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*हमारे परिवार के 56 पुरुष सदस्य बँटवारे के दंगों में मारे गए। छप्पन! लाखों सिख परिवार ने बँटवारे का दंश झेला था। पर हौसला कभी नहीं टूटा; ग़म पर काबू पाया, और अगली पीढ़ी के जवान होते ही वे फिर पैरों पर खड़े हो गए। मुख्यधारा में घुल-मिल गए।यही पंजाब की भावना है। यही भावना बनी रहनी चाहिए।चिंगारियाँ राख के नीचे दबी हैं। समझदारी इसी में है कि उन्हें वहीं दबा रहने दें।
1947 में भारत का बँटवारा हुआ। मेरा परिवार भी उन्हीं लाखों में था, जो पाकिस्तान से उजड़कर खाली हाथ किसी अनजान मंज़िल की ओर चल पड़े। बँटवारे के दर्द और उसमें जीवट की कहानियाँ मैंने उन्हीं से सुनी हैं जिन्होंने यह सब झेला।
उन्हीं से पता चला कि हमारे परिवार के 56 पुरुष सदस्य बँटवारे के दंगों में मारे गए। छप्पन! बेटे, पिता, भाई, पति, कुछ ही रक्तरंजित हफ़्तों में सब चले गए। सिर्फ़ औरतें, बच्चे और गिने-चुने मर्द बॉर्डर पार पहुँच पाए। ज़िंदा रहने को औरतों को, बच्चों को मेहनत करनी पड़ी, पर हौसला कभी नहीं टूटा; उनकी हिम्मत ने ग़म पर काबू पाया, और अगली पीढ़ी के जवान होते ही वे फिर पैरों पर खड़े हो गए।
सिख सिर्फ़ पंजाब में नहीं बसे। वे देहरादून, गोरखपुर, शिलॉन्ग, मुंबई, कानपुर, इंदौर और नागपुर तक गए और उन्हें अपना घर बनाया। जहाँ भी गए, घुल-मिल गए, ख़ुद आगे बढ़े। किसी से रहम नहीं माँगा, बस मेहनत की और अपनी आबादी से कहीं ज़्यादा देश को दिया।
आज़ादी के बाद कई दशकों तक सिखों के साथ कोई बड़ा भेदभाव याद नहीं आता; बल्कि उनकी कामयाबी के किस्से मशहूर हुए, मिल्खा सिंह, फ़ील्ड मार्शल अर्जन सिंह, प्रताप सिंह कैरों, खुशवंत सिंह, बिशन सिंह बेदी, अमृता प्रीतम। और फिर पंजाब पर बुरी नज़र पड़ी। करीब दो दशक पंजाब जलता रहा, हिंदू-सिख सबने दुख झेला, जानें गईं, भरोसा टूटा, डर मँडराया, हर मन पर चोट लगी।
घाव फिर से हरा हुआ
यही याद हनी त्रेहन की, दिलजीत की फ़िल्म सतलुज फिर वापिस लायी है। यह उस दौर को दिखाती है जब आतंकवाद के दमन ने और ज़्यादा उग्रवाद को जन्म दिया, और दो पाटों के बीच आम लोग पिस गए। मिलिटेंट तो मारे ही गए, बेगुनाहों को भी मारकर बाद में आतंकवादी करार दिया गया और “कोलैटरल डैमेज” कहा गया। एक मुख्यमंत्री की हत्या हुई, बहुत से पुलिस और सुरक्षाकर्मी मारे गए।
इसकी शुरुआत एक दशक पहले अस्सी के दशक के आतंकी हमलों से हुई, जिसकी परिणीति ब्लू स्टार में हुई, एक ऑपरेशन जिसकी कीमत प्रधानमंत्री ने जान देकर चुकाई। फिर 1984 के दंगों का कहर आया और हर सिख ने वह घाव महसूस किया, भले ही वह निजी तौर पर न सहा हो। हर तरफ़ अविश्वास और भय था; पूरे समुदाय को उसी देश में शक से देखा जाने लगा, जिसे उसने अपने ख़ून-पसीने से बनाया था।
अभी एक ही पीढ़ी पहले सिक्खों ने बँटवारे का दर्द सहकर उस त्रासदी को पीछे छोड़ा था; अब फिर इस काले अध्याय ने उन्हें झकझोर दिया। 
