जब उन्होंने इस मुद्दे पर सितंबर में आमरण अनशन शुरू किया, तो उसके बाद सिर्फ अपने लोगों से बातचीत की, भारतीय लोगों से, ब्रिटिश सरकार से नहीं की।
सोनम वांगचुक के अनशन के संदर्भ में मैंने लिखा था कि गांधी ने ब्रिटिश के ख़िलाफ़ कभी अनशन नहीं किया। कुछ लोग में 1932 में पुणे पैक्ट के वक़्त गाँधी द्वारा किए गये “आमरण अनशन” को अंग्रेज़ों के विरुद्ध सबसे बड़ा उपवास मानते हैं। महात्मा गांधी की ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडॉनल्ड को 18 अगस्त, 1932 को लिखी चिट्ठी के कारण ऐसा आभास होता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर depressed classes के लिए अलग निर्वाचन मंडल के फैसले को वापिस नहीं लिया गया, तो वो आमरण अनशन शुरू करेंगे।
लेकिन गाँधी के तौर-तरीक़ों को समझने के लिए थोड़ा गहराई से देखना होगा, क्योंकि इसी में अनशन के औज़ार का पूरा राज़ छिपा है।
अगस्त 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने “कम्युनल अवॉर्ड” का ऐलान किया, जिसमें दलितों (depressed classes) को अलग निर्वाचन-मंडल (separate electorate) दे दिया गया। गांधी के अनुसार ये हिंदू समाज को स्थायी रूप से बाँटने की अंग्रेज़ी चाल थी, फूट डालो, राज करो नीति की चाल! उनका विरोध दलितों के प्रतिनिधित्व से नहीं था, विरोध अलग चुनाव-मंडल से था।
गांधी ने अंग्रेज़ों से पत्र-व्यवहार ज़रूर किया, पर उसका मक़सद बातचीत से समझौता करना नहीं था। उनका मक़सद इस पत्र-व्यवहार की मार्फ़त इस मुद्दे पर अपनी ठोस, ग़ैर-समझौतावादी (non-negotiable) पोजीशन को देश के सामने रखना था। एक मायने में कहें, तो उनका लक्ष्य एजेंडा तय करना था। इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से ख़ुद आग्रह किया कि प्रधानमंत्री मैकडॉनल्ड को और भारत-सचिव सैमुअल होर को लिखे पत्र सार्वजनिक किए जायें।
13 सितंबर को जब ब्रिटिश सरकार ने यह पूरा पत्र-व्यवहार जारी किया, तो देश सन्न रह गया।
गांधी के लिए अंग्रेज़ों के साथ पत्राचार असल में एजेंडा तय करने का एक मंच था, बातचीत की मेज़ । बातचीत वो अंग्रेजों से नहीं, भारतीय समुदाय से करना चाहते थे।
इसीलिए जब उन्होंने इस मुद्दे पर सितंबर में आमरण अनशन शुरू किया, तो उसके बाद सिर्फ अपने लोगों से बातचीत की, भारतीय लोगों से, ब्रिटिश सरकार से नहीं की।
उन्होंने अपना अनशन उन लोगों पर नैतिक दबाव डालने के लिए शुरू किया था, जो उनसे जुड़े थे। उनके अपने देश के लोग, यानि डॉ. अम्बेडकर, डिप्रेस्ड क्लासेज के नेता और सवर्ण हिंदुओं के नेता।
अनशन शुरू होते ही देश में हलचल मच गई थी। मदन मोहन मालवीय की पहल पर तेज बहादुर सप्रू, एम आर जयकर, राजाजी राजगोपालाचारी, जी डी बिड़ला जैसे सवर्ण हिंदू नेता गांधी से मिलने गए।
दूसरी ओर अंबेडकर, एम सी राजाह, आर श्रीनिवासन जैसे दलित नेता इसके बाद गांधी से बात करने पहुंचे।
गांधी ने इस बातचीत में ख़ुद को रेफ़री की भूमिका में रखा; उन्होंने एजेंडा तो तय किया, लेकिन कहा कि जो भी हल ज़िम्मेदार स्वर्ण हिंदू और दलित नेता मिलकर निकालेंगे, वे मान लेंगे।
24 सितंबर को अंबेडकर और मालवीय के बीच पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए। ये पूरा समझौता भारतीयों ने आपस में किया, बिना किसी अंग्रेज़ अधिकारी की भागीदारी के। अंग्रेज़ों ने केवल उस पर मंज़ूरी की मुहर लगाई, और गांधी ने 26 सितंबर को अनशन तोड़ा।
यही अनशन की आत्मा है। यह उन पर असर करता है जो आपकी मौत का बोझ नहीं उठा सकते, आपके अपने लोग। अंग्रेज़ किनारे खड़े तमाशबीन बने रहे, क्योंकि गांधी जानते थे कि उन पर अनशन का कोई ज़ोर नहीं चलेगा। बातचीत हमेशा अपनों से थी। गांधी को समझने के लिए यही समझना होगा।
ग़लत जगह अनशन का अस्त्र चलाना, और फिर उसकी नाकामी को गांधीवाद की हार बता देना, दोनों ही इतिहास से नादानी है।
(एक बात फिर सोनम वांगचुक के अनशन पर। केजरीवाल उनके मंच पर गए, समर्थन दिया और कह दिया कि धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना चाहिये और वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाना चाहिए।
इस एक स्टेटमेंट से उन्होंने वांगचुक के नैतिक आंदोलन को उनके लिए निजी पद में परिवर्तित कर दिया। वांगचुक की रैफरी की भूमिका को समाप्त कर दिया। शायद वो वांगचुक का नैतिक क़द सीमित करना चाहते होंगे, कि कहीं उपवास उन्हें बहुत बड़ा आइकॉन ना बना दे। लेकिन अगर आप गांधी के उपवासों का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि गांधी ने कभी भी ख़ुद के पद-पोजीशन के लिए अनशन नहीं किया था। पर-पीड़ा को समझना, निजी त्याग से उसे जोड़ना, नैतिक मूल्यों पर अपनों को झकझोरना, उनकी अंतरात्मा तो जगाने की कोशिश ही गांधी की वास्तविक ताक़त बने। केजरीवाल या तो इसे समझने में चूक कर गए, या फिर पैंतरा खेल गए। जो भी हो, वांगचुक को इस सुझाव से स्वयं इनकार करना चाहिए। सब जानते हैं कि जब केजरीवाल पंजाब सरकार में ख़ुद उन्हें शिक्षा मंत्री नहीं बना रहे हैं, तो मोदी की कैबिनेट में शिक्षा मंत्री बनाने का सुझाव तो कोरी जुमलेबाजी या पैंतरेबाजी ही है।
गांधी के तमाम अनशन देख लीजिये। शाब्दिक या राजनैतिक जुमलेबाजी का कोई उदाहरण नहीं मिलेगा। वो ऐसी राजनैतिक टोटकेबाज़ी से ऊपर थे। इसीलिए उनका कहा हर शब्द मायने रखता था। इसलिए उनका कोई भी उपवास अप्रभावी नहीं रहा।
इसीलिए मेरा कहना है कि गाँधी के रास्ते पर चलिये, लेकिन उनके नाम पर राजनैतिक प्रपंच या हल्की जुमलेबाजी मत कीजिए। गाँधी की तौर तरीकों में लोगों का विश्वास बना रहे, इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन्हीं की है, जो गांधी के नाम से ख़ुद को जोड़ते हैं।)
गुरुदीप सिंह सप्पल की पोस्ट से साभार
