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आज के दौर में मुश्किल यह है हमारे पास संचार की तकनीक है लेकिन मानवीय सहानुभूति नहीं है। तकनीक से संपर्क रहता है ,दूरियॉं कम नहीं होतीं। बल्कि तकनीक दूरियॉं बढ़ा देती है। दूरियों को कम करने के लिए हमें अपने व्यवहार में प्रेम और मानवीय सहानुभूति का समावेश करना होगा।
इंटरनेट युग में संपर्क और संबंध पेट नहीं भरते,मोबाइल की बातों से संतुष्टि नहीं मिलती,आज हमें सभी किस्म के अत्याधुनिक तकनीकी और संचार साधन चैन से जीने का भरोसा नहीं देते, बार बार अलगाव का एहसास परेशान करता है ,चिन्ता होने लगती है कि आखिरकार हम किस दुनिया में जी रहे हैं। इस अलगाव से मुक्ति कैसे पाएं और इसका सामाजिक स्रोत कहां है ? इस समस्या के समाधान के बारे में मुक्तिबोध मशाल हैं। अकेलेपन की रामबाण दवा हैं।
मुक्तिबोध ने लिखा अकेलेपन की अवस्था में '' मन अपने को भूनकर खाता है।' यह वाक्य बेहद मारक है। हम गंभीरता से सोचें कि इससे कैसे बचें। ऐसी अवस्था में हम अपने लिए मार्गदर्शक खोजते रहते हैं,अपने जीवन के चित्र और अपने जीवन की समस्याओं के समाधान नेट से लेकर साहित्य तक खोजते रहते हैं लेकिन हमें अपनी समस्याओं के समाधान नहीं मिलते। थककर हम चूर हो जाते हैं और सो जाते हैं। अलगाव को दूर करने के लिए नेट,मोबाइल और फोन पर घंटों बातें करते रहते हैं। इसके बावजूद बेचैनी दूर नहीं होती,जीवन में रस-संचार नहीं होता। इसका प्रधान कारण है हमारी बातचीत,संपर्क और संवाद से मानवीय सहानुभूति का लोप।
मानवीय सहानुभूति के कारण ही हम एक-दूसरे के करीब आते हैं। हम चाहे जितना दूर रहें कितना ही कम बातें करें मन भरा रहता है क्योंकि हमारे मानवीय सहानुभूति से भरे संबंध हैं। लेकिन आज के दौर में मुश्किल यह है हमारे पास संचार की तकनीक है लेकिन मानवीय सहानुभूति नहीं है। तकनीक से संपर्क रहता है ,दूरियॉं कम नहीं होतीं। बल्कि तकनीक दूरियॉं बढ़ा देती है। दूरियों को कम करने के लिए हमें अपने व्यवहार में प्रेम और मानवीय सहानुभूति का समावेश करना होगा। प्रेम और मानवीय सहानुभूति के कारण ही जिन्दगी के प्रति आस्था,विश्वास और प्रेम बढ़ता है।
मुक्तिबोध की नजर में इसका प्रधान कारण है ' आजकल आदमी में दिलचस्पी कम होती जा रही है।' अलगाव में मनुष्य दोहरी तकलीफ झेलता है वह 'स्व' और 'पर' दोनों को दण्ड देता है। मुक्तिबोध के अनुसार जिन्दगी जीने अर्थ है 'बिजली-भरी तड़पदार जिन्दगी' जीना। ' ऐसी जिन्दगी जिसमें अछोर,भूरे,तपते , मैदानों का सुनहलापन हो, जिसमें सुलगती कल्पना छूती हुई भावना को पूरा करती है, जिसमें सीने का पसीना हो, और मेहनत के बाद की आनन्दपूर्ण थकन का सन्तोष हो। बड़ी और बहुत बड़ी जिन्दगी जीना (इमेन्स लिविंग) तभी हो सकता है,जब हम मानव की केन्द्रीय प्रक्रियाओं के अविभाज्य और अनिवार्य अंग बनकर जिएं। तभी जिन्दगी की बिजली सीने में समाएगी।'