दोष किस पर मढ़ा जाए, बहस अंतहीन है। सही है कि उग्रवाद खूनी था, उसका जवाब भी दमनकारी था, और उस वक़्त के तमाम नेताओं की ज़िम्मेदारी बनती है। इतिहास कभी साफ़-सुथरा नहीं होता, इसलिए हर बात साफ़ कही जानी चाहिए । पर ये बातें, चाहे कितनी सच हों, बदले का समर्थन नहीं करतीं। उस आग से निकलने का एक ही रास्ता है: सुलह (reconciliation)। यही तीन दशकों की सुलह पंजाब को सामान्य स्थिति में लौटा लाई और सिख मन पर मरहम बनी।
निर्णायक मोड़
झुलसे पंजाब को नार्मल बनाने में एक फ़ैसले ने सबसे बड़ी मदद की थी। ये था सोनिया गांधी द्वारा डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना। यही निर्णायक मोड़ था; उग्रवाद के बाद सिखों का मुख्यधारा में लौटना पूरा हुआ। एक सिख IB Director बने, सिख फिर से सेनाध्यक्ष बने, सिख अफ़सर मुख्य चुनाव आयुक्त बने, भारत सरकार के सचिव सिख बने। जिस समुदाय को कभी शक से देखा गया था, उसे फिर देश की रखवाली का दायित्व सौंपा गया, एक गहरा घाव भर गया।
यह अपने आप नहीं हुआ; यह उन लोगों के सक्रिय फैसलों से चलते हुआ, जिन्होंने नफ़रत की फ़सल काटकर सत्ता बनाये रखने की बजाय सुलह और सदभाव का रास्ता चुना।
कांग्रेस अध्यक्ष बनकर सोनिया गांधी ने उस दौर को इग्नोर करने या उसे सही ठहराने की कोशिश नहीं की। वो तो ख़ुद राजनीतिक हिंसा शिकार हुई थीं। हिंसा का दंश उन्होंने ख़ुद झेला था, अपने पति को आंगनवाड़ी के हाथों को कर। लेकिन वो विद्वेष और बदले की भावना के हमेशा ख़िलाफ़ रहीं। उनके बच्चों ने, राहुल और प्रियंका ने अपने पिता के हत्यारों तक को माफ़ कर दिया है।, नफ़रत के ख़िलाफ़ इससे बड़ा स्टेटमेंट नहीं हो सकता।
राजनैतिक ताक़त हाथ में आने पर वे चुपचाप स्वर्ण मंदिर गईं और सिक्खों के सर्वोच्च स्थान पर खामोशी से सिर झुकाया। न भाषण, न कैमरे, बस एक झुका सिर और खेद का भाव, जिसे सिख समुदाय ने चुपचाप महसूस किया।
और जब मनमोहन सिंह को चुना, तो अर्थ स्पष्ट था। शीर्ष पर एक सिख थे, और उनकी धार्मिक आस्था जैसे कोई मुद्दा ही नहीं थी। भारत के लोगों ने उन्हें अपनाया, सराहा और अपने नेता के रूप में सम्मान दिया। यह एक अलिखित स्टेटमेंट था: सिख भारतीय आत्मा का अभिन्न हिस्सा हैं, और वह काला दौर ख़त्म हो चुका है।
2005 में डॉ. मनमोहन सिंह ने 1984 की हिंसा के लिए संसद के पटल पर माफ़ी माँगी। उन्होंने कहा कि उस घटनाक्रम पर वे शर्म से सिर झुकाते हैं, कहा कि वह संविधान में बसे राष्ट्रीयता के विचार का हनन था। संसद में माँगी ऐसी बिना शर्त माफ़ी सुनने के लिए सिख समुदाय ने दो दशक इंतज़ार किया था; उनके लिए यह मन का बोझ हटने जैसा था, एक समापन था।
फिर हाल ही में एक अकल्पनीय बात हुई। राहुल गांधी, इंदिरा गांधी के पोते, हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) गए और चुपचाप तीन दिन सेवा की, उसी स्थान पर जो 1984 की भयावह याद समेटे था। वे पहले भी एक बार वहाँ गए थे, पर इस बार गंभीर सुरक्षा ख़तरों की परवाह किए बिना वे स्वर्ण मंदिर परिसर में ही रुके। उन्होंने कुछ कहा नहीं, ज़रूरत भी नहीं थी; सिखों ने एक बार फिर ख़ामोशी की भाषा समझ ली। संदेश शब्दों से नहीं, आचरण में दिखा। कोई दिखावा नहीं। सिर्फ़ सिद्धांतों में आस्था: बिना शर्त प्रेम में आस्था, नफ़रत और बँटवारे की राजनीति के ख़िलाफ़ आस्था, सद्भाव में आस्था।
