अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 90 वर्ष पूर्ण हुए। इस यात्रा में प्रलेस ने कई उतर चढ़ाव देखे। इस अवसर पर मुंबई में दो दिवसीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है। इस संदर्भ में बम्बई (आज के मुंबई) में आयोजित अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के तीसरे सम्मेलन (22-25 मई, 1943)को याद किया जाना चाहिए क्योंकि तब और आज की वैश्विक और राष्ट्रीय परिस्थितियां एक जैसी ही हैं। साथ ही बम्बई सम्मेलन के उदघाटन अवसर पर कामरेड डाँगे के अध्यक्षीय उदबोधन की प्रमुख बातें पढ़ी जानी चाहिए।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 90 वर्ष पूर्ण हुए। इस यात्रा में प्रलेस ने कई उतर चढ़ाव देखे। इस अवसर पर मुंबई में दो दिवसीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है। इस संदर्भ में बम्बई (आज के मुंबई) में आयोजित अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के तीसरे सम्मेलन (22-25 मई, 1943)को याद किया जाना चाहिए क्योंकि तब और आज की वैश्विक और राष्ट्रीय परिस्थितियां एक जैसी ही हैं। साथ ही बम्बई सम्मेलन के उदघाटन अवसर पर कामरेड डाँगे का अध्यक्षीय उदबोधन पढ़ा जाना चाहिए।
पहले कुछ बाते स्थापना दिवस पर –
प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी।
सात वर्ष पहले, 1936 में, ख्यातिलब्ध साहित्यकार प्रेमचन्द की अध्यक्षता में लखनऊ में आयोजित पहले सम्मेलन में प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ था। हमारे देश के साहित्य परिदृश्य में प्रगतिशील लेखन का अस्तित्व हमेशा से रहा है। प्रगतिशील लेखक संघ ने हमारे देश के साहित्यिक आन्दोलन को प्रगतिशील स्वरूप, चेतना और दिशा प्रदान किया। इसने हमारे लेखकों के विश्व फासिस्ट विरोधी लेखक संगठन के साथ लाकर इसे सांगठनिक तौर पर संस्कृति की रक्षा के विश्वसंघ से जोड़ा।
विश्व के पैमाने पर गठित यह महान सांस्कृतिक आंदोलन फासिस्ट विरोधी व्यापक संयुक्त मोर्चे का अंग था जो 1933 से ही गठित किया जा रहा था तथा जिसकी परिणति 1935 और 36 के फ्रांस और स्पेन के जन-मोचौं में हुई। जो लोग उन घटना-बहुल वर्षों के इतिहास से परिचित हैं. जानते हैं कि बुद्धिजीवियों (विशेषतः फ्रांसीसी) ने प्रसिद्ध उपन्यासकार हेनरी बारबुसे के नेतृत्व में फ्रांस और स्पेन की जनता का फासिस्टवाद की काली ताकतों के विरोध में एकताबद्ध करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की।
1943 में बम्बई (आज के मुंबई)में प्रगतिशील लेखक संघ का सम्मेलन द्वितीय विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी एवं फासिस्ट ताकतों से निर्णायक लड़ाई से जूझते सांस्कृतिक साहित्यिक संकट से संघर्ष के दौर में हुआ था। इस अधिवेशन में कामरेड डाँगे का अध्यक्षीय उद्बोधन बहुत महत्वपूर्ण रहा था।
अब कामरेड डाँगे के अध्यक्षीय उद्बोधन के प्रमुख अंश –
मुम्बई सम्मेलन किन परिस्थितियों में आयोजित हुआ ? इसका आयोजन तब हो रहा है जब दुनिया के सारे जन-गण फासिस्टी गुलामी का खतरा झेल रहे हैं, जब सभी देशों की संस्कृति और सभ्यता पर घातक आक्रमण का वास्तविक खतरा उपस्थित है, जब एक नये अंधकार युग के आने का खतरा है। इस गम्भीर संकट में भारतीय प्रगतिशील लेखकों की क्या भूमिका है ? उनकी मजबूत फासिस्ट विरोधी, उनकी सोवियत पक्षधरता, चीनी जनता के प्रति उनकी मित्रता इन सब में कोई संदेह नहीं। कामरेड एस. ए. डाँगे ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा: ‘हमारे महान मानवतावादी विश्वविख्यात कवि टैगोर ने जापान के फासिस्ट साहित्यकार नागूची द्वारा बढ़ाये दोस्ती के बढ़े हाथ को झटकार दिया। क्या हम तटस्थ बने रह सकते, फासिज्म के विरोध में खड़े नहीं हो सकते और अपने सम्पूर्ण अतीत को, अपने महानतम कवि को और देशभक्त नेतृत्व वर्ग को झुठला सकते हैं? हम ऐसा नहीं कर सकते। हम फासिज्म के विरोध में और इस युद्ध में इसके पूर्ण विनाश के लिए खड़े हैं। हमने फासिज्म विरोध का और दुनिया के समी राष्ट्र और जनगण की मुक्ति का पक्ष चुना है।