मुक्तिबोध के अनुसार सार्थक जीवन की अभिलाषा रखना एक बात है और उसके अनुसार जीवन जीना दूसरी बात है। यह भी लिखा हर आदमी अपनी प्राइवेट जिन्दगी जी रहा है । या यों कहिए कि व्यावसायिक और पारिवारिक जीवन का जो चक्कर है उसे पूरा करके सिर्फ़ निजी जिन्दगी जीना चाहता है। मैं भी वैसा ही कर रहा हूँ । मैं उनसे किसी भी हालत में बेहतर नही हूँ । लेकिन क्या इससे पार्थक्य की अभावात्मक सत्ता मिटेगी ? क्या इससे मन भरेगा,जी भरेगा ? यह बिलकुल सही ख्याल है कि सच्चा जीना तो वह है जिसमें प्रत्येक क्षण आलोकपूर्ण और विद्युन्मय रहे,जिसमें मनुष्य की ऊष्मा को बोध प्राप्त हो। किन्तु यह तभी संभव है जब हम अपने विशिष्टों और सुविशिष्टों को किसी व्यापक से सम्बद्ध करें,विशिष्ट को व्याप्ति प्रदान करना, केवल बौद्धिक कार्य नहीं है,वह मूर्त, वास्तविक ,जीवन -जगत् संबंधी कार्य है। तभी उस विशिष्ट को एक अग्निमय वेग और आवेग प्राप्त होगा , जब वह किसी दिशा की ओर धावित होगा।यह दिशा विशिष्ट को व्यापक से सम्बद्ध किए बिना उपस्थित नहीं हो सकती।
मुक्तिबोध ने हिन्दू धर्म और दर्शन की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या निर्मित की है। सबसे पहले हम देवी-देवताओं के संदर्भ में उनकी व्याख्याओं को देखें। आम तौर पर देवी-देवताओं की देवत्ववादी व्याख्याएं मिलती हैं। इस मूल्यांकन में मुक्तिबोध देवत्व भावना के प्रति समाजशास्त्रीय नजरिया व्यक्त करते हैं। मुक्तिबोध के अनुसार ब्रह्मा,बिष्णु, और महेश का संबंध क्रमश: जन्म, विकास और मृत्यु से है। साथ ही उत्पत्ति ,पालन और संहार इन तीन प्राकृतिक क्रियाओं से ये तीनों देवता जुड़े हैं। इसी रूप में इनकी व्याख्याऍं भी मिलती हैं।
मुक्तिबोध का मानना था ‘ वैदिक आर्यों ने सृष्टि की शक्तियों में देव -रूप देखा। ऋग्वेद में जो देवता हैं वे प्रकृति के नाना रूपों और शक्तियों के प्रतीक हैं। आगे ,चलकर, उन्होंने कण-कण में समाए परमात्मा की भावना की। प्रारम्भ में वे प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के उपासक थे। हम वैदिक देवताओं को तीन भागों में बॉंट सकते हैं : (1) सर्वोच्च शून्याकाश के देवता,जैसे द्यौस्, अश्विन,सूर्य तथा उसके विभिन्न रूप, जैसे सवित् ,उषस्, और इनके अतिरिक्त ,विष्णु और वरूण; (2) पृथ्वी के देवता,जैसे, अग्नि,सोम, सरस्वती, तथा पृथ्वी; और इन दोनों के बीच , (3) अन्तरिक्ष देवता जैसे इन्द्र,वायु,पर्जन्य,मरूत। इनमें सर्वाधिक प्राचीन हैं द्यौस् और पृथ्वी। द्यौस् या द्यौ: आकाश का चमकता देवता था। वह हमारा पिता था,पृथ्वी माता थी। किन्तु ,ज्यों -ज्यों समय आगे बढ़ता गया ,द्यौ : के स्थान पर वरूण का तथा इन्द्र का माहात्म्य बढ़ता गया। आगे चलकर वरूण समुद्रों का , जल का भी देवता बना। यही नहीं, वह सत्य और ऋत का (विश्व -व्यवस्था , सृष्टि-व्यवस्था ,समाज-व्यवस्था, नैतिकता आदि सबका ) देवता बना। विश्व के त्रिकालदर्शी शासक और अनुशासक के रूप में उसकी कल्पना की गयी। पाप-शान्ति के लिए लोग उससे क्षमा याचना करने लगे। ‘
