रमरतियो गोहार किए जा रही थी। बीच-बीच में वह झपट कर नन्हें भोलू को कोरा में लेने का प्रयास भी करती जाती। नन्हा भोलू, जो पड़ोस वाली महतोइन मउसी के सीने से चिपका हुआ, आँख फाड़-फाड़कर अपने सामने रोती-झांकती इस औरत को घूर रहा था। वह बेहद डरा हुआ लगता था। विकल्प विमर्श साप्ताहिक कॉलम- एक कहानी- में आज पढ़ें सुपरिचित कवि-कथाकार-अनुवादक आनंद बहादुुर की कहानीः भेद
आइह् गे दइया गे दइयाऽऽऽ हेगे देखऽहीं गेऽऽऽ
रमरतियो गला फाड़-फाड़कर रोए जा रही थी उसको समझाने-बुझाने के सारे प्रयास विफल हो चुके थे। असल में औरतों का झुंड जो उस समय वहाँ मौजूद था- वह भी हताश और रुआँसा लग रहा था। उधर कोठरी के दूसरे कोने में रजतवा भुइयाँ पर बैठा हुआ कुछ मर्दों के साथ बातचीत कर रहा था। बीच-बीच में उसका दायाँ या बायाँ हाथ अनायास सिर पर चला जाता और दो-चार चीकट लटों को हल्के से नीचे खींचता।

दइया गेऽऽऽ हमर बऽचऽवाऽऽऽ-
रमरतियो गोहार किए जा रही थी। बीच-बीच में वह झपट कर नन्हें भोलू को कोरा में लेने का प्रयास भी करती जाती। नन्हा भोलू, जो पड़ोस वाली महतोइन मउसी के सीने से चिपका हुआ, आँख फाड़-फाड़कर अपने सामने रोती-झांकती इस औरत को घूर रहा था। वह बेहद डरा हुआ लगता था। जब-जब रमरतियो उसे कोरा में लेने के लिए झपटती, वह चीखकर रोने लगता। फिर एकदम से सांस अंदर खींच लेता और घायल पंछी की तरह छटपटाने लगता। मारे डर के रमरतियो तुरंत ही उसे महतोइन की बाहों में डाल देती। मउसी के कोरा में आते ही वह चुप हो जाता। मगर फिर कुछ ही पलों बाद ‘माई ? माई ?’ पूछता हुआ इधर-उधर ताकने लगता।
सचमुच अजगुत और अलबत था यह बेहवार और नहीं तो कम से कम आस-पड़ोस और चिन्हार वालों के लिए। प्रांत बिहार जिला नरंगा थाना ओबरा के एक छोटे से निम्नस्तरीय मुहल्ले के रहने वाले ये लोग!
संक्षेप में प्रकरण यह है, कि आज तीज्या या हरतालिका व्रत के पारन का दिन है। रमरतियो बहुत बहुत ही अबेरे उठ गई और नहाने-सुनाने के बाद, कुछ अतिरिक्त उत्साह से ही, सिंगार-पटार कर रही थी। अतिरिक्त क्यों ? तो इसका एक कारण है। अब, यह तो सभी जानते हैं कि तीज्या में नयी साड़ी पहनना औरतें अपना जन्मसिद्ध अधिकार मारती हैं। चाहे वह उच्च वर्ग की वनिता हो या निम्न वर्ग की लुगाई। तो रमरतियो भी, चाहे उसका पति क्यों न माध्यमिक विद्यालय के गेट पर या कचहरी परिसर में, फेरी लगाया करता हो, या वही क्यों न सेठानियों-साहूकारिनों के घर झाड़ू-बर्तन किया करती हो- तीज्या के दिन नयी साड़ी जरूर पहनती है। अब, चाहे यह साड़ी कितनी ही साधारण हो, रजतवा फुटफाट पर से सौ-पचास में जो भी छांटकर ले आता, उसी में वह निहाल हो जाती। इस बार वह साड़ी लाने की सोच ही रहा था, कि तभी मानो रमरतियो के भाग जगे। उसे मिली एक नयी साड़ी- सुन्दर और चटकीली।