डांगे ने अपने भाषण में न केवल प्रगतिशील लेखक संघ के फासिस्ट विरोध पर बल दिया बल्कि उनका आहवान किया कि वे डाँगे ने अपने भाषण में न केवल भारतीय प्रगतिशील लेखक दोतरफा बने रहना बन्द करें। उन्होंने ‘सन्ताप-ग्रस्त आत्माओं से रुखे तौर पर कहा, “यदि आप सोचते हैं कि सोवियत संघ के नेतृत्व वाले देशों की जीत से आपको कुछ लेना-देना नहीं, तो आप अपने देश को गुलाम बनाकर रखने वाले से अपनी आजादी का मार्ग प्रशस्त नहीं कर रहे हैं. आप उसकी जगह पर और भी बदतर गुलामी को मदद पहुंचा रहे हैं. आप न केवल अपने सारी मानवता के समस्त संस्कृति के विनाश को न्योता दे रहे हैं। भारत की रक्षा हमारा दायित्व रक्षा के लिये, दुर्भिक्ष और तोडफोड के विरुद्ध एक राष्ट्रीय सरकार के गठन के लिये, जेल में पडे हजारों लोगों की रिहाई के लिये, हमारी कला जनता को गोलबन्द करे, एकताबद्ध करे।”
इस एकता का आधार क्या है? डाँगे के अनुसार “यह सोचा भी नहीं जा सकता कि कोई कलाकार-मराठी, कर्नाटकी, बंगाली जो अपनी जनता की भाषा, संस्कृति, विचारधारा और भावना का प्रतिनिधित्व करता है, दूसरों के ऊपर अपने को थोपने का प्रयास करेगा। स्वायत्त राष्ट्रीयताओं का स्वेच्छया एकताबद्ध हिन्दुस्तान, न कि थोपा हुआ अखंड हिन्दुस्तान हमारे जन-कलाकारों का असली वास-स्थान और आदर्श होगा।
डाँगे का भाषण अत्यन्त महत्वपूर्ण था। उन्होंने प्रारम्भ से ही मराठी साहित्य का सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण किया और मराठी साहित्य के वर्तमान संकट की निम्नलिखित व्याख्या प्रस्तुत की :- हमारे लेखक आज के दैत्याकार वैश्विक संघर्ष के संपूर्ण स्वरूप को समझने में पूर्णतः असफल रहे हैं।” डाँगे के अनुसार आज कला उन तक पहुँच गयी है जो भारत तथा दुनिया के आमलोगों के साथ जी रहे और जीविका पा रहे हैं… मेहनतकश वर्ग के लेखक प्रेरणास्पद नाटिकाएँ कविताएँ और कहानियाँ लिख रहे हैं। मराठी पवाड़ा (वीरगाथा) जो सोलहवीं सदी में लुप्त हो चुका था। एकाएक उभर कर सामने आ गया है और एक मजदूर कवि ने स्टालिन ग्राड की वीरगाथा को अभिव्यक्ति दी है। स्टालिनग्राड हमारे मेहनतकश वर्ग के कण-कण में रचा-बसा है। अतः यह उस वर्ग के बच्चों में सच्ची कविता की प्रेरणा दे सकता है।”
बंबई सम्मेलन में अध्यक्ष मंडल के सदस्य
डाँगे के साथ अध्यक्ष मंडल के अन्य सदस्य थे-उर्दू के महान शायर जोश मलीहाबादी, तेलुगु लेखक तापी धर्मरावः प्रसिद्ध गुजराती लेखक और समीक्षक जितुभाई; आनन्दबाजार पत्रिका के पूर्व सम्पादक एवं बंगला साप्ताहिक अरणि के वर्तमान सम्पादक सत्येन्द्रनाथ मजुमदार तथा कन्नड़ विद्वान प्रोफेसर जागीरदार।
अन्य उद्बोधन की महत्वपूर्ण बातें –
जितुभाई तथा तापी धर्मराव दोनों ने ही अपनी-अपनी भाषा में अति प्राचीन काल से प्रगतिशीलता और प्रतिगामिता के बीच चले आ रहे विरोध पर प्रकाश डाला। श्री धर्मराव ने बताया कि तेलगू प्रगतिशीलता की अभिव्यक्ति लड़ाई उन लेखकों के द्वारा हुई जो संस्कृतनिष्ठ भाषा के प्रयोग की बाह्मणवादी प्रवृत्ति के विरोध में लड़ रही जनता के करीब थे। उन्होंने घोषित किया कि अपनी बढ़ी उम्र के बावजूद मैं आंध्र प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के पूर्णतः साथ हूँ क्योंकि इस आन्दोलन के माध्यम से हमारे साहित्य को जनता के निकट लाया जा सकता है तथा इसमें नयी जान फूंकी जा सकती है।
