, क्योंकि मैं इनका साझीदार हुआ.
मेरी यही स्वीकारोक्ति है.
(पीठिका- यह मुक़दमा उन न्यायाधीशों पर चलाया गया था, जिनके सत्तामुखी आदेशों से आम लोगों, खासतौर पर अल्पसंख्यक यहूदियों को भारी तकलीफ़ हुई या उन्हें मार डाला गया। इन न्यायाधीशों के बचाव संबंधी पैरवी के प्रतिवाद में जो तर्क रखे गए, वे आज भी दुनिया भर में विचारणीय हो सकते हैं। उनकी बानगी यहाँ पेश है।
ये इस विषयक बनाई प्रसिद्ध फ़िल्म ‘जजमेंट इन द न्यूरेम्बर्ग -1961’ पर लिखे गए मेरे निबंध के कुछ फुटकर हिस्से हैं। आज यह एक और अंश, जिसमें एक आरोपी न्यायाधीश का अपराध बोध जाग्रत हो गया है और वह कन्फेशन में कुछ बयान दे रहा है।)
(वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज की पोस्ट से साभार)
