Oplus_16908288
मीनाक्षी नटराजन का राजनीति से इतर एक दूसरा रूप भी है, जो साहित्य, इतिहास और वैचारिक चिंतन की दुनिया में समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। 1857 : भारतीय परिप्रेक्ष्य” और “अपने अपने कुरुक्षेत्र” जैसी महत्वपूर्ण किताबों की लेखिका के बौद्धिक और रचनात्मक व्यक्तित्व को भी याद करना चाहिए, जिसकी चर्चा राजनीति से कहीं अधिक स्थायी है।
आज की सबसे बड़ी खबर है मध्यप्रदेश राज्यसभा के चुनाव से कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हो जाना। उनके विषय में भाई Bhupendra Bisht की पोस्ट पढ़कर जो जानकारियां जुटाई, वे विस्मित करती हैं।
मीनाक्षी नटराजन का राजनीति से इतर एक दूसरा रूप भी है, जो साहित्य, इतिहास और वैचारिक चिंतन की दुनिया में समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। हमें उनके उस बौद्धिक और रचनात्मक व्यक्तित्व को भी याद किया जाना चाहिए, जिसकी चर्चा राजनीति से कहीं अधिक स्थायी है।
जैव रसायन और विधि की शिक्षा प्राप्त मीनाक्षी नटराजन ने सक्रिय राजनीति के साथ-साथ गंभीर अध्ययन और लेखन को भी अपनी पहचान का हिस्सा बनाया। इतिहास के प्रति उनकी रुचि के अनुरूप उन्होंने इतिहास को देखने की एक वैकल्पिक दृष्टि विकसित करने का प्रयास किया। उनकी दो खंडों में लगभग 850 पृष्ठ में प्रकाशित पुस्तक “1857 : भारतीय परिप्रेक्ष्य” इसी प्रयास का परिणाम है। यह कृति 1857 को भारतीय समाज, स्मृति और प्रतिरोध की व्यापक पृष्ठभूमि में देखने का आग्रह करती है। यद्यपि इतिहास के स्थापित निष्कर्षों को चुनौती देना आसान नहीं होता, लेकिन मीनाक्षी ने अपने लेखन में यही साहस दिखाया।
साहित्य के क्षेत्र में सामयिक प्रकाशन से छपा उनका उपन्यास “अपने अपने कुरुक्षेत्र” उल्लेखनीय है। महाभारत जैसे विराट आख्यान को उन्होंने उसके पात्रों के अंतर्द्वंद्व और नैतिक संघर्षों के माध्यम से समझने की कोशिश की। सत्यवती, गांधारी, कुन्ती, शिखंडी, द्रौपदी और भीष्म जैसे पात्र उनके यहां अपने समय, अपने निर्णयों और अपनी पीड़ाओं से जूझते जीवित मनुष्य बनकर सामने आते हैं। यह उपन्यास पाठक को महाभारत की परंपरागत व्याख्याओं से आगे सोचने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि इस कृति को प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान प्राप्त हुआ और इसे हिन्दी के महत्त्वपूर्ण आधुनिक उपन्यासों में गिना गया।
मीनाक्षी नटराजन की विशेषता यह है कि वे इतिहास और साहित्य दोनों को सत्ता की स्थापित व्याख्याओं से अलग कोण से देखने का प्रयास करती हैं। उनके लेखन में प्रश्न अधिक हैं और दावे कम। शायद यही कारण है कि उनके काम में वैचारिक आग्रह तो दिखाई देता है, पर बौद्धिक जिज्ञासा उससे कहीं अधिक दिखाई देती है।
उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष उनकी विनम्रता है, जिसका उल्लेख साहित्यकार सदानंद शाही ने अपनी स्मृतियों में किया है। 2005 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “गोदान को फिर से पढ़ते हुए” में, जब उन्हें मंच पर बैठने का आग्रह किया गया, तब उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि प्राध्यापकों के बीच बैठना उचित नहीं होगा। वे श्रोताओं के बीच बैठीं और अपनी बारी आने पर प्रेमचंद की स्त्री-दृष्टि पर गंभीर और सार्थक टिप्पणी की। सार्वजनिक जीवन में ऐसी सहजता और आत्मसंयम आज दुर्लभ होता है।
राजनीति में सफलता और असफलता क्षणिक होती है। चुनाव आते हैं, परिणाम बदलते हैं और पद भी बदल जाते हैं। लेकिन विचार, लेखन और बौद्धिक योगदान कहीं अधिक स्थायी होते हैं। मीनाक्षी नटराजन की पहचान एक राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ एक ऐसी चिंतक की भी है जो इतिहास को नए प्रश्नों के साथ पढ़ती है और साहित्य को नए अर्थों के साथ रचती है।
इसलिए आज की राजनीतिक खबरों से हटकर यदि मीनाक्षी नटराजन को याद किया जाए, तो उन्हें उस दुर्लभ परंपरा की प्रतिनिधि के रूप में देखा जाना चाहिए जिसमें राजनीति, अध्ययन, साहित्य और सार्वजनिक नैतिकता एक-दूसरे से जुड़ते हैं। यदि मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा तक पहुंचतीं, तो वह केवल एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक जीवन की भी उपस्थिति होती।
अपडेट: 1857: भारतीय परिप्रेक्ष्य —
यह अब तक लिखे गए इतिहास से अलग उस धारा से जुड़ा इतिहास–लेखन है जो सीधा भारतीय दृष्टि और परिप्रेक्ष्य से अनुप्राणित है। 1857 की क्रांति ने हमारे राष्ट्र को एकजुट कर राजनैतिक तौर पर जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने हमें राष्ट्र–राज्य की अवधारणा के करीब लाने में कैसे अनुप्राणित किया, इन सूत्रों को मीनाक्षीजी ने गंभीरता से सामने रखा है।
भारत तक पहुंचने की होड़ में लगे विदेशियों, प्लासी का युद्ध, वारेन हेस्टिंग्स के अत्याचार, दक्खन में अंग्रेज, हैदरअली और टीपू सुल्तान, अंग्रेज गर्वनर जनरल, मराठा युद्ध, कंपनी की विदेश नीति, पेशवाराज का अंत, नया चार्टर एक्ट, सिंध पर अधिकार तक क्रमश: पहला खंड बोधगम्य भाषा में इस कालखंड से परिचित कराता है।
दूसरा खंड सिख युद्ध से प्रारंभ होता है और 1857 की पूर्वपीठिका सामने रखते हुए क्रमश: दिल्ली में क्रांति, नाना साहेब और अजीमुल्ला, झांसी की रानी, कुंवर सिंह का संघर्ष, तात्या टोपे का जीवट, क्रांति के बाद अन्य केंद्रों के साथ ही राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिदृश्य को भी मीनाक्षी जी ने सम्यक रूप में प्रस्तुत किया है। लेखिका का मानना है कि 1857 की क्रांति ने देश के एक बड़े हिस्से को एक सूत्र में बांधा। भारतीय मन पर अंग्रेजी प्रतिरोध और दमन का खासा असर पड़ा। इससे भारतीयों को अपनी मुक्ति का नया मार्ग खोजने में मदद मिली। इतिहास के अध्येताओं, शोधार्थियों, शिक्षकों और छात्रों के लिए यह एक स्थायी महत्त्व का ग्रंथ है।
Mahesh Bhardwaj Samayik Prakashan से साभार
