रवींद्रनाथ टैगोर पर सवाल करते हैं, उन्हें नही पता कि उन्होंने कितना लिखा है और क्या क्या किया है । एशिया का पहला व्यक्ति,जो साहित्य के नोबल तक पहुँचा, जिसका लेखन लगभग अठारह हज़ार पन्नों में दर्ज है ।
रवींद्रनाथ टैगोर बहुत औसत कवि थे । ज़बरदस्ती उन्हें कुछ ज़्यादा ही महत्व दिया गया…..
अक्सर ऐसी बातें सामने आ जाती है । यह कहने वाला साहित्य की गलियों का ही हो,ज़रूरी नही । कोई भी सड़क से उठकर गुरुदेव पर ऐसे सवाल उठा सकता है । क्योंकि अब तो यह परम्परा ही हो चली है कि बड़ी,ऊंची शख़्सियत पर कीचड़ उछालो और अपने सर पर एक भीड़ का मुकुट धर लो ।
जो रवींद्रनाथ टैगोर पर सवाल करते हैं, उन्हें नही पता कि उन्होंने कितना लिखा है और क्या क्या किया है । एशिया का पहला व्यक्ति,जो साहित्य के नोबल तक पहुँचा, जिसका लेखन लगभग अठारह हज़ार पन्नों में दर्ज है । जिसमे कविता,कहानी,उपन्यास हैं । जिसने लिखा,तो इतना डूबकर लिखा कि ज़माना उसके सामने झुक गया ।
उन्हें तो नाइटहुड भी मिला था मगर जब जलियांवाला बाग़ हुआ,तो उन्होंने उस वक़्त के राजा को नाइटहुड सम्मान लौटा दिया । यह विरोध था,एक भारतीय लेखक का,अपने भारतीय भाइयों के लिए,अंग्रेज राजा के ख़िलाफ़ ।
रवींद्रनाथ टैगोर ने एक ऐसी यूनिवर्सिटी की कल्पना की,जिसके तौर तरीके बंधे हुए न हों,जो दिमाग़ को खोलकर ऐसे विद्यार्थी समाज को दे,जो खुद में एक विश्वविद्यालय हों । वह बाउंड्रीज से बंधे न हों,वह हर ओर से खुले आज़ाद होकर सोच सकें,पढ़ सकें ।
तब जाकर दुनिया के सामने एक कवि के ख्यालों का कैम्पस, शांति निकेतन आया । यानी शांति का घर । यह विश्वविद्यालय उस कवि के हाथों से उपजा है, जिसे सारी दुनिया ने सम्मान दिया । जिन्हें हमारी माटी ने भरपूर सम्मान दिया । हमारे बुज़ुर्गों ने उनकी बेपनाह इज़्ज़त की क्योंकि वह इसके हक़दार थे ।
लखनऊ के बाद कलकत्ता में प्रगतिशील लेखक संघ का दूसरा सम्मेलन रखा गया । लखनऊ में इसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी,कलकत्ता में रवींद्रनाथ टैगोर से प्रार्थना की गई कि वह अध्यक्षता करें । कॉन्फ्रेंस का समय आ गया । गुरुदेव बहुत बीमार हो गए, उसमें नही आ सके । तो अध्यक्ष की कुर्सी पर रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर रखकर, उनका अध्यक्षीय भाषण पढ़ा गया । यह कमाया था गुरुदेव ने की उनका सम्मान धरती का हर समझदार इंसान करता था ।
आज गुरुदेव की पुण्यतिथि है । उन्होंने ही हमारे देश के ख़मीर को महसूस करके एक बूढ़े को महात्मा कह कर पुकारा था । आज भी लोग कहते हैं कि हम भला उन्हें महात्मा क्यों कहें,भाई न कहो तुम,वैसे भी तुम रवींद्रनाथ नाथ टैगोर नही हो, न ही उनकी परम्परा के हो,वह तो गुरुदेव थे,जिन्होंने महात्मा कहा,तो दुनिया ने उन्हें महात्मा कहकर पुकारा ।
गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जे बी पादरिवाला की पीठ ने इसी एक मामले में सुनवाई करते हुए,तथ्य इकट्ठे करके, वादी संध्या के लिए फैसला दिया था कि महात्मा का खिताब रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था । रवींद्रनाथ टैगोर एक खुली सोच के महान कवि थे । जिसका एक नमूनाभर है शांतिनिकेतन, जहाँ कौन कौन पढ़ा है, यह भी खोज लें,तो समझ आ जाएगा वह कौन थे ।
एक बार और अगर रबिन्द्रनाथ टैगोर और उनके खानदान के बारे में कुछ निजी पढ़ना है । तो अनिमेष मुखर्जी की ठाकुरबाड़ी पढ़ डालियेगा ।।काफी कुछ आप जान लेंगे ।
हमने जनगण मन की अवधारणा और गीतांजलि पर नही लिखा,क्योंकि आपको उनका महत्व पता ही होना चाहिए….
और गुरुदेव, गुरुदेव ही हैं,दुनिया उन्हें हमेशा सम्मान से ही याद करेगी।
ह(फ़ीज़ अतीक किदवई की पोस्ट से साभार)
