कांग्रेस या गांधी- नेहरू की नीतियों आलोचना का अधिकार भगतसिंह सहित उन तमाम देशभक्तों को है, जो स्वतंत्रता की राह के हमराही थे, लेकिन उनको नहीं, जिन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलनों से पर्याप्त सुरक्षित दूरी बनाए रखी।
यद्यपि कांग्रेस की अहिंसात्मक विचारधारा और क्रांतिकारियों की विचारधारा में मूलभूत अंतर था, पर उद्देश्य एक ही था और वह था देश की स्वतंत्रता। जहां कांग्रेस जनांदोलन के जरिए स्वतंत्रता प्राप्ति की लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ रही थी, वही क्रांतिकारी संगठन को सशस्त्र क्रांति और हिंसात्मक गतिविधियों में विश्वास के कारण सार्वजनिक रूप से चलाया जाना संभव नहीं था। क्रांतिकारी संगठनों की प्रकृति इसकी इजाज़त नहीं देती थी।
पुलिस क्रांतिकारियों की विशुद्ध राजनीतिक गतिविधियों को भी हिंसा, हत्या और ब्रिटिश क्राउन के खिलाफ साजिश के रूप में पेश करके उनको गंभीर धाराओं में निरुद्ध करने को तत्पर रहती थी। ऐसे में क्रांतिकारियों को उस तरह की आजादी ले पाना संभव नहीं था, जिस तरह कांग्रेस के आंदोलनकारियों को थीं।
उदाहरण के तौर पर जब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के प्रतीकात्मक विरोध हेतु असेंबली में खाली जगह बम फेका था और बम फेकने की वजह, बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होने में बताई थी, तब उनके इस कृत्य को महामहिम सम्राट की प्रजा को जान से मारने वाला बताया गया।
हालांकि बाद में वायसराय ने एक विशेष वक्तव्य जारी किया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि “दोनों हमलावरों ने यह ध्यान रखा था कि किसी को मारा न जाए। अगर वे चाहते तो कहर बरपा सकते थे।”
भगतसिंह और दत्त दोनों के पास रिवॉल्वर थीं और दोनों के पास उस भगदड़ में भागने का पर्याप्त समय था, लेकिन न तो वे भागे और न ही किसी पर गोलियां दागी। भगतसिंह ने पुलिस को खुद ही पिस्तौल सौंप दी और खुद को गिरफ्तार करवाया। वे गिरफ्तार होकर अदालत के जरिए अपने क्रांतिकारी उद्देश्यों को लोगों तक पहुंचाना चाहते थे।
अदालत के कटघरे में दिए गए उनके बयान पूरे देश में चर्चा के विषय बने। वे बताना चाहते थे कि क्रांति का उद्देश्य मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का खात्मा करना है।
तो कहने का मतलब जब अंग्रेजी सत्ता भरी संसद में भगतसिंह और दत्त द्वारा किए गए अहिंसक विस्फोट और तत्पश्चात् उनके स्वयं समर्पण की अनदेखी कर उनको गंभीर मामलों में फंसाने के लिए झूठे मुकदमे तैयार कर रही थी, तो अन्य किसी क्रांतिकारी को पकड़ने पर क्या उसे यूँ ही छोड़ देती? इसलिए क्रांतिकारियों की सांगठनिक गतिविधियों का गुप्त रहना स्वाभाविक ही था।
लेकिन इन सब बातों के बावजूद क्रांतिकारी कांग्रेस के आंदोलनों पर गहरी नज़र रखते थे और उनके द्वारा हस्तगत उपलब्धियों की स्वस्थ विवेचना भी करते थे। आवश्यक होने पर कड़ी आलोचना भी करते थे। यह उचित भी था। आलोचना प्रायः कड़ी ही होती, क्योंकि क्रांतिकारी स्वभावतः संपूर्ण और त्वरित परिवर्तन चाहते थे। कांग्रेस सभी वर्गों जो प्रायः विरोधी वर्गचरित्र के होते, को साथ लेकर चलती। वह आंदोलन के विस्तारीकरण के लिए इसे जरूरी समझती। उसका मध्यवर्गीय चरित्र क्रमिक परिवर्तन का आकांक्षी था।
