पुण्यतिथि : (13 अप्रैल 1973 ) पर संस्मरण । अरे यह तो कॉमरेड बलराज हैं। फ़िल्म के समानांतर उग्रेसन जी की टिप्पणियों और यादों की पोटली खुल चुकी थी । हम फ़िल्म कम देख रहे थे ,अब उन्हें ही ज्यादा सुन रहे थे ।
तारीख ठीक – ठीक याद नहीं लेकिन यह 1978 – 79 का साल था । दिल्ली के प्रगति मैदान ( मेट्रो स्टेशन का नाम अब सुप्रीम कोर्ट हो गया है ) में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला लगा था । उस समय मोरारजी देसाई की जनता सरकार में मोहन धारिया वाणिज्य मंत्री थे ।
मैं भी, रामछबीला मिश्र , धर्मराज सिंह और कुछ अन्य , बड़े सोशलिस्ट नेता , सांसद उग्रसेन ( ‘ सिंह ‘ जाति सूचक उपनाम उनके डिकास्ट होने की प्रक्रिया में गैर जरूरी होकर समाजवाद की अनथक साधना के पथ पर कहीं चू गया था ) के साथ व्यापार मेले में गये थे । अपनी आदत जो उनकी सहज शैली थी के मुताबिक उन्होंने मोहन धारिया से मेरा परिचय कराया — ‘ दोस्त यह है राघवेंद्र …मेरे जिगर का टुकड़ा .. ऐसे ही जुनूनी नौजवानों के बूते मैं 40 लाख की नुमाइंदगी करता हूं .. दोस्त .. मिलो इससे …। ‘
मोहन धारिया ने मुझसे लपक कर हाथ मिलाया , मेरी पीठ थपथपाई । उसके बाद हमलोग रीगल आ गये । टिकट लिया और हॉल में । यह भी नहीं जाना कि कौन फ़िल्म लगी है ।
- अरे यह तो कॉमरेड बलराज हैं
फ़िल्म के समानांतर उग्रेसन जी की टिप्पणियों और यादों की पोटली खुल चुकी थी । हम फ़िल्म कम देख रहे थे ,अब उन्हें ही ज्यादा सुन रहे थे ।
- ‘.. मैंने मुंबई से ही अपनी राजनीतिक शुरुआत की थी .. मजदूर आंदोलन से .. जार्ज तो तब सक्रिय हुए जब मैंने मुंबई छोड़ दी …अरे हां , कॉमरेड बलराज ने मुझे एक किताब दी थी पढ़ने को …. मैं उन्हें लौटना भूल गया … हा .. हा .. हा । गजब लापरवाह हूं मैं ।
…. क्या संयोग है … मेरे इस लाजवाब दोस्त का जन्म भी अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस ( एक मई 1913 ) के दिन ही हुआ था और इसने पूरी जिंदगी एक ईमानदार और प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट की ही जी । 1949 में प्रखर कम्युनिस्ट होने और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ बोलने के कारण इसे छह महीने की जेल हुई थी लेकिन क़ानून ने, एक दिहाड़ी मजदूर के तौर पर पूरी इज्ज़त के साथ फिल्म सेट पर काम करने का अधिकार भी दिया था ।..’
कॉमरेड बलराज साहनी अप्रतिम अभिनेता थे । ‘ दो बीघा ज़मीन ‘ , ‘ सीमा ‘ , ‘ काबुलीवाला , ‘ गर्म हवा ‘ के बलराज को कौन भूल सकता है । वह एक उत्कृष्ट , नैसर्गिक और मौलिक कलाकार थे ।
उस समय के और जिनके उल्लेख बिना भारतीय सिनेमा के 100 साल का इतिहास न पूरा होता है न प्रामाणिक , ज्यादातर फिल्मकार या अभिनेता नेहरूवीयन या कम्युनिस्ट ही क्यों थे ? क्या यही होना किरदार में उतरने और उसे जीने लगने का हौसला या हुनर होता था ?
कोलकाता की सड़क पर हाथ रिक्शा खींचने वाले को जीने के लिए बलराज साहनी ने कई दिन भूख के गुजारे , लाचारगी और एक मजदूर का संत्रास घूंट – घूंट , पपड़ी पड़े होठों से पी लिया । तब उनमें एक रिक्सावाला ‘ रिवील ‘ हुआ था ।
( फ़िल्म : दो बीघा जमीन में ) अपनी जमीन ( खेती – बारी ) गंवा चुका , हाथ रिक्सा खींच रहा यह शख्स तब मशहूर अभिनेता बलराज साहनी नहीं शम्भू था । कुछ को छोड़ दें तो आज के अधिकांश अभिनेता किरदार को अपनी ही स्टार छवि में उतारते हैं । बलराज साहनी वह अभिनेता थे जो किरदार ( कैरेक्टर ) में खुद को विसर्जित कर देते थे । बलराज साहनी एक जेन्युइन मनुष्य और जीनियस कलाकार थे । क्या इसीलिए वह कम्युनिस्ट भी थे ?
बलराज साहनी एक प्रतिभाशाली लेखक भी थे और शुरुआती लेखन अंग्रेजी में किया हालांकि बाद में पंजाबी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक बन गये । 1960 में, पाकिस्तान की यात्रा के बाद, उन्होंने ‘ मेरा पाकिस्तानी सफर ‘ लिखा , उनकी किताब, मेरी रशिया सफरनामा, को ‘ सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार ‘ मिला ।
वह और पी के वासुदेवन नायर दिल्ली में एआइआइएफ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को आयोजित करने के लिए फायरब्रांड कम्युनिस्ट, कॉमरेड गुरु राधा किशन के साथ अखिल भारतीय युवा संघ के लिये कार्यरत थे । बलराज साहनी अखिल भारतीय युवा संघ के पहले अध्यक्ष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की युवा शाखा के रूप में निर्वाचित हुए ।
बलराज साहनी पूर्ण रूप से मार्क्सवादी थे । उन्होंने कहा था – ‘ जब मेरी मौत होगी तब कोई पंडित न बुलाना । कोई मंत्र उच्चारण नहीं होगा । जब मेरी अंतिम यात्रा निकलेगी तो मेरे शरीर पर लाल रंग का झंडा होना चाहिए ।’
टाइम ऐनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे कहते हैं — वह ‘ मेथड एक्टिंग ‘ का आविष्कार होने से पहले के ‘ मेथड एक्टर ‘ थे । प्रभावशाली अभिनय के प्रचलन में आने से बहुत पहले बलराज साहनी ने अपने किरदार जीना, उसमें डूब जाना सीख लिया था, जैसे कि वे उनके डीएनए का हिस्सा हों ।
विनम्र श्रद्धांजलि
Raghvendra Dubey (nehru review से साभार)