सुलह और सदभाव के इस महत्व को पहले भी समझा गया था, अटल बिहारी वाजपेयी, वी.पी. सिंह, देवेगौड़ा और चंद्रशेखर सब समझते थे। राजनैतिक खेमेबंदी के आर-पार नेताओं की एक पूरी पीढ़ी एक सीधी बात समझती थी: राख के नीचे दबी चिंगारियों को फिर कभी नहीं भड़कने देना चाहिए। सरकार का काम घाव भरना और आगे बढ़ना है, उन्हें कुरेदना और उन पर रोटियाँ सेंकना नहीं।
Reconciliation पर दुनिया क्या सोचती है
सुलह- सद्भाव के उदाहरण और भी हैं। 1994 के नरसंहार के बाद रवांडा ने न तो सबकुछ भूल जाने का रास्ता चुना, न ही अंतहीन बदले का; उसने Gacaca कोर्ट बनाईं, जहाँ अपराधियों ने पीड़ित परिवारों के सामने गुनाह कबूल किए और पीड़ित समुदाय ने तय किया कि उन्हें कैसे अपनाया जाए। रंगभेद के बाद दक्षिण अफ़्रीका ने फाँसी के बजाय सत्य और सुलह आयोग (Truth and Reconciliation Commission) बनाया, इस भरोसे से कि सच्चाई दबाने से घाव नहीं भरते हैं। खुलकर उस पर बात करना और फिर सबके साथ ले कर चलना ही बेहतर बेहतर होता है।
त्रासदी भुलाने का कोई तरीका परफेक्ट नहीं होगा है।
इसीलिए दोनों देशों में पीड़ितों को इंसाफ़ अधूरा लगा। पर दोनों ने एक सबक सीखा: जो समाज सिर्फ़ अपने घावों का बदला लेता है, वह सुनिश्चित करता है कि अगली पीढ़ी के पास भी बदला लेने के लिए नए घाव होंगे। उन्होंने हिंसा की भयावहता इसलिए दर्ज की कि आगे की पीढ़ियाँ सबक़ लें, इसलिए नहीं कि नफ़रत को और बढ़ाया जाये।
अटूट वादा
लाखों सिख परिवार ने बँटवारे का दंश झेला था। फिर वो मुख्यधारा में घुल-मिल गए। लेकिन जल्द ही उग्रवाद के वर्षों का अविश्वास सहा, और reconciliation से फिर नॉर्मलाइज़ हुए। वे शांति चाहते हैं। वे इस देश से प्रेम, मेहनत और कुर्बानी करते हैं। उनका हक़ है कि उन्हें फिर कभी असुरक्षा, अलगाव और शक के दौर में न घसीटा जाए।
सिख भावुक, ज़िंदादिल और मेहनती हैं। सिख मूल्यों ने उनमें दर्द सहने और फिर भी इंसाफ़ के लिए लड़ने की क्षमता दी, सिर्फ़ अपने लिए नहीं, ‘सरबत दा भला’ के लिए। पचास और अस्सी के दशक में दो पीढ़ियाँ अकल्पनीय क़त्लेआम से गुज़रीं, फिर भी हर बार एक दशक में समाज फिर खड़ा हो गया, बिना दुर्भावना के देश की सेवा करता हुआ। यह इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि सिख मानते हैं कि सारे इंसान एक हैं: ‘मानस की जात सभै एकै पहचानबो’। रोज़ की अरदास में विवेक, सहनशीलता और विश्वास का वरदान माँगा जाता है: ‘विवेक दान, विसाह दान, विश्वास दान’। यही वजह है कि इस समुदाय में सहने, माफ़ करने और भुला देने का गुण है।