दरअसल बात यह है कि कुछ दिनों पहले मलकाइन की बेटी ने अहमदाबाद से कई साड़ियाँ भेजी थीं। उनमें से कुछ तो मलकाइन और उनकी बहू छोट- मलकीनी को पसंद आ गईं। बची हुई साड़ियाँ बाँट दी र्गइं। एक मुनीमजी, एक रसोई की महराजिन को और इसी क्रम में एक रमरतियो को। कुछ माह पूर्व पोते के जन्म के समय मलकाइन इन लोगों की छुद्र इच्छाओं का शमन नहीं कर पाई थी। उसी की क्षतिपूर्ति अब की गई।
साड़ी पाकर रमरतियो फूली न समाई। उसने उसी शाम पति से कहा-
‘देखा तऽऽऽ, कइसने इजोत करइत हई!’ वह इतराई, रजतवा भी बहुत खुश हुआ –
‘चला, अब तीजा खातिर साड़ी लावे के जरूरते खतम भेल….. बढ़िया लुआ हई, ईऽ-हे पहीर लीहू! उसने सिर डुलाया।
‘ऐंऽऽऽह, ई सड़िया थोड़े पहिरब- तीजा में तऽ पति केर लाउल सड़िया पहिरना चाही,‘ रमरतियो बोली।
‘आऽऽरे जायदाऽ- बूझ लीहा ईऽ-हे हमर लाउल सड़िया हई-
‘देखा, ईसब ठाठा हमरा ना सोहावा…… रऊरे खातिर हम निरजला करिब अउर रऊरा एगो सड़ियो न लावे चाहा-
’अर-अरे, हम तऽ मजाक करइत हली……. तू सांचो गोसा गइला……. हमहू लाइब भाई। हमहू लाइब- तोरा तउन मन तउन पहीर लीहू!’
’हाँ, एह बात ठीक हय, दू गो सड़िया होइत तऽ एगो पुजान बखत आर दोसरका बिहने पारन बखत पहिरम।’ रमरतियो फूल कर कुप्पा हो गई। ‘बेऽस, अरे तू तऽ रानी-महरानी हो गेला, होऽऽ-होऽ होऽ…’, रजतवा ठठाकर हंस पड़ा। रमरतियो भी लहालोट होने लगी।
तीज्या के दिन उसने वैसा ही किया, मान के साथ पति की लाई साड़ी पहनी, माँग भरकर सिंदूर टीका और टीके की लकीर को नाक तक खींच लिया। गले में मंगलसूत्र, आलता, रंगे पाँवों में बिछिया, नयी चूड़ियाँ- सजधज कर वह टोले की औरतों के साथ गाती हुई चली। एक हाथ में परसाद की थाली, दूसरे से उसने नन्हे भोलू को कमर पर टिका रखा था। वह मंथर गति से झूलती हुई चली जा रही थी। भोलू हाथ हिला-हिलाकर किलकारी मार रहा था, रमरतियो बीच-बीच में पुचकारती-चुमकारती जा रही थी। वह उसकी इकलौती औलाद था। पहली संतान और वह भी बेटा। मगर उसके बाद न जाने क्यों, और संतान नहीं हो पाई। इसलिए वह पुत्र-प्रेम में दीवानी बनी रहती। अभी भी उसका मन उछाहें ले रहा था। धड़कन कलेजे में सिमटती ही न थी।
जल्द ही वे सभी सामूहिक पूजन-स्थल पर पहुँच गई। यहाँ कुछ औरतें पहले से ही मौजूद थीं। वे भी पूजन-वेदी को घेरकर बैठ गई। पंडीज्जी ने शंख ध्वनि के साथ मंत्रोच्चर शुरू किया, फिर उन्होंने पार्वती द्वारा शिव की प्राप्ति हेतु तीज्या व्रत की कथा सुनाई, जिसे सुनकर औरतें भाव-विभोर हो गई।
कथा के बाद पंडीज्जी तो झोला-पोथा-पुरान सम्हाले विदा हुए, लेकिन औरतें वहीं पर जमकर बैठ गई और देर तक झूम-झूमकर गाती रहीं। यहां तक कि रात घिर आई, मगर इनके उत्साह में कोई कभी नहीं आई। इन्होंने अपनी-अपनी थाली में सजे आटे के दीयों को जला लिया और उनकी मीठी रोशनी में गाती गई। आकाश में छोटे-छोटे सितारे जगमगा रहे थे और धरती पर पानवालों, ठेलेवालों, मजदूरों, कामगारों की ये मेहरारूएँ- थालियों में दीप सजाए मंगलकामनाओं के गीत गा रही थीं।
