‘ तीसरी कसम ‘ देखने और उस भावालोक में उतर सकने की सलाहियत तमाम रिटायर्ड और नौकरी में बने आचार्यों में भी नहीं है । हो सकता है वे शैलेन्द्र, साहिर , मजरूह , हसरत जयपुरी, शकील बदायूंनी के गीतों को कमतर साहित्य मानते हों । बहरहाल नामवर सिंह जी रैदास के बाद शैलेन्द्र को भारत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कवि मानते थे ।
मुझे लगता है मोहब्बत भी कोई दलित / गरीब ही जी सकता है, इसलिए कि उसके पास और कुछ नहीं होता । सांस्कृतिक अभिजन, उच्च वर्णीय – उच्च वर्गीय में प्यार जी सकने का हौसला नहीं होता । यही वजह है कि जन नायक राहुल गांधी जी की ‘ मोहब्बत की दुकान ‘ से सर्वाधिक आवेशित आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़े और अल्पसंख्यक ही हैं ।
सम्भवतः बीते साल ही एक खास संदर्भ में बुद्ध, कबीर, गांधी की राह, जीवन संदर्भों के अन्वेषक ख्यात जनबुद्धिधर्मी प्रो. सदानंद शाही और टाइम ऐनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे से अप्रतिम गीतकार कॉमरेड शैलेन्द्र पर लंबी चर्चा हुई थी । शैलेन्द्र पर एक आयोजन की भी उनकी योजना है ।
आज फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि पर शैलेन्द्र को भी याद करने के अपने औचित्यपूर्ण संदर्भ हैं । रेणु पर अलग से इसी फेसबुक वाल पर अभी – अभी लिखा है । इस दूसरी पोस्ट में शैलेन्द्र पर ।
शैलेन्द्र और महान कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु की यह फोटू मुझे कहां मिली , याद कर लूं तो बता दूंगा । यह फोटू देख कर मुझे ‘ रील पर कविता ‘ , अप्रतिम प्रेमकथा फिल्म ‘ तीसरी कसम ‘ याद आयी और ‘ पिंजरे वाली मुनिया ‘ का आलोक झिलमिला गया ।
फिल्म ‘ तीसरी कसम ‘ अलग – अलग शहरों में ( गोरखपुर नहीं ) मैंने 12 – 14 बार देखी है । मेरे शहर गोरखपुर में ‘ तीसरी कसम ‘ देखने और उस भावालोक में उतर सकने की सलाहियत तमाम रिटायर्ड और नौकरी में बने आचार्यों में भी नहीं है । हो सकता है वे शैलेन्द्र, साहिर , मजरूह , हसरत जयपुरी, शकील बदायूंनी के गीतों को कमतर साहित्य मानते हों । बहरहाल नामवर सिंह जी रैदास के बाद शैलेन्द्र को भारत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि मानते थे ।
‘ तीसरी कसम ‘ 1966 में बनी भारतीय भाषा की नाट्य फिल्म है । फ़िल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने और निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने किया था । यह फणीश्वर नाथ ‘ रेणु’ की प्रसिद्ध कहानी ‘ मारे गए ग़ुलफ़ाम ‘ पर आधारित है । फिल्म का संवाद भी फणीश्वरनाथ रेणु ने ही लिखा । इस फिल्म के मुख्य कलाकार राज कपूर और उनके अपोजिट वहीदा रहमान थीं ।
कुछ याद आ रहा है । फिल्म में कजरी नदी के किनारे हीरामन ( राजकपूर ) , हीराबाई ( वहीदा रहमान ) से पूछता है – मन समझती हैँ न आप ?
कैमरा क्लोज रेंज में वहीदा रहमान पर फोकस करता है । हीराबाई कुछ नही बोलतीं । अपलक हीरामन को देखती हैँ । गोरखपुर के कुछ आचार्य सूक्ष्म जीवन अनुभवों का चंदोवा यानी प्रेम क्या जानें ? लेकिन , प्रो. सदानंद शाही से पूछा जा सकता है — मन समझते हैँ न आप ?
मन समझने वाले गिनती के कुछ और लोग , हमारे समय के जरूरी कवि देवेंद्र आर्य , पत्रकार अशोक चौधरी , मनोज सिंह भी हैँ । इन्होंने जरूर मन से देखा होगा — तीसरी कसम ।
“ चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया…
चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया…
उड़-उड़ बैठी हलवइया दुकनिया…
उड़-उड़ बैठी हलवइया दुकनिया…
अरे, बर्फी के सब रस ले लिया रे पिंजरे वाली मुनिया…”
अन्योक्ति रूप में खुद पर ही गीत के बोल सुनकर , हिरामन के टप्पर गाड़ी में बैठी हीराबाई का मंद-मंद मुस्कराना प्रो. शाही को याद होगा । जरूर याद होगा ।
याद ही होगा शाही जी को —
‘….आसिन-कातिक के भोर में छा जानेवाले कुहासे से हिरामन को पुरानी चिढ़ है । बहुत बार वह सड़क भूल कर भटक चुका है । किंतु आज के भोर के इस घने कुहासे में भी वह मगन है । नदी के किनारे धन-खेतों से फूले हुए धान के पौधों की पवनिया गंध आती है । पर्व-पावन के दिन गाँव में ऐसी ही सुगंध फैली रहती है । उसकी गाड़ी में फिर चंपा का फूल खिला । उस फूल में एक परी बैठी है । …जै भगवती । ‘
हिरामन ने आँख की कनखियों से देखा, उसकी सवारी …मीता …हीराबाई की आँखें गुजुर-गुजुर उसको हेर रही हैं । हिरामन के मन में कोई अजानी रागिनी बज उठी । सारी देह सिरसिरा रही है । बोला – ‘ बैल को मारते हैं तो आपको बहुत बुरा लगता है ? ‘
हीराबाई ने परख लिया, हिरामन सचमुच हीरा है । ‘… रेणु का यह लेखन हमेशा चिर स्मरणीय क्लासिक लोक में डूबे रहने वाले आचार्य नहीं समझ सकते।
(Nehru review से साभार) पुण्यतिथि: 11 अप्रैल (1977 ) पर
