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जो विधेयक लोकसभा में विपक्ष की एकजुटता से गिरा, वह महिला आरक्षण विधेयक नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहग्रस्त परिसीमन विधेयक था, जो राजनीतिक बेईमानी की गहरी साजिशों से भरा हुआ था माना जा रहा था।
राजीव गांधी काल का 64वां संविधान संशोधन विधेयक भारत में महिला आरक्षण की पहली क्रांतिकारी पहल थी, जो बीजेपी सहित कुछ दलों के विरोध से राज्यसभा में 2/3 बहुमत में मात्र एक वोट की कमी से अपदस्थ हुई थी। जहां तक संसद व राज्य विधायिका में महिला आरक्षण का सवाल है, उसका संविधान संशोधन तो कांग्रेस सहित तमाम दलों के खुले समर्थन से पहले ही 2023 में हो चुका है। जो विधेयक लोकसभा में विपक्ष की एकजुटता से गिरा, वह महिला आरक्षण विधेयक नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहग्रस्त परिसीमन विधेयक था, जो राजनीतिक बेईमानी की गहरी साजिशों से भरा हुआ था माना जा रहा था। सन् 2023 में सभी दलों के समर्थन से महिला आरक्षण के पहले ही हो चुके संवैधानिक प्रावधान को जाति गणना सहित चल रही अद्यतन नई जनगणना की प्रतीक्षा किये बिना, पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन बनाकर लागू करने की यह पहल संघीय न्याय, सामाजिक न्याय विरोधी और संविधान विरोधी साजिशी पहल थी। संसद सहित विधायिका सदनों में 2023 में ही सभी दलों के सहयोग से स्थापित महिला आरक्षण 2029 के चुनाव में लागू होने का संवैधानिक संकल्प है। उसमें अभी तीन वर्ष से ज्यादा वक्त शेष है। चल रही जनगणना पूर्ण होने के बाद यह काम सहजता से और न्यायसंगत ढंग से हो सकता है। इसके बावजूद बंगाल में चल रहे चुनाव में महिला आरक्षण कै लेकर मतिभ्रम पैदा करने एवं दुष्प्रचार करने के निहित लक्ष्य से संसद की विशेष बैठक राजनीतिक बेईमानी से भरे परिसीमन के लिये बुलाई गई। सरकार इसे पास कराने की जगह चाहती थी कि विधेयक निरस्त हो जाय। यह कैलकुलेटेड मूव था कि विधेयक में परिसीमन की धांधलियों के नाते विपक्ष इसका विरोध करेगा, और सरकार के पास दो तिहाई बहुमत है नहीं। इस स्थिति में लाजिमी है कि विधेयक पारित नहीं होगा। इससे सत्ता दल को दुष्प्रचार का मौका मिलेगा कि कांग्रेस नीत इंडिया मोर्चे के दल महिला आरक्षण विरोधी हैं। दरअसल आज की सरकार को इस संवैधानिक लोकतंत्र में निपट चुनावी लाभ के नैरेटिव गढ़ने के अलावा और कुछ भी सूझता ही नहीं। जिस महिला आरक्षण का संविधान संशोधन कांग्रेस 2023 में ही समर्थन देकर करा चुकी है, उसके विरोध का आज कोई प्रश्न कहां से उठता है ? विरोध तो उस परिसीमन का है, जिसे शीघ्रता से जनगणना कार्य पूर्ण कराकर उसके बाद कराया जाना चाहिये। इस जिम्मेदारी को अनदेखा कर लाया गया यह परिसीमन विधेयक पिछड़े वर्गों, दक्षिण एवं पूर्वोत्तर के राज्यों के प्रतिनिधित्व के हितों को आहत करने वाला और इस तरह संघीय न्याय एवं सामाजिक न्याय के तकाजों के खिलाफ था। नेता प्रतिपक्ष का स्पष्ट कहना है कि महिला आरक्षण विधेयक तो हम तीन साल पूर्व ही पारित कर उसे पहले ही संविधान का हिस्सा बना चुके हैं, आज तो हमने दलगत स्वार्थ के राजनीतिक लाभ हेतु चुनावी ढांचे को ही बदल देने की कोशिश को रोका है।
(सतीश कुमार की पोस्ट से साभार)