प्रायः बड़े कांग्रेस के नेताओं से क्रांतिकारियों के संबंध भी रहते थे। संबंध सद्भावपूर्ण ही थे क्योंकि दोनों पक्ष यह जानते थे कि तरीके भले ही भिन्न-भिन्न हों, पर दोनों का उद्देश्य एक है।उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी और क्रांतिकारियों के संबंध सर्वविदित हैं। काकोरी अभियुक्तों के वकील कांग्रेस के चंद्रभानु गुप्ता थे, जो बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
भगतसिंह के वकील आसफ अली थे, जो कांग्रेस के युवा नेता थे। इसके अलावा जब भगतसिंह ने क्रांतिकारियों को राजनीतिक कैदी माने जाने और जेलों के अमानवीय व्यवहार को लेकर भूख हड़ताल की, तो कांग्रेस ने इसे गम्भीरता से लिया। मोतीलाल नेहरू ने सरकार की निंदा करते हुए कहा, “कैदियों ने यह भूख हड़ताल अपने लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक उद्देश्य के लिए की है।”
आप कह सकते हैं कि यह भूख़ हड़ताल कांग्रेस के तौर-तरीकों से मेल खाती थी। क्रांतिकारी स्वभावतः हिंसा-पसंद नहीं थे, बल्कि सच तो यह है कि वे उच्च मानवीय मूल्यों से संपृक्त थे।
भूख हड़ताल जब लंबी खिंची तो जवाहरलाल नेहरू जेल में भगतसिंह और अन्य क्रांतिकारियों से मिलने जेल गए। उन्होंने बयान जारी करके कहा कि, “हमारे नायकों की हालत को देखकर मुझे बड़ी गहरी तकलीफ़ पहुंची है। उन्होंने इस संघर्ष में अपनी जिन्दगी दांव पर लगा दी है…. मुझे पूरी उम्मीद है कि अपने इस त्याग से उन्हें उन्हें अपने इरादों में जरूर सफलता मिलेगी”
यहाँ तक कि जिन्ना ने भी भगतसिंह की भूख हड़ताल को सेंट्रल असेंबली में उठाया। मगर आश्चर्य है कि स्वघोषित राष्ट्रवादी संगठन की तरफ से इन क्रांतिकारियों के पक्ष में कोई बयान नहीं दिखता।
इसी भूख हड़ताल में जब एक अन्य क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ दास शहीद हो गए तो सुभाष चंद्र बोस ने उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कलकत्ता लाने के लिए 600 रुपए भेजे।
इस दुखद घटना के बाद असेंबली में मोतीलाल नेहरू ने लाहौर जेल के कैदियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को लेकर सदन को भंग करने का प्रस्ताव रखा।
खैर बताते हैं कि जब भगतसिंह सहित अन्य सभी क्रांतिकारियों पर अदालत में मुकदमा चल रहा था तो मोतीलाल नेहरू, रफी अहमद किदवई और राजा कालाकांकर आदि अदालत में उपस्थित होकर उनकी हौसला अफजाई की।
शहीदों को बचाने की कोशिशें हर तरफ़ से हुईं।
एक बार सरदार किशन सिंह ने पुत्र को जीवित देखने की ख्वाहिश के चलते, जो कि स्वाभाविक ही था, 20 सितम्बर 1930 को ट्रिब्यूनल में एक अर्जी दाखिल करके कहा कि सांडर्स की हत्या वाले दिन भगतसिंह लाहौर में नहीं थे। हालांकि पिता किशन सिंह खुद एक बड़े क्रांतिकारी थे। लेकिन जब यह बात भगतसिंह को पता चली तो वे बहुत नाराज हुए और इस अर्जी से खुद को अलग कर लिया। ज्ञात हो कि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी सांडर्स हत्याकांड के आधार पर ही दी गई थी।
भगतसिंह अपने बचाव के सख़्त ख़िलाफ़ थे। बल्कि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 20 मार्च 1931 को संयुक्त रूप से पंजाब के गवर्नर के नाम एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि,”हमारे साथ युद्धबंदियों की तरह व्यवहार किया जाय और फाँसी पर लटकाने की बजाय हमें गोलियों से भून डाला जाय।”
