बौद्धिकों की सबसे बडी चुनौती है तयशुदा सरकारी दायरे में सोचना, तयशुदा मित्रों में बोलना- लिखना,यानी वे लोग तयशुदा मार्ग के बाहर निकलकर खुले मंचों पर बहस ही नहीं करते।
प्रोफेसर-बुद्धिजीवियों की सार्वजनिक मीडिया में जन हित में निष्क्रियता और मोदी-आरएसएस के पक्ष में अहर्निश सक्रियता हम सबके गले नहीं उतर रही । वे सारवान मसलों पर अधिकांश समय चुप रहते हैं।फलत: हाशिए के बाहर चले गये हैं या फिर सत्ता के साथ हैं या मात्र फोटो कल्चर के शिकार बन चुके हैं।
ये लोग अपना अधिकांश समय स्टाफ रुम में नॉनसेंस विमर्श में व्यस्त रहते हैं,इन दिनों अचानक उनके अंदर जाति बोध पैदा हो गया है,जाति उनका फास्ट फूड है! वे खुलकर जातिवाद का खेल खेलते रहते हैं,जातिवाद के संघी मुहावरे चलते रहते हैं।
जनहित के सामाजिक- राजनीतिक सवालों पर इनका हस्तक्षेप कहीं नजर नहीं आता ! विश्वविद्यालय-कॉलेजों में उनकी अकादमिक सक्रियता सिर्फ कृपाकांक्षी बनकर पद पाने और संघ के कार्यक्रमों में जाने तक सीमित होकर रह गई है।
इन सबसे एक ही सवाल है ? उनकी पगार कौन देता है ? मोदी देता है ? वीसी देता है ? आरएसएस-कांग्रेस या वाम देता है ? इन शिक्षकों को यह चीज भूलनी नहीं चाहिए कि उनको पगार भारत की जनता के टैक्सों से प्राप्त आमदनी से मिलती है,इसलिए उनकी इस जनता के प्रति राजनीतिक जवाबदेही है। इन प्रोफेसरों को मोटी पगार इनके पूर्वज नहीं छोडकर गए थे ।जनता के ऊपर अपार जुल्म हो रहे हैं और इन प्रोफेसरों ने शर्म-लाज सब उतार कर जिस तरह से आम जनता के दुखों से मुँह मोड़ लिया है,उसके लिए उनको समाज के सामने उत्तर देना होगा।
आज हम सबके बीच में फेसबुक, वेबसाइट, ब्लॉगिंग से लेकर टीवी जैसे ताक़तवर माध्यम हैं । इसके अलावा दैनिक समाचारपत्र और पत्रिकाएँ भी हैं। लेकिन अधिकांश प्रोफेसर- बुद्धिजीवी सक्रिय नजर नहीं आते। एक जमाना था उनकी व्यापक हिस्सेदारी होती थी लेकिन विगत बीस -पच्चीस सालों में उनकी सार्वजनिक कम्युनिकेशन में हिस्सेदारी घटी है। इस गिरावट के कारणों की पहचान करने की ज़रुरत है । इनमें बहुत कम लोग हैं जो मीडिया – सोशलमीडिया में सक्रिय हैं। इनकी निष्क्रियता का बड़ा कारण है नए यथार्थ को सही गति के साथ पकड़ने में असमर्थता।
नया यथार्थ परंपरागत कम्युनिकेशन के उपकरणों से कम्युनिकेट करने नहीं देता। वह संप्रेषण का संकट पैदा करता है। नया यथार्थ नए क़िस्म के मीडियम में कम्युनिकेशन और नए क़िस्म के कम्युनिकेशन संस्कारों की माँग करता है। बुद्धिजीवियों के अ-कम्युनिकेशन की बुनियादी जड़ यही है । इन बुद्धिजीवियों का पुराना संस्कार और आदतें इस क़दर दिमाग़ को कैद किए हुए है कि नया सच देखकर भी ये लोग अनदेखा करते हैं। नया सच है लिबरल बनो , लिबरल लिखो और लिबरल मीडियम में रचो-बसो। जाति,धर्म, साम्प्रदायिकता के पहचान के रूपों के दायरे के बाहर निकलकर देखो।
संचारक्रांति पूर्व की अवस्था में बुद्धिजीवी सक्रिय थे और प्रभावशाली थे क्योंकि उसके परंपरागत गैर-लिबरल सोच के लिए मीडिया के ढाँचे में जगह थी लेकिन संचार क्रांति के नए कम्युनिकेशन ढाँचे में वह एकदम मिसफ़िट है। संचार क्रांति का नया ढाँचा कम्युनिकेशन के नए संस्कार और एटीट्यूट की माँग करता है। स्थिति यह है कि पहले पार्टी या संगठन की अनेक बातें छिपाकर काम करना संभव था लेकिन अब यह संभव नहीं है। लेखक की स्थानीय स्तर पर चल रही अ-लोकतांत्रिक हरकतों को राष्ट्रीय क्षितिज पर एक ही झटके में ले जाकर रख दिया है।
बौद्धिकों की सबसे बडी चुनौती है तयशुदा सरकारी दायरे में सोचना, तयशुदा मित्रों में बोलना- लिखना,यानी वे लोग तयशुदा मार्ग के बाहर निकलकर खुले मंचों पर बहस ही नहीं करते।