सतलुज पंजाब की पाँच नदियों में से एक है, इन्हीं से पंजाब को नाम मिला। ये नदियाँ सिर्फ़ पानी नहीं, यादों को भी बहाकर आगे ले जाती हैं। इस नदी के नाम पर बनी फ़िल्म याद दिलाती है कि अतीत मिटाया नहीं जा सकता; असली सवाल यह है कि जब वह याद सतह पर उभरे, तो हम उसका क्या करें।
जवाब साफ़ है: इतिहास को दर्ज करो, सहेजो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सीख सकें। लेकिन एक अटल लक्ष्मण रेखा है: इतिहास को घाव फिर से हरा करने का हथियार मत बनाओ। हर राजनीतिक ताक़त की ज़िम्मेदारी है कि आग फिर न भड़के।
इसीलिए राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के आख़िरी दिन, श्रीनगर के भाषण में यह बात कही थी। भारी बर्फ़बारी में, खुले मैदान में खड़े होकर, सुरक्षा बलों की सलाह को नज़रअंदाज़ करते हुए, वे हिंसा-पसंद ताक़तों के सामने सीना तान कर खड़े हुए और नफ़रत की राजनीति को चुनौती दी। उन्होंने कहा:
“देखिए, मैं हिंसा को समझता हूँ। मैंने हिंसा सही है, देखी है। जो हिंसा नहीं सहता, जिसने हिंसा नहीं देखी, उसे यह बात समझ नहीं आएगी। तो जो हिंसा करवाते हैं, वे इस बात को समझ नहीं सकते, वे उस दर्द को समझ नहीं सकते, हम समझ सकते हैं। (इसीलिए) हमारी कोशिश है कि जो विचारधारा इस देश की नींव को तोड़ने की कोशिश कर रही है, उसके ख़िलाफ़ हम खड़े हों, मिलकर खड़े हों, नफ़रत से नहीं, क्योंकि वो हमारा तरीका नहीं है, मोहब्बत से खड़े हों… देश को याद दिलाएँ कि हिन्दुस्तान मोहब्बत का देश है, इज़्ज़त का देश है, भाईचारे का देश है।”
उनके शब्द सिर्फ़ भाषणबाज़ी नहीं थे। काले अध्याय इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज रहेंगे, वे आने वाली पीढ़ियों को कचोटते रहेंगे। लेकिन जो पीढ़ियाँ आएँगी, उन्हें शांति और ख़ुशी में फलना-फूलना चाहिए।
आगे का रास्ता यही है: नफ़रत का सामना करो, दर्द सहो, और यह सुनिश्चित करो कि भरोसा और मेलमिलाप से एक बेहतर भविष्य गढ़ो। सिख गुरुओं ने मानवता को यही संदेश दिया। पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी, ने कहा था:
बिसरि गई सभ ताति पराई, जब ते साधसंगति मोहि पाई।
ना को बैरी नही बिगाना, सगल संगि हम कउ बनि आई॥
(“साधुओं की संगति पाकर मैं दूसरों से सारी ईर्ष्या भूल गया हूँ। न कोई मेरा शत्रु है, न कोई पराया; मैं सबके साथ घुल-मिल गया हूँ।”)
जो सिख इतिहास से परिचित नहीं हैं, उनके लिए बताना चाहता हूँ कि पाँचवें गुरु ने तब शहादत पाई थी, जब जहाँगीर के आदेश पर उन्हें अत्यंत अमानवीय ढंग से क़त्ल किया गया था। फिर भी अगले सौ वर्षों तक, उनके बाद आए पाँच गुरुओं ने कभी नफ़रत की बात नहीं की, कभी इतिहास का हिसाब चुकाने की बात नहीं की। उन्होंने केवल मानवता और समानता का संदेश दिया, बदले के लिए नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ने का संदेश दिया, जहाँ हर किसी की भलाई (सरबत का भला) शब्दों में भी हो और कर्मों में भी।

यही पंजाब की भावना है। यही भावना बनी रहनी चाहिए।
चिंगारियाँ राख के नीचे दबी हैं। समझदारी इसी में है कि उन्हें वहीं दबा रहने दें।
(गुरदीप सिंह सप्पल की पोस्ट से साभार)