रमरतिया उन्मुक्त होकर गा रही थी, नन्हा भोलू उसकी गोद में खेलता-खेलता जाने कब का सो चुका था। सोते-सोते तक उसने माई को नजर भर-भर कर देखा था। दीप की रोशनी में गीत गाता वह सलोना चेहरा, हरी-मटमैली साड़ी में टभकता हुआ वह सांवला तन। वह अंगूठा चूसते-चूसते माई को निहारता गया निहारते-निहारते जाने कब उसकी आँख लग गई।
आखिर औरतों का गाना थामा, और वे अपने-अपने घरों की तरफ झुण्ड बनाकर चलीं। नन्हा भोलू माई के कंधे पर झूला-झूलता, मीठी नींद में खोया हुआ था। कोठरी में पहंुचकर माई ने उसे खाट पर डाल दिया और थाल को पूजा वाले कोने में रखने के बाद आप भी उसी के बगल में लुढ़क गई।
कोठरी में ढिबरी की, पुराने सोने-सी, मद्धिम-कांतिमान रोशनी फैली हुई थी। खाट के उल्टे किनारे पर दीवाल से सटी एक चौकी थी जिस पर रजतवा पसरा हुआ था। एक तरफ कुछ बासन टीन के दो बक्से, गोबर-मिट्टी के दो जुड़वां-चूल्हे और पानी का एक मटका था। एक कोने में देवी-दवताओं के कैलेण्डर और फ्रेम की हुई तस्वीरें जिन पर रोली चंदन के पुराने धब्बे पड़े हुए थे। एक लकड़ी के तख्ते पर अनगढ़ पत्थरों वाले शिवजी, भगवती, पवनपुत्र, कालीजी, और आटे का एक दीया था। वहाँ की दीवाल धूप-कपूर के धुएँ से चिकनी हो गई थी। दीवाल से लगी, एक मोटी-चिपचिपी रस्सी झूल रही थी जिस पर धूसर और बदरंग कपड़े लदे हुए थे। इन्हीं के बीच, अंगोछे से आधी ढंकी, झलक रही थी एक शानदार, चमकीली, नारंगी साड़ी, जिस पर हरी पŸिायाँ और सुनहली धारियाँ बनी हुई थीं।
रमरतियो मुंह-ऊंधेरे ही जग गई। रजतवा मुंह पर अंगोछा लपेटे नाक बजा रहा था। नन्हा भोलू गहरी नींद में था। रात वाली सुख-शांति अभी भी उसके चेहरे पर विरज रही थी। रमरतियो, आंख खुलते ही उठकर बैठ गई। उसने मुंह फिराकर देवता-पितर को नमन किया, फिर खाट से उतरी। कोठरी से बाहर आकर उसने किवाड़ बाहर से ही भेंड़ दिया।
जब वह लौटी, तो पौ-फट चुकी थी। पुनपुन में डुबकी लगाकर असनान करने के चलते उसके खुले केशों पर रेत और छोटे-छोटे शंख अटके हुए थे। रजतवा जग गया था। वह जम्हाई लेता हुआ बीड़ी सुलगा रहा था। रमरतियो को देखकर वह खुद मैदान के लिए निकल पड़ा। रमरतियो इतमिनान से तैयार होने लगी।
उसने सावधानी के साथ उस चमचमाती साड़ी को रस्से पर से उतारा। फिर खाट के नीचे वाली छोटकी संदूकची में से लाल पोटली, जिसमें उसके गहने थे। चांदी का मंगटीका, हंसुली, नथुनी, झूमर, पायल, साथ में शंख की चूड़ियाँ, कुछ गिलट की बालियाँ और हार, मंगलसूत्र का सोने का छोटा लाकेट। वह बरबस गुनगुनाने लगी…….