‘ मन्त्र-दृष्टा ऋषियों ने वरूण के प्रति कुछ अतिशय रसार्द्र स्तवन किए हैं। वरूण के पश्चात् सर्वाधिक लोकप्रिय देवता इन्द्र हैं। वह देवों का अग्रणी अर्थात् नेता है। वह वर्षा करता ,शत्रुओं के दुर्गों को विध्वंस करता। युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए आर्य उसकी प्रार्थना करते। इसके अतिरिक्त सूर्य के विभिन्न रूप -पूषा,मित्र,सवितृ इत्यादि भी आर्यों के प्रिय देवता थे। ‘
मुक्तिबोध ने आर्यों की धर्म -दृष्टि के बारे में लिखा ” आर्यों की धर्म-दृष्टि की बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे देवताओं की सहायता से इसी पृथ्वी पर स्वर्ग बनाना चाहते थे। उनके धर्मौपदेश संसार से विरक्ति या पलायन नहीं सिखाते, वरन् वे इसी जगत् को सर्वांगीण समृद्धि के लिए देवताओं का आवाहन करते हैं। आर्यजन आशावादी थे। उनका अन्त:करण प्रसारशील था। ”
‘ वे मूर्त्तिपूजक नहीं थे,देवताओं के लिए मन्दिर नहीं बनाते थे। प्रकृति-सौंदर्य के प्रति,उनका हृदय सहज रूप से आकर्षित होता। प्रभात की मनोरम सौन्दर्य आभा को ‘देवी’ का रूप देना, उनकी कल्पना का सुन्दर नमूना था। ‘
मुक्तिबोध ने लिखा ‘ इसके बावजूद वे मातृ देवियों के पूजक नहीं हैं। वैदिक धर्म में पुरूष भावों की प्रधानता है। उसमें एक ताजगी है, नवीनता की संवेदना है,विकास और प्रसार की भावनाऍं हैं। उस धर्म में ,स्वर्ग का तो उल्लेख है ,किन्तु नरक का कहीं नहीं । पापी मनुष्य को इसी लोक में दण्ड दे दिया जाता था । उसके लिए नरक के विधान की आवश्यकता नहीं थी। यह हमारा प्रारम्भिक वैदिक धर्म है। ‘
मुक्तिबोध ने लिखा ‘ वेद ‘ श्रुति’ भी कहलाते हैं, इसलिए कि शिष्य ,उन्हें गुरूओं से सुन-सुनकर कण्ठाग्र कर लेते थे। महान् विद्वान ऋषि बादरायण वेदव्यास ने उनका संकलन किया। इसलिए ,ये चारों वेद संहिताऍं कही जाती हैं। संहिता का अर्थ है एकत्र रखना अर्थात् संकलन करना। वेदों का जो रूप आज विद्यमान है वह भगवान वेदव्यास का दिया हुआ है। उन्होंने पुराणों का भी संकलन किया। भगवान वेद-व्यास अपनी माता के अवैध पुत्र थे। इनकी माता कृष्ण वर्ण की,केवट जाति की,शूद्र स्त्री थीं। इनके पिता एक आर्य ऋषि थे । वेदों को संहिता -रूप देने वाला महान् दृष्टा वेदव्यास इस बात का साक्षी है कि जिस भारतीय आर्य सभ्यता का विकास हुआ है उसमें आर्येतर तत्वों का समावेश स्वाभाविक हो उठा था। ”
मुक्तिबोध का उपरोक्त उद्धरण कई नए सवाल पैदा करता है ,पहला तथ्य यह संप्रेषित करता है कि वेदव्यास शूद्र थे, ऐसे में क्या दलित लेखन की परंपरा क्या वेदव्यास से मानी जाए ? यदि ऐसा होता है तो दलित लेखक दुनिया का सबसे पुराना आदिम लेखक कहलाएगा । हमारे दलित बंधु ध्यान दें क्या वेदव्यास से दलित लेखन की परंपरा का आरंभ मानें ? दूसरी महवपूर्ण बात यह निकलती है कि देवी देवताओं के प्रति मुक्तिबोध का नास्तिक भाव नहीं था। वे अपने तर्क यहॉं से आरंभ नहीं करते कि ईश्वर नहीं है। इस अर्थ में वे एक नया धर्मनिरपेक्ष नजरिया व्यक्त करते हैं। इसमें देवताओं के प्रति खारिज करने वाला नहीं बल्कि सम्मान और आदर का भाव है।यही हमारी आधुनिक सामंजस्यवादी दृष्टि की धुरी है।
