हिटलर के बाद :”न्यूरेम्बर्ग मुक़दमा “-
यह मुक़दमा उन न्यायाधीशों पर चलाया गया था, जिनके सत्तामुखी आदेशों से आम लोगों, खासतौर पर अल्पसंख्यक यहूदियों को भारी तकलीफ़ हुई या उन्हें मार डाला गया। इन न्यायाधीशों के बचाव संबंधी पैरवी के प्रतिवाद में जो तर्क रखे गए, वे आज भी दुनिया भर में विचारणीय हो सकते हैं। फिल्म पर वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज द्वारा लिखे गए निबंध के फुटकर हिस्से पढ़ें –
हिटलर के बाद :”न्यूरेम्बर्ग मुक़दमा “-
यह मुक़दमा उन न्यायाधीशों पर चलाया गया था, जिनके सत्तामुखी आदेशों से आम लोगों, खासतौर पर अल्पसंख्यक यहूदियों को भारी तकलीफ़ हुई या उन्हें मार डाला गया। इन न्यायाधीशों के बचाव संबंधी पैरवी के प्रतिवाद में जो तर्क रखे गए, वे आज भी दुनिया भर में विचारणीय हो सकते हैं। उनकी बानगी यहाँ पेश है। ये इस विषयक बनाई प्रसिद्ध फ़िल्म ‘जजमेंट इन द न्यूरेम्बर्ग -1961’ पर लिखे निबंध के फुटकर हिस्से हैं- कुमार अंबुज
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“#मी #लॉर्ड,
फिर न्यायिक विवेक का क्या होगा? न्यायाधीश भले क़ानून नहीं बनाते हैं लेकिन वे क़ानूनों का सही भावना में लागू होना सुनिश्चित करते हैं. जो शब्दों में नहीं लिखा होता है, उस उदात्त आशय को ग्रहण करते हैं. यदि चीज़ें केवल काग़ज़ों, नियमों, धाराओं और साक्ष्यों से सहज स्पष्ट होती हों तो फिर न्यायाधीशों की ज़रूरत क्या है. तब तो कोई यंत्र भी न्याय कर सकता है. लेकिन हर कोई समझ सकता है कि वह न्याय नहीं होगा. जब तक पीड़ित पक्ष पर ग़ौर नहीं किया जाएगा, जब तक उसके प्रति संवेदनात्मक दृष्टि न होगी, करुणा न होगी, जब तक उसकी परिस्थितियों और तकलीफ़ों पर विवेकपूर्ण विचार नहीं किया जाएगा, वह कभी न्याय प्राप्त नहीं कर सकेगा.
हो सकता है पीड़ित के पास अकाट्य प्रमाण न हों, उसके गवाह कमज़ोर हों, भयग्रस्त हों या वह ख़ुद शक्तिहीन हो. यों भी राज्य और उसके उपकरणों की क्रूर संरचनाएँ इतनी ताक़तवर, मदांध होती हैं कि बिना न्यायाधीशों की सजगता के, बौद्धिक तार्किक विश्लेषणात्मक क्षमता के बग़ैर कोई न्याय संभव नहीं. और जब न्यायाधीश ही सत्ता के पक्षधर हो जाएँ, लोभ और भय से पस्त हों तो फिर महज़ अन्याय ही हासिल होगा.
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जब विधर्मियों के साथ किसी भी संपर्क को, स्पर्श मात्र को अश्लील साबित कर दिया गया. एक चुंबन, हार्दिक आलिंगन और प्रेमिल छुअन को भी अपराध बना दिया गया. अल्पसंख्यक होने या फासिज़्म विरोधी होने के कारण उन्हें मानवीय अधिकारों से ही नहीं, सहज मानवीय गरिमा से भी वंचित किया गया. झूठे आरोपों की बारिश की गई. उन्हें बिना सबूत सज़ाएँ दी गईं. थानों में, यातना शिविरों में, फिर गैस-चैम्बर्स में भेजा गया और यह सब इन न्यायाधीशों के आदेशों से हुआ. उन फ़रमानों पर दस्तख़त किए गए जो इन्हें पता था कि वे मौत के परवाने हैं. मानो ये न्यायाधीश नहीं रह गए थे, नाज़ी-दल के न्यायिक प्रतिनिधियों की तरह काम कर रहे थे. इन्होंने आत्मसमर्पण करते हुए अपनी पोशाक पर स्वस्तिक निशान धारण किया. ये हिटलर और उनके साथियों की तरह ही दोषी हैं. यदि ये न्याय-विवेक रखते, निर्दोष लोगों की जान बख़्शते तो वह एक मिसाल होती. पूरा देश ग़लत राह पर चलने से बच सकता था.
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इनका क़ानूनी ज्ञान, विशेषज्ञता और उपाधियाँ किस काम की अगर वे इन्हें न्याय करते समय साहसी और विवेकसम्मत नहीं रख पाईं. यदि ये भी भीरुता और लालच का शिकार हुए तो इनकी अकादेमिकता का, इनकी नैतिकता क्या अर्थ? जो अपराध राज्य या शासन द्वारा और राजनीतिक स्वार्थ प्रेरित होते हैं, उन्हें तो केवल न्यायालय दुरुस्त कर सकता है. वह उनकी चूकों, इरादों या अपराधों को अपनी ओट नहीं बना सकता. जबकि ऐसे उदाहरण भी हैं कि कई न्यायाधीशों ने अपना प्रतिवाद सार्वजनिक रूप से रखा. अनेक त्यागपत्र देकर चले गए लेकिन अन्याय करने में शामिल नहीं हुए. स्पष्ट है इन जैसे बाक़ी लोगों ने नयी परिस्थितियों से, नए शासन से, नयी राजनीति से समायोजन कर लिया. मुमकिन है कि इन्हें शुरू में उतनी भयावहता का अनुमान न रहा हो लेकिन ये इसके न केवल अभ्यस्त हो गए बल्कि तंत्र के भागीदार बनकर लाभान्वित भी हुए. जबकि ये चाहते तो अपना प्रतिवाद दर्ज कर सकते थे. अन्यायपूर्ण आदेशों पर हस्ताक्षर करने से मना कर सकते थे.