इधर गांधी जी ने 23मार्च 1931 को वायसराय को लिखा कि, “सही हो या गलत, लेकिन जनमानस सजा को कम किए जाने की माँग कर रहा है। अगर कोई सिद्धांत दांव पर न लगा हो, तो इसका सम्मान करना अकसर एक कर्तव्य की तरह होता है…… मेरे ख्याल से कोई और क्रांतिकारी हत्या होने तक इस सजा को स्थगित करना एक हक़शफा फर्ज बन जाता है। इससे पहले भी राजनीतिक हत्याओं को माफ़ किया जा चुका है। गांधी ने अंत में लिखा कि दानवीरता कभी भी बेकार नहीं जाती।”
मदन मोहन मालवीय जी ने भी इन शहीदों को बचाने के लिए वायसरॉय के नाम एक तार भेजा था।
लेकिन यह सारी कोशिशें व्यर्थ गईं।
अंत में वह दिन भी आ गया जब अंग्रेजों ने न्याय का नाटक करते हुए उन्हें फांसी दे दी। पूरा हिंदुस्तान गहरे शोक में डूब गया। उस समय शहीद भगतसिंह की प्रतिष्ठा देश में महात्मा गांधी के ही बराबर हो गई थी। अगर ज़्यादा भी हो गई हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
फांसी पर त्वरित प्रतिक्रिया जवाहरलाल नेहरू की थी, उन्होंने कहा – “भगतसिंह एक निर्मल-हृदय योद्धा थे, जिन्होंने शत्रु को खुले मैदान में ललकारा था। वे देश के लिए गहरे जज़्बे से भरे एक होनहार नौजवान थे।”
फांसी के सप्ताह भर बाद कांग्रेस का सरदार पटेल की अध्यक्षता में कराची अधिवेशन हुआ। गांधी को विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। लोगों का यह मानना था कि गांधी ने इन शहीदों को बचाने में सामर्थ्य भर कोशिश नहीं की। सुभाष बाबू भी बहुत दुखी थे, लेकिन बोस ने यह माना कि गांधी जी ने अपनी तरफ़ से पूरा जोर लगाया था।
गांधी जी ने कहा – “मैं यहां अपना बचाव करने नहीं आया था, इसलिए मैंने ये तथ्य सामने रखने की जरूरत नहीं समझी है कि भगतसिंह और उनके कामरेडों को बचाने के लिए मैंने क्या किया। मैंने सभी तरीकों से वायसरॉय को मनाने की कोशिश की। भगतसिंह के रिश्तेदारों के साथ अपनी मुलाकात के बाद मैंने निर्धारित तारीख यानी 23 की सुबह वायसरॉय को एक व्यक्तिगत पत्र लिखा जिसमें मैंने अपने दिल और अपनी आत्मा को निचोड़कर रख दिया लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ….”
अधिवेशन में तीनों क्रांतिकारियों की शहादत की ही चर्चा रही। निश्चित तौर पर लोग दुःखी और आक्रोशित थे, बावजूद इस स्थिति में भी लोग गांधी के प्रति सम्मान बनाए रहे, जबकि वे उन्हें दोषी मान रहे थे। वे शालीनता से उन्हें काले फूल देकर अपना विरोध दर्ज़ कराया। यह बड़ी बात है। आख़िर गांधी भी देश की आजादी के एक योद्धा थे, भले ही अलग राह के राही हों।
अधिवेशन में भगतसिंह के पिता किशनसिंह का भाषण सबको भावुक कर गया। लोग फूटफूटकर रोने लगे थे। उन्होंने कहा -“हमसे भगत ने कहा था कि तुम परेशान न होओ। मुझे फांसी लगने दो, यही ठीक है। हमें फांसी लगी तो एक हफ़्ते में ही स्वराज मिल जाएगा………. इसके बाद उन्होंने लोगों से अपील की – “आपको अपने जनरल (गांधी जी) का साथ देना है। आपको सभी कांग्रेस नेताओं का साथ देना है। तभी आप देश के लिए आजादी हासिल कर सकते हैं”
यह घटना बताती है कि कांग्रेस में एक ऐसी अंतर्धारा थी जो हिंसा-अहिंसा के औपचारिक विभेद से इतर क्रांतिकारियों से गहरे से जुड़ी हुई थी।
बेशक कांग्रेस या गांधी- नेहरू की नीतियों आलोचना का अधिकार भगतसिंह सहित उन तमाम देशभक्तों को है, जो स्वतंत्रता की राह के हमराही थे, लेकिन उनको नहीं, जिन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलनों से पर्याप्त सुरक्षित दूरी बनाए रखी। इसलिए भला इसीमें है कि ऐसे लोग कांग्रेस बनाम क्रांतिकारी खेल न खेलें।
- संजीव शुक्ल की पोस्ट से साभार