जोश मलीहाबादी का भाषण छोटा था, पर उन्होंने हमारे साहित्य की एक महत्वपूर्ण समस्या, लेखकों को अनुशासनबद्ध करने की समस्या, पर प्रकाश डाला। अपने अप्रितम तरीके से उन्होंने बताया कि लेखकों को अनुशासन में नहीं बाँधा जाना चाहिये, हमारे जैसे साहित्यिक संगठन का उद्देश्य आदर्शों और उद्देश्यों का प्रतिपादन होना चाहिये और लेखक को छूट होनी चाहिये कि वह इन्हें अपने तरीके से अभिव्यक्ति दे। जोश का कहना था कि प्रगतिशील लेखक संघ ने अपने सम्मुख जो उद्देश्य रखे हैं वे इतने महान और उदात्त हैं कि सभी सही किस्म के लेखक और कवि उन्हें आवश्यक तौर पर स्वीकार करेंगे।
प्रगतिशील लेखक संघ के तीसरे अधिवेशन (मुम्बई,1943) का घोषणा पत्र
इस गंभीर संकट के काल में हिन्दुस्तान के प्रगतिशील लेखकों का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्र के मनोबल को सुदृढ़ बनाएं। उनका फर्ज है कि वे जनता के साहस और संकल्प को मजबूत करें, ताकि हमारी आजादी का दिन नजदीक आए, हमारी संस्कृति और सभ्यता सुरक्षित रहे. उसकी उन्नति हो और हम इस कठिन संकट काल से स्वतंत्र शक्तिशाली और संगठित होकर निकल सकें।
प्रगतिशील लेखक सदा से ही भारत की स्वतंत्रता और देश में एक न्यायोचित सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के लिए लड़ते रहे हैं। यही नहीं उन्होंने हर प्रकार की सामाजिक प्रतिक्रिया और प्रगतिशील विचारधारा के खिलाफ भी संघर्ष किया है। हिन्दुस्तान की स्वतंत्रतता को उन्होंने विश्व की स्वतंत्रता के एक अभिन्न अंग के रूप में समझा है और जहां उन्होंने जनता के हर प्रकार के साम्राज्यवादी प्रभुत्व से मुक्त होने और अविच्छिन्न अधिकार की घोषणा की है, वहां उन्होंने फासिज्ज का भी विरोध किया है, जो साम्राज्यवादी सत्ता का ही खूंखार रूप है।
जिस समय हमारी पुरानी परिचित दुनिया नष्ट-भ्रष्ट हो रही है और इतने दिनों से अपनाई हुई मान्यताओं की पुनर्स्थापना की आवश्यकता हो, यदि लेखक अपने जीवन-कार्य के प्रति ईमानदार रहना चाहता है तो उसे जनता से नाता जोड़ना होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम इस बात से इन्कार करते हैं कि साहित्य-रचना एक कठिन कला है. जिसकी अत्यन्त प्राचीन और अनोखी परपंराएं हैं। न इसका यही मतलब है कि हम इस प्रवंचना में पड़ जाएं कि आज्ञा दे देने से ही परिपक्व नई संस्कृतियां तैयार हो जाती हैं। लेकिन जब समाज पीड़ाग्रस्त हो. जब वह अपने जीवन-मरण के संघर्ष से गुजर रहा हो, तब लेखक को स्वयं अपने ही हित की रक्षा अपने शीशमहल से बाहर निकल आना चाहिए। यह हम केवल कुछ थोड़े चुने हुए लोगों को ही सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक समझेंगे, तो जैसा कि फासिज्म के अंतर्गत उन देशों में हुआ है जो उसके लौह बूटों के नीचे कुचले जा चुके हैं यहा भी अन्याय और जुल्म की शक्तियां उन्हें अवश्य ही पाशविक दमन के बल से जबर्दस्ती अपने अधीन कर लेगी। सोवियत का उदाहरण हमें बतलाता है कि क्रांति किस प्रकार प्रतिष्ठा, गौरव और सभ्यता को आम जनता की संपत्ति बनाने का असर देती है।
हमारा देश अपने इतिहास के सबसे गंभीर संकट में फंसा हुआ है। एक ओर एक क्रूर और नालायक विदेशी साम्राज्यवादी नौकरशाही जनता के हाथ में ताकत देने से इंकार कर रही है, दूसरी ओर खूंखार लुटेरा, जापानी फासिज्म हमारे पूर्वी सीमांत का दरवाजा खटखटा रहा है। हजारों देशभक्त जेलों में बंद पड़े हैं। फासिस्ट आसाम और बंगाल पर बम बरसा रहे हैं, अन्न और वस्त्र की दिन-ब-दिन कमी होती जा रही है। कागज और किताब और पत्र छपाने के लिए जरूरी दूसरी चीजों की सख्त कमी है, जिसके कारण एक ऐसी परिस्थिति पैदा हो गई है, जो हमारे सांस्कृतिक जीवन के विकास के लिए बहुत खतरनाक है। उत्पादन अस्त-व्यस्त हो रहा है। हमारे समाज की पूरी आर्थिक व्यवस्था के छिन्न-भिन्न हो जाने की आशंका है।