नामवर सिंह निर्विवाद रूप से सबसे बड़े आलोचक हैं। लेकिन आलोचना में मुक्तिबोध की छाया का भी स्पर्श क्यों नहीं कर पाए ? मुक्तिबोध ने आलोचना को जिस जमीन पर ले जाकर छोड़ा था उसके आगे क्यों नहीं ले जा पाए ? क्या नामवर सिंह जैसे समर्थ आलोचक से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे मुक्तिबोध की जमीन से आगे जाएं और आलोचना का विकास करें। नामवरजी बहुत बड़े आलोवक हैं लेकिन मुक्तिबोध के संदर्भ में उन्होंने वे सावधानियां क्यों नहीं बरतीं जिनके बारे में मुक्तिबोध ने प्रगतिशील आलोचना को सावधान किया था । जाहिर है मुक्तिबोध की बतायी सावधानी हटी और आलोचनात्मक दुर्घटना घटी और हिन्दी आलोचना की सबसे बड़ी दुर्घटना है ‘कविता के नए प्रतिमान’।
सबसे पहले नामवर जी के मुक्तिबोध के प्रति खंडित रवैये पर गौर करें। मुक्तिबोध को ‘कविता के नये प्रतिमान’ में न्यूनतम स्पेस दिया गया है। मुक्तिबोध की समग्र रचनाशीलता पर नहीं सिर्फ एक कविता के कुछ आयामों पर ही विचार किया गया है। मुक्तिबोध ने प्रगतिशील समीक्षा के बारे में जो बातें कही थीं, वे नामवरजी पर भी घटती हैं, मसलन् मुक्तिबोध ने लिखा है ” क्या आपने वास्तविक काव्य-कृतियों को उनकी समग्रता में लेकर किसी कवि -विशेष का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत किया ? ” जाहिर है यह काम नामवरजी ने कम से कम नहीं किया।
मुक्तिबोध का आलोचना या साहित्य में सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने पूंजीवाद को प्रधान एजेण्डा बनाया। मुक्तिबोध की शक्ति वहीं पर चमक के साथ महसूस होती है जहॉं पर वे पूंजीवाद की सबसे तीखी आलोचना करते हैं। आलोचना से लेकर कविता तक पूंजीवाद की निर्मम आलोचना और यह आलोचना भी वर्गीय हितों को केन्द्र में रखकर की गई है। क्या हिन्दी का कोई भी आलोचक वैसी निर्मम आलोचना कर पाया है ?
हमें इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि ‘कविता के नए प्रतिमान’ में किस तरह के प्रतिमानों की चर्चा की गई है ,क्या नामवरजी कोई समाजवादी काव्य प्रतिमान खोज पाए ? क्या कोई ऐसा प्रतिमान स्थिर कर पाए जिससे पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष में रचना और आलोचना का अस्त्र बनाया जा सके ? वे जिन प्रतिमानों की चर्चा करते हैं वे पूंजीवाद का तिलिस्म नहीं तोड़ पाते। उलटे कल्याणकारी राज्य के साथ कदमताल मिलाते नजर आते हैं ।
जिन लेखकों,कवियों और आलोचकों के बारे में विस्तार के साथ विमर्श में नामवरजी उलझे रहे हैं उनमें से अधिकतर आज कहॉं पर हैं ? हिन्दी में उनकी क्या कोई परंपरा है ? ऐसा क्यों हुआ कि मुक्तिबोध हिन्दी के नए साहित्यकारों के प्रतीकपुरूष बन गए और बाकी सिर्फ कवि,आलोचक,लेखक मात्र होकर रह गए।
हिन्दी में अपनी परंपरा प्रेमचंद ने बनायी थी या बाद में मुक्तिबोध ने बनायी । दोनों के यहॉं पूंजीवाद सबसे बड़ा एजेण्डा है, प्रेमचंद ने किसान और मध्यवर्ग की तबाही को चित्रित करके मनुष्य की खोज की थी। ठीक अपने तरीके से मुक्तिबोध ने मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग की पूंजीवाद के द्वारा मचायी गयी तबाही को नंगा किया और मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित किया। पूंजीवाद के प्रति अविचल सिद्धान्तनिष्ठ संघर्ष चलाने के कारण ही ये दोनों हिन्दी के महान् लेखक बने हुए हैं।
