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जब छायावाद के अवसाद को गांधीजी के असहयोग आंदोलन वापस लेने से देश में व्याप्त निराशा से जोड़ा जाने लगा तब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर इस धारणा की परतों को बड़ी बेबाकी से उधेड़ा। उनके अनुसार, छायावाद को गांधीवाद का ‘साहित्यिक संस्करण’ कहना न केवल गलत है, बल्कि दोनों के मूल स्वभाव की अनदेखी करना है।
एक तरफ सादगी, संयम और कठोर साधना का गांधीवाद तो दूसरी तरफ सूक्ष्म सौंदर्य, कल्पना की उड़ान और भावनाओं के अगाध ज्वार वाला छायावाद। जब राजनीति के ‘महात्मा’ की तुलना साहित्य के ‘स्वप्नद्रष्टाओं’ से होने लगी, तो दिनकर ने तीखे तर्कों के साथ छायावाद और गांधीवाद के बीच के उस द्वंद्व का विश्लेषण किया जो आज भी साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर कर देता है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में जब ‘छायावाद’ को गांधीवादी आंदोलनों की साहित्यिक अभिव्यक्ति माना जाने लगा। और छायावाद के अवसाद को गांधीजी के असहयोग आंदोलन वापस लेने से देश में व्याप्त निराशा से जोड़ा जाने लगा तब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर इस धारणा की परतों को बड़ी बेबाकी से उधेड़ा। उनके अनुसार, छायावाद को गांधीवाद का ‘साहित्यिक संस्करण’ कहना न केवल गलत है, बल्कि दोनों के मूल स्वभाव की अनदेखी करना है।
1. कर्म बनाम कल्पना का द्वंद्व
दिनकर का मानना था कि गांधीजी ‘कर्मठता के आराधक’ थे। उनका पूरा जीवन अनुशासन, उपवास और कठोर शारीरिक श्रम (चरखा, पदयात्रा) पर टिका था। इसके विपरीत, छायावाद ‘कल्पना-विहारी’ कवियों का संसार था। जहाँ गांधीजी स्थूल जगत की समस्याओं को सुलझाने के लिए ‘कृच्छ साधना’ (कठिन तप) कर रहे थे, वहीं छायावादी कवि अतींद्रिय सुख और स्वप्निल लोकों में विचरण कर रहे थे।
2. भोग की ललक बनाम गांधीवादी संयम
एक बहुत ही ‘क्रांतिकारी’ बात जो दिनकर कहते हैं, वह यह कि छायावादियों के भीतर ‘भोग की ललक’ थी, जो लाख छिपाने पर भी उनकी कविताओं में झलक जाती थी। गांधीजी जरूरतों को न्यूनतम करने (सादगी) की बात करते थे, जबकि छायावाद में एक प्रकार की ‘ठिठुरी हुई काम-भावना’ और सूक्ष्म सौंदर्य के प्रति तीव्र आकर्षण था। यह गांधी के ‘इंद्रिय निग्रह’ के दर्शन से बिल्कुल मेल नहीं खाता था।
3. क्या अवसाद गांधी की ‘हार’ का नतीजा था?
आलोचकों का एक वर्ग कहता है कि छायावाद में जो दुःख या अवसाद है, वह गांधीजी के असहयोग आंदोलन की विफलता से उपजा था। दिनकर इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं।
क्या हार जीत, खोजे कोई,
उस अद्भुत पुरुष अहन्ता की,
हो जिसकी संगर-भूमि बिछी,
गोदी में जगन्नियन्ता की?
संगर की अद्भुत भूमि, जहाँ,
पड़ने वाला प्रत्येक कदम है
विजय पराजय भी जिसकी,
होती न प्रार्थनाओं से कम।
- बापू
दिनकर गांधीजी के आंदोलनों को हार जीत से परे मानते हैं और पूछते हैं कि यदि साहित्यिक वर्ग गांधी की तथाकथित पराजय से निराश था, तो वे राष्ट्रसेवा छोड़कर ‘प्रियतम के विरह’ में क्यों रोने लगे? असल में, छायावाद का दुःख वैयक्तिक और काल्पनिक अधिक था, राजनीतिक कम।
4. विद्रोह की नई परिभाषा
दिनकर स्वीकार करते हैं कि छायावाद एक विद्रोह था, लेकिन गांधी के कारण नहीं। यह द्विवेदी-युगीन काव्य की शुष्कता, नीरसता और कड़े अनुशासन के विरुद्ध एक विद्रोह था। छायावादी कवि स्वामी दयानंद सरस्वती के कठोर नैतिक बंधनों से तो भाग निकले, लेकिन वे गांधी के युग में जी रहे थे, इसलिए पूरी तरह ‘अनैतिक’ भी नहीं हो सके। इसी खींचतान ने छायावाद को एक अनूठा स्वरूप दिया।
दिनकर के शब्दों में, छायावाद और गांधीवाद के बीच उतनी ही समानता है जितनी ‘रोमांटिक कविता’ और ‘होमियोपैथी’ के बीच। छायावाद हिंदी कविता का वह श्रृंगारिक और सूक्ष्म उत्कर्ष था, जिसने भाषा को नई कोमलता तो दी, लेकिन वह गांधी की ‘हड्डियों वाली कर्मठता’ से कोसों दूर था।
Gandhi Darshan – गांधी दर्शन से साभार
