प्रोफेसर यशपाल का मानना था ,यदि किसी वैज्ञानिक में कला, संवेदना और मनुष्य के प्रति करुणा नहीं है, तो उसकी वैज्ञानिकता भी अधूरी है। उनके लिए वैज्ञानिक चेतना का अर्थ केवल प्रयोगशाला का विज्ञान नहीं, बल्कि तर्क, सहिष्णुता, जिज्ञासा और मानवीय संवेदना का विकास था।
25 जुलाई 2017 को भारत ने केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चेतना के सबसे बड़े जन-प्रचारकों में से एक को खो दिया। प्रोफेसर यशपाल उन विरले वैज्ञानिकों में थे जिन्होंने विज्ञान को प्रयोगशाला की चारदीवारी से निकालकर बच्चों, युवाओं और आम लोगों के जीवन का हिस्सा बना दिया। वे मानते थे कि विज्ञान तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने का साहस और सत्य की खोज का संस्कार है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी बच्चे के प्रश्न को छोटा नहीं मानते थे। वे स्वयं बच्चों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करते थे। उनका कहना था कि विज्ञान में हर प्रश्न का उत्तर तुरंत नहीं मिलता। एक वैज्ञानिक उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करता है, और प्रश्न तथा उत्तर के बीच की यही जूझन वैज्ञानिक चेतना को जन्म देती है।
प्रोफेसर यशपाल का जीवन केवल विज्ञान की उपलब्धियों का इतिहास नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत के नैतिक आदर्शों से गहरे जुड़ा हुआ था।
नेहरू का वह प्रश्न जिसने जीवन बदल दिया
देश-विभाजन के समय वे दिल्ली के किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों की सेवा कर रहे थे। सांप्रदायिक हिंसा की एक घटना के बाद जवाहरलाल नेहरू वहाँ पहुँचे। आक्रोश और पीड़ा से भरे नेहरू ने कहा-
“क्या इसी दिन को देखने के लिए हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी? क्या हम ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं?”
युवा यशपाल ने यह वाक्य स्वयं सुना। बाद में वे कहा करते थे कि यही प्रश्न उनके पूरे जीवन का नैतिक मार्गदर्शक बन गया। हर बड़े निर्णय से पहले वे स्वयं से यही पूछते थे—”क्या हम ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं?”
जब गांधीजी की रक्षा के लिए उठाया खाट का डंडा
विभाजन के उन्हीं दिनों महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल शरणार्थी शिविर पहुँचे। वातावरण तनावपूर्ण था और आशंका थी कि कहीं उग्र भीड़ गांधीजी पर हमला न कर दे। युवा स्वयंसेवक यशपाल ने तत्काल पास की एक खाट तोड़ी और उसका डंडा हाथ में लेकर गांधीजी की सुरक्षा के लिए खड़े हो गए। बाद में वे मुस्कुराकर कहते थे कि यह हिंसा का नहीं, बल्कि अपने नैतिक कर्तव्य का सहज भाव था। यह घटना उनके जीवन की सबसे गहरी स्मृतियों में रही।
नेहरू की आत्मकथा से मिली दिशा
प्रोफेसर यशपाल ने स्वयं स्वीकार किया था कि सबसे पहले उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा पढ़ी। उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसके बाद उन्होंने गांधी और टॉल्स्टॉय को पढ़ा। इन विचारों ने उनके भीतर स्वतंत्रता, तर्क, मानवता और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना को और मजबूत किया। 1944 में स्वतंत्रता दिवस मनाने के कारण उन्हें तीन दिन हिरासत में भी रहना पड़ा।
विज्ञान और मानवता का अद्भुत संगम
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अग्रदूतों में शामिल प्रोफेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से अपने वैज्ञानिक जीवन की शुरुआत की। वे स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के प्रथम निदेशक बने, कॉस्मिक किरणों पर उनका शोध विश्व स्तर पर चर्चित रहा, यूजीसी के अध्यक्ष रहे, जेएनयू के कुलपति बने और दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम “Turning Point” के माध्यम से विज्ञान को घर-घर पहुँचाया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पद या पुरस्कार नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बनाना।
वे कहते थे कि एक अच्छा वैज्ञानिक, एक अच्छा कलाकार भी हो सकता है। यदि किसी वैज्ञानिक में कला, संवेदना और मनुष्य के प्रति करुणा नहीं है, तो उसकी वैज्ञानिकता भी अधूरी है। उनके लिए वैज्ञानिक चेतना का अर्थ केवल प्रयोगशाला का विज्ञान नहीं, बल्कि तर्क, सहिष्णुता, जिज्ञासा और मानवीय संवेदना का विकास था।
25 जुलाई 2017 को जब उन्होंने अंतिम साँस ली, तब एक महान वैज्ञानिक का जीवन अवश्य समाप्त हुआ, लेकिन उनकी जिज्ञासा, उनका आशावाद और प्रश्न पूछने की संस्कृति आज भी जीवित है। वे हमें याद दिलाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके हथियार नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की वैज्ञानिक दृष्टि, मानवीय संवेदना और सत्य की खोज का साहस है।
प्रोफेसर यशपाल की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।उनकी विरासत हमें लगातार यह प्रश्न पूछने की प्रेरणा देती रहे-“क्या हम ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं?”
प्रोफेसर यशपाल की पुण्यतिथि पर विशेष : गांधी दर्शन से साभार
Science For Everyone By AK Pandey