अस्मिता विमर्श मूलत: पूंजीवादी विमर्श है । क्या अस्मिता विमर्श अस्मिता,जाित,धर्म,भाषा,नस्ल,गोत्र ,वर्ग आदि के आधार पर तय होगा या नजरिए के आधार तय होगा ? बतर्ज नामवरजी आधुनिक मानव की ज्वलंत समस्या अस्मिता या ‘आइडेंटिटी’ की है। क्या मुक्तिबोध की अस्मिता खोज का प्रकल्प वही है जो बुर्जुआजी का है ? क्या मार्क्सवाद में अस्मिता विमर्श है ? मार्क्सवादी वर्गदृष्टि का अस्मिता के साथ तीन तेरह का रिश्ता है। विचारणीय सवाल यह है कि मुक्तिबोध अपनी कविता और आलोचना में अस्मिता को नष्ट करते हैं या निर्मित करते हैं ? थोड़ी देर के लिए नामवरजी की बात मान लें और विचार करें कि मुक्तिबोध की अस्मिता क्या है ,पहले देखें नामवरजी क्या कहते हैं ।
नामवरजी का मानना है ” ‘अँधेरे में’ कविता की ये अन्तिम पंक्तियॉं उस अस्मिता या’आइडेंटिटी’ की ओर संकेत करती हैं, जो आधुनिक मानव की सबसे बड़ी समस्या है। निस्सन्देह इस कविता का मूल कथ्य है अस्मिता की खोज; किन्तु कुछ अन्य व्यक्तिवादी कवियों की तरह इस खोज में किसी प्रकार की आध्यात्मिकता या रहस्यवाद नहीं , बल्कि गली-सड़क की गतिविधि,राजनीतिक परिस्थिति और अनेक मानव-चरित्रों की आत्मा के इतिहास का वास्तविक परिवेश है। ” नामवरजी की सारी समस्या की जड़ उपरोक्त समझ में है।
अस्मिता कोई वायवीय अथवा वातावरण की चीज नहीं है जिसे गली,सड़क वातावरण में खोजें। अस्मिता वातावरण ,नाटकीयता, मैं और तुम में नहीं बल्कि ठोस सामाजिक इकाईयों में निवास करती है। वह ‘मैं’ और ‘वह’ में वर्गीकृत होकर व्यक्त नहीं होती। नामवरजी ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ में ‘अँधेरे में ‘ कविता की जो आलोचना और व्याख्या लिखी है, वह अपनी जगह सही हो सकती है, मुक्तिबोध को देखने का यह उनका नजरिया है और इसे व्यक्त करना उनका लोकतांत्रिक हक है। लेकिन अस्मिता का अवधारणात्मक विभ्रम पैदा करने की जो उन्होंने कोशिश की है वह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है। नामवर जी का मानना है ” कवि मुक्तिबोध के लिए अस्मिता की खोज व्यक्ति की खोज नहीं अभिव्यक्ति की खोज है।एक कवि के नाते उनके लिए परम अभिव्यक्ति ही अस्मिता है। भाषा स्वभावत: इस अभिव्यक्ति का आधार है।”
सवाल उठता है मुक्तिबोध की भाषा कौन सी है मराठी या हिन्दी ? क्या उनके पास दो भाषाओं की अस्मिता नहीं है ? क्या मुक्तिबोध की मराठी अस्मिता को हिन्दी अस्मिता हजम कर गई या ये दोनों एक-दूसरे पर लदी रही हैं ,क्या मराठी साहित्य,कम्युनिस्ट आंदोलन का मुक्तिबोध की अस्मिता पर कोई असर था ? क्या मुक्तिबोध की पुंस अस्मिता को हम भूल जाएं ? क्या उनकी एक पति, शिक्षक,कम्युनिस्ट,लेखक, ब्राह्मण,पिता,पुत्र आदि में से किसी भी अस्मिता को मुक्तिबोध में से निकाल सकते हैं ?