कउन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया
कवन रंग नऽनऽदीऽ तोरे बिधना
होऽओऽओऽओऽ होऽऽऽजीऽऽ हो!
उसने करीने से साड़ी पहनी, फिर एक-एक करके सारे गहने। पहले मंगलसूत्र, फिर मांग को काढ़ लेने के बाद, मंगटीका। छोटी हरी नग उतारकर नथुनी, कान के मटमैले फूल को हटाकर उसकी जगह झूमर को दी। अब गिलट के गहनों की बारी आई। फिर चूड़ियाँ और तब पायल। उसने ललाट पर दपदप करता सिंदूर का बड़ा सा टीका बनाया। अंत में भुइयाँ पर बैठकर बड़े मनोयोग से आलता लगाया, फिर अपने-आप को दीवार पर लटके आईने में निहारने लगी।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि दर्पण में झलकने वाली यह छव खुद उसकी है। मानो किसी ने जादू की छड़ी फेर दी हो। रमरतियो अपने-आपको निहारती हुई बेसुध हुई जा रही थी। अचानक किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा तो वह उछल पड़ी।
‘बाह जी बाह! आज तऽ कम्माल कइला रानी!’ रजतवा मैदान से लौट आया था। रमरतियो उसकी दृष्टि की कौंध से लजा गई।
‘चलाऽ हटा, बेसी ठाठा करे के बात नइखे- देखा, बचवा जगइत हवा, ओकरे धरा, हम तबले पारन करके अइते ही।’
रजतवा खाट पर बैठकर नन्हें भोलू को खिलाने लगा। रमरतियो ने पूजा वाली थाल उठाई, और बाहर निकल गई। वह कुछ ही देर में मंदिर से लौट आई। उसका चेहरा दमक रहा था। मंदिर में कई सहेलियों ने साड़ी की प्रशंसा की थी। तू तऽ सेठानी बन गेलू– एक ने बड़ाई की थी। वह आकर पूजा वाले कोने में बैठ गई। उसने दीया जला लिया और देवी-देवताओं को अक्षत-रोली चढ़ाना शुरू किया। फिर थाल में से परसाद निकाल कर पति को दिया और भावुक होकर उसके पैरों पर झुक गई।
नन्हा भोलू खाट पर आराम से खेल रहा था। उसने रमरतियो को तिरछी नजर से देखा। रमरतियो ने हुलस कर उसे कोरा में ले लेना चाहा, मगर तभी ऐसा क्या हुआ, कि उसके बढ़े हुए हाथ वहीं के वहीं रुक गए?
नन्हे भोलू के चेहरे पर कुछ ऐसा भाव था कि वह देखती ही रह गई। उसके चेहरे की मांसपेशियाँ कुछ इस कदर खिंच गई थी कि वह उसका ही बच्चा लग ही नहीं रहा था। किसी और ही दुनिया का वासी। भोलू भी एकटक उसी को ताके जा रहा था। सदा की भांति उसके बढ़े हुए हाथों को देखकर उसने किलकारी नहीं भरी थी। खिलखिला कर उछल-उछल नहीं पड़ा था। अपने बाबू की बाहों में अकड़ा-हुआ, वह साँचे में ढली धातु की कोई प्रतिमा लग रहा था।
माईऽऽऽ?‘अचानक उसने पुकारा, फिर इधर-उधर नजर दौड़ाई, मानो किसी को खोज रहा हो। उसकी नजर रमरतियो पर पड़ी, मगर उसके लिये जैसे वहाँ कुछ नहीं था, मानो वह शून्य में ताक रहा हो। उसने फिर पलट कर पिता से पूछा- माई ?
