भिखारी ठाकुर जो दरअसल सामाजिक चेतना की अलख का ही एक नाम है, कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता है, तो कोई भोजपुरी का भारतेंदु हरिश्चंद्र । महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें अनगढ़ हीरा और भोजपुरी का शेक्सपियर कहा ।
ए रविशंकर तिवारी का जाने कहवां बानें लोग ‘ विश्व भोजपुरी सम्मेलन ‘ वाला । कहवां चालू बा दोकान । के जाने अध्यक्ष जी भिखारी ठाकुर के नांवें ना सुनले होखें ।
बताया जाता है कि आरा ( बिहार ) के किसी कार्यक्रम में भिखारी ठाकुर ने लाठी का ठेका देते पंडित नेहरू को ग्रामीण समस्याओं और लोक की व्यथा – कथा गीतों में सुनायी थी । पंडित जी भावुक हो गये थे ।
भिखारी ठाकुर जो दरअसल सामाजिक चेतना की अलख का ही एक नाम है, कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता है, तो कोई भोजपुरी का भारतेंदु हरिश्चंद्र । महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें अनगढ़ हीरा और भोजपुरी का शेक्सपियर कहा ।
यह सही है कि भिखारी ठाकुर उस सौन्दर्यचेतना के लोककवि या लोक नाटककार हैं जिसमें स्त्री, मजदूर और वंचितों का पूरा जीवन व्यवहार शामिल है, जो खुद को व्यक्त करने और अपने अनुभवों को आवाज दे सकने में अक्षम हैं । वह सामंती , वर्चस्वशील और दबंग तबके द्वारा फैलाई गयी छद्म चेतना का प्रतिकार रचते हैं जिसमें राष्ट्रीय नवजागरण और मुक्तिसंघर्ष की गूंज है ।
यहां भिखारी ठाकुर अभिव्यक्ति के अपने फ्रेम में लोक के गांधी हो जाते हैं । उन पर बापू की पूरी छाप दिखती है । वह अपने नाटकों में वहीं संदेश दे रहे थे, जो बापू अपने राजधर्म में दे रहे थे । बापू के समाजोद्धार विषयक विचार ही लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के कालजयी नाटक, नौटंकियों के मूल कथानक हैं ।
शीर्ष समालोचक मैनेजर पांडेय लिखते हैं — ‘….भिखारी ठाकुर जो विगत शताब्दी में बिहार और उत्तर प्रदेश के भोजपुरी बोली क्षेत्र में लोक गायक के रूप में व्यापक रूप से प्रसिद्ध हैं ने देशभक्ति से लेकर सामाजिक मुद्दों तक के विषयों पर लिखा है । उन्होंने ब्रिटिश राज के दौरान लोगों के बीच उपनिवेश विरोधी भावनाओं को जगाने का भी प्रयास किया था । अपने नाटक ‘ बिदेशिया ‘ ( द माइग्रैंट- प्रवासी ) के लिए प्रसिद्ध भिखारी ठाकुर का जीवन और रचनात्मक लेखन इस समुदाय के प्रतिदिन के सांस्कृतिक जीवन को जानने के लिए एक प्रवेशद्वार है ।
बिदेशिया थिएटर को देखने के लिए एक बड़ा दर्शक समूह आता था विशेष रूप से तब जब स्वयं भिखारी ठाकुर और उनकी नाटक मंडली नाटक खेलती थी । नाटकों की प्रसिद्धि उनके सामान्य घटनाओं के वर्णन एवं प्रवासियों की पीड़ा से सम्बंधित अनुभवों के कारण थी, यह ऐसा विषय था जो भोजपुरी दर्शकों के दिलों को छू लेता था । मनोरंजन का अंतःप्रकीर्णन तथा विद्यमान व्यवस्था पर व्यंग्य ने भी बिदेशिया थिएटर को लोक कला एवं संस्कृति के एक अत्यंत प्रसिद्ध फॉर्म के रूप स्थापित किया । ये नाटक विद्यमान सामाजिक विभाजनों एवं भोजपुरी प्रवासियों के विस्थापन की प्रक्रिया पर एक टिप्पणी भी है ।
टाइम ऐनेलाइजर प्रो. देवेश दुबे कहते हैं — अपनी माटी से प्रगाढ़ रागात्मक लगाव और अलौकिक इल्म ने लोक गायक भिखारी ठाकुर को अंतरराष्ट्रीय ऊंचाई दी । वह सात समुंदर पार मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, ब्रटिश गुयाना जैसे देशों में आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं । भोजपुरी का यह राजहंस, आज लोक संस्कृति की धरोहर है ।