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यदि चारों तरफ़ भय का, घृणा का वातावरण था तब भी ये न्यायाधीश अपने निर्णयों से माहौल को बेहतरी की तरफ़ ले जा सकते थे. क्या विद्वान न्यायाधीश यह नहीं समझ सके कि उनका उपयोग औज़ार की तरह किया जा रहा है. उनका जीवन कितना संकट में आता, यह प्रश्न ही उचित नहीं. एक सैनिक अपना जीवन जोख़िम में डालकर भी देश को बचाता है, उसी तरह न्यायाधीशों से भी अपने जीवन या सुख की चिंता किए बिना, देशहित में काम करना अपेक्षित है. तब लोगों को कहीं से तो उम्मीद दिखती. अकसर वह उम्मीद न्यायालय से होती है. इन्होंने उस आशा को ही खंडित कर दिया. इससे बड़ा अन्याय ये क्या कर सकते थे कि न्याय की आशा ही ख़त्म हो जाए.
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इन्होंने देश की जनता से कहीं अधिक अपनी तनख़्वाह की, पैंशन और सेवानिवृत्ति उपरांत सुविधाओं की परवाह की. ये भूल गए कि न्यायिक फ़ैसलों में अपने समय, अपने युग की आशाओं, इच्छाओं और नैतिकताओं को भी दर्ज करना होता है. ताकि एक आम नागरिक ठीक तरह जीवित रह सके, मार न दिया जाए. ये माननीय न्यायाधीश जिनके विचार किताबों में अलग हैं और कर्मक्षेत्र में कुछ अलग. ये व्यक्तिगत पुनरुत्थानवादी विचारों से या फिर आज्ञाकारिता से ही संचालित होते रहे. ये सब जानते थे. इन्हें अंदाज़ा था कि इनके आदेश से लोग क़त्लगाह की तरफ हाँक दिए जाएंगे. सत्ता का तरीक़ा ही था कि विरोधियों की देह तोड़ दो. हृदय मसल दो. उनकी जिजीविषा नष्ट कर दो.
ये सब कटघरे में हैं क्योंकि बिना मुक़दमे के, बिना उनका पक्ष ठीक से सुने इन्होंने लोगों को मारने के आदेश दिए. इनके निर्णय हत्यारे हैं. ये आरोप लगानेवाली संस्थाओं पर, राज्य सत्ता पर विश्वास जताते रहे और आम आदमी की गुहार को, उनकी सच्चाई को नकारते रहे. जैसे करुणा, प्रज्ञा और प्रत्युन्नमति सिरे से ग़ायब हो गई हो. इन्हें संदेह का लाभ देना, न्याय के लिए ख़तरा है.
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अब गवाहों को यह कहकर मत बरगलाओ कि उनकी गवाही से उन्हें सज़ा मिलेगी. समरथ को नहीं दोस गुसाईं. वकील साहब, क्या आप इतना भी इतिहास नहीं जानते कि आज तक कोई भी सक्षम राजनीतिक, सरकारी या प्रशासनिक हत्यारे दण्डित नहीं हुए हैं. वे भाग गए, उन्होंने आत्महत्या कर ली, स्वाभाविक मौत मर गए या उन्हें बख़्श दिया गया लेकिन वे कभी दण्डित नहीं हुए. यह भी कहा गया कि वे सरकारी लोग थे और अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे थे। जैसे लोगों को मारना सरकारी काम है।
जो जितना बड़ा हत्यारा, उतना ही ज़्यादा सुरक्षित. जो सच बोलता है, वही तत्काल गिरफ़्तार होता आया है. सच बोलनेवाले को कोई ज़मानत तक नहीं देता. न न्यायालय, न समाज.न चौथा खंभा।
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समय साक्षी है कि वह समय ऐसा था कि सत्ता के ख़िलाफ़ हर गवाही झूठी ठहरा दी जाएगी. सफ़ाई देनेवाले आरोपी पर अदालत में हँसी का फव्वारा छूटेगा. जैसे सच बोलना कोई चुटकुला है. मैं निर्दोष हूँ: यह सुनकर वकील हँस देंगे, पूरा न्यायालय हँस देगा. पूरा सदन, पूरा देश हँसेगा. हँसो, हँसो, जल्दी हँसो. किसी निर्दोष को पकड़कर हँसो. उसे अकेला करके हँसो. उस पर मुक़दमा करके हँसो. हँसो कि तुम्हारी नौकरी बची रहे. हँसो कि तुम्हारा वैभव, तुम्हारी सुविधाएँ बची रहें. हँसो कि हँसने पर ही पुरस्कार है. हँसो कि अन्याय बचा रहे. हँसो कि तुम्हारी यह दो कौड़ी की जान बची रहे.”
(वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज की पोस्ट से साभार)