भारत जैसे देश में बौद्धिक क़तारों को लोकतांत्रिक शिरकत और उदारतावाद के आधार पर ही व्यापक रुप से पुख़्ता बनाया जा सकता है। उदारतावाद का मार्ग अपनाने से लेखक समृद्ध होगा। अनेक मसले हैं जिन पर बौद्धिकजन सोच सकते हैं। हमारे अनेक हिन्दी लेखक हैं जिनका नाम है,वे फेसबुक में भी हैं ,लेकिन मोदी गैंग और गुंडों के हिंसाचार पर वे लिखने से परहेज करते हैं। मैं नाम नहीं लिखना चाहता, क्योंकि यह समस्या व्यक्तियों की नहीं है बल्कि उस पूरी मनोदशा की है जिसमें बौद्धिक जन कैद हैं। बौद्धिक जन जितनी जल्दी पुरानी कम्युनिकेशन मानसिकता से बाहर निकल आएँगे देश के लिए यह उतना ही लाभप्रद होगा।
बौद्धिकजन चुप क्यों हैं इसका दूसरा बड़ा कारण है उनकी सार्वजनिक माध्यमों के प्रति अछूतदृष्टि। मसलन्, फेसबुक को वे समय की बर्बादी , लंपटता, और तर्कशास्त्र का अंत मानते हैं। इंटरनेट और सोशलमीडिया के बारे में डरे- सहमे से आते हैं और देखकर चले जाते हैं। हम मित्रों से कहना चाहते हैं सोशलमीडिया देखने की नहीं कम्युनिकेट करने की जगह है। विचरण या निगरानी या जासूसी का नहीं वैचारिक खेल का खुला मंच है। यहाँ आप अपने विचारों की प्रस्तुति में वह कौशल पैदा करें जिससे वह अन्य का दिल जीत सके। कुछ नहीं तो अन्य को आप अपने विचारों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने का भाषिक कौशल पैदा करें।
प्रोफेसर- बुद्धिजीवी अब तक बंद माध्यमों और इकतरफ़ा कम्युनिकेशन में जीते रहे हैं, अपनी कहते रहे हैं। संचार क्रांति ने इकतरफ़ा कम्युनिकेशन और उपदेशपरक कम्युनिकेशन को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है। यही वजह है कि ये लोग इनदिनों अलगाव और अनजानेपन को महसूस कर रहे हैं। उनकी फेसबुक वॉल पर कोई कम्युनिकेशन नहीं होता, वे अपनी कहते हैं या शेयर करते हैं, वे कहीं बहस नहीं करते और न अपनी वॉल पर कोई बहस चलाते हैं। इस तरह की स्थिति उनको और भी अप्रासंगिक बना रही है।
सोशलमीडिया वस्तुत: सार्वजनिक बहुआयामी कम्युनिकेशन है। यहाँ वही सफल है जो लिबरल है और अन्य के विचारों को शेयर करने के लिए जिसके पास जगह है। बौद्धिकजन अब तक अन्य के ऊपर अपने विचार थोपते रहे हैं, लेकिन सोशलमीडिया में जो विचार थोपता है उसको कोई नहीं पढ़ता।अन्य को पढ़ो और पढ़ाओ । वे तो परिचित में रमण करते रहते थे और अपने विचारों को अपने अनुकूल विचारों के लोगों में ही रखकर विचारों की जंग लड़ते थे लेकिन अब अपरिचितों में कम्युनिकेट करने की चुनौती है और यह ज्यादा मुश्किल काम है। अपरिचित का दिल मार्क्सवाद से नहीं उदारतावादी कम्युनिकेशन के जरिए ही जीता जा सकता है।
प्रोफेसर-बुद्धिजीवी लंबे समय से गप्प या अफवाह या कॉमनसेंस चर्चाओं समय खर्च करते हैं। यहां तक कि उनकी यह बीमारी सोशल मीडिया तक आ गयी है। वे कभी अपने आसपास के समाज पर नहीं लिखते।
मैं पश्चिम बंगाल में 28साल रहा।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते हैं।भाषण देते हैं,सम्मान लेते हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की। यहां सभी रंगत के बुद्धिजीवी आए लेकिन वे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे ।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।अन्य शहरों के बुद्धिजीवियों की कमोबेश यही दशा है।
यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा देश का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे देश के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।
जगदीश्वर चतुर्वेदी की पोस्ट से साभार