यशस्वी कथाशिल्पी संजीव ने भिखारी ठाकुर के जीवन पर बहुचर्चित उपन्यास ‘ सूत्रधार ’ लिखा है । उसके मुताबिक जन्म से ही भिखारी ठाकुर अभाव में अपनी जिंदगी घसीटते रहे । पिता दलसिंगार ठाकुर ने जब पढ़ने को स्कूल भेजा, तब काफी दिनों बाद तक भिखारी ठाकुर को ‘ राम गति, देहूं सुमति ’ लिखने नहीं आया । जब वे स्कूल पहुंचते, तो उस समय के माट साहब उनसे नाई वाला काम लेने लगते ।
‘ सूत्रधार ‘ में चर्चा है कि मास्टर लोग भिखारी ठाकुर से कहते कि पढ़ लिखकर क्या करेगा, आखिर जवान होकर हाथ में उस्तरा ही पकड़ना है । अबहिए से पैरैटिस कर ले बचवा । भिखारी ठाकुर का मन स्कूल में नहीं लगा और वे भैंसों के साथ चरवाही में भेज दिए गये ।
उन्हें पढ़ना नहीं आया, लेकिन उसकी जरूरत उन्हें महसूस जरूर हुई । कोई पत्र पढ़ना होता, तो वे मित्र भगवान साह के पास जाते और कहते कि हमरो के पढ़े सिखा द । भिखारी ठाकुर तीस साल की उम्र में रोजी रोटी के लिए परदेश पहुंचे । उस समय का परदेश यानी कोलकाता ।
उनके एक रिश्तेदार मेदनीपुर जिला में रहते थे । वह उस जिले के शहर खड़गपुर, में जमीन पर बैठकर नाईगिरी करने वालों की जमात में जम गये । रात में खाली होने के बाद वे रामायण का अध्ययन करते । वहीं पर उनके पड़ोसी रामानंद सिंह ने उन्हें सलीके से जीने और लिखने की प्रेरणा दी । उसके बाद कलाकार मन वाले भिखारी ने भोजपुरी संस्कृति में क्रांति का अध्याय लिखना शुरू किया ।
और अंत में भारतीय भाषा के यशस्वी कवि केदारनाथ सिंह की यह कविता —
भिखारी ठाकुर
विषय कुछ और था
शहर कोई और
पर मुड़ गई बात भिखारी ठाकुर की ओर
और वहाँ सब हैरान थे यह जानकर
कि पीते नहीं थे वे
क्योंकि सिर्फ़ वे नाचते थे
और खेलते थे मंच पर वे सारे खेल
जिन्हें हवा खेलती है पानी से
या जीवन खेलता है
मृत्यु के साथ
इस तरह सरजू के कछार-सा
एक सपाट चेहरा
नाचते हुए बन जाता था
कभी घोर पियक्कड़
कभी वर की ख़ामोशी
कभी घोड़े की हिनहिनाहट
कभी पृथ्वी का सबसे सुंदर मूर्ख
और ये सारे चेहरे सच थे
क्योंकि सारे चेहरे हँसते थे एक गहरी यातना में
अपने मुखौटे के ख़िलाफ़
और महात्मा गाँधी आकर
लौट गए थे चम्पारन से
और चौरीचौरा की आँच पर
खेतों में पकने लगी थीं
जौ-गेहूँ की बालियाँ
पर क्या आप विश्वास करेंगे
एक रात जब किसी खलिहान में चल रहा था
भिखारी ठाकुर का नाच
तो दर्शकों की पाँत में
एक शख़्स ऐसा भी बैठ था
जिसकी शक्ल बेहद मिलती थी
महात्मा गाँधी से
इस तरह एक सांझ से
दूसरी भोर तक
कभी किसी बाज़ार के मोड़ पर
कभी किसी उत्सव के बीच की
खाली जगह में
अनवरत चलता रहा
वह अजब बेचैन-सा चीख़-भरा नाच
जिसका आज़ादी की लड़ाई में
कोई जिक्र नहीं
पर मेरा ख़याल है
चर्चिल को सब पता था
शायद यह भी कि रात के तीसरे पहर
जब किसी झुरमुट में
ठनकता था गेहुंअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे-धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज़
और ताल के जल की तरह
हिलने लगती थीं
बोली की सारी
सोई हुई क्रियाएँ
और अब यह बहस तो चलती रहेगी
कि नाच का आज़ादी से
रिश्ता क्या है
और अपने राष्ट्रगान की लय में
वह ऐसा क्या है
जहाँ रात-बिरात जाकर टकराती है
बिदेसिया की लय
पुण्यतिथि: 10 जुलाई ( 1971 ), नेहरू रिव्यू से साभार।