रजतवा को भी मानो साँप सूंघ गया था। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने बालक को ढकेल कर माता की गोद में देना चाहा। रमरतियो भी पुचकारती हुई आगे बढ़ी मगर-
उसने ज्यूँ ही उसे थामा, कि बच्चा ऐसे गला फाड़-फाड़कर चीखने लगा जैसे उसे जबह किया जा रहा हो। साथ ही वह ऐंठता हुआ हाथ-पाँव फेंकता जाता। रमरतियो सन्न रह गई, उसका करेज्जा जोर-जोर से धक्-धक् करने लगा। तभी रजतवा ने हाथ बढ़ाकर शिशु को वापस ले लिया। भोलू बाबू के सीने में छुपकर सुबकने लगा।
रमरतियो और रजतवा काफी देर तक, तरह-तरहके उपायों द्वारा नन्हे भोलू का मन जीतने की चेष्टा करते रहे। वे थककर हार गए, मगर भोलू किसी भी तरह काबू में नही आ रहा था। आखिर रमरतियो के सब्र का बांध भी ढह गया। वह पछाड़ खाने लगी- ‘आई हो ऽऽऽ दद्दाऽऽऽ मोर बचवाऽऽ….. केऽ नकटे, मुँझौंसे, जरलाहे, टोना कइलक होऽऽऽऽ-ऽऽ।’ वह आँख-नाक का लोर मुंह से सड़पती जाती और बार-बार पैर पटकती।
इस शोर-गुल को सुनकर अड़ोस-पड़ोस के सारे मर्द-औरत जमा हो गए। लोग तरह-तरह का उपाय करने लगे। इन उपायों से भोलू और भी बिदक कर छेरिया गया। आश्चर्य, जो भोलू रमरतियो को आसपास फटकने भी नहीं दे रहा था, वही सपाक-से बगल वाली महतोइन मउसी के कोरा में समा गया।
वे तमाम लोग दंग थे, उन्होंने तरह-तरह का कयास लगाना शुरू किया। कोई टोने-टोटके की, कोई नजर लगने की, तो कोई डायन-चुड़ैल की बात बताता। ‘ई त ऽ उपरी हवा-बतास लग रहा है….
देख न रहे होऽ नऽ कइसे बचवाऽ अँखिया गुरेर रहा है- ’ बूढ़े चमरू ने कहा। कइयों ने सिर हिलाया, फिर शुरू हुआ लम्बा विचार-विमर्श। तय हुआ कि पास के गाँव खरांटी के शिवमंदिर वाले पुजारीजी को दिखाया जाय। वे तंत्र-मंत्र के ख्यात ज्ञाता थे।
बात की बात में वे निकल पड़े। खराँटी के रामवचन शास्त्री ने सारा हाल ध्यान से सुना। उन्होंने माता-शिशु की टोह ली। भोलू की पपनियों को पलट कर देखा, फिर कुछ टोटके किए। भोलू और रमरतियो के बालों को जलाया, कुछ मंतर पाठ किया और देर तक समाधी लगाई। फिर बोले –
‘बच्चे को छाया लग गई है जो इसका रक्त-पान कर रही है…… मगर तुम्हारे बालक पर भोले शंकर की कृपा हो गई है। मैं जाप किए देता हूँ- तुम पाँच सेर देसी घिऊ और हवन का प्रबंध कर लो।
हवन सामग्री हेतु डेढ़ सौ रूपये शास्त्री जी को देकर अगले दिन घिऊ लेकर आने की कहकर वे लौट चले। उनके पैर भारी पड़ रहे थे। पांच से घी- यानी महीने भर की कमाई स्वाहा!