हिंदुस्तान के प्रगतिशील लेखक रवींद्रनाथ ठाकुर और इकबाल की महान मानववादी और स्वतंत्रता प्रेमी परंपराओं के उत्तराधिकारी हैं। आज वे अपनी जनता को स्वतंत्र देखना चाहते हैं, संसार के सभी राष्ट्रों को साम्राज्यवाद और फासिज्म के खतरे से मुक्त कराना चाहते हैं। हम सोवियत और चीन के लेखकों की ओर आदर और श्रद्धा से देखते हैं, जो अपनी बहादुर जनता के साथ-साथ इस कठोर फासिस्ट विरोधी लड़ाई के कष्टों और तकलीफों को बर्दाश्त कर रहे हैं और इस कटु और कष्टकर युद्ध में भाग लेते हुए गौरव और उल्लास का भी अनुभव कर रहे हैं। इस अंधकार की घड़ी में भी वे कला और साहित्य की लौ को जाग्रत किए हुए हैं। हम भी अपने देश की स्वतंत्रता और एकता के संदेश को अपने देशवासियों के पास पहुंचाएंगे, और उनके अंदर उनकी अपनी ही शक्ति में विश्वास जाग्रत करने का अनवरत प्रयत्न करेंगे। आज प्रगतिशीलता का और दूसरा कोई अर्थ नहीं है। जब मानव-समाज की नींव ही खतरे में हो, जब उसके संपूर्ण भविष्य के अंधकारमय हो जाने की आशंका हो, जब फासिस्ट प्रतिक्रियावाद जीवन में जो कुछ भी अच्छा, भला और सुन्दर है, उसे नष्ट करने के लिए अपना अंतिम हमला कर रहा हो और जब प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी दल हमारे देशवासियों की स्वतंत्रता और एकता के पथ को रोके खड़ा हो, तब प्रगतिशीलता को हर आदमी तक आशा और आजादी का संदेश ले जाना चाहिए और ऐलान कर देना चाहिए कि जो कौम आजादी पाने के लिए एक हो जाएगी, उसे दुनिया की कोई भी ताकत नहीं हरा सकती।
आगामी कार्य योजना –
इन आम उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए प्रगतिशील लेखक संघ को नीचे लिखी विशेष बातें जरूर करनी चाहिए :
(1) छोटे-छोटे नाटकों, कहानियों, कविताओं, गीतों और पवाड़ों की रचना, जिनमें साम्राज्यवादी गुलामी से छुटकारा पाने के लिए और जापानी आक्रमणकारियों से अपने देश की रक्षा करने के लिए राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर जोर दिया गया हो।
(2) विदेशी प्रगतिशील रचनाओं और विशेष कर सोवियत और चीनी साहित्य का अनुवाद और प्रचार करना चाहिए।
(3) समय-समय पर नियमित रूप से विभिन्न हिन्दुस्तानी भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं का अंग्रेजी में संकलन निकालना चाहिए।
(4) हिंदुस्तान की विभिन्न भाषाओं में प्रगतिशील साहित्य के संग्रहों और पत्र-पत्रिकाओं को प्रकाशित करना चाहिए।
(5) मजदूरों और किसानों के बीच साहित्यिक और सांस्कृतिक क्लबों या बैठकों (मुशायरों, कवि सम्मेलनों) का संगठन करना चाहिए और प्रगतिशील लेखक संघ का जन-साहित्य और कला से संबंध स्थापित करना चाहिए।
(6) भारतीय जननाट्य संघ के सहयोग से ऐसे नाटकों आदि की रचना करनी चाहिए।
(अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ तीसरा सम्मेलन, 22-25 मई 1943, मुम्बई)
इस अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि संगठन का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ से हटाकर मुम्बई कर दिया जाए। यह भी निश्चय पाया कि डॉ. अब्दुल अलीम के स्थान पर दुबारा सज्जाद जहीर का महामंत्री का कार्यभार संभालें। ख्वाजा अहमद अब्बास को ज्वाइंट सेक्रेटरी बनाया गया।
(“अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का इतिहास ” से संदर्भ लिए गए हैं। फोटो गूगल से साभार।)