नामवरजी जानते हैं कि व्यक्ति के पास एक नहीं अनेक अस्मिताएं होती हैं,इनमें प्रतिस्पर्धा और अन्तर्विरोध भी हैं। आप अस्मिता के जंगल में जब एकबार दाखिल हो जाएंगे तो तार-तार होकर निकलेंगे। अस्मिता स्वयं का ही नाश करती है। हम तय कर लें हमें लेखक मुक्तिबोध की अस्मिता पर विचार करना है या मराठी भाषी मुक्तिबोध पर विचार करना है अथवा ‘मनुष्य मुक्तिबोध’ पर विचार करना है। सवाल यह है ‘मनुष्य मुक्तिबोध’ को देखने की बजाय भाषायी अस्मिता वाले मुक्तिबोध को नामवरजी ने क्यों स्थापित किया, क्या यह तत्कालीन भाषायी अस्मिता संघर्षों का नामवरजी पर प्रभाव है ?
‘मनुष्य मुक्तिबोध’ उन तमाम अस्मिताओं और विचारधाराओं का अतिक्रमण करता है जिसमें उसे बांधने की कोशिश की जा रही है। एक और सवाल पैदा होता है कि मुक्तिबोध के यहॉं मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित करने का काम किया गया है या ‘परम अभिव्यक्ति’ या ‘ भाषायी अस्मिता’ या ‘मैं’ को अथवा मैं और मैं के बीच की नाटकीयता को खोजने पर जोर है या मनुष्य को खोजने पर जोर है। आखिरकार मुक्तिबोध क्या स्थापित करना चाहते हैं।
सवाल उठता है मुक्तिबोध मनुष्य की खोज करते हैं अथवा अभिव्यक्ति की खोज करते हैं। नामवरजी यह भूल ही गए कि पूंजीवाद ने मनुष्य केअस्तित्व पर ही हमला बोला हुआ है,मानवीय मूल्यों की क्षयगाथा बताते हुए मुक्तिबोध अभिव्यक्ति की खोज नहीं कर रहे थे, मनुष्य की खोज कर रहे थे। उन्हें कविता से लेकर आलोचना में मनुष्य की तलाश थी, समाज में मनुष्य के जितने रूप हैं उनके सभी चरित्र व्यक्त होते हैं लेकिन ये चरित्र माध्यमभर हें। सामाजिक चरित्रों की खोज करना उनका लक्ष्य नहीं है लक्ष्य है मनुष्य को खोजना, मनुष्य की अक्षुण्ण सत्ता को स्थापित करने के क्रम में उन्होंने विभिन्न विचारधाराओं की यात्रा की और इस यात्रा में उन्हें लगातार मनुष्य पर पूंजीवाद के बर्बर हमले दिखाई दिए जिसे उन्होंने अपनी अंतर्वस्तु बनाया।
मुक्तिबोध ने पूंजीवाद को नंगा करने के लिए अस्मिता,भाषा और अभिव्यक्ति का नहीं मनुष्य की सत्ता का सहारा लिया, मनुष्य की सत्ता के प्रति इस तरह की गहरी प्रतिबद्धता भारत में बहुत कम लेखकों में नजर आती है।
मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित करने के लिए मुक्तिबोध अनेक किस्म के उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें अस्मिता,भाषा आदि भी हैं, लेकिन उनका लक्ष्य मनुष्य है परम अभिव्यक्ति नहीं। पूंजीवाद ने मनुष्य के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति और भाषा के अपने पैर नहीं होते। मनुष्य के कंधे पर सवार होकर ही वे जाती हैं। मजेदार बात यह है कि स्वयं को व्यक्त करने के लिए भाषा भी चाहिए,अभिव्यक्ति भी चाहिए। लेकिन किसके लिए अस्मिता के लिए अथवा मनुष्य के लिए। मनुष्य की सत्ता ही एकमात्र सत्य है बाकी तो मिथ्याचेतना है। मुक्तिबोध इस अर्थ में अपने युग का और अपने सामयिक साहित्यकारों का अतिक्रमण करते हैं क्योंकि मनुष्य को पाने की जितनी उत्कट आकांक्षा उनके यहॉं है वह अन्यत्र उतनी फोर्स के साथ दिखाई नहीं देती।
आज ग.मा. मुक्तिबोध की पुण्यतिथि है-
जगदीश्वर चतुर्वेदी की पोस्ट से साभार