इस आवाजाही, दौड़धूप के चलते नन्हा भोलू बिल्कुल थक गया। लौटते समय वह पिता के कंधे पर गाल सटाए-सटाए ही सो गया। घर पहंुचते ही रजतवा ने उसे खाट पर लिटा दिया और आप भी लुढ़क गया। वह तनमन से थक गया था, इसलिए एक टैम की फेरी का कार्यक्रम उसने रद्द कर दिया था।
यह मुहलत रमरतियो के लिए नहीं थी। सारा घर जैसे उसी की प्रतिक्षा में था। उसने अपनी नई साड़ी उतार कर तह की, और उसे खाट के नीचे वाले अपने खास बक्से में बंद कर दिया। साड़ी के संग ही समा गए वे सारे चांदी-गिलट के गहने। उसने अपना पुराना लुआ बेफिक्री से लपेट कर फेटा कमर में खोस लिया और इधर-उधर नजर दौड़ाई।
सबसे पहले उसने जूठे बर्तनों को कठौत में समेटा और बाहर ले जाकर रख आई। फिर चूल्हे में से ढेर सारी राख कुरेद कर ले चली। वह देर तक रगड़-रगड़ कर बासन मांजती, झाड़ू देती, लीपा-पोती करती रही। उसका सारा शरीर राख और गर्द से अंट गया। लुआ-लŸाा पर गोबर-माटी के छींटे पड़ गए। अब वह रसोई करने बैठी। उसने फटाफट पतले-पतले कंडे सुलगाकर साग-भात चढ़ाया। जब तक रसोई बन नहीं गई, वो चूल्हे को फंूक मार-मारकर और बिना हत्थे वाले पंखे से हवा देकर जगाती गई। उसके रोम-रोम से पसीना रिसने लगा। यह पसीना- धूल, गोबर और मांड को जज्ब करके एक अनोखा, चिपचिपा ‘उबटन’ बन गया। लगातार आग के पास बैठे रहने के चलते उसका चेहरा और अधिक स्याह हो गया। एक आबनूसी आभा वहां विरज रही थी। उसके केश झखुराए हुए थे।
रमरतियो काम में मगन थी, तभी कमरे में एक कराह गूँजी, फिर एक धीमी ’माईऽऽ’ की पुकार। उसने चौंक कर ताका, खाट पर सोए रजतवा का पांव भोलू के सीने पर चला आया था जिससे दबकर वह कुनमुना रहा था। रमरतियो द्रवित होकर लपकी। उसने रसोई-सने हाथ से ही रजतवा की टांग हटा दी। पर हड़बड़ी में बच्चे को घुटने की ठेंस लग गई। भोलू नींद में ही सुबक उठाा। उसने करवट बदली। रमरतियो के प्राण हलक में आ गए।
उसे लगा कि अभी-अभी भोलू जग जाएगा। जगते ही उस पर वही खौफनाक टोटका सवार हो जाएगा। वह उसे भुतही आँखों से घूरेगा और किसी आज्ञात डाइन-माई को पुकारता हुआ गोल-गोल पुतलियाँ नचाएगा। फिर अपनी भुतही रूआन रोएगा। रमरतियो का सीना धौंकनी की तरह धक-धक चलने लगा। वह मन ही मन देवता-पितर को याद करने लगी, ‘रच्छा करा हेऽऽ भगवती, हेऽऽ काली, दोहाई हेऽऽ पवनपुतरजी,हेऽऽ संकटमोचन…..
अपने आँचल को पसार कर वह घुटनों के बल बैठ गई पल भर के लिए उसकी आँख मंुद गई। जब उसने आँख खोली तो पाया कि —
नन्हा भोलू जग गया था। वह अपलक उसी को निहार रहा था। उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान खेल नहीं थी।
‘माई ऽऽऽ-‘ वह किलका।
‘हमर बचवाऽऽऽ–’
अगले ही पल रमरतियो नन्हें भोलू को अपनी छातियों पर मसलती हुई उसे आटे की तरह सान रही थी। रजतवा भी जग गया था।
